Wednesday, December 4, 2019

विज्ञान बचाए रखिए

सब ठीक है साहब, इतिहास खोदिए, वीररस-करुणरस में कविता पाठ करिए, संघर्ष का या सामंजस्य का समाजशास्त्र गढ़िए, राजनीतिशास्त्र के नए आयाम ढूंढिए लेकिन सबसे ज़रूरी है, सबसे ज़रूरी, विज्ञान को बचाए रखिए क्योंकि अंततः क्रांति और परिवर्तन यही लाता है।
किसी काल कोई भक्खा भंगी था, मैला साफ करता, सर पर मैला ढोता।इतिहासकारों ने उसे बताया कि उसके पुरखे ब्राह्मण थे। हलाकि एक दूसरा इतिहासकार कह रहा था कि  भक्खा के पूर्वज अनार्य थे जिनको आर्यो ने गुलाम बना लिया।अब इससे उसे इससे क्या फर्क पड़ गया कि उसके पुरखे क्या थे। कुछ साहित्यकारों ने भक्खा के मैला ढोने को वीर रस में ढाल कर तो किसी ने करुण रस में कविता लिख डाली।
क्या हो गया इससे? जब भक्खा ने वीर रस वाली कविता पढ़ी तो उसने उस दिन रोज के मुकाबले तिगुना मैला ढोया और जिस दिन उसने करुण रस वाली कविता पढ़ी उस दिन लुहार के यहाँ से तलवार खरीद लाया । राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र भी उसने पढ़े और उसके अनुरूप तदनुरूप बस प्रतिक्रियाएं ही हुईं। माना भक्खा ने इतिहास, साहित्य, राजनीति शास्त्र और समाज शास्त्रपढ़ के अपना काम छोड़ दिया लेकिन सक्खा का क्या? पंडित आंधी करुणा के वशीभूत स्वयं सर पर मैला ढोने लगे।  ठीक, लेकिन कुछ बदला क्या? मानवीय गरिमा स्थापित हो पाई क्या?? चलिए माना कि भंगियों का अधिनायकत्व ही स्थापित हो गया और अब इस व्यवस्था में ब्राह्मण सर पर मैला ढोएंगे।
क्या इस बार भी संचमुच क्रांति हुई??कोई वास्तविक परिवर्तन हुवा?? मानव की गरिमा स्थापित हुई??? ना!! इन सबसे हटकर किसी ने दाब के नियम को समझ कर ऐसी मशीन बना दी जो एकत्रित मल को  फेंक देगा, उस व्यक्ति ने एक फ्लश बना दिया। अब न तो इतिहास खोदने की ज़रूरत थी, न काव्य पाठ की, न खुनी क्रांति की , न करुणा युक्त ह्र्दयपरिवर्त की। एक मशीन ने सब कर दिया और मानवीय गरिमा भी स्थापित हो गई।

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