मेरी डेढ़ वर्ष की पुत्री है, छोटे मोटे शब्दो का उच्चारण कर लेती है। समझ विकसित हो रही है। बो बो से तुता (कुत्ता) और मम से पापी (पानी) पर आ रही है।
कल नैना (मेरी बेटी) खेलते खेलते सोफे से लड़ गयी। कुछ चोट जरूर लगी होगी क्योंकि उसने रोना शुरू कर दिया। बगल में उसके नाना जी थे।गोद में उठाया और कहा कि राजा बेटा को चोट लग गई। थोड़ा दुलारा पुचकारा और फिर नैना से उन्होंने कहा कि लाओ लाओ जहाँ चोट लगी है वहाँ फूंक देता हूँ।
नाना ने नैना के चोट पर फूँक मार दिया।
हालांकि नैना चुप हो गयी है लेकिन उसके नाना यह जानते हैं कि फूंकने वुकने से कोई फर्क नही पड़ा है।
लेकिन नैना शायद समझ रही है कि फुकने से चोट खत्म हो जाति है।
फूंकने से चोट खत्म हो जाती है यह नैना का ज्ञान है जो दरअसल ज्ञान नही है।
लेकिन, नैना की चेत्तना अभी उतनी विकसित नही है। उसके पास उतने शब्द नही है।
आदमी के पास तो कोई नाना भी नही था जो उसे फूंक मारता उसे तो स्वयं ही यह फूंक भी मारनी थी और इसके साथ कालो तक जीना था; तब तक जबतक उसके साथ विज्ञानं न घटित हो जाए ।
मैं जानता हूं कि नैना अगले कुछ ही सालो में यह समझ जाएगी की फूँक मारने से चोट मिट जाती है, उसकी यह अवधारणा गलत थी क्योंकि यह ज्ञान था ही नही लेकिन, आज भी कई आदमी है जो सभ्यता के उसी काल में जी रहे है।
खैर, मुझे उससे क्या मुझे तो यह सोचना है कि जब लाईट चली जाए और नैना यह सुने की बिजली चली गयी है और नैना यह पूछ ही दे की पापा लाईट का घर कहाँ है तो उसे कैसे समझाऊंगा।
प्रश्न और अ-प्रश्न में फर्क होता है; अ-प्रश्नों के चाहे कितने ही गुढ़ उत्तर दू वह ज्ञान नही होंगे।
ज्ञान के लिए तो सार्थक प्रश्न पूछने होते है।
क्या हमें सार्थक प्रश्न पूछना आ गया है या आज भी हम #जगत विषयक #बिजली_कहाँ_रहती_है का प्रश्न ही कर रहे है?
कल नैना (मेरी बेटी) खेलते खेलते सोफे से लड़ गयी। कुछ चोट जरूर लगी होगी क्योंकि उसने रोना शुरू कर दिया। बगल में उसके नाना जी थे।गोद में उठाया और कहा कि राजा बेटा को चोट लग गई। थोड़ा दुलारा पुचकारा और फिर नैना से उन्होंने कहा कि लाओ लाओ जहाँ चोट लगी है वहाँ फूंक देता हूँ।
नाना ने नैना के चोट पर फूँक मार दिया।
हालांकि नैना चुप हो गयी है लेकिन उसके नाना यह जानते हैं कि फूंकने वुकने से कोई फर्क नही पड़ा है।
लेकिन नैना शायद समझ रही है कि फुकने से चोट खत्म हो जाति है।
फूंकने से चोट खत्म हो जाती है यह नैना का ज्ञान है जो दरअसल ज्ञान नही है।
लेकिन, नैना की चेत्तना अभी उतनी विकसित नही है। उसके पास उतने शब्द नही है।
आदमी के पास तो कोई नाना भी नही था जो उसे फूंक मारता उसे तो स्वयं ही यह फूंक भी मारनी थी और इसके साथ कालो तक जीना था; तब तक जबतक उसके साथ विज्ञानं न घटित हो जाए ।
मैं जानता हूं कि नैना अगले कुछ ही सालो में यह समझ जाएगी की फूँक मारने से चोट मिट जाती है, उसकी यह अवधारणा गलत थी क्योंकि यह ज्ञान था ही नही लेकिन, आज भी कई आदमी है जो सभ्यता के उसी काल में जी रहे है।
खैर, मुझे उससे क्या मुझे तो यह सोचना है कि जब लाईट चली जाए और नैना यह सुने की बिजली चली गयी है और नैना यह पूछ ही दे की पापा लाईट का घर कहाँ है तो उसे कैसे समझाऊंगा।
प्रश्न और अ-प्रश्न में फर्क होता है; अ-प्रश्नों के चाहे कितने ही गुढ़ उत्तर दू वह ज्ञान नही होंगे।
ज्ञान के लिए तो सार्थक प्रश्न पूछने होते है।
क्या हमें सार्थक प्रश्न पूछना आ गया है या आज भी हम #जगत विषयक #बिजली_कहाँ_रहती_है का प्रश्न ही कर रहे है?
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