【वाद:】
जब पूर्वमान्यताओ को निष्कर्ष समझा जाने लगता है तो सम्बंधित पूर्वमान्यताओ पर आधारित चिंतन पद्धति अन्वेषण पद्धति से ज्यादा एक रूढ़ि बनने लगती है, बड़े बड़े क्लेम आने लगते हैं, यह दावे उभरने लगते हैं कि अब जानने को कुछ नही बचा हाँ अगली पीढ़ी बस मापन में प्रिसिजन ला सकती है। इन दावों से ऐसा लगता है जैसे मनुष्य अब सर्वज्ञ बनने ही वाला है।
【प्रतिवाद:】
हमने कोई किसी पूर्वमान्यता के साथ उस मान्यता की स्थापित सीमा में कोई अनुसन्धान प्रारम्भ किया। मान लिया की अब अब तक उस मान्यता पर आधारित जितने भी निष्कर्ष है वह प्रेडिक्टिव पावर रखते हैं। स्थापित निष्कर्षों की भी आपस मे संगति है। अभी तक कोई ऐसा ऑबर्जवेशन नही मिला जिसकी व्याख्या इन पूर्वमान्यताओ कि पृष्ठभूमि में न हो सके तो फिर यह पुरमान्यताएँ स्वयम भी क्या निष्कर्ष नही बन जातीं?
क्या एजम्प्शन और पाश्चयुलेट में फर्क होता है? यदि नही तो आइंस्टीन की स्पेशल रिलेटिविटी थ्योरी के दोनों पाश्चयुलेटस या पूर्वमान्यताएँ क्या अंततः स्पेशल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी के निष्कर्ष भी नही बन जाते और यदि यह निष्कर्ष बन जाते हैं तो फिर संइंटिसिज़्म और द साइंस डेलयूज़न के नाम पर यह कहना कि पूर्वमान्यताएँ जब वैज्ञानिक निष्कर्ष के रूप में स्वीकार कर ली जाती हैं तो विज्ञान रूढ़ि में तब्दील हो जाता है कितना उचित है?
जब पूर्वमान्यताओ को निष्कर्ष समझा जाने लगता है तो सम्बंधित पूर्वमान्यताओ पर आधारित चिंतन पद्धति अन्वेषण पद्धति से ज्यादा एक रूढ़ि बनने लगती है, बड़े बड़े क्लेम आने लगते हैं, यह दावे उभरने लगते हैं कि अब जानने को कुछ नही बचा हाँ अगली पीढ़ी बस मापन में प्रिसिजन ला सकती है। इन दावों से ऐसा लगता है जैसे मनुष्य अब सर्वज्ञ बनने ही वाला है।
【प्रतिवाद:】
हमने कोई किसी पूर्वमान्यता के साथ उस मान्यता की स्थापित सीमा में कोई अनुसन्धान प्रारम्भ किया। मान लिया की अब अब तक उस मान्यता पर आधारित जितने भी निष्कर्ष है वह प्रेडिक्टिव पावर रखते हैं। स्थापित निष्कर्षों की भी आपस मे संगति है। अभी तक कोई ऐसा ऑबर्जवेशन नही मिला जिसकी व्याख्या इन पूर्वमान्यताओ कि पृष्ठभूमि में न हो सके तो फिर यह पुरमान्यताएँ स्वयम भी क्या निष्कर्ष नही बन जातीं?
क्या एजम्प्शन और पाश्चयुलेट में फर्क होता है? यदि नही तो आइंस्टीन की स्पेशल रिलेटिविटी थ्योरी के दोनों पाश्चयुलेटस या पूर्वमान्यताएँ क्या अंततः स्पेशल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी के निष्कर्ष भी नही बन जाते और यदि यह निष्कर्ष बन जाते हैं तो फिर संइंटिसिज़्म और द साइंस डेलयूज़न के नाम पर यह कहना कि पूर्वमान्यताएँ जब वैज्ञानिक निष्कर्ष के रूप में स्वीकार कर ली जाती हैं तो विज्ञान रूढ़ि में तब्दील हो जाता है कितना उचित है?
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