मेरे वामपंथी प्रोफेसर और मित्र श्री राम में मेरी आस्था को अंधविश्वास कहते हैं और उनके अनुसार मार्क्सवाद एक विज्ञान है।
सर्वप्रथम मार्क्सवाद एक विज्ञान है यही बात पुष्ट नही है क्योंकि विज्ञान के दार्शनिक #पॉपर के अनुसार विज्ञान को छद्मविज्ञान से जो चीज अलग करती है वह है #फ़ालसिफलिकेबलिटी।
और आज इस सर्वमान्य निकष के आधार पर #पॉपर मार्क्सवाद को विज्ञान नही मानते।
विज्ञान हवा में नही उपजता, एक पद्धति के रूप में यह कुछ पूर्वमान्यताए और स्थापनाओं को बस मान लेता है जैसा मैं बिना प्रश्न के राम को मान लेता हूँ।
विज्ञान की निम्नवत कुछ पूर्वमान्यताए हैं:
■जगत ज्ञेय है
■जगत जैसा है वैसा ही है अर्थात यह हमारी चेतना में जैसा प्रतिबिंबित होता है, हमारी चेतना के बाहर अपने वस्तुगत रूप में भी वैसा ही है।
■ वैज्ञानिक पद्धति #आगमनात्मक होती है। अर्थात विशेष घटनाओं से एक सामान्य नियम पर पहुंचा जाता है।
एक उदाहरण:
मच्छर से मलेरिया होता है, यह एक वैज्ञानिक निष्कर्ष है लेकिन इस निष्कर्ष तक पहुचने में हम दो बातों पर #आँख_बंद_करके विश्वास कर लेते है और वह है: #कार्य_कारण_का_नियम और #प्रकृति_में_एकरूपता_का_नियम
इन दो सामान्य नियमो को सिद्ध नही किया जा सकता बस इनको मानना पड़ता है और इन पर विश्वास करना पड़ता है तथा इनके आधार पर वैज्ञानिक विधि में निष्कर्ष निगमित करने के लिए एक छलांग लगाई जाती है जिसे #आगमनान्तक_छलांग या #इंडक्शन_लिप कहते हैं।
यहाँ हमे अपनी तार्किकता, वैज्ञानिकता की तिलांजलि देनी ही पड़ती है और आस्था, विश्वास या अंधविस्वास का सहारा लेना ही पड़ता है।
मेरे वामपंथी मित्र कहेंगे कि यह अलाउड है क्योंकि इन विश्वासों के आधार पर लिया छलांग के कारण आया निष्कर्ष काम करता है।
सही बात, यहाँ अर्थकरियकरित्व तो है लेकिन भैया राम का नाम भी तो मेरे लिए काम करता है।
राम के नाम मे भी तो अर्थकरियकरित्व है और
#अर्थकरियकरित्व_सत_लक्षणम अतः #राम_सत्य_हैं।
■अर्थक्रियाकरित्व :अर्थ का अभिप्राय, प्रयोजन को पूर्ण करने का सामर्थ्य।
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