Wednesday, December 4, 2019

धर्म की व्यापकता

धर्म एक बहुत ही व्यापक शब्द है जो जीवन के समस्त व्यापारों को अपने अंदर समाहित कर लेता है। धर्म की व्यपकता के कारण जीवन और जगत को देखने की वह विशिष्ट भारतीय दृष्टि है जो जगत को स्व का विस्तार मानती है। जगत स्व का ही विस्तार होने के कारण अभौतिक स्तर पर समस्त सृष्टि एक ही तत्व है। अतः यहाँ मनुष्य और प्रकृति, प्राणी और प्राणी, पथ और पथ का भेद उपस्थित नही होता।
इस दृष्टि के कारण धर्म का अभिप्राय बाध्यकारी नियम नही बल्कि धारिता है। मनुष्य अपने यथार्थ रूप में अनन्तताओं से युक्त एक आध्यात्मिक सत्ता है अतः सद्गुण उसके स्वभावधर्म हैं। इन सद्गुणों को धारण करना ही धर्म है। पुनः मनुष्य निष्क्रिय प्राणी नही है, वह कर्ता है। कर्म सिद्धान्त कभी उल्लंघित नही होते, ऋत का पालन सृष्टि ही नही देवता भी करते है अतः धर्म की अवधारणा में कर्म भी समाहित हैं। जीवन की आवश्यकताओं और व्यक्ति विशेष की प्रवृतिगत विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए धर्म विविध कर्मो को भी प्रस्तावित करता है। यह कर्म  उसके सामाजिक तथा व्यक्तिगत आयामो में संतुलन बनाते हुए उसे उसके यथार्थ रूप की ओर अग्रसारित करते हैं क्योंकि इस यथार्थ रूप को प्राप्त किए बिना मनुष्य पीड़ा से मुक्त नही हो सकता।

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