Wednesday, December 4, 2019

हिन्दू धर्म के चार स्तम्भ

सर्वप्रथम मैं हिन्दू शब्द को वैदिक परम्परा तक और वैदिक् विचारधारा तक ही सीमित रखने का पक्षधर नही हूँ। ऐसी कोई भी विचारधारा सनातन परपरा की विशेषता #समायोजन को इससे दूर कर देती है  अंततः इसे भी #वहाबिज़्म ही बना देती है।
धर्म, विचार दर्शन स्टेटिक नही होता: उसमे निरन्तरता होती है, सातत्यता होती है।

हिन्दू धर्म मात्र अद्वैत नही है और न ही मात्र वैदिक विचारधारा:
हिन्दू धर्म #वैदिक, #पौराणिक, #तांत्रिक (वाममार्ग) और #शाबर विचारों का अद्भुत संगम है।

यहाँ मेरा आपसे एक प्रश्न है कि हम निगम को ही संस्कृति क्यों माने और् आगमो को विकृति क्यों माने?

पुनः पुराणों के विषय मे:
कल्पना कहाँ उपजती है?
चेतना में
चेत्तना का विषय वस्तु क्या है?
वाह्य-आंतरिक #यथार्थ

अब चेत्तना इस वाह्यान्तर के यथार्थ को प्रचलित किस रूप में प्रस्तुत करती है वह प्रस्तुतिकरण मात्र ततसमय  के प्रचलित मानक के अनुसार मिथक या यथार्थवाद बन जाता है।

कहानियां हमेशा काल्पनिक होती है लेकिन कल्पना में हमेशा एक हक़ीक़त होती है।

हम देख न सके तो हमारी गलती।।

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