Wednesday, December 4, 2019

मैट्रिक्स; माया



वैज्ञानिक ज्ञान की एक सीमा है, जगत की नही। विज्ञानं क्या है? दरअसल यह अमीबा के उस उद्दीपन-प्रतिक्रिया का ही अत्यन्त जटिल रूप है, उस क्रिया-प्रतिक्रिया का मात्रात्मक-गुणात्मक विकास है। उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रिया करने की आज तक की सबसे अच्छी प्रक्रिया, सबसे सफल प्रक्रिया है,और इसीलिए इसने इतने कम समय में हमारी चेतना के जगत को हमारे लिए इतना अनुकूलित कर दिया है।
यह प्रकृति के नए नए रहस्यों को खोल रहा है।
अणु में इसने अथाह शक्ति ढूंढ लिया और बस ढूंढा ही नही उसे मानव का पालतू भी बना दिया। प्रकृति पर आज हम किसी हद तक नकेल कस सकते है। हाँ वो शक्तियां जिनसे अभी मात्र पांच हज़ार साल पहले हमारे पुरखे डर कर विनती करते थे वो आज हमारे नियंत्रण में हैं,और क्रमशः होती जा रही हैं। हमारे पुरखे जहाँ तक सोच नही सकते थे उन जगहों पर हम अपने पदचिन्ह छोड़ रहे हैं।
अनुकूलन की विविध चेतन प्रक्रियाओं में विज्ञान की बराबरी तो कोई कर ही नही सकता, न धर्म, न आदिम जादू (फ्रेजर) न सहज वृति, न अपने परंपरिमक मायनो में दर्शन।
लेकिन, विज्ञानं की एक सीमा है जगत की कोई सीमा नही है।
हमे जो ज्ञान प्राप्त हो रहा है, हम जिन रहस्यों को जान रहे हैं क्या वो निरपेक्ष है, वास्तव में वैसे है या हमारी चेतना उन्हें वैसा प्रदर्शित करती है? चेतना, जिसका विकास प्रकृति से अनुकूलन के लिए हुवा है, हमारे न्यूरॉन के फंक्शन पर ही तो अवलम्बित है।
और यह अवलम्बन स्वयं एक विकास का परिणाम है।
दरअसल हम देखने के लिए स्वतंत्र नही है, हम वही तक देखने के लिए स्वतंत्र है जहाँ तक हमारी चेतना हमे स्वतंत्रता देती है और हम उसी प्रकार देखने को स्वतंत्र है जिस प्रकार देखने की स्वतंत्रता हमारी चेतना देती है।
तो क्या हम संच में स्वतंत्र है?
नही और यही बन्धन मैट्रिक्स है जो है
विज्ञानं की सीमा है, जगत असीमित है।

No comments:

Post a Comment

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...