Saturday, February 29, 2020

आवारा विचार 【दर्शन】

दर्शन की एक परिभाषा बेकन ने भी दी है और दर्शन को विज्ञानों का संश्लेषण कहा है। एक दर्शनिक की मधुमक्खी से तुलना करते हुए वह दार्शनिक को वह मधुमक्खी कहते है जो विभिन्न विज्ञानों के पुष्पों से पराग चूसकर दर्शन रूपी मधु तैयार करता है। 
अब यदि आप वास्तव में एक ईमानदार दार्शनिक हैं तो आपको  एडवांस भौतिकी ही नही, एडवांस न्यूरोसाइंस की जानकारी रखनी भी  बाध्यता है। 
आप ब्रह्मांड की बात करते है और आपको रिलेटिविटी, क्वाण्टम, सिमिट्री, क्वार्क आदि के बारे में पता ही नही, आप चेतना की बात करते है और आपको सेंट्रल लैटरल थैलामस, एफ एम आर आई, सेरोटोनिन, डोपामिन आदि के बारे में कोई जानकारी ही नही, आप बुद्धि की बात करते है और आपको AI और पायथन के बारे में कोई जानकारी ही नही तो मामला कुछ ठीक नही!!

घ्यान रहे "ब्रह्म सत्यं-जगत मिथ्या" ही दर्शन नही है।

Friday, February 28, 2020

वैज्ञानिक तथ्य लिखने वालों की भाषा कैसी होनी चाहिए? 【एक】

वैज्ञानिक तथ्य लिखने वालों की भाषा कैसी होनी 
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चाहिए? 【एक】
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यद्यपि हम जो कुछ जानते है, जो कुछ अभिव्यक्त करते है वह अपने ही परिप्रेक्ष्य में कर सकते है तथापि हमरा परिप्रेक्ष्य जितना बड़ा हो उतना बेहतर होता है। कम से कम वैज्ञानिक तथ्य या वैज्ञानिक विवरण लिखते समय परिप्रेक्ष्य विषयक इस बात की सावधानी बरतनी बहुत आवश्यक है अन्यथा वह तथ्य जो लिखा गया है वैज्ञानिक नही रह जाता। 
ऐसा नही है कि हमने वैज्ञानिक भाषा और उसकी शब्दावली के रूप में एक पूर्णतया वस्तुनिष्ठ अभव्यक्ति का मध्ययम प्राप्त कर लिया है; सम्भव है कि मेटा-साइंटिफिक डिस्कोर्स की भाषा और शब्दावली साइंटिफिक डिस्कोर्स की भाषा और शब्दावली से तुलनात्मक रूप से अधिक वस्तुनिष्ठ हो। लेकिन, यह भविष्य की बात है। वर्तमान में वैज्ञानिक व्याख्याएँ अभिव्यक्त करते समय उन शब्दों के, उन वाक्य विन्यासों के प्रयोग से बचना चाहिए जो शब्द और वाक्य विन्यास भावात्मक और सांस्कृतिक रूप से पूर्वभारित या प्रीलोडेड हैं। ध्यान रहे कि भावात्मक या सांस्कृतिक रूप से पूर्वभारित शब्दावली और वाक्यविन्यास द्वारा वैज्ञानिक व्याख्या एक व्याख्या नही बल्कि एक मंडन या अपोलॉजी बन जाती है। 
विज्ञान के अपने नियम हैं, अपने अनुसाशन हैं और इनका पालन अपरिहार्य है। नवीन तथ्यों की अभिव्यक्ति के लिए विज्ञान ने नवीन शब्दावली, नवीन वाक्य विन्यास रचने की छूट दे रखी है अतः बजाय उस प्राचीन और शास्त्रीय भाषा के प्रयोग के, नवीन भाषा की रचना की जानी चाहिए।

मानवीय जगत तथ्य-मूल्य की समष्टि है। विज्ञान तथ्य का अनुसंधान करता है। इसका क्षेत्र मूल्यो की खोज या व्याख्या कतई नही है। अब, हमारी भाषा के तीन कार्य हैं (इर्विन कॉपी):
■इंफोर्मेटिव यूज ऑफ लैंग्वेज (भाषा का सूचनात्मक कार्य)
■इमोटिव यूज़ ऑफ लैंग्वेज (भाषा का भावात्मक कार्य)
■ डिडेक्टिव यूज़ ऑफ लैंग्वेज (भाषा का निदेशात्मक कार्य)
भाषा यह तीनो कार्य वाक्य विन्यास (सिंटेक्स) और शब्दावली से सम्पन्न करती है और प्रायः होता यह है कि इसके भावात्मक व निदेशात्मक कार्य मे प्रयुक्त शब्द वाक्य से अलग एकांत में भी वही भावात्मक और निदेशात्मक कार्य करना प्रारम्भ कर देते हैं: यह भाषा के साथ एक प्रकार की कंडिशनिग है। 
इन शब्दो का भाषा के सूचनात्मक कार्य मे दो कारण से उपयोग हो सकता है: जानबूझकर या अनजाने में।
मंडनशास्त्री यह जानबूझ कर करते हैं ताकि उनके पक्ष की मान्यता स्थापित हो सके और विज्ञान में कम प्रशिक्षित लोग अनजाने में। इन दोनों ही हालातो में विज्ञान का नुकसान ही होता है और छद्मविज्ञान की ही प्रतिष्ठा होती है। 
वैज्ञानिकों ने इस बात को समझा है और तभी आज प्राकृतिक विज्ञानों के शीर्ष पर बैठी भौतिकी प्रतीकों (सिंबल्स) और गणितीय सम्बन्धो का प्रयोग करती है।
दार्शनिकों ने भी इस बात को समझा और यह स्पष्ट किया कि बहुत सी दार्शनिक समस्याएं तो मात्र भाषाजन्य भ्रम हैं; हमारी भाषा हमे स्प्ष्ट हुई नही की ये समस्याएं वाष्पीकृत हो जाती हैं।
प्रख्यात दार्शनिक और गणितज्ञ बर्ट्रेंड रसेल ने इसी लिए दर्शन के लिए एक अलग वस्तुनिष्ठ, भाव-निदेश निरपेक्ष भाषा विकसित करने की वकालत की और इस सम्बंध में प्रयास किया।

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Tuesday, February 25, 2020

लाल सलामी उनके दलाल हैं।


लाल सलामी उनके दलाल हैं।
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कॉरपरेट घरानों की टकसालें ये जमींने
उनको पूंजी रचनी है इसमे।
तुम खेलो चित-पट
उनके टकसाल से निकले
खोटे सिक्कों से।
उन कचरे धातु के टुकड़ों से, 
जो लाल सलामियो ने बटोरा
और तुम्हे बाँट दिया है
उन्ही के हुक्म पर,
ताकि पुलिस पर हमला करो
और मुठभेड़ में मारे जाओ।
फिर लाल सलामी खून देख चिल्लाएंगे
लाल सलाम! लाल सलाम! लाल सलाम!
और कराते जाएंगे उन घरानों के काम
तुम्हे मरवाकर, उन्हें जल जंगल जमीनें दिलवाकर!

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Friday, February 21, 2020

स्पेनिश: एक मौसी-भाषा

स्पेनिश: एक मौसी-भाषा।
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अंग्रेजी से हम भले ही प्रेशराइज्ड फील करते हैं क्योकि यह हमारे मालिको की भाषा रही है और इसीलिए अंग्रेजी जानकर हम मालिक टाईप का भी फील कर लेते हैं लेकिन भाषा को लेकर यदि आप संवेदनशील है; मंतलब भोजपुरी या आपकी अपनी क्षेत्रीय भाषा यदि आपकी माता लगती है, हिन्दी आपकी दादी और संस्कृत बुढ़िया दादी जो अब पुरखिन बन गई है और जिसको सांझा-पराती में श्रद्धा भाव से गोहराना है तो मेरा दावा है कि जब आप रोमांस भाषा  (फ्रेंच, पुर्तगाली, स्पेनिश, इटालियन आदि) को पढ़ते हैं या उनसे सामना होता है तो आपको लगेगा कि आप अपनी मौसी से मिल रहे हैं।

विश्वास नही होता तो कुछ शब्द लीजिए:
स्पेनिश                        हिन्दी/संस्कृत
Ojo (ओखो)                आँख/ चक्षु
Ventana (वेन्ताना)      वातायन
Vento (वेंतो)               वायु
Marido                      मरद
Mujer (मुखेर)            मेहरारू
Pajaro (पखारो)        पखेरू/ चिड़िया

शब्द तो बहुत है लेकिन यही नही मुहावरे भी आत्मीयता का बोध देते हैं।

भोजपूरी में बहुत ज्यादा कीमत देने को कहते हैं कि 
"आँख लागता"। स्पेनिश में costar un ojo de la cara है अर्थात costar: कोस्ट (मोल) , un (एक) ojo-ओखो-आँख de la cara: चेहरे का।

एक मजेदार लोकोक्ति लेते हैं : 
matar dos pájaros de un tiro 
मातार दोस पखारोस दे उन तीरो

मातर: मारना
दोस: दो
पखारोस: पखेरू का बहुवचन ( अर्थात दो पखेरू या चिड़िया)
दे: से
उन: एक
तीरो: तीर

एक तीर से दो चिड़ियों का शिकार!

है न यह मौसी-भाषा?

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ऐसा नही है कि केवल भोजपुरी में ही गुड्डू रंगीला है और "दे, दे, दे तनी देना रे, तोर माल हटे छेना तनी दे ना रे गाता है। मौसी के यहाँ भी गुड्डू रंगीला है और वो "दा मे तू कोसीता: आपन छोटीकी चिजिया दे" गाता है।
और सकिरवा के तो क्या कहने: लोका-लोका-लोका!!

*लोका: पगलेट, क्रेजी।

ज्ञानमीमांसा

ज्ञानमीमांसा 【शून्य】

मनुष्य प्रदत्त पा पहले से बने बनाए जगत में नही रहता बल्कि वह अपने जगत का निर्माण स्वयम करता है। जगत विषयक तथ्य का मानव भले ही निर्माण न कर सके किन्तु वह मूल्यों का सृजन स्वयम करता है और इस प्रकार 'मानवीय जगत और जीवन', मात्र व्यवस्थित तथ्यों का संजाल नही है बल्कि यह तथ्य-मूल्यों की एक समष्टि बन जाती है।
जगत विषयक कोई भी सूझ और समझ इस प्रकार मानवीय सन्दर्भ में, मात्र जगत के तथ्यों का अक्यूमलेशन ही केवल नही है। 
जगत विषयक तथ्य को मात्रतात्मक तथा गुणात्मक रूप से और बेहतर जानने के लिए मानव ने डेटा प्राप्त करने के लिए विविध उपकरण यथा, टेलिस्कोप, माइक्रोस्कोप आदि बनाए हैं जो मानवीय ज्ञान इंद्रियों के विस्तार हैं। इन डेटा को सूचना और ज्ञान बनाने के लिए इन्हें सन्दर्भ और अर्थ एवम आशय देने के लिए मानव आज सुपर कम्प्यूटर ही नही बल्कि क्वाण्टम कम्प्यूटर की भी सहायता लेने को आमादा है। इन जटिल और अत्याधुनिक उपकरणों से  हमे एक बहुत ही उदात्त और जटिल ज्ञान मिलता है लेकिन इस उदात्त और जटिल ज्ञान को विवेक बनाने वाली मशीन का, उपकरण का अविष्कार हमने न तो आज तक किया है और न कर पाएंगे हालांकि  आज प्रचलित मन के कम्प्यूटेशनल मॉडल के अनुसार मन और मष्तिष्क में हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का सम्बंध है और इस विषय से सम्बंधित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, वीक वर्जन, स्ट्रॉन्ग वर्जन आदि कॉन्सेप्टों पर विचारकों के मध्य विवाद है।
ध्यातव्य है कि महान भौतिकीविद हॉकिंग से जब मन के बारे में प्रश्न किया गया तो उन्होंने मन को मष्तिष्क का सॉफ्टवेयर कहा। प्रसिद्ध दार्शनिक सर्ल ने मन विषयक हॉकिंग की इस पोजीशन का जमकर खंडन किया है।

थोड़ी देर के लिए हम मान लेते हैं कि मन विषयक उक्त मॉडल सही है और हमने एक एथिकल सुपर कम्प्यूटर भी बना लिया है और उस एथिकल सुपर कम्प्यूटर से हम नीतिशास्त्र और मूल्य मीमांसा सिख रहे हैं। इस स्थिति में क्या हम मानव रह जाएंगे?

डेटा, सूचना, ज्ञान और विवेक में अंतर होता है। हमारी ज्ञाननेंद्रियों से होकर जो कुछ भी चेतन या अचेतन रूप से हमारे मन पर संस्कारित होता है वह डेटा है। चेतन मन इन संस्कारो की उपेक्षा भी कर सकता है और इनको आकार और सन्दर्भ भी दे सकता है। हमारा मन इन डेटा को आकार और सन्दर्भ देकर सूचना का निर्माण करता है। सूचना को आशय और अर्थ इसे ज्ञान बनाता है। सूझ के साथ, अंतरदृष्टि के साथ, ज्ञान विवेक होता है।

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ऊपर हुई बीटिंग अबाउट द बुश, कोई भी सूचना जिसका व्यवहारिक (प्रैगमीटिक वैल्यू) मूल्य होता है वह ज्ञान है।

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ज्ञानमीमांसा 【एक】

पाश्चात्य ज्ञानमीमांसा में ज्ञान को परिभाषित करते हुए इसे "न्यायोचित सत्य विश्वास" कहा जाता है: नॉलेज इज़ ए जस्टिफाइड ट्रू बिलीफ।
अर्थात, पाश्चात्य परम्परा में ज्ञान और सत्यता आपस मे सम्बद्ध हैं। इस परम्परा में "असत्य ज्ञान" कहना "बन्ध्या माता" कहने के समान ही व्याघती है। 
भारतीय परम्परा में ज्ञान के साथ सत्य होना कोई बाध्यता नही है। ज्ञान असत्य भी हो सकता है। भारतीय चिंतन पद्धति में सत्य ज्ञान को "प्रमा" तथा असत्य ज्ञान को "अप्रमा" कहते हैं। 
प्रमा को जानने के साधन प्रमाण है यथा: प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान इत्यादि।
प्रमाणशास्त्र और ज्ञानमीमांसा बड़ा ही रोचक विषय है जिसमे ज्ञान, इसके स्वरूप, ज्ञान के स्रोत, सत्यता की कसौटी, सत्य का स्वरूप, ज्ञान की सीमाओं आदि विषयों का अध्ययन होता है। 

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ज्ञानमीमांसा 【दो】

प्रमाण किसे कहेंगे, कौन सा प्रमाण वैध है, किस परिस्थिति में कौन सा प्रमाण अपनी वैधता खो देता है यह भी बड़ा महत्वपूर्ण विषय है क्योंकि ज्यों ज्यो हम सत्य शब्द को लेकर गम्भीर होते है आगे प्रमाण और सत्य सम्बन्धी उलझने बढ़ती जाती है। 
ज्ञानमीमांसा में दो सिद्धान्त है: वस्तुवादी और  प्रत्ययवादी।

सामान्य जनमानस सहज वस्तुवादी होता है। इसे नाईव रियलिज़्म कहते हैं। रियलिज़्म या वस्तुवाद एक ज्ञानमीमांसीय सिद्धांत है जिसके अनुसार ज्ञेय की सत्ता ज्ञाता से स्वतंत्र होती है। ज्ञानमीमांसा ज्ञान के स्रोत, इसकी वैधता, इसके निकष आदि का अध्ययन करने की दर्शन की शाखा है। 
वस्तुवाद के विपरीत जो दूसरा सिद्धान्त है उसे प्रत्ययवाद कहा जाता है जिसके अनुसार ज्ञेय की सत्ता ज्ञाता पर निर्भर करती है। 
प्रथम दृष्टया यह सिद्धान्त बड़ा अजीब लगता है कि मैं जानता हूँ इसलिए दुनिया है यह कैसा अजीब और बेतुकी बात है लेकिन दर्शन के इतिहास में यह एक बलवती विचारधारा रही है और जी ई मूर द्वारा इसके खंडन के बावजूद यह आज भी अस्तित्वमान है। कवांटम सिद्धान्त के निष्कर्षों द्वारा कुछ दार्शनिक यह निगमित करते है कि सत्यता हमारी चेतना में उतपन्न होती है।

वस्तुवाद भी कई प्रकार का है : 
●नाईव रियलिज़्म---कॉमन सेंस
●रिप्रजेंटेटिव रियलिज़्म---जॉन लॉक
● नियो रियलिज़्म----बर्ट्रेंड रसेल
● क्रिटिकल रियलिज़्म--सेलर

वस्तुवाद या यह विचारधारा की ज्ञेय का ज्ञाता से स्वतंत्र अस्तिव होता है भी अपने आप मे एक नही है बल्कि कई रूपो में बंटा हुआ है। 
प्रश्न है कि एक सहज विचार जिसके अनुसार मैं जानु या न जानु यह दुनिया रहेगी चार प्रतिनिधि शीर्षकों में क्यो विभाजित है?

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ज्ञानमीमांसा 【तीन】

ज्ञेय की सत्ता ज्ञाता पर निर्भर करती है या दृश्यते इति वर्तते या दृष्टि ही सृष्टि करती है, इस अजीब ज्ञानमीमांसीय सिद्धान्त पर कोई कैसे पहुँच गया जबकि यह सामान्य सी बात है कि मैं रहूँ या न रहूँ यह दुनिया रहेगी; मेरे अपने  कमरे से बाहर चले जाने पर उसमे मौजूद मेरी स्टडी टेबल का लोप नही हो जाता। 
पहली बार तो यह ज्ञानमीमांसिय सिद्धान्त ही अनर्गल प्रलाप और पागलपन प्रतीत होता है।
पाश्चात्य परम्परा में दार्शनिक जॉर्ज बर्कली ने अपने पूर्ववर्ती जॉन लॉक के अनुभववाद पर दार्शनिक चिंतन कर यह निष्कर्ष स्थापित किया कि "सत्ता दृश्यता है; टू बी इज़ टू बी प्रसिव्ड।" 

अजीब बात है, बर्कली यह क्या कह रहे हैं! ऐसा नही है कि बर्कली की बात पहली बार मे हमे ही अजीब और अनर्गल लगती है बल्कि उनके समकालीन डॉक्टर जॉनसन ने जब उनका यह सूत्र सुना तो अपने पैर के अंगूठे को एक पत्थर पर पटक के कहा: मैं इस तरह इसका खंडन करता हूँ। 
डॉक्टर जॉनसन ही नही महान वैज्ञानिक स्टीफेन हॉकिंग भी बर्कली की बात को समझ नही पाए और हॉकिंग ने तो बर्कली के बारे में यह लिख दिया कि वह समस्त भौतिक सत्यता, दिक और काल को भ्रम कहते थे। 
हॉकिंग ने केवल बर्कली को ही आधा-अधूरा नही समझा बल्कि दर्शन को भी आधा अधूरा समझते हुए उसे मृत घोषित कर दिया।
हॉकिंग ने कांट की भी आलोचना की लेकिन वह स्वयम ही कांट के जूते में पैर रख देते हैं, बहरहाल हमरा प्रश्न यह है कि यह अजीबोग़रीब सिद्धान्त कि "सत्ता प्रत्यक्षीकरण का होना है" कैसे अस्तित्व में आ गया।

अमेरिकी दार्शनिक अर्चि जे दर्शन को परिभाषित करने का प्रयास करते हुए इसके समस्त पक्षो के विश्लेषण के पश्चात इसे "सामान्य अनुभव की सामान्य अनुभव द्वारा आलोचना"( फिलोसोफी इज़ द कॉमन सेंस क्रिटिसिज़्म ऑफ द कॉमन सेंस) कहते है। दर्शन सेकेंड ऑर्डर इंक्वायरी या द्वितीय स्तर का अन्वेक्षण है और मानवीय चेतना की प्रकृति ऐसी है कि उसके सामान्य अनुभव काल क्रम में और सामान्य होते जाते है। अर्थात कुछ सामान्य अनुभवो का सामान्य कुछ सामान्य अनुभवो से अधिक सामान्य होता है। दरअसल हम ज्ञान के विकास के साथ विशिष्टता से सामान्यता की ओर बढ़ते है। और इसी लिए क्वाण्टम मैकेनिक्स क्लासिकल मैकेनिक्स का कोई विशिष्ट पार्ट नही बल्कि इसके उलट क्लासिकल मैकेनिक्स ही क्वाण्टम मैकेनिक्स का एक विशिष्ट पार्ट है।

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ज्ञानमीमांसा 【चार】
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हमरा सामान्य अनुभव जब विरोधाभासी प्रतीतियां देने लगता है तो उस समय सामान्य अनुभव की आलोचना की आवश्यता पड़ती है। ज्ञानमिमसैय प्रत्ययवाद या यह सिद्धान्त कि ज्ञेय की सत्ता ज्ञाता पर आश्रित है वस्तुतः सामान्य अनुभव की आलोचना और समीक्षा में ही जन्मा है। 
पाश्चात्य परम्परा में डेकार्ट, स्पिनोजा और लिबिनिज़ट्ज़ बुद्धिवादी परम्परा के प्रतिनिधि दार्शनिक हैं। बुद्धिवाद के अनुसार हमारे समस्त ज्ञान बुद्धि द्वारा होते हैं। कुछ प्रत्यय या कॉन्सेप्ट्स ऐसे होते हैं जो सहजात या जन्म से हममें मौजूद होते हैं। 
डेकार्ट ने तो ईश्वर के प्रत्यय को भी सहजात माना है। 
अनुभव के ऊपर बुद्धि की प्रमुखता वास्तव में प्लेटो के दर्शन की हामी ही है। प्लेटो का मानना था कि वास्तविक ज्ञान कूटस्थ होता है और इस कूटस्थ तत्व का बोध हमारी बुद्धि ही हमे करा सकती है क्योंकि अनुभव का विषय ही परिणामी और परिवर्तनशील जगत है और सत्य परिवर्तनशील नही होता। 
अपनी इस पोजीशन के कारण प्लेटो को जगतो का एक द्वैतवाद स्थापित करना पड़ा जिसमे यह आनुभविक जगत भ्रम है और वास्तविक जगत अगोचर किसी और लोक, किसी और आयाम में स्थित है। 

ब्रटिश दार्शनिक जॉन लॉक को अनुभववादी परम्परा का प्रेणता माना जाता है जिन्होंने ज्ञान के स्रोत के रूप में बुद्धिवादियों की बुद्धि की जगह अनुभव को प्रतिष्ठित किया और कहा कि मन जन्म के समय कोरी स्लेट या टेबुला रासा होता है जिसपर इंद्रियों के मध्ययम से अनुभव रूपी संस्कार अंकित होकर ज्ञान के विषय वस्तु बनते हैं। उन्होने अनुभववादी ज्ञानमीमाँसा की स्तपनार्थ डेकार्ट के सहजात प्रत्ययों या इननेट आइडियाज का भी खंडन किया लेकिन लॉक अपनी दार्शनिक मीमांसा में कॉमन सेंस रियलिस्ट या सामान्य अनुभव वस्तुवादी नही रह पाए और उनकी अपनी ही अनुभववादी दृष्टि ने उनको प्रत्ययप्रतिनिधिवाद वस्तुवादी (रिप्रेजेंटेटिव रियलिस्ट)  बना दिया।

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प्रत्यय प्रतिनिधिवाद वस्तुवाद यद्यपि सामान्य अनुभव वस्तुवाद के अनुसार यह मानता है कि वस्तुओं का ज्ञाता से स्वतंत्र अस्तित्व होता है तथापि यह सामान्य अनुभव वस्तुवाद की इस बात को नही मानता कि ज्ञाता ज्ञेय को डायरेक्टली जनता है बल्कि इसके उलट वह समेदन मन और वस्तु की भूमिका का ज्ञान की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया में विश्लेषण कर यह निधकर्ष स्थस्पित करता है कि यद्द्यपि वाह्य वस्तुएं होती हैं, हम उनको नही बल्कि उनके द्वारा उतपन्न समरूप संवेदना को जानते हैं।

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ज्ञानमीमांसा 【पांच】

सामान्य अनुभव वस्तुवाद की विशेषताओं को यदि सारबद्ध करना हो तो उन्हें निम्न 6 विन्दुओ के माध्यम से व्यक्त किया जा सकता है:

■वस्तु जो जाने जाते हैं वह हमारी चेतना से स्वतंत्र वाह्य जगत में अस्तित्वमान हैं अर्थात, हमारी चेतना उन वस्तुओं की रचना नही करती। उनका अस्तित्व तब भी होता है जब वह ज्ञान के विषय नही होते।
■ वस्तुओं में गुण उनकी अपनी निजी विशेषता होती है। उनके गुणधर्म ज्ञाता की चेतना में जन्म नही लेती।
■ वस्तुओं का गुणधर्म ज्ञाता की उपस्थिति में परिवर्तित नही हो जाता अर्थात यह ज्ञाता की चेतना से निरपेक्ष होता है।
■ सत्ता जैसा है वैसा ही हम उसका प्रत्यक्षीकरण करते हैं। आभास ही सत्यता है। 
■ वस्तुओ का अव्यवहित ज्ञान होता है। ज्ञाता की चेतना और ज्ञेय को जोड़ने के लिए किसी अन्य मध्ययम की आवश्यकता नही होती।
■  वस्तु सार्वजनीन होते हैं अर्थात वह किसी ज्ञेय विशेष की चेतना ही उन्हें नही जानती बल्कि सभी ज्ञाता उस वस्तु को एक समान रूप में जानते हैं।

सामान्य जनमानस सामान्य स्थिति में ज्ञान-वस्तु-ज्ञेय के त्रिकोण में ऊपरोक्त 6 बातें चेतन-अचेतन रुप से स्वीकार करता है और इन 6 बातों पर ज्यादा तूल नही देता लेकिन ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञाता का त्रिकोण यदि उपरोक्त 6 बातों को हमेशा पुष्ट ही करता तो क्या बात थी परन्तु समस्या यह है कि सामान्य अनुभव की कई प्रतीतियां आपस मे संगति नही रखती और उस विरोधाभास की व्याख्या करने के लिए हमे अपने सामान्य अनुभव विषयक सामान्य बातों में सुधार करनी पड़ती है। 
इस सधार के पश्चात जो वस्तुवाद जन्म लेता है वह सहज बस्तुवाद या सामान्य अनुभव बस्तुवाद नही रह जाता।

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Thursday, February 20, 2020

छोटकऊ-बड़कऊ

छोटकऊ-बड़कऊ
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इंटर पास करने के बाद छोटकऊ को अब इलाहाबाद पढ़ने जाना है। इसका सबसे पहला कारण तो यह है कि इलाहबाद में ही बड़कऊ दस साल से रहकर "सिबिल" दे रहे हैं। काफी अनुभवी हैं और विश्वविद्यालय में उनकी सेटिंग भी बहुत जबर है। उन्होंने खुद ही छोटकऊ का इंट्रेस दिया है और उसको "बी ए सी" के इंट्रेस एक्जाम में पास करा दिया है।
छोटकऊ के समान बड़कऊ के कोई बड़कऊ नही थे। उनको बी ए की प्रवेश परीक्षा खुद अपने दम पर पास करनी पड़ी थी। उनके लिए इलाहाबाद इस लिए चुना गया कि इलाहाबाद जौनपुर के काफी नजदीक है: ए जे पैसेंजर से तीन घण्टे का रास्ता, और सबसे बड़ी बात कि यहाँ जौनपुर में ए जे में चावल-गेंहूँ रखो और वहाँ प्रयाग के प्लेटफार्म नम्बर तीन पर उतार लो। यही नही प्लेटफार्म नम्बर तीन को दस कदम डाँका नही की रामप्रिया रोड आ गया जहाँ बड़कऊ के मामा   ने कमरा खोज दिया था। रामप्रिया बड़ा अच्छा लोकेशन है: स्टेशन, चाय की दुकान, पान-तम्बाकू की दुकान, मौर्या जी की सब्जी की दुकान, पिसान के लिए चक्की और वहाँ से यूनिवर्सिटी की दूरी मात्र दो-तीन किलोमीटर!
अब ए जे पैसेंजर में डबल चावल-गेंहू जाएगा। 

इलाहाबाद में एजुकेशन का माहौल भी बहुत अच्छा है। यहाँ जिसको देखो "सिबिल" देता है, नही बल्कि जिसको जहाँ देखो वहीं सिबिल देता है: ,चाय की दुकान पर सिबिल, पान की दुकान पर सिबिल, दोहरा गुटखा की दुकान पर सिबिल, खाना खाते समय सिबिल, खाना बनाते समय सिबिल। 
यह शहर सिबिल में ही जीता है और सिबिल में ही----
बड़कऊ ने शौचालय के दरवाजे पर भी संविधान का कैलेंडर चिपका रखा है-आखिर उस समय का उपयोग भी होना चाहिए!

छोटकऊ बड़कऊ के साथ रहेगा तो बिगड़ेगा भी नही: शायद ही कोई चायवाला, पानवाला, दोहरवाला, दूधवाला, ये वाला, वो वाला होगा जो बड़कऊ को नही पहचानता और बड़कऊ उन्हें नही पहचानते-आखिर दस साल से बड़कऊ सिबिल दे रहे है। अब इसमें उनकी क्या गलती की आज तक प्रिलिम्स भी नही पास कर पाए। असल मे समय ही कम है। 24 घण्टे में 9 घण्टा सोने में निकल जाता है: रात को 6 घण्टे और दिन में दाल-चावल-चोखा खाने के बाद 3 घण्टे। खाना बनाने में दोपहर में एक घण्टा और रात में एक घण्टा। दो वक्त चाय-पान-दोहरा करने में 4 घण्टा क्योकि सामाजिकता भी कोई चीज है। बाकी नौ घण्टे में नहाने-धोने-बर्तन मांजने में 1 घण्टा। अब इस आठ घण्टे में यदि एक एक घण्टा भी  एक व्यक्ति को दिया जाय तो दिन भर में केवल आठ लोगो से ही मात्र परिचर्चा हो पाती है। यहाँ तो मुलाकाती ही 24 घण्टे में पूरी नही हो पाती तो बड़कऊ पढ़ेंगे कब बेचारे!

खैर छोटकऊ को इलाहाबाद इसलिए भी जाना है कि वह बड़कऊ के सामने रहेगा तो बिगड़ेगा नही।

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Tuesday, February 18, 2020

इलाहाबाद प्रकरण

तब मैं इलाहाबाद में रहता था। हॉस्टल छूट जाने के बाद डेलीगेसी में एक कमरा बड़ी मुश्किल से मिला था। मकान मालिक की माली हालत थोड़ी औसत से नीचे रहती थी तो हर वर्ष नया नया तंत्र करवाते थे। कभी कोई मौलवी हर कमरे में कील ठोकता तो कभी कोई मकान बांधता। 
इस वर्ष उन्होने 'काल भैरव सोखा" को बुलाया था। मुझे और निशांत पांडेय को पता नही था कि अंदर तंत्र-मंत्र चल रहा है तो हमलोग शायद क्रिकेट का स्कोर जानने अन्दर घुस गए। अंदर धुप्प अंधेरा था। केवल एक दिया जल रही थी। कमरे में दारू, इत्र, अगरबत्ती और पसीने की बदबू फैली पड़ी थी। दिया के एक तरफ मकान मालिक का सारा परिवार बैठा था और दूसरी तरफ एक सत्ताईस अठाईस वर्ष का काला आदमी। हम और निशांत उस्तुकतावश वहां उसके तख्त पर बैठ गए जिसे देखकर वह आदमी हाथ पैरों को ऐंठ कर जमीन पर लौटने लगे और जोर जोर से कहने लगा; मैं काली का पूत काल भैरव हां।
हम और निशांत अभी भी बैठे रहे तो वह आदमी थोड़ी देर लौटने के बाद बैठा गया और हमसे बिना मंतलब पूछा: दारू पिओगे?
हमने और निशांत ने हा कह दी तो अब उस बेचारे ने बोतल से दारू ग्लास में निकला और एक चाकू लेकर अपने हाथ को थोड़ा काटा और कटे हाथ से टपकता खून ग्लास में पड़ी शराब में मिला दिया और हमारी तरफ करते हुए बोला कि लो पियो। हमने कहा कि बिना खून वाला दो तो वो और तेजी से लौटते हुए गाने लगा: मैं काली का पुत काल भैरव हां, मैं काली का पूत काल भैरव हाँ।

हम बैठे रहते लेकिन मकान मालिक के लड़के ने हमे जाने को कह दिया और हम और निशांत बाहर निकल आए।

दो
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यह हमरा दूसरा अनुभव था, इसके पूर्व मैं और आशुतोष आधी-आधी रात तक जिन्नाती मज़ार के पास जो कि गङ्गा जी के किनारे बबूल की झाड़ियों में है और लोग कहते हैं कि वहाँ जिन्नों का बसेरा है, जिन्न देखने छुपकर बैठे रहते। दरअसल उस बबुराही मे तीन मज़ारे थी और एक बहुत पुराना मस्जिद और उस मस्जिद के बगल में एक भसा हुवा कुवाँ। 
खैर, एक दिन शाम को ही उस वीराने में एक साहब मिल गए तो उन मज़ारो पर माथा टेकने आए थे।  खान साहब वही थोड़ी दूर पर के आई ई आर टी के प्रोफेसर थे। हालाकि वो हमें पहले भी कई बार देख चुके थे लेकिन संयोग से हमने उन्हें नोटिस नही किया था। खान साहब ने हमसे कहा: बेटा आपलोग यहाँ रात में घूमते है, ये अच्छी जगह नही है। 
यह सुनकर हमे लगा खान साहब अब आगे जिन्न वगैरह की बात कटेंगे लेकिन उन्होंने कहा: यहाँ घूमना ठीक नही है क्योंकि इस जगह पुलिस अपराधियो को लाकर इनकाउंटर करती है।
(यदि आप इलाहाबाद के है तो पता करिएगा, आई ई आर टी के पीछे बबूल के जंगल मे कई इनकाउंटर हुए हैं)
हमने पूछा कि सर और वो जिन्न वाली बात?
खान साहब ने बताया कि देखिए बेटा पुराने जमाने मे पानी के लिए कुंए होते थे न?
हमने कहा हां, तो उन्होंने बताया कि यह मस्जिद शायद मुगलों के या उन्ही के आस पास के ज़माने की है और मस्जिद बनाने के लिए ही वह कुवाँ खुदा गया होगा जो बाद में भस गया और लोग उसे जिन्नाती कुँवा कहने लगे।
हमने कहा कि ठीक लेकिन वो जमीन से जो चीजे निकलती है उनका क्या?
खान साहब ने बताया कि वहां उस मस्जिद बनने के बहुत पहले तेलियो की एक बस्ती थी। वहां उस इलाके में तेल की पिराई होती थी और गङ्गा जी से नाव में लादकर उनका व्यापार किया जाता था। उन्ही लोगो ने तलवार भी रखा होगा और फिर किसी कारण से तेलियो की वो बस्ती उजड़ गई होगी और धीरे धीरे उनके समान मिट्टी में दबते चले गए।
वहां प्रयाग विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के लोगो ने खुदाई की थी और उस इलाके में ज़मीन के अंदर से कोल्हू, दैनिक जीवन के समान, तेल रखने का ड्रम और कुछ तलवारे मिली थी जिससे लोग कहते थे कि यह जिन्नों के समान हैं।

बाद में हम और आशुतोष एक दिन आई ई आर टी गए और हमने वहां खान साहब का नाम बताते हुए उनसे मिलने को कहा।
आई ई आर टी वालो ने बताया कि खान साहब तो लगभग सात आठ साल पहले ही गुज़र चुके थे!

फिर हम बबुराही कभी नही गए।

तीन
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तीसरा अनुभव सबसे भयावह रहा। मैं और आशुतोष माघ मेले में घूम रहे थे। हमे एक नङ्ग घड़ंग औघड़ दिखा। हम उसे छेड़ने की नीयत से उसके नज़दीक चले गए। मैंने उस समय एक जैकेट पहन रखी थी।  औधड़ ने हमे अपने नजदीक पा कर मुझसे कहा कि अपना जैकेट दो मैं इसे खाऊंगा। मैंने सोंचा की यह जैकेट कैसे खा सकता है।  फिर सोंचा हो सकता है कि जैकेट खा ही जाए जिसे देख कर जैकेट की कीमत वसूल हो जाएगी। 
मैंने उसे अपना जैकेट दे दिया। मेरी जैकेट लेकर उसने उसमे से दाँत से अंदर का कपड़ा फाड़ने की कोशिश की जो उससे नही फटा क्योकि वह गलती से अंदर कॉलर के पास का कपड़ा फाड़ने की कोशिश कर रहा था। एक आध मिनट तक जब वह उसे नही फाड़ पाया तो मैंने तेजी से उससे अपना जैकेट वापस ले लिया। 
औघड़ मुझसे बोला: घमंड तो रावण का भी नही रहा रे घमंडी और यह कहते हुए उसने अपने हाथ पर थोड़ा सा पेशाब किया और तेजी से मेरे माथे पर मल दिया। 
यह उसने इतनी तेजी से किया था कि मुझे समवहलने का मौका ही नही मिला और जब तक मैं सम्भलता वह पेशाब मेरे ललाट पर मल कर जा चुका था।

Sunday, February 16, 2020

आवारा विचार 【3】 सौंदर्य, ज्ञान और बल

सौंदर्य और ज्ञान दोनों इस अर्थ में एकसम होते हैं कि ये बल द्वारा भोगे जाते हैं। सत्ता न सौंदर्य की होती है न ज्ञान की। सत्ता हमेशा बल की होती है और सौंदर्य तथा ज्ञान बल के चारण होते हैं।

खलील जिब्रान की शैली में

 【एक】

उस राज्य की सबसे सुंदर स्त्री के सौंदर्य के चर्चे होते थे।  दूर देश के कवि उसकी एक झलक पाने को बेताब रहते थे ताकि उनकी कविता श्रृंगार और विरह के अब तक अनछुए पक्षो को शब्दों में बांध सके। कुछ दीवानों ने तो उस स्त्री के लिए सम्राट के महल में, जहाँ वह रहती थी और उसका मनोरंजन करती थी, छुपकर प्रवेश करने की कोशिश भी की थी और फिर सम्राट के सजग सैनिकों द्वारा पकड़े गए थे और सम्राट के क्रूर जल्लादों द्वारा चौराहे पर काट डाले गए थे।

उस राज्य के सबसे ज्ञानी व्यक्ति के भी देश विदेश हर जगह चर्चे थे और सम्राट ने उसे सरस्वती-पुत्र की उपाधि भी दे रखी थी। वह समस्त शास्त्रों और समस्त विद्याओं का ज्ञाता था तब भी उसकी ज्ञान पाने की भूख मिटती ही नही थी।

सम्राट अपने सिंहासन के बाएं उस सौंदर्यवान स्त्री को अपने बाएं तथा ज्ञानी को दाएं बिठाकर शासन चलाता। 

एक दिन ज्ञानी और सौन्दर्यवती एक दूसरे पर आसक्त हो गए किंतु वह सम्राट से मन ही मन डरते भी थे अतः उनके मन मे इस विचार ने जन्म लिया कि सौंदर्य और  ज्ञान मिलकर शासन क्यो न करे, आख़िर हमे इस सम्राट की आवश्यकता क्या है! और यह विचार विद्रोह में बदल गया। 
ज्ञानी ने अपने ज्ञान से सबसे घातक विष तैयार किया जिसे उस सौन्दर्यवती स्त्री ने धोखे से सम्राट को उस रात शराब की प्याली में शराब ढालने वक्त मिला दिया। 

अगली सुबह सम्राट के सिंहासन के अगल-बगल की जगह खाली थी, पता चला कि कल रात ज्ञानी ने एक विष बनाया था जिसका उसने स्वयम पर प्रयोग किया   और उस विष की बेचैनी में उसने उस सौन्दर्यवती को मार दिया तथा स्वयम भी उस विष के प्रभाव से मर गया।

सिंहासन पर बैठे सम्राट की आँखों मे कोई पश्चाताप नही था बल्कि उसके चेहरे को बड़े ध्यान से देखने पर संतोष का भाव दिखता था जो इस बात की चुगली थी कि वह बलवान है।
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【दो】


अपने अंतरंग वार्तालाप के क्षणों में नदी ने सागर से इठलाते हुए उस चट्टान के बारे में बताया: एक अभागा पत्थर था जो बाकी पत्थरो से टूट कर मुझमे गिर गया लेकिन मुझे तो सागर में मिलना था इसलिए मैंने उस पत्थर पर थोड़ी अठखेलिया कर लीं। और दोष मेरा भी नही है क्योंकि यदि मैं उस पर अठखेलिया ना करती तो वो मेरा बहाव रोक देता लेकिन मुझे तो सागर में मिलना है।
सागर अपनी सम्पूर्ण गम्भीरता से बोला: पत्थरो की यही नियति है। मैं कई युगों से उनकी यह नियति देख रहा हूँ।

वही बगल में सागर और उस नदी की आंखों से अदृश्य उनकी बातें एक पतित देवदूत ने सुन लिया।
उसे अपनी और उस चट्टान की नियति एक दिखी--दोनों ही तो पतित थे; दोनों ही ने विद्रोह किया था; आह, दोनों ही ने तो सपने देखे थे!
तभी उस पतित देवदूत को स्मरण हुवा कि उसके पास तो स्वप्न विधाता ने भेजे थे और हाथ जोड़ते हुए यह मिन्नत की थी कि इस स्वप्न को देखो ताकि तुम पतित बनो--तुम पतित बनो क्योकि मेरी बनाई दुनिया अभी अपूर्ण है; मैं इसमें पुण्य डालना चाहता हूँ; मैं इसमें मुक्ति डालना चाहता हूँ; मैं इसमें धवल श्वेत रंग भरना चाहता हूँ लेकिन तब पुण्य के लिए पाप होना ज़रूरी है, धवल श्वेत रंग के लिए गहन तम का कालापन होना ज़रूरी है; मुक्ति के लिए मूल पाप का होना ज़रूरी है।
तो क्या इस पत्थर से भी विधाता ने प्रार्थना किया था, पतित देवदूत ने स्वयम से प्रश्न किया।

उधर सबसे ऊपर के आकाश में रहनेवाले जगत के सृष्टिकर्ता ने प्रयोगवश अपनी शब्दावली से पतित शब्द को मिटा दिया क्योकि वह देखना चाहता था कि इस शब्द के बगैर मानवता बनी रह सकती है कि नही।

पतित शब्द के मिटते ही विधाता का अस्तित्व भी वाष्पीकृत हो गया!



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अखलाक/ नैतिकता
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मजलिस जमी थी, यह रंको की मशहूर चौपाल थी जहाँ उनके बच्चे रंको की तहजीब सीखते। इस मजलिस के सामने जो ऊँची जगह थी वहाँ रखी तख्ती तब से मौजूद है जब से दुनिया मे बादशाहत कायम हुई। दुनिया मे बादशाहत कायम होने के अगले ही दिन वहाँ पहली मजलिस जमी थी। उस तख्त पर उसी दिन एक पहला नासेह बैठा था जिसने रँको को नैतिकता / अखलाकियत की पहली सबक सिखाई थी। 
तब से आज तक यह रवायत कायम थी। रंको की दुनिया का सबसे उम्दा नासेह उस तख्ती पर बैठता, सामने बच्चे बैठते और अखलाकियत कि सबक चलती।

नासेह ने एक दास्तान के ज़रिए सबक पढ़ना शुरू किया:
"एक क्रूर राजा था
था एक ज़ालिम बादशाह!"

कहते हैं कि करामन और कातिबीन हर जगह मौजूद होते हैं। इंसान के कर्मों का लेखा-जोखा रखने का काम ईश्वर ने दो फ़रिश्तों को दे रखा है। ये फ़रिश्ते इंसान के हर अच्छे-बुरे कर्म को लिखते हैं। इन फ़रिश्तों को करामन-कातिबीन कहा जाता है। ये फ़रिश्ते जिस रजिस्टर में कर्मों को लिखते हैं उसे नामा-ए-आमाल कहा जाता है। 

इस दिन किसी तरह नामा-ए-आमाल करामन कातिबीन के हाथ से फिसलकर नीचे ज़मीन पर गिर पड़ा और किसी ने उसमे लिखी बाते पढ़ लीं। उसमे लिखा था: 
"यह रंको कि कौम के नासेह जो कहते हैं कि एक क्रूर राजा था, एक था ज़ालिम बादशाह, हक़ ये है कि वो बादशाह ज़ालिम हो न हो ये कौम बदअख़लाक़ी ज़रूर है, बिल्कुल बेईमान और भगोड़ी।"
 
आगे एक शेर दर्ज था जिस के नीचे करामन और कातिबीन दोनों के दस्तखत थे---

"तुम भी चाहते तो थे के तेरी ही होती दुनिया
उसकी दुनिया जो हुई, कहते हो ज़ालिम था वो!"
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बी ए प्रोफेट ऑनटू दाईसेल्फ


इस समाचार को सुनने के पश्चात की सम्बुद्ध, वह जिन्हें सारे रहस्य ज्ञात हैं, कल इस पगडंडी से गुजरेंगे, सड़क के किनारे अपनी दुकान लगाने वाला चर्मकार खुशी से झूम उठा--
"मेरी अज्ञानता ने मेरी राह रोक रखी है अतः कल महाज्ञानी से रहस्य को जानूँगा", चर्मकार ने इस प्रकार मन मे विचार और निश्चय किया।

अगली सुबह जब सम्बुद्ध जब उस चर्मकार की अस्थाई दुकान के सामने से गुजर रहे थे तब वह अपनी चटाई से लगभग छलांग लगाते हुए सम्बुद्ध के सामने हाथ जोड़े खड़ा हो गया।

हे परमज्ञानी, मैं आपसे एक सत्य, एक रहस्य जानना चाहता हूँ, चर्मकार ने सम्बुद्ध से कांपते हुए कहा।
-मित्र, सत्य ही केवल उत्तर है, कुछ नही बल्कि मात्र सत्य, प्रश्न करो!
-प्रभु, जूतों की कैसे सिलाई करूँ की वह जूते न कभी घिसे, न फटे?
-एक सम्बुद्ध से इस प्रकार के ओछे प्रश्न करने की  तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई!! सम्बुद्ध के अनुयायियों ने उनका अपमान समझते हुए क्रोधित होकर कहा।
-लेकिन प्रभु, मेरे लिए इसी प्रश्न का उत्तर सारे रहस्यों की कुंजी है क्योकि आपके पिता, जो इस राज्य के महाराजधिराज थे, ने मेरे पिता को इसी गलती के लिए सजा दी थी कि मेरे पिता ने उनके लिए जो जूते बनाए वह शाश्वत नही थे, कुछ  दिनों के पश्चात उनकी सिलाई खुल गई और मैं भी उस दण्ड को मैं भोग रहा हूँ तथा मेरी आने वाली पीढियां भी भोगेंगी।

सम्बुद्ध हमेशा की भांति मौन होक र आगे बढ़ गए-अव्यक्तानि;अप्रश्नानि!!
चर्मकार के मन मे एक निश्चय आया: अप्पदीपो भव!!

--------☆★★★★☆--------

Saturday, February 15, 2020

आवारा विचार 【2】: माचिस और चरनी

बब्बा के बब्बा चिंतित थे मानो प्रलय की घड़ी आने ही वाली है। बब्बा पिछले चार पांच घण्टो से चरनी चला रहे थे लेकिन अग्नि प्रज्वलित होने का नाम ही नही ले रही थी। बब्बा के सहयोगी बैठे जोर जोर से गाते जाते थे: 
अग्नि तुम आओ, अग्नि अपनी अनेक जिव्हाएं फैलाओ, अग्नि अपना अंश ग्रहण करने हेतु प्रकट हो, प्रकट हो।

एक आदमी बब्बा के बगल से गुजर रहा था। शायद भविष्य से आया था। उसने अपनी बीड़ी सुलगाई बब्बा की और चवन्नी की माचिस  फेंकी और आगे बढ़ गया।

उधर भविष्य में इस बात पर चर्चा चल रही थी कि क्या फॉस्फोरस की रगड़ से जलने वाली आग पवित्र है और शीघ्र ही इस विषय पर एक अंतराष्ट्रीय सेमिनार करने की तैयारी चलने वाली थी।

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आवारा विचार 【1】

कविता, आधुनिक या शास्त्रीय, बड़ी विषयिनिष्ठ चीज है-पाठक के लिए भी और लेखक के लिए भी। कई बार लेखक की विषयनिष्ठता पाठक के वस्तुनिष्ठता से  बड़ी भी होती है लेकिन पाठक इस बात से प्रायः अनावगत होता है और अपनी समझ की सीमाओं की समीक्षा किए बिना ही जल्दीबाजी में प्रतिक्रिया दे बैठता है।
खैर, लेखक तो तो इस बात की खुशी है कि पाठक ने कम से कम उसका लिखा पढ़ा क्योकि यह भी कम महत्वपूर्ण चीज नही है।

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सावधान इंडिया!

पैगम्बरों की बातों में 
मत आना,
सबसे बड़े शिकारी होते हैं 
ये धर्म उपदेशक: 
तुम्हारी आत्मा
कच्चा चबाने के बाद
कुढ़ते हुए कहेंगे-
कितना असभ्य था इसका इसका स्वाद!
और फिर तुम
उनके मल ही बनोगे।
अपना पैगम्बर खुद बनो,
अपने धर्मोपदेशक स्वयम!!

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Absolute Truth

No matter how far we push our horizon, there will be still some questions hinting at something hidden and unknown. Seems we are condemned to being so or if you have a diffrent bend of mind you'd say it is wired into us as a species. 
I wonder at this deja vu : no matter which framework we adopt to, the old feeling of something hidden keeps recurring.
Mythological framework concluded into something transcendental, so did the philosophical and now the scientific one.
If history follows a trend, the meta-scientific framework would also lead to the same conclusion; every framework has ended into a diffrent conception of transcendence however.

This puzzle can't be solved by analyzing the external world but the answer to this puzzle lies in our acceptance of the fact that "knowledge is an everlasting process and there is no absolute truth.

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विरोधाभास (Paradox)

 विरोधाभास
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प्रारम्भ में भौतिकी थी। नही, भौतिकी मनस की प्रगपेक्षा रखती है अतः प्रारम्भ में भौतिकी नही थी। तब प्रारम्भ में क्या  मनस नही था?
नही क्योकि मनस प्रारम्भ के 14 करोड़ वर्ष बाद अस्तित्व में आता है-----

★ प्रारम्भ में भौतिकी थी।
  【Neil D grass Tyson】

★ भौतिकी मनस की प्रगपेक्षा रखती है।
  【Rupert Sheldrake】

★मनस प्रारम्भ के 14 करोड़ वर्ष बाद विकसित होता है
 【Darwinian Evolution】

ऐतिहासिक रूप से पैराडॉक्स का हल उसमे मौजूद समस्या से परत: अलग उच्च स्तर की शब्दावली तलाशने में होता है और यह नई शब्दावली पूर्णतः नवीन शब्द होते हैं जो  पूर्णतः नवीन संकल्पनाओं और नवीन यथार्थों को अभिव्यक्त करते हैं और इस नवीन यथार्थो में दिखता है कि वह पुराना विरोधाभास वास्तव में कहीं है ही नही।



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वास्तविकताएं

कोई एक वास्तविकता होती ही नही। इस एक वास्तविकता की तथा इसमें भी कई वास्तविकता की परते होती हैं एवम वास्तविकता के समानांतर भी सारी सम्भावित वास्तविकताएं। 
इन सारी वास्तविकताओं में से कुछ या एक मे हम अस्तित्व में आते हैं और जिस वास्तविकता के हम हिस्से है वह यह तय करती है कि हमे क्या क्या जानना है, क्या कल्पना करनी है; क्या हमारी वास्तविकताएं होगी और क्या हमारे मिथक।
और वास्तविकता यह भी है कि हम इस वास्तविकता द्वारा, जिसके हम हिस्से हैं, हमे दी गई सीमा का अतिक्रमण कर ही नही सकते!

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Thursday, February 13, 2020

चावल (दका)

एक
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अगर एक सिद्धान्त को माने तो भारत में सबसे पहले नेग्रीटो प्रजाति ने प्रवेश किया। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में यह आज भी अपने पाषाण कालीन सभ्यता में जी रहे हैं।
उक्त सिद्धान्त के अनुसार भारतवर्ष में निग्रिटो के बाद आग्नेय या  ऑस्ट्रेलॉयड/ प्रोटो-ऑस्ट्रेलायड प्रजाति ने प्रवेश किया।
आग्नेय प्रजाति के पश्चात द्रविड़ों ने भारत में प्रवेश किया और फिर आर्य भारत वर्ष आए।
माना जाता है इनमे आग्नेय प्रजाति उस रास्ते से भारत नही आई जिस रास्ते से होकर आर्य और द्रविड़ आए थे बल्कि ऑस्ट्रो एशियाटिक भाषा समूह का वितरण इस बात की गवाही देता है कि वह उत्तर-पूर्व के रास्ते भारत में घुसे।
बर्मा, इंडोनेशिया, वियतनाम में उसी भाषा समूह की भाषाएं ही जिस भाषा समूह की भाषा संथाली और मुंडारी है।

यही नही ऑस्ट्रेलिया के अबोरिजीनल्स और मुंडा-सन्थाल एक ही प्रजाति समूह के हैं।
अब भारत से मुंडा-सन्थाल प्रजाति के लोग या तो  ऑस्ट्रेलिया गए या तो जावा सुमात्रा से इनकी एक लहर उत्तर पश्चिम होते हुए भारत पहुंची और दूसरी लहर दक्षिण पूर्व ऑस्ट्रेलिया।
लेकिन यह तभी सम्भव है जब हम जावा मानव की परिकल्पना को सत्य मान ले।
यदि मानव अफ्रीका में विकसित हुवा तो हमे यह यह मानना होगा की ये अफ्रीका से पहले भारत आए फिर भारत से ऑस्ट्रेलिया गए और बीच रास्ते से कहीं इनकी एक लहर काल क्रम में पुनः किसी कारण से वापस लौट आई।

यदि हम इस परिकल्पना को सत्य माने तो अचानक से अज्ञात  हिहरी पिपड़ी, हरात पर्वत, सिंग दुवार, सासांग बेडा स्पष्ट होते दिख जाते हैं।
और इसी क्रम में मारांग बुरु सबसे बड़ा पहाड़ की कल्पना/परिकल्पना के जन्म के पृष्ठभूमि भी स्पष्ट होती दिखती है।
इनकी स्मृति-श्रुतियों में इनके राह को एक बहुत बड़े पर्वत ने अवरुद्ध कर दिया तब इन्होंने मारांग बुरु (सबसे बड़े पहाड़) की आराधना की और इन्हें रास्ता मिल गया और इनकी यात्रा जारी हुई।
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दो
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झारखण्ड के आदिवासियों का कोई धार्मिक अनुष्ठान हँड़िया के बिना सम्पन्न नही होता। यह चावल से बनी शराब है जो लगभग हर आदिवासी परिवार बनाता है।
सन्थाल लोककथाओं के अनुसार लिटा गोसाईं या मरांग बुरु (सबसे बड़े देवता) ने प्रथम पुरुष और प्रथम स्त्री, पिलछु हड़ाम तथा पिलछु बूढ़ी की रचना के पश्चात उनके सम्मुख आकर उन्हें हँड़िया बनाने की विधि बताई। इसे पीकर इन आद्य पूर्वजो ने आपस मे सम्बन्ध बनाए तथा मानवता की शुरुवात हुई।
आशय यह है कि, चावल की खेती सीखने के पश्चात ही उनकी सभ्यता फली फूली और वह फिर विभिन्न गोत्रो, क्लैनो में विभाजित हुए।
इस बात की पूरी संभावना है कि भारत मे चावल की खेती का इंट्रोडक्शन इन्ही प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड लोगो ने किया।
संथाली लोककथाओं और गीतों में कुछ नाम मिलते हैं: हिहरी-पीपीरी, सासांग बेड़ा, मरांग बुरु।
ये स्थान कहाँ हैं यह अभी एक रहस्य हैं किंतु कुछ शोधों के आधार पर एक परिकल्पना का निर्माण किया जा सकता है।
भारत के बाहर ऑस्ट्रोएशिएटिक भाषा वियतनाम, कम्बोडिया, वर्मा आदि देशों में बोली जाती है।
अभी हाल ही में ज्ञानेश्वर चौबे ने अपने शोध से यह प्रमाणित कर दिया है कि भारत मे सन्थाल, मुंडा आदि दक्षिण पूर्व से आए थे। यह शोधपत्र नेचर पत्रिका में मौजूद है।
चावल का जन्मस्थान चीन और हिमालय की तराई है।
सन्थाल लोककथाओं में सासांगबेड़ा आता है । सासांग का अर्थ पिला और बेड़ा का अर्थ घाटी होता है। क्या यह संयोग मात्र है कि ह्वांगहो या पीली नदी चीन में है और सन्थाल, मुंडा आदि ज्ञानेश्वर चौबे के शोध के अनुसार उधर से आए?


इन लोगो को इनकी कथा के अनुसार एक बहुत बड़ा पहाड़ (मरांग बुरु) मरांग का अर्थ बड़ा और बुरु का अर्थ पहाड़ होता है, मिला था। क्या वह हिमालय नही था?
यहाँ इन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की और फिर उन्हें रास्ता मिल गया।
इन सबके बीच क्या एक सम्भावना नही बनती की यह चावल की खेती करते करते भारत तक फैल गए और भारत के अंदरूनी हिस्सो में इन्होंने चावल को इंट्रोड्यूस किया?

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तीन
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एक दिन बॉडिंग की द सन्थाल एंड देयर ट्रेडिशन दिखी तो उत्सुकतावश उसके पन्ने पलटने लगा क्योंकि जहाँ मैं काम करता हूँ वहाँ सन्थाल जनजाति के लोग रहते है। पुस्तक के पन्ने पलट रहा था कि निगाह एक शब्द पर आकर अटक गई-खरवार!
बीस पच्चीस साल पहले की स्मृति ताज़ा हो गई: मेरे पैतृक गाँव, जो की बिहार के बक्सर जिले में है, में एक छोटी से पहाड़ी नुमा सरचना है। इसे लोग गढ़ कहते हैं। गढ़ के ऊपर आज गढ़पति परमार राजपूतों के वंशजो की बैठक है। उस वक़्त मैंने किसी से पूछा की ये गढ़ किसने बनाया तो उसने बताया कि हमने अपने बाप-दादाओं से सुना है कि इसमें पहले कन्दरा नुमा संरचनाये थी जिसमे शायद चिरो-खरवार रहते थे।
उस वक़्त मैंने सोचा की शायद इस व्यक्ति को कुछ भी पता नही इसलिए यह एक झूठ-मुठ के नकली शब्द से मुझे बहला रहा है लेकिन, खरवार शब्द मेरे मन में अंकित हो गया।
खैर पन्द्रह-बीस सालों तक वह शब्द मन के किसी कोने में दबा रहा लेकिन यहाँ तो बॉडिंग भी इस शब्द को लिख रहे हैं!
हो-सन्थाल-बिरहोर और कुडुम्बी (कुड़मी) जनजातियों को सामूहिक रूप से एक कोलिया, जिसकी कथा बॉडिंग रिकार्ड कर रहे है,आज से 137 साल पूर्व खरवार कह कह रहा है।

मेरा पैतृक गाँव गङ्गा के मैदानी इलाके में अवस्थित है। प्रश्न यह है कि क्या मेरे पुरखों ने झारखण्ड के आज के आदिवासी के पुरखों से कुछ छिना है?

इस प्रश्न का उत्तर मैं समय और परिस्थिति के अनुसार देता हूँ। झारखण्ड में मेरा उत्तर #नही होता है लेकिन सत्य यह है कि #हाँ।

हमारे पुरखो ने इस उपजाऊ जमीन को उनसे छीना है और उन्हें पठार की ओर खदेड़ा है।
मेरे पास अपनी बात को सिद्ध करने के लिए आदिवासियों के उनके विस्मृत गीत हैं, उनकी लोककथाएं हैं, गङ्गा के मैदान के प्रति उनके गीतों में उनका क्रंदन है।

हमारे यहाँ जब किसी को जंगली या असभ्य कहना होता है तो लोग कहते है कि चिरो खरवार हो क्या?
नटुआ का नाच मत करो आदि

जिन शब्दों से हम धिक्कार अभिव्यक्त करते है वह उन शब्दों के नीचे यहाँ के आदिवासी आज भी जीते हैं और ये शब्द उनके लिए गर्व की बात है।

ये स्वयम को खरवार कहते हैं। खरवार खेड़वाड़ का विकृत रूप है जिसका अर्थ है चिड़िया का वंश

समग्र खरवार स्वयम को कॉस्मिक हंस और हंसिनी के कॉस्मिक अंडे से उतपन्न मानते हैं।

इनकी इस सृष्टि विषयक कथा को मिशनरियों ने कैसे एक्सप्लॉयट किया है यह भी कभी बताऊंगा लेकिन यहां यह भी बताना चाहता हूं कि उनका यह विस्थापन और विस्थापन के पूर्व का दो अलग संस्कृतियों के एनकाउंटर आज भी उनके शब्द हमारी भाषा मे और हमारे शब्द उनकी भाषा  मे क्रियात्मक होकर उस एनकाउंटर की गवाही देता है।

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पीड़िया के कहनी

पिंड़ीया के कहनी।

परूवा के दिन सोहराई
की रात ह गाई दाढ़ लागेला
भइस पखेरेले
चेर मोरिनिया पिंडिया लावेले
लावे के दिन गईली हा
छोडवे के दिन अईली हा
चेरिया गईली हा रन में बन में
इन्हना के कठिया के
तले त रानी के मन मे खीस दिख भईलहा
चेरिया के पुतवा, बछवे खूंटवा
तुर तार देली हा
पिंडिया उसिनली हा
उपासे बईठली हा
तले चेरिया आइल हिया रन से बन से
देखतीया की मोर बेटा घूरा प लोटता पोटता
झार झुर के कोरा में उठा लेलिहा
कहतिया रानी हो रानी केवाड़ खोल
-कइसे में केवाड खोली
तोर त बेटवा बछवे खूंटवा, तुर तार दिहनी
पिंडिया उसीननी उपासे बईठनी
रेल आव टेल आव
-कांखे मोरा बेटा बा,माथे मोरा ओड़ा बा
(बेटवा के नाम सुन के सोहर के गोड़ प गिरली हा)
-चेरिया रे चेरिया कवन ते नेम कइलिस, कवन ते धरम कइलिस?
काहे तोर जियछ भईल,काहे मोर मराछ भइल?
-रानी हो रानी तू त राजा के रानी बाड़ू
पान-फूल कढलु, मुँह जूठीअवलू
हम त चेर चापट
अगिया के गईनी तहो कहानियां सुननी
पनिया के गईनी तहो कहानियां सुननी
एहि से हमार जियछ भइल बा
एहि से तहार मराछ भइल बा।

हरतो सोग ना परतो सोग
सोग पर घूर पुतवे कोर!

सरनेम से आसक्ति या अनासक्त भाव से सरनेम?

सरनेम से आसक्ति या अनासक्त भाव से सरनेम?

भाई अचेतन मन से भेद को स्वीकार करते हुए सरनेम हटाने से अच्छा है कि सरनेम लगाते हुए उससे अनासक्त रहना।
पुनः
जब मैं मिश्र अपने नाम के साथ कहता हूँ तो बहुत दूर, बहुत दूर, बहुत दूर तक की बातें याद आती है। इस छोटे से शब्द में कम से कम 5000 साल का इतिहास फ्रीज़्ड है।उन 5000 सालो के ताले पर लगी एक कुंजी है यह। 
इतिहास संजोने के एक सूत्र परम्परा है, ठीक वैसी ही जिस प्रकार बड़े बड़े गम्भीर विचारो को छोटे छोटे सूत्रों में बांध दिया जाता है।
इसलिए भाई मैं तो अपना उपनाम नही हटाऊंगा।

मनुवादी-ब्राह्मणवादी सोंच??

दुर्भाग्य से हमारी संस्कृति ही उस ओर मुड़ गई जहाँ उपनामो का वजन व्यक्ति को दाबे रखता है वरना व्यक्ति हमारी इस महान संस्कृति की आंधी में ही उड़ कर गुमनाम हो जाएगा।

विडम्बना है कि हमने ऐसी सोंच विकसित कर ली है जिसमे अतीत का होना, एक महान अतीत का होना आवश्यक है।
और यह विडंबना केवल हमारी नही, किसी व्यक्ति की नही बल्कि मानवीय है।

उपनामो की संस्कृति ने तीन प्रकार के मानवीय अपसंस्कारो को जन्म दिया है:

       1.उपनामो पर दम्भ करने की आत्ममुग्धता,
2.उपनामो को बोझ मानने की विकृति,
3.उपनामो की बराबरी के लिए तरस।

दरअसल ये तीनो अपसंस्कार सांस्कृतिक  बीमारियां है और यह बीमारी कही बाहर से नही आई बल्कि हमारे खुद की संस्कृति के अंदर से आई है और इस बीमारी को अनपढ़ और जाहिलो ने जितना फैलाया है ठीक उतना ही पढ़े लिखे बुद्धिपिशाचों ने भी फैलाया है ।

"जो अपना इतिहास भूल जाते हैं, इतिहास उन्हें भूल जाता है" और फिर जेनयू का कोई विद्यर्थी उन पर शोध करता है। और फिर उनके इतिहास का डोक्युमेंट्सन होता है उन व्यर्थ की बातों पर सेमिनार होते हैं-----मुझे एक अजीब सा विरोधाभास दीखता है समाज मे, पढ़े-लिखो के समाज में-----समाज के एक छोर् पर जातिगत पह्चान लिए खड़े व्यक्ति को बुद्धिजीवी लताड़ लगाते है और कहते है कि यह एक अनावश्यक बोझ है वही समाज के दूसरे छोर पर खड़े एक गुमनाम आदिवासी को वह उनका पूर्वज महिसासुर के रूप में ढूंढकर देते है और 'महिसासुर एक जननायक' किताब छपती है।

भाई जब जातिगत पहचान गलत है तो फिर यह बाभन के लिए और उस आदिवासी दोनों के लिए गलत है न?
अब आप खुद ही पूरा दम खम लगा कर आदिवासी, उस आदिवासी के लिए पहचान के नाम पर एक जातिगत इतिहास, उनकी जाति का इतिहास गढ़ते है।

आप एक ऐसी परिस्थिति का निर्माण क्यों नही करते जहाँ इतिहास ही अप्रासंगिक हो जाए?

नही दोहरे मानदंड बनाए रखना तो जरूरी है आपके लिए क्योकि आप को सामंजस्य तो दीखता ही नही केवल और केवल संगर्ष दीखता है और संघर्ष के लिए "दो" का होना तो आवश्यक है।
इस "दो"मुही बात के प्रतिरोध में अपना उपनाम नही छोडूंगा!

सावधान!
मैं बाभन हूँ इसका अहसास मुझे आप दिला रहे है।
अनासक्त से आसक्त आप कर रहे है।
सावधान!!

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साहेब का गणित (व्यंग)

साहेब का गणित (व्यंग)
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बाहर कड़ाके की बारिश हो रही थी और उस क्षेत्र में कुछ ज्यादा ही वज्रपात होता है क्योंकि पहला जमीन के नीचे मिनरलस हैं और दूसरा टोपोग्राफी अनइवेन है, तभी साहेब का मोबाइल बजा....जी कौन?
--साहेब मेरी बकरी वज्रपात से मर गई.
--तो मैं क्या करूँ? मुझे बकरी जिंदा करना नही आता।
--नही साहब, सरकारी मुआवजा लेना था।
--ओह, कितना मुआवजा मिलता है? 
---साहेब तीन हज़ार रूपए।
--देखिए, फलाने जी आपकी बकरी मरी है तो आप आवेदन करिएगा और उसमे यहाँ का चपरासी पाँच सौ रुपया ले लेगा तो बचा ढाई हजार। आपकी बकरी  वज्रपात से मरी है कि नही इसकी जाँच करने कर्मचारी जाएगा और यह लिखने के लिए कि आपकी बकरी वज्रपात से ही मरी है एक हजार कम से कम ले लेगा तो बचा डेढ़ हजार। वो उस रिपोर्ट को किरानी को देगा जिस पर किरानी और बड़ा बाबू दस्तखत करेंगे और वहा आपका खर्च होगा एक हज़ार तो अब बचा पांच सौ रुपया।  फाईल आपकी जाएगी नाजिर के पास जो आपको चेक देगा जो चेक देने के एवज में लेगा पांच सौ रुपए तो आपके पास बच गया ज़ीरो। हो गया हिसाब बराबर। 
----जी साहेब
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Wednesday, February 12, 2020

बोतल का मुँह और मुँह का बोतल

मैं: कोई अंतिम सत्य नही होता
वो: यह कहकर तुम एक अंतिम सत्य ही तो बता रहे हो।
मैं: तभी तो कोई अंतिम सत्य नही होता। सत्य प्याज के छिलके के मानिंद होता है। आप परत उघाड़ते जाइए, उघाड़ते जाइए, उघाड़ते जाइए और बहुत सी दार्शनिक समस्याएं तो मात्र भाषा-जन्य भ्रम होती हैं; ये मात्र इसलिए उपस्थित होती हैं कि हम अपने भाषा की सीमा को नही समझते और बुद्धि प्रपंच द्वारा तर्क पर तर्क किए जाते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि उस मूल प्रश्न का उत्तर तो मिलता नही असंख्य और प्रश्न खड़े होते चले जाते हैं और फिर उनके असंख्य उत्तर। और फिर एक दार्शनिक सम्प्रदाय का ही जन्म हो जाता है और फिर उस संप्रदाय के अंदर  सम्प्रदाय......और अंततः होता यह है कि दर्शन का जीवन से विच्छेद हो जाता है और यह एक दुरूह शास्त्र बनकर आसमान में टँग जाती है।
एक उदाहरण लीजिए:
गाय के चार पैर होते हैं
गधे के चार पैर होते है
अतः गाय गधा है। 
अब वास्तविक दुनिया मे गाय तो गधा है नही लेकिन चूंकि मनुष्य एक बौद्धिक प्राणी है और यह बुद्धि ही उसको अन्य पशुओ से अलग करती है तो बुद्धि द्वारा स्थापित यह तथ्य गलत कैसे हो सकता है?
सम्भवतः इस दुनिया के गाय और गधे वास्तविक गाय और गधे नही हैं। अब चूंकि इस दुनिया के गाय और गधे वास्तविक गाय और गधे नही है अतः यह दुनिया भ्रम है और चुकी यह दुनिया भ्रम है अतः कोई वास्तविक दुनिया अवश्य है। और चूंकि वास्तविक दुनिया अवश्य है अतः हमरा लक्ष्य उस वास्तविक दुनिया के लिए होना चाहिए। और चूंकि--------।
और हाँ चूंकि इस तरह "गाय-गधे वाली" चिंतन हमारे पूर्वजो ने की है; तर्क की एक विधि स्थापित की है अतः मुझे उस तर्क के अनुरूप मात्र उदाहरण ढूंढना है और उसी चिंतन पद्धति को पुष्ट करना है तो ये लीजिए:
दरवाजा आधा बन्द है अतः दरवाजा आधा खुला है
अतः दरवाजा पूरा बन्द है क्योंकि दरवाजा पूरा खुला है; दरअसल बात उस दरवाजे की हो रही है बन्द होते हुए भी खुला है और चूंकि----------------।

वैसे बोतल का मुँह होता है तो मुँह का बोतल क्यो नही होता भी एक बहुत बड़ा दार्शनिक प्रश्न है।

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विज्ञान  विजित क्षेत्र है; इसकी हद में वह सुरक्षित क्षेत्र हैं जिसमे ज्ञान और कला हमारे अद्भुत जगत का निर्माण करते हैं। लेकिन यात्रा यहीं खत्म नही हो जाती। इस विजित क्षेत्र के आगे और अनिश्चित तथा और भी अधिक रहस्य से भरा क्षेत्र जीते जाने के लिए उपलब्ध होता है। दर्शन यहाँ परिकल्पनाओं और विमर्शात्मक चिंतन द्वारा पथ-प्रदर्शक बनने का प्रयास करता है।
ध्यातव्य है कि इस विंदु पर कल्पना की कोई एक दिशा नही होती, कल्पना यहाँ हर दिशा में उड़ान लेती है। चिंतन की पद्धति में एक नया पैराडाइम भी उपस्थित हो सकता है और विज्ञान आगे बढ़ता है।
इन सबो के बीच एक समस्या उतपन्न होती है: विज्ञान द्वारा पुष्ट उन एक या अनेक दार्शनिक परिकल्पनाओं के अलावा शेष परिकल्पनाओं को भी मोह/रूढ़ि/वश मानव नकार नही पाता और उन्हें जीवित रखने के लिए जाने-अनजाने छद्म विज्ञान की रचना करता है। यहाँ दुर्भाग्य से  ज्ञान-से दिखनेवाले ऐसे तन्त्रो का एक समूह भी विकसित किया जाता है जिनका वास्तव में कोई मोल नही, ये मात्र अपव्यय हैं।

दर्शन का काम छद्मविज्ञानो को नष्ट करने के  साथ साथ  इन बन्ध्या परिकल्पनाओं और विचार पद्धतियों को भी नष्ट करना  होना चाहिए।
 
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Tuesday, February 11, 2020

मेरी बेहूदगी और मी गरदम

मेरी बेहूदगी और मी गरदम
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चीखती रही माटी
जीवन से बंध कर
देव रूप न दो मुझे!
पगली बोध में
ठहरती है तू
तेरे बोध में ही
अमरता है मेरी,
कातर स्वर में बोला देव:
बुद्ध का नहीं होता विखंडन!
रूप में बंध कर
अब माटी ढूंढती है
बोधि का उत्सव
बोधि का उत्सव।
बोधि का उत्सव:
मी गरदम!!
हाँ मन बेहूदा गिरदे 
कोहे-ओ-आबसार मी गरदम!!!

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मन: मैं
गिरदे: घूमना/भटकना
कोह: पहाड़
आबसार: झरना
मी गरदम: I whirl

स्यादवाद और मेरा सन्निपात

स्याद्वाद और मेरा सन्निपात
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(एक)

क्या सापेक्षता का होना निरपेक्षता को स्वयमेव प्रमाणित करता है?
प्रो● हिरियन्ना जैन दर्शन को लेकर लिखते हैं: यदि सापेक्षवाद को उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुचाया जाय, तो निरपेक्षवाद प्राप्त होता है, जिसे जैन दर्शन मानने से इनकार करता है।

ध्यातव्य है कि जैन दर्शन एक सापेक्षतावादी ज्ञानमीमांसा का प्रतिपादन करता है जिसे स्वादवाद कहते हैं। इसकी मान्यता है कि "सत का स्वरूप अत्यधिक अनियत है"। अर्थात वस्तु को अनेक दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है और प्रत्येक दृष्टिकोण से एक भिन्न निष्कर्ष प्राप्त होता है (अनेकांत)। 
सत के विषय मे प्रत्येक कथन असल मे सोपाधिक मात्र होता है। एकांत विधान (उपनिषद) और एकांत निषेध (बौद्ध) दोनों गलत है। 

प्रो● हिरियन्ना स्याद्वाद के विषय मे यह भी लिखते हैं कि "वैदिक एकेश्वरवाद के प्रसंग में हमने दार्शनिक दुराराध्यता की जो बात कही थी वह यहाँ पराकाष्ठा पर पहुंच जाती है"।

प्रो● चन्द्रधर शर्मा जैन दर्शन की इस विशेषता को "बौद्ध और उपनिषदों का तत्वमीमांसिय-ज्ञानमीमांसिय माध्य" कहते हैं।

प्रश्न यह है कि सापेक्षता की तार्किक परिणति निरपेक्षता है या निरपेक्षता एक अनावश्यक तत्वमीमांसिय कोटि है जो मनस द्वारा सापेक्षता के मानसिक निषेध की प्रक्रिया पर आधारित है और विचार के बाहर वाह्य जगत में कुछ निरपेक्ष होता ही नही?

भाषाई अज्ञेयों द्वारा बौद्धिक क्रीड़ा करके एक मानसिक सत्ता बनाकर उसको वाह्य जगत पर आरोपित करना अलग बात है और वाह्य जगत में जो सत्ताएं पाई जाती है उनका विश्लेषण अलग।
हालांकि यह समझा जाता रहा है कि उपरोक्त प्रथम कार्य एक दार्शनिक होने की अनिवार्य शर्त है लेकिन वास्तव में यह दर्शन नही है। पश्चिम में तो हीगल के बाद ही यह प्रतिक्रिया हो गई और तत्वमीमांसा की कृत्रिमता, अतिशय बौद्धिकता, परिकल्पनात्मक चिंतन का बाहुल्य, प्रत्ययवादी प्रवृति और दर्शन तथा तत्वमीमांसीय चिंतन के एकीकरण के विरुद्ध उयोगोगितावाद, वास्तववाद, अस्तित्ववाद, द्वंदात्मक भौतिकवाद आदि दृष्टियों का जन्म हुआ लेकिन भारत मे आज तक ऐसी कोई प्रतिक्रिया हुई ही नही है और यह अभाव दर्शन के लिए घातक है।

देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय लिखते हैं

"भारतवर्ष में कुछेक दार्शनिक मतवादों का जन्म बहुत पुराने समय मे ही हो गया था, और आगे के समय का दार्शनिक क्रियाकलाप-कम से कम इरादे में-इन मूलभूत दृष्टिभंगियो का पल्लवन-भर था।"
(भारतीय दर्शन)

【यह शोध का विषय हो सकता है कि भारत में दार्शनिक क्रियाकलाप एक सर्वथा नवीन वैचारिक ढांचे में नवीन चिंतन, जगत और मनुष्य तथा जगत और मनुष्य के नए नए सम्बन्धो की तलाश की बजाय पूर्व में प्रतिपादित कुछ मूलभूत दृष्टि और स्थापित वैचारिक ढाँचे का ही बार बार नवीन हामी ही क्यों रहा।
दर्शन मनुष्य से बड़ा नही है किंतु भारत मे इस दृष्टि का जन्म क्यो नही हो पाया जिसमे मनुष्य के अस्तिव को दर्शन के ऊपर स्थापित किया जाय। 
विचारों में परिवर्तन, वैचारिक ढाँचों में परिवर्तन बदलती परिस्थितियों के सूचक होते हैं। भारत मे एक ही वैचारिक ढाँचे और फिर मात्र बौद्ध धारा में एक नवीन वैचारिक फ्रेमवर्क का आना क्या इस बात की ओर ईशारा नही करता कि भारतीय समाज पश्चिमी समाज की तुलना में गत्यात्मक नही था?
राजनैतिक उठापठक, साम्राज्यों का आना और जाना अलग बात है और सामाजिक गत्यात्मकता और बात।】

बहरहाल बात स्यादवाद की हो रही थी और देखिए मुझे फिर सन्निपात हो गया। अगली बार स्याद्वाद पर एकाग्र करने की चेष्टा करूँगा हालांकि मुझे पता है कि मेरा और सन्निपात का विक्रम और वेताल का रिश्ता है।

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स्याद्वाद और  मेरा सन्निपात 
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(दो)

अव्वल तो मुझे आंतरिक जगत का अर्थ बहुत ज्यादा स्प्ष्ट नही है। मैं आंतरिक जगत से मन और उसके विभिन्न संकाय के समुच्चय का अवबोध पाता हूँ। स्मृति, कल्पना, भावना, ईष्या, परार्थकल्याण आदि सम्भवतः आंतरिक जगत के अवयय हैं।आतंरिक विकास वाह्य विकास के लिए निश्चित रूप से आवश्यक है इसमें तो कोई दो मत है ही नही हालांकि चेतना का ग्रेडेशन पता नही एक वैज्ञानिक शब्दावली है या नही फिर भी व्यवहार के लिए इस शब्द को तबतक स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नही है जब तक चेतना का वैज्ञानिक ग्रेडेशन न हो जाय अथवा चेतना का ग्रेडेशन होता है इस बात को ही लैब में अप्रमाणित न कर दिया जाय।
चेतना के ग्रेडेशन के विषय मे न्यूरोसाइंटिस्ट, मनस-दार्शनिकों और समकालिन मनोवैज्ञानिकों की राय जानने का प्रयास करूंगा।

भारतीय दर्शन के विभिन्न सम्प्रदाय भिन्न-भिन्न टेम्परामेंट वालो के लिए है यह बात सही होते हुए भी गलत है क्योंकि यदि इस लाईन ऑफ थॉट को एक्स्टरपोलेट किया जाय तो फिर हिंदुत्व-इस्लाम-क्रिश्चियनिटी भी अलग अलग टेम्परामेंट के लोगो के लिए है और इस प्रकार इनमे कोई भेद है ही नही।
दूसरी, यह बात इस लिए भी सही नही है कि यह विभिन्न दर्शनों के मध्य हुए वाद-विवाद, उनके पक्ष-प्रतिपक्ष, उनकी पुष्टि और विरोधी मतों के खण्डनार्थ विकसित सिद्धांतो और शास्त्रों को ऑबलीवियन में धकेल देता है जो दर्शन के इतिहास के साथ न्याय नही है; आत्मा के स्वरूप पर ही नास्तिक सम्प्रदायो को छोड़िए, सारे आस्तिक सम्प्रदाय एकमत नही है।
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विशुद्ध चेतना क्या हो सकती है?  चेतना के साथ विशुद्ध का विशेषण क्यों? चेतना के साथ क्या मिल कर उसे अशुद्ध करती है? 
क्या चेतना अपने आप मे कोई चीज है या चेतना किसी की होती है? फेनोमेनोलॉजीकल विचारक यह दावा करते हैं कि चेतना में डियरेक्टेडनेस होती है अतः चेतना किसी की होती है और निरपेक्ष चेतना की बात करना बेमानी है। 
चेतना क्या वास्तव में कोई अभौतिक सत्ता है? शायद नही क्योकि चेतना न्यूरॉन्स में हो रहे बायो इलेक्ट्रिकल और बायो केमिकल क्रियाओं का परिणाम है। 
अब यदि चेतना के लिए भूतद्रव्य के इस खास प्रकार से संगठन की आवश्यकता होती है तो उस अर्थ में ब्रह्मांडीय चेतना शब्द का कोई अर्थ नही है हाँ यह शब्द कोई काव्यत्मक उदगार अवश्य हो सकता है।
पशुओ में शायद बिचार नही होते क्योकि उनमें मष्तिष्क का यह हिस्सा नही होता जो विचार बनाने के लिए उत्तरदायी है। मैं एक प्रयोग करता हूँ--अपने मष्तिष्क को विचार शून्य करने का प्रयास करता हूँ। हालांकि यह कठिन है लेकिन जब जब मष्तिष्क विचार शून्य मस्तिष्क होता है तो वास्तव में जो बोध मुझे हो रहा होता है, जो संवेदना मुझे हो रही होती है वही उन पशुओ की संवेदना है जिनके मष्तिष्क के पास विचार करने की जटिलता नही है। मैं और भीतर जाने का प्रयास करता हूँ और मैं विकास क्रम में और पीछे के जीवो की संवेदना को महसूस करने का प्रयास करता हूँ। 
दरअसल मैं विशुद्ध चेतना की ओर नही जाता बल्कि निम्न स्पीसीज अपने दिमाग मे कैसा महसूस करते है इसकी कसरत मात्र करता हूँ।

विशुद्ध चेतना, ब्रह्मांडीय चेतना वास्तव में कुछ होती भी है!

स्वादवाद और मेरा सन्निपात
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(तीन)

मित्र, चेतना उत्तरोत्तर विकसित होती रहती है। हम स्थूल से सूक्ष्म की और बढ़ते हैं। कभी सोचा है कि किसी आदिम सभ्यता को अविकसित और आधुनिक सभ्यता को विकसित क्यों कहते हैं? मेरा मानना है कि विकसित सभ्यता सत्ता और अस्तित्व , जिसमे प्रकृति भी शामिल है, के सूक्ष्म तक पहुंच चुकी होती है। इस अर्थ में संहिताओं के काल से विकसित औपनिषदिक काल होंगे, औपनिषदिक काल से विकसित दर्शन का काल रहा होगा  और दर्शन कालों में सर्वाधिक विकसित शून्यवाद और अद्वैतकाल रहे होंगे।

मित्र, जब आप भारतवर्ष के दार्शनिक इतिहास पर दृष्टिपात करेंगे तो आप पाएंगे कि आदर्शवादी विचारकों ने जिनके अनुसार ईस्वर, चेतना, प्राथमिक है और भूत गौण अपनी व्याख्या में एक सरल वैज्ञानिक सत्य की,' उत्तरोत्तर विकास होता है ,"के साथ संगति स्थापित नहीं कर पाए है।

आइए ऋग्वेद के प्रथम संहिता को लेते हैं
अग्निमिदे पुरोहितम। यज्ञस्य देवम ऋत्विजम। होतारम। रत्नोधात्मम!
अब इस मंत्र की व्याख्या कई तरीकों से की जा सकती है ।
आचार्य सायण आधारित ग्रिफ्फिथ के अनुसार,

"I laud Agni, the chosen priest, God, Minister of sacrifice, the Hotar, the lavishest of wealth."

अब देखिए स्वामी दयानंद सरस्वती इसमें कैसे अर्थ विस्तार करते हैं:
"He is like Energy. He leads. He has been present from before. I adore him. He sheds light on this interconnected spectacle. He creates at the appointed time. He gives and reclaims. He sustains jewels in an incomparable manner"

मित्र, दयानद की चेतना किसी देश काल की उपज थी। वह काल था भारतियों को जगाने का काल अतः ऐसी व्याख्या आत्म स्वाभिमान को बनाए रखने के लिए आवश्यक थी। उस वक्त की मांग थी की स्थूल से जुड़े भारतीय मनस को पुनः सूक्ष्म से संबद्ध किया जाय लेकिन हम आज क्या कर रहे हैं-आज परमाणु बम और सपेक्षिता के सिद्धांत को वेदों में ढूंढ रहे है, क्वांटम भौतिकी के सिद्धांतों और वेड की अद्वैत वादी धाराओं  में ज़बरदस्ती सामाजस्य बिठाने का प्रयास कर रहे हैं  जबकि वेद मात्र और मात्र मानवीय चेतना के स्थूल से सूक्ष्म की ऒर प्रयाण की गवाही हैं।

कुछ दिनों पहले संघ विचारक श्री राकेश सिन्हा जी का "डेकोलोनैज़ेश ऑफ़ इंडियन माइंड' पर व्याख्यान सुन रहा था। बड़ी अच्छी बात कही उन्होंने : हम भारत महान के माइक्रो नैरेटिव में फंस कर रह गए है हमने आइडिया ऑफ़ इंडिया के मेटा नैरेटिव को क्रिएट ही नहीं किया है। यदि भारत की सृजनात्मकता को बहार लाना है तो कम से कम 50 सालो के लिए मेरा भारत महान, वेद उपनिषद और लछछेदार संस्कृत के श्लोको पर मोराटोरियम लगाना होगा।


स्याद्वाद और  मेरा सन्निपात 
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(चार)

विडम्बना यह है कि फंडामेंटल लेवल पर पार्टीकल की उपस्थिति न होने को लोग अपने अनुसार मोड़ लेते है और उन्हें लगता है कि यहाँ भौतिकवाद हार गया और इस पार्टीकल की समाप्ति के पश्चात पृष्ठभूमि में चेतनवाद है लेकिन यह फील्ड्स जो मैटर को जन्म देती है, स्वयम भी कोई चेतन तत्व नही हैं बल्कि इनका स्वरूप भी भौतिक ही है।
अब यदि मासलेस फ़िल्डस से मास वाले मेटेरियल इमर्ज हो सकते हैं तो पुनः मैटर के विशिष्ट संयोजन से मासलेस और एक नवीन घटना "चेतना" क्यो नही इमर्ज होगी?
सारा चेतनावाद चेतना को भौतिक न मानने की शर्त पर टिका है।

जगत की अंतिम सत्ता के विषय मे दो सिद्धान्त बड़े चर्चित हैं: आइडियलिज़्म या प्रत्ययवाद (चेतनवाद) और भौतिकवाद। भौतिकवाद जगत को भूत द्रव्यो से उतपन्न मानता है अतः इस विचारधारा के अनुसार चेतना भूतद्रव्यो का उत्पाद है। चेतनावाद इसके उलट जगत को चेतना की उतपत्ति स्वीकार करता है और या तो जड़ तत्व का ही खंडन करने का प्रयास करता है; जड़ को अविद्याजन्य या भ्रम स्वीकार करता है।
उपरोक्त एकत्त्ववादी विचारधाराओं के अलावा जगत की अंतिम सत्ता विषयक बहुतत्ववादी और द्वैतवादी विचार भी मौजूद है। भारतीय दार्शनिक पद्धतियो में न्याय-वैशेषिक एवम जैन को बहुतत्ववादी व सांख्य को द्वैतवादी माना जा सकता है।

बात सन्निपात, स्यादवाद और चेतना की हो ही रही है तो थोड़ा डायवर्जन लेते हुए मनोव्याधियो की भी बात आवश्यक है। मनोविकारों की चर्चा के आलोक में भी चेतना के विषय मे स्थापित शास्त्रीय भारतीय मान्यताओं का विश्लेषण अनिवार्य है ताकि चेतना को उस अलौकिक लोक से नीचे लाकर इहलोक का विषय बनाया जा सके। प्रसङ्गातीत यह डाइग्रेशन इसलिए भी आवश्यक है कि "ब्रह्मांडीय चेतना, विशुद्ध चेतना, अनश्वर चेतना आदि जैसे शब्दों के दावों की इस नई रोशनी में भी जाँच की जा सके।
आप यहाँ कहेंगे कि नही नही तुम भारतीय शास्त्रों में वर्णित चेतना को समझने में भूल कर रहे हो तो मैं आपको आमंत्रित करता हूँ कि मुझे भारतीय शास्त्रों में वर्णित चेतना का अर्थ समझाने की कृपा की जाय क्योकि प्रो●हरिमोहन झा की तरह ही मैं उस चेतना को नही जानता जो न तो शस्त्रों से कट सकती है और न ही जिसे अग्नि जला सकती है बल्कि मैं उस चेतना को जानता हूँ जो क्लोरोफॉर्म से तिरोहित हो जाती है (सन्दर्भ: दार्शनिक विमर्श, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी)

पेट्रीसिया कैसी और ब्रेंडन कैली "फिशज़ क्लिनिकल सैकोपैथोलॉजी" में मनोव्याधियो को निम्न शीर्षो में विभाजित करते हैं:
● प्रत्यक्षीकरण की व्याधियाँ
(Disorders of Perception)
● विचार और वाक की व्याधियाँ
(Disorders of thought and speech)
●स्मृति की व्याधियाँ
(Disorders of memory)
● भावनाओ की व्याधियाँ
(Disorders of Emotion)
●आत्मानुभव की व्याधियाँ
(Disorders of self experience)
●व्यक्तित्व सम्बन्धी व्याधियाँ
(Disorders of Personality)
●गति सम्बन्धी व्याधियाँ
(Motor disorders)
●चेतना की व्याधियाँ
(Disorders of consciousness)


Sunday, February 9, 2020

एक बदफैलसुफ़ का सन्निपात

सन्निपात
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एक
मनुष्य पशुओ की अपेक्षा चांस और रैंडमनेश के विकास के गुण के सबब एक बड़ा मस्तिष्क पा जाने की खुमारी से आज भी बाहर नही निकल पाया है। चांस और रैंडमनेश, क्योकि आप जैव विकास की प्रक्रिया को रिवाइंड करते हुए फिर वही से प्रारम्भ करिए जहाँ से सब प्रारम्भ हुवा और इस बात की कोई गारंटी नही की उत्परिवर्तन और प्राकृतिक चयन इस स्तर तक आते आते या बीच मे ही कहीं आपको वही स्पीशीज देगी जो इसके पूर्व रही है, और हमारे स्तर तक आते-आते शायद एक बहुत बड़े सर वाला कॉकरोच हो जो जीवन के इस प्रकृति के एवम अन्य प्रजातियों के साथ हो रहे संघर्ष में सबसे ज्यादा फिट हो। एक फोटोन पानी पर गिरता है और हम नही बता सकते कि वह फोटोन पानी से होकर गुजरेगा या परावर्तित हो जाएगा। एक प्रेक्षकीय चेतना के परिप्रेक्ष्य से जगत क्वाण्टम लेवल पर किसी उस नियतिवाद का पालन नही करता जिससे हम इस क्वाण्टम की दुनिया मे प्रवेश करने से पहले परिचित थे, जिसके अभ्यस्त थे और जगत के विषय मे हमने बड़े-बड़े दावे ठोक दिए थे; जैव विकास की घटना में उत्परिवर्तन या जेनेटिक म्यूटेशन एक क्वाण्टम इवेंट की तरह है--हम नही जानते कि कौन सा जीन उत्परिवर्तित होगा---कौन सी नई स्पीशीज सामने आएगी।
प्रश्न यह है कि जब हम अपने ही अस्तित्व के बारे में इतने अनिश्चित हैं तो फिर हम उन बड़े-बड़े दावों को कैसे कर बैठते हैं यथा: मुक्ति, निर्वाण, कैवल्य, ब्रह्म।
केवल एक घटना, इस विशाल जगत में एक बहुत ही इनसीगनिफिकेन्ट घटाना नही हुई होती और हम उन विशाल सर वाले कॉकरोचों की दुनिया मे बीमारी फैला रहे होते तथा उनके स्प्रे और हिट से छुपते फिर रहे होते।

सन्निपात
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दो

हम बने ही ऐसे हैं कि प्रथम दृष्टया हमे लगता है कि हम सबके केंद्र में हैं। हम एक निर्जन स्थान पर हों तो हम उस वृत के जो हमारी आँखे देखती हैं उसके केंद्र में नज़र आते हैं। अपनी दृष्टि थोड़ी विस्तृत करें तो हमे हमारी पृथ्वी पूरे दृश्य आकाशगंगा के केंद्र में लगती है। अगर हम अपनी आकाशगंगा के परिप्रेक्ष्य से ब्रह्मांड को देखें तो फिर शेष दृश्य ब्रह्मांड के केंद्र में हमारी आकाश गंगा होती है।
हर जीव और जीवन के केंद्र में हमे अपना अस्तित्व और मानव जाति दिखती है जैसे यह सब हमारे लिए ही बना हो या हम सबसे महत्वपूर्ण, सबसे उच्च जीव हों लेकिन परिप्रेक्ष्य बदलिए और दृश्य बदल जाता है हालांकि परिप्रेक्ष्य बदलना बहुत हिम्मत का काम है क्योंकि यह हमारे अंदर एक भावात्मक तूफान खड़ा कर देता है। यह स्थिति बड़ी पीड़ादायी होती है और हम इससे बचना चाहते हैं इसीलिए हम अपने उस मिले, बने बनाए ककून में खुश रहते हैं। 
अपनी अहमकेन्द्रित विष्मवस्था में खुश रहने में कोई दिक्कत नही है लेकिन किसी और को जो उस ककून को तोड़ कर बाहर निकलना चाहता है उसको संस्कृति, पूर्वज आदि की दुहाई देकर या कई बार उसके प्रति हिंसक होकर उसे रोकना बुद्धिमता और मानवीयता नही स्वार्थ है।चुकी उसके द्वारा उद्घाटित नया सत्य भी अंततः आपके अंदर वही पीड़ादायी भावात्मक तूफान ला सकता है अतः यह संस्कृति नही बल्कि छद्म रूप से आपके अपने उस ककून की रक्षा है।

परमसत, परमसत्ता आदि की जब हम बात करते हैं तो अचेतन रूप से हम एक गतिहीन, मानव केंद्रित जगत में विश्वास कर रहे होते हैं ज्यों मनुष्य जाति की कॉग्निटिव फेकल्टी और एस्थेटिक सेंस उस निरपेक्ष को जानने, उसके सौंदर्यबोध को विकसित है। निम्नतर जन्तुओ के कॉग्निशन की तुलना में हमारी यह फेकल्टी अवश्य विकसित है लेकिन आज से एक लाख वर्ष भविष्य में जो प्रजाति हमसे विकसित होगी उसकी तुलना में हमारी संज्ञानात्मकता, एस्थेटिक सेंस अत्यंत निम्न है; उनकी परमसत्ता कुछ और होगी क्योंकि परमसत्ता हमारे फ्रोन्टल लोब में रचा जाता है।

एक मित्र ने कहा कि आपके पूर्वज बंदर होंगे हमारे तो ऋषि थे। आज से एक दो लाख वर्ष भविष्य में स्वयम को प्रोजेक्ट करिए और देखिए हमसे विकसित कुछ लोग शर्म के मारे यह स्वीकार ही नही कर पा रहे हैं कि उनके पूर्वज मानव थे। उस समय "अरे आदमी" एक गाली है।

सन्निपात
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【तीन】

हम कुछ भी सीखते ही क्यों हैं इसका एक पंक्ति में उत्तर है सर्वाइव करने के लिए।  विकास क्रम में निम्न स्पीशीज में सम्बंधित बेहेवियर इंस्टिक्ट में होता है। एक मधुमक्खी अपना छत्ता बनाना कहीं सीखती नही है, यह उसके अंदर है। एक चिड़िया अपने घोंसले बनाने के लिए विश्विद्यालय नही जाती, उसके अंदर है। विकास क्रम में चेतना के विस्तारण के साथ, मन के इमर्ज होने के बाद, मस्तिष्क के और जटिल होने के बाद इंस्टिक्ट के अलावा लर्नड बिहेवियर इमर्ज होता है। अब सूचना हमारे इंस्टिंक्ट के बाहर भी स्टोर किया जा सकता है और बिना किसी जेनेटिक्स के इसको अगली पीढ़ी में ट्रांसफर किया जा सकता है।
इस जेनेटिक्स के बाहर उपस्थित सूचना का भी मूल अभिप्राय इंस्टिंक्टिव बिहेवियर की तरह सर्वाइवल ही है, अंतर मात्र यह है कि इस सूचना पर आधारित व्यवहार अतःस्फूर्त नही होता है।
विकास क्रम में उच्चतर जीव के आने के बाद व्यवहार का एक अनुषांगिक पक्ष भी होता है:
हमारे लिए भोजन मात्र स्वयम को जीवित रखने के लिए नही है, इससे सम्बंधित एक अनुषांगिक पक्ष भी है: स्वाद। और हम इसके लिए भी पाकशास्त्र सीखते है। सेक्स हमारे लिए अब मात्र अपनी प्रजाति को जीवित रखने का करण नही है, सेक्स अब हम मजा के लिए भी करते हैं।
ज्ञान का भी मात्र और मात्र सर्वाइवल मूल्य जो आज तक होता था, मानव में इससे सम्वन्धित एक अनुषांगिक पक्ष भी उभरता है।
 
एब्स्ट्रेक्शन, जेनरलाइजेशन और पैटर्न पहचानने का बोध अन्य जीवों से ज्यादा है जिसका कोई रहस्यात्मक कारण नही बल्कि विकास क्रम में मात्र यह एक सर्वाइवल उपकरण है। हमने आकाश को देखा उसके चमकते तारो में एक पैटर्न था, हमने अपने अगल-बगल की घटनाओं को देखा, उसमे एक पैटर्न था, हमने जेनरलाइजेशन किया, एब्स्ट्रैक्ट चिंतन की।  हमारे पैटर्न पहचानने के बोध, सामान्यीकरण तथा अमूर्तकरण की क्षमता ने मिथक-दर्शन-विज्ञान आदि को जन्म दिया हैं, लेकिन फिर वही बात की यह मात्र हमारे सर्वाइवल टूल हैं; विज्ञान अब तक का सबसे बेहतर।
परमसत या परम सत्ता को जाना जा सकता है या यह है भी इसके बारे में मैं आश्वश्त नही हूँ। सब व्हाइट मैटर और ग्रे मैटर का खेल है और यह सफेद और भूरा गुदा इस प्रकार ऑर्गनाइज हुवा है कि हम मात्र बेहतर तरीके से वातावरण के साथ अनुकूलित हो सकें, हम और हमारी प्रजाति जिंदा रह सके। इस अनुकूलन में यदि कोई परमसत्ता आता है तो वह फिर परम-सत्ता है ही नही क्योकि वह, अनुकूलन, हमारे और हमारे प्रजाति के जीवित रहने के अभिप्रेरण से कंडिशन्ड है।

सन्निपात
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चार

वैज्ञानिक ज्ञान की एक सीमा है, जगत की नही। विज्ञानं क्या है? दरअसल यह अमीबा के उस उद्दीपन-प्रतिक्रिया का ही अत्यन्त जटिल रूप है, उस क्रिया-प्रतिक्रिया का मात्रात्मक-गुणात्मक विकास है। उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रिया करने की आज तक की सबसे अच्छी प्रक्रिया, सबसे सफल प्रक्रिया है,और इसीलिए इसने इतने कम समय में हमारी चेतना के जगत को हमारे लिए इतना अनुकूलित कर दिया है।
यह प्रकृति के नए नए रहस्यों को खोल रहा है।
अणु में इसने अथाह शक्ति ढूंढ लिया और बस ढूंढा ही नही उसे मानव का पालतू भी बना दिया। प्रकृति पर आज हम किसी हद तक नकेल कस सकते है। हाँ वो शक्तियां जिनसे अभी मात्र पांच हज़ार साल पहले हमारे पुरखे डर कर विनती करते थे वो आज हमारे नियंत्रण में हैं,और क्रमशः होती जा रही हैं। हमारे पुरखे जहाँ तक सोच नही सकते थे उन जगहों पर हम अपने पदचिन्ह छोड़ रहे हैं। 
अनुकूलन की विविध चेतन प्रक्रियाओं में विज्ञान की बराबरी तो कोई कर ही नही सकता, न धर्म, न आदिम जादू (फ्रेजर) न सहज वृति, न अपने परंपरिमक मायनो में दर्शन।
लेकिन, विज्ञानं की एक सीमा है जगत की कोई सीमा नही है।
हमे जो ज्ञान प्राप्त हो रहा है, हम जिन रहस्यों को जान रहे हैं क्या वो निरपेक्ष है, वास्तव में वैसे है या हमारी चेतना उन्हें वैसा प्रदर्शित करती है? चेतना, जिसका विकास प्रकृति से अनुकूलन के लिए हुवा है, हमारे न्यूरॉन के फंक्शन पर ही तो अवलम्बित है।
और यह अवलम्बन स्वयं एक विकास का परिणाम है।
दरअसल हम देखने के लिए स्वतंत्र नही है, हम वही तक देखने के लिए स्वतंत्र है जहाँ तक हमारी चेतना हमे स्वतंत्रता देती है और हम उसी प्रकार देखने को स्वतंत्र है जिस प्रकार देखने की स्वतंत्रता हमारी चेतना देती है।
तो क्या हम संच में स्वतंत्र है?
नही और यही बन्धन मैट्रिक्स है जो है
विज्ञानं की सीमा है, जगत असीमित है।

सन्निपात
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पाँच

जो कुछ भी जाना जा सकता है अपने अस्तित्व के परिप्रेक्ष्य में ही जाना जा सकता है। अस्तित्व को ट्रांसेन्डेन्ट कर कुछ जाना ही नही जा सकता इस प्रकार हर जानना अस्तित्वकेन्द्रित विषमावस्था से ग्रसित है। यदि थोड़ा और बौद्धिक अनुशाषित हुवा जाय तो हम नही जानते कि हमारे अस्तित्वकेन्द्रित विषमावस्था में प्राप्त ज्ञान के बाहर कुछ है भी। वह अज्ञात अस्तित्वमान हो,तब भी न तो वह हमे प्रभावित करता है और न हम उसे। हमारे और उसके बीच कोई अन्तःक्रिया सम्भव नही फिर उसके बारे में चिंतन बौद्धिक अपव्यय भी हो सकता है।
उस तक हमारी वाणी नही पहुंच सकती, उस तक हमारे विचार नही पहुंच सकते तब वह हमें रिस्पॉन्ड भी नही करेगा फिर मानव एक अनावश्यक सत्ता का बोझ क्यो ढोए?

सन्निपात
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छह

प्रश्न है कि क्या बिग बैंग प्रारम्भ है और इस ब्रह्मांड का अंत सम्भव है?
प्रायः ब्रह्मांड क्यो का जवाब दिया जाता है कि ह्यूमैन मोटिव को ब्रह्मांड पर आरोपित नही किया जा सकता। ब्रह्मांड किसमे फैल रहा है का उत्तर होता है कि यह प्रश्न सार्थक नही है और यह ठीक वैसा ही प्रश्न है कि उत्तरी ध्रुव के उत्तर में क्या है। 【हॉकिंग】
कहा जाता है कि हम ब्रह्मांड को अंदर से जानते है  और इन अंदर की कोटियों पर आधारित प्रश्न ब्रह्मांड पर लागू नही हो सकते। बिगनिग और एंड, अथ और इति ब्रह्मांड के अंदर की घटना तो निश्चित रूप से है। प्रारम्भ और समाप्ति तो निश्चित रूप से ब्रह्मांड के अंदर पाए जाते है लेकिन इसके उलट अथ और इति के अंदर ब्रह्मांड है यह हम निश्चितता के साथ कैसे कह सकते हैं? क्या यह रोजमर्रा की घटनाओ का इस वृहत पर आरोपण नही है?
क्या कोई बता सकता है कि "कब" "कैसे" "क्यों" कहाँ" में से कौन-कौन किस-किस सन्दर्भ में पूछना नॉनसेंस नही है और इसके निर्धारण का मानक क्या है?

बिग-बैंग हुवा है, बिग फ्रीज़, बिग रिप या बिग क्रंच भी हो सकता है लेकिन यह ब्रह्माण्ड का प्रारम्भ या खात्मा नही हो सकता। यह उस वृहत की एक प्रक्रिया का पूर्ण हो जाना मात्र लगता है।
प्रतीत होता है कि बिग बैंग से बिग क्रंच या बिग फ्रीज़, रिप तक की प्रक्रिया यदि ब्रह्मांड है तो यह सीमित है और कॉस्मोलॉजिस्ट का यह ब्रह्मांड भले ही देश-काल मे अनन्त हो लेकिन यह असीम नही है और #वह ससीम नही है। ये कॉस्मोलॉजिस्ट हमारी चेतना में आए ब्रह्मांड की एक एड होक व्याख्या कर रहे हैं।
कुछ ज्ञात ज्ञात हैं, कुछ ज्ञात अज्ञात हैं और कुछ अज्ञात अज्ञात है। हम उस अज्ञात अज्ञात तक पहुँच ही नही सकते।

क्वाण्टम भौतिकी के विकसित होने के साथ भौतिकी में प्रेक्षक या ऑब्जर्वर की भूमिका बढ़ती जा रही है। कहा तो यह भी जाने लगा है कि जिसे हम सत्यता कहते हैं वह ज्ञाता और ज्ञेय के मध्य अन्तःक्रिया में उभरता है और इस अंतः क्रिया के बाहर इस सत्यता का कोई अस्तित्व नही रहता।【व्हीलर】
इस विचार पर आधारित व्हीलर ने ब्रह्मांड में मौजूद फाइन ट्यूनिग की व्याख्या करने के लिए पार्टिसिपेटरी एंथ्रोपिक प्रिंसिपल दिया जिसके अनुसार वेव फंक्शन के ध्वस्त होने के लिए एक वास्तविक प्रेक्षक की आवश्यकता है। जॉन बैरो और फ्रैंक टिपलर कहते हैं की ब्रह्मांड अस्तित्व में तब आता है जब कोई प्रेक्षक ब्रह्मांड का प्रेक्षण कर रहा होता है। 【द एंथ्रोपिक कॉस्मोलॉजिकल प्रिंसिपल】
नील द ग्रास टायसन अपनी पुस्तक ओरिजिन्स में लिखते हैं कि प्रारम्भ में भौतिकी के नियम थे।
जीव विज्ञानी रूपर्ट शेल्ड्रेक कहते हैं कि हम एक ऐसी स्थिति में आ जाते हैं जहाँ भौतिकी के नियम की पूर्वमान्यता माइंड या मनस है। 【द साइंस डेलयूज़न】

यदि भौतिकी के नियम वास्तव में मनस की प्रागपेक्षा रखते हों तो फिर बिग-बैंग को हमारा मनस रच रहा है। ब्रह्मांड की शुरुआत और अंत का प्रत्यय हमारा मनस रच रहा है। ब्रह्मांड का आदि या अंत है हम नही कह सकते।

सन्निपात
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सात

ब्रह्मांड में चेतना का इमर्ज होना एक अद्भुत घटना है। कार्ल सेगन कहते हैं कि जो कुछ भी था, जो कुछ भी है और जो कुछ भी होगा वह कॉस्मॉस है।
अर्थात हम ज्ञाता हो जाने से ब्रह्मांड से बाहर नही हो जाते बल्कि हम भी ब्रह्मांड के हिस्से हैं।
अब यह उद्वेलित नही करता कि ब्रह्मांड का एक हिस्सा ब्रह्मांड ने ऐसा रचा जो ब्रह्मांड को जानने लगता है और जानने ही नही लगता बल्कि ब्रह्मांड में एक नए स्तर से पार्टिसिपेट करने लगता है।इस स्तर पर ब्रह्मांड में पार्टिसिपेट कोई नही करता: न कोई ग्रह, नक्षत्र, तारे, निहारिका या बैक्टेरिया, वायरस, वृक्ष, पशु कोई भी नही।
एक अल्टरनेट ब्रह्मांड में सम्भव है कि वह इंटेलिजेंट लाईफ को तो छोड़िए, लाइफ को ही नही इमर्ज होने देता। हमारे ब्रह्मांड ने हमे यह या तो मौका दिया है या यह हमारे ब्रह्मांड के अस्तित्व में आने की शर्तों में ही है।
क्या यह असम्भव है कि ब्रह्मांड ने हमे इसलिए रचा है कि हम ब्रह्मांड को रचे?
हमारे माता-पिता हमे जन्म देते हैं और हम अपने बच्चों को जन्म देते हैं लेकिन दरअसल जीन के स्तर पर हमारे माता पिता हमारे माध्ययम से स्वयम को जन्म देते हैं और हम अपने बच्चों के माध्ययम से स्वयम को। दृष्टि को थोड़ा और विस्तार दिया जाय तो हम अपनी सन्तति के माध्ययम से अपने पूर्वजो को जन्म दे रहे होते हैं।
हम ब्रह्मांड के बच्चे हैं, शायद ब्रह्मांड ने हमे इसलिए इंटेलिजेंस दिया है कि हम ब्रह्मांड को जन्म दें और अनुकूलन के बहाने ही सही इसलिए भी ब्रह्मांड अपने रहस्य हमे बताता है।

सम्भव है कि कल हम ब्रह्मांड को जन्म दे रहे हों और ब्रह्मांड ने हमे इसीलिए रचा हो।
वैसे अभी यह मात्र एक विज्ञान गल्प है।

सन्निपात
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आठ

यह ब्रह्मांड क्यों है?
जब हम यह प्रश्न करते हैं तो इसका अर्थ क्या होता है? मेरे सामने यह पुस्तक क्यों है? क्योंकि इस पुस्तक के माध्ययम से मेरा एक प्रयोजन सिद्ध होना है। ब्रह्मांड के विषय मे जब हम क्यो का प्रश्न करते हैं तो हम अचेतन रूप से इस बात को मान रहे होते हैं कि ब्रह्मांड का प्रयोजन है लेकिन क्या हो यदि सत्य यह हो कि ब्रह्मांड का कोई प्रयोजन ही न हो और इस प्रकार ब्रह्मांड क्यों एक निरथर्क प्रश्न हो।
 ब्रहांड बस हो जैसा बर्ट्रेंड रसेल कहते हैं। विश्व मे कोई प्रयोजनवत्ता नही हो और यह मात्र यांत्रिकता के नियम और सिद्धान्त से संचालित होता हो?
भौतिकी के आधुनिक सिद्धान्त हमे बताते हैं कि जगत में कोई प्रयोजन नही है। यह उस घड़ी की तरह है जिसका कोई न तो घड़ीसाज है न किसी के लिए ही यह निर्मित है: यह बस है,इसके पुर्जे आपस मे एक दूसरे से जुड़े हुए 14 खरब वर्षो से अनन्त(?) काल तक टिक-टिक-टिक-टिक।
हमारी बुद्धि यह आसानी से मान लेती है कि ईश्वर अपना स्वयम का कारण हो सकता है लेकिन जगत में प्रयोजन देखने को हम इतने अभ्यस्त हैं कि जगत भी स्वयम्भू हो सकता है यह बात हमे अटपटी लगती है लेकिन ऐसा क्यों नही हो सकता?
जगत अपने आप से अपनी रचना क्यो नही कर सकता? जगत अपने एकत्व से ही अपने अंदर के नानात्व को क्यो नही रच सकता?

सन्निपात
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नौ

कोई भी यूनिफाइड सिद्धान्त, चाहे वह ब्रह्म हो, परमसत्ता हो या बहुप्रतीक्षित भौतिकी की थ्योरी ऑफ एवरीथिंग, यदि वह मानव की पीड़ा का इसी व्यवहारिक दुनिया मे निवारण नही करती तो वह एकीकृत सिद्धान्त कैसे है?
पीड़ा, मनुष्य को व्यवहार से बाँधे भी रखती है और मनुष्य से परमार्थ के रूप में पलायन की अधिभौतिकी भी रचवाती है।
सत चित आनंद का नही पता, सत और चित का भी नही मालूम लेकिन वेदना है, यह निर्विवाद है।
परमार्थ का बोध में पीड़ा का निवारण हो न हो पीड़ा से पलायन के प्रयास में परमार्थ अवश्य रचा जाता है।

सन्निपात
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दस

कब-क्यों-कहाँ-कैसे-कितना
हमारे पास यह पाँच ही प्रश्न है, हमारा मस्तिष्क इतना ही पूछने के लिए विकसित हुवा है लेकिन #सत्ता (ब्रह्मांड) अपनी वस्तुगतता में जाने कितने #वेरिएब्ल्स (चरों) को लिए बैठा है अतः हम ब्रह्मांड को उसकी वस्तुगतता में नही समझ सकते।

हाँ हम अपने सन्दर्भ से कब-क्यों-कहाँ-कैसे ढूंढते चले जा सकते है और परत दर परत, रहस्य दर रहस्य उद्घाटित करते जाएंगे लेकिन हम यह भी दावे के साथ नही कह सकते ही ब्रह्मांड की वस्तुगतता के परिप्रेक्ष्य से यह कब-कहाँ-कैसे-क्यों सही प्रश्न हैं भी या नही!

सन्निपात 【एक】



मनुष्य पशुओ की अपेक्षा चांस और रैंडमनेश के विकास के गुण के सबब एक बड़ा मस्तिष्क पा जाने की खुमारी से आज भी बाहर नही निकल पाया है। चांस और रैंडमनेश, क्योकि आप जैव विकास की प्रक्रिया को रिवाइंड करते हुए फिर वही से प्रारम्भ करिए जहाँ से सब प्रारम्भ हुवा और इस बात की कोई गारंटी नही की उत्परिवर्तन और प्राकृतिक चयन इस स्तर तक आते आते या बीच मे ही कहीं आपको वही स्पीशीज देगी जो इसके पूर्व रही है, और हमारे स्तर तक आते-आते शायद एक बहुत बड़े सर वाला कॉकरोच हो जो जीवन के इस प्रकृति के एवम अन्य प्रजातियों के साथ हो रहे संघर्ष में सबसे ज्यादा फिट हो। एक फोटोन पानी पर गिरता है और हम नही बता सकते कि वह फोटोन पानी से होकर गुजरेगा या परावर्तित हो जाएगा। एक प्रेक्षकीय चेतना के परिप्रेक्ष्य से जगत क्वाण्टम लेवल पर किसी उस नियतिवाद का पालन नही करता जिससे हम इस क्वाण्टम की दुनिया मे प्रवेश करने से पहले परिचित थे, जिसके अभ्यस्त थे और जगत के विषय मे हमने बड़े-बड़े दावे ठोक दिए थे; जैव विकास की घटना में उत्परिवर्तन या जेनेटिक म्यूटेशन एक क्वाण्टम इवेंट की तरह है--हम नही जानते कि कौन सा जीन उत्परिवर्तित होगा---कौन सी नई स्पीशीज सामने आएगी।
प्रश्न यह है कि जब हम अपने ही अस्तित्व के बारे में इतने अनिश्चित हैं तो फिर हम उन बड़े-बड़े दावों को कैसे कर बैठते हैं यथा: मुक्ति, निर्वाण, कैवल्य, ब्रह्म।
केवल एक घटना, इस विशाल जगत में एक बहुत ही इनसीगनिफिकेन्ट घटाना नही हुई होती और हम उन विशाल सर वाले कॉकरोचों की दुनिया मे बीमारी फैला रहे होते तथा उनके स्प्रे और हिट से छुपते फिर रहे होते।

Friday, February 7, 2020

Silence


Eyes, blank ,expressionless, 
Gaze heavenward, 
My soul wounded, 
I cried. 
Only my voice I heard! 
Was the Almighty an Echo, 
Cursed to lost his will, 
To speak on his own, 
Or a Narcissus was I? 

Then, one night, 
My soul wounded again 
I cried, cried and cried, 
My eyes closed, 
I felt my cries, 
Punctuated by a silence, 
God had answered. 
(His voice is the most silent) 
Versed in the linguistics of silence, 
My gaze turned heavenward, 
I saw the endless silence, 
Punctuated by my endless cries. 
My eyes turned spirited; expressionless.

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(2003)

तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा:

उसकी दवाई के डब्बे में
अवसाद की दवा है
नींद की गोलियां हैं
ब्लड प्रेशर की भी दवाई है 
माइग्रेन की माईगरानील गोली है
गैस की तो हमेशा होती है
लेकिन सबसे बड़ी बात की इन सबके बावजूद
वियाग्रा भी है।
अस्तित्व बड़ी कुत्ती चीज है भाई
वह आपसे जीती है
आप केवल माध्ययम हैं, केवल माध्ययम!
आप जीवन नही जीते
जीवन आपको जीता है!!

बुदबुदा

ग्यारहवी क्लास में लिखी यह कविता
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◆◆◆◆

जी रहे हैं हम
क्षण क्षण नवीन अनुभूतियों के संग
एक श्रृंखला पंचतत्वो की
जो आज व्याप्त है
जाने कब विलीन हो अनन्त में
दूर कही इस नश्वर संसार से
महाशून्य की गोद मे
परिपूर्णता के विस्तार में
अकेला या मैं होऊंगा मेरे साथ
या कुछ भी नही
यह मात्र कोरी कल्पना है
और सत्य बस यही है कि
बस जी रहे है हम
उतारते कागज पर अनुभूतियां
और एक दिन अनुभूतियां भी
जल जाएंगी चिताओं पर
ह्रदय और मस्तिष्क के संग संग
अपने पीछे कुछ क्षणिक भाव छोड़कर?

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Thursday, February 6, 2020

एक थी तरंगिणी

एक थी तरंगिणी,
निश्छल, निर्मल प्रवाहमयी;
अपने किनारों को तोड़ती,
घुमड़ती, लहराती आगे बढ़ती,
मैं, उसके किनारों का शिलाखंड,
प्यासी आँखो से उसे देखता:
मूक था न, अभिशापित!
आह, पालकों पर सपने----!
और एक दिन तुमने 
मुझे छू दिया।
अद्वितीय संगीत!
विधाता ने पत्थर की आत्मा को
नाचते देखा, गाते देखा, झूमते देखा।
तरंगिणी, क्या तुमने भी महसूस किया था 
उस संगीत को?
फिर तो चट्टान का प्रेम,
जन्म-जन्मांतर का भाव,
उसके सपने मेरे धर्मग्रन्थ,
उसकी स्मृति मेरी श्रुति!
टूटा और मिल गया तुममें।
(स्वर, संगीत, नाद या विप्लव?)
अब तुम्हारी लहरे मुझ पर अठखेलिया करतीं हैं
लेकिन,  आत्मा और प्यासी होती चली जाती है,
और प्यासी, और और प्यासी!!

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अपना रिश्ता, दिल्ली की नौकरी



प्रिये हमारा सम्बन्ध
जैसे दिल्ली की कोई नौकरी
जब जब आँखों मे सपने नही होते
तुम्हारे देखता हूँ:
कम से कम यह तो बची रहे!
बदसूरत सा काम
पर होठो पर बनावटी मुस्कान
लिपा, पोती, झूठ
ऊपर से ठाट बाट नीचे मोकामा घाट।
हाँ जी, हाँ जी सर, हाँ डार्लिंग!
क्योकि हाँ जी की नौकरी
ना जी का खाली हाथ।
दिल्ली की चाकरी: अपना रिश्ता
ज़िंदगी साली,
तुम्हारे साथ साली ज़िंदगी!

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तुम्हारी संस्कृति

"पेट, जब भर न पाए तो मुफलिसी, दरिद्रता, गरीबी।
पेट जब भर जाए तो धर्म, संस्कृति की दुहाई।

हा-हा हा! हा-हा-हा!

पेट भर ठूंसने के बाद अर्धनिद्रा में बड़बड़ाना सा है तुम्हारी संस्कृति!

और अपनी संस्कृति का विरोधाभास तो देखो, यदि मैं नाखून बढ़ा लूं जो मुझे प्रकृति ने एकमात्र हथियार दिया है तो मैं असंस्कृत लेकिन तुम सुसंस्कृत हो क्योकि तुम्हारी मैनिकयुर्ड उंगलियां ट्रिगर को चूमती हैं।"

हा-हा हा! हा-हा-हा!

काफ़िर



कहया मैं काफिर न कोई
सब पर रहमत राम की होई 

तब हरफ़ बिखरे पड़े थे। अलिफ़ कहीं, लाम कहीं और हे कहीं। किसी ने हरफों को जोड़ दिया, हरफो में उसको बांध दिया। माटी भी बिखरी पड़ी थी, पत्थर भी तब लावारिश थे। किसी दूसरे ने माटी में, पत्थर में उसको गढ़ दिया।

कौन मोमिन, कौन काफ़िर?

मुल्ला कहता बुतपरस्त काफ़िर।
वह इस हक़ को नही देख पाया कि
बुत, माटी से सिफ़ात  हैं
और वो सिफात, हरफो से गढ़ी मूरत।
हरफो में देखो तो माटी मिलेगी
पत्थर में देखो तो हरफ!!

अल अस्मा उल हुस्ना अल्लाह त'आला के 99 सिफ़ात हैं: अर रहीम, अल रहमान, अल मालिक, अल कुद्दुस-----------------------------------------

सिफ़ात हरफो की मूरत
मूरत सजर ओ गिल के सिफ़ात!!

सजर: पत्थर
गिल: मिट्टी

Wednesday, February 5, 2020

अगीत गाता हूँ

असभ्य, जाहिल!
तुम मर्म नही समझते 
कविताओं का,
शास्त्री जी ने कहा।
मैं अगीत लिखता हूँ,
अकाव्य गाता हूँ,
और जानते हो शास्त्री
ओरांग ओटान को किसी ने पहचाना था केवल,
मैंने उसे कलम पकड़ा दिया है,
कागज काले करता है,
दूसरे ओरांग ओटानो के लिए!

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...