Saturday, February 29, 2020
आवारा विचार 【दर्शन】
Friday, February 28, 2020
वैज्ञानिक तथ्य लिखने वालों की भाषा कैसी होनी चाहिए? 【एक】
Tuesday, February 25, 2020
लाल सलामी उनके दलाल हैं।
Friday, February 21, 2020
स्पेनिश: एक मौसी-भाषा
ज्ञानमीमांसा
Thursday, February 20, 2020
छोटकऊ-बड़कऊ
Tuesday, February 18, 2020
इलाहाबाद प्रकरण
Sunday, February 16, 2020
आवारा विचार 【3】 सौंदर्य, ज्ञान और बल
खलील जिब्रान की शैली में
Saturday, February 15, 2020
आवारा विचार 【2】: माचिस और चरनी
आवारा विचार 【1】
सावधान इंडिया!
Absolute Truth
विरोधाभास (Paradox)
वास्तविकताएं
Thursday, February 13, 2020
चावल (दका)
बर्मा, इंडोनेशिया, वियतनाम में उसी भाषा समूह की भाषाएं ही जिस भाषा समूह की भाषा संथाली और मुंडारी है।
लेकिन यह तभी सम्भव है जब हम जावा मानव की परिकल्पना को सत्य मान ले।
यदि मानव अफ्रीका में विकसित हुवा तो हमे यह यह मानना होगा की ये अफ्रीका से पहले भारत आए फिर भारत से ऑस्ट्रेलिया गए और बीच रास्ते से कहीं इनकी एक लहर काल क्रम में पुनः किसी कारण से वापस लौट आई।
यदि हम इस परिकल्पना को सत्य माने तो अचानक से अज्ञात हिहरी पिपड़ी, हरात पर्वत, सिंग दुवार, सासांग बेडा स्पष्ट होते दिख जाते हैं।
और इसी क्रम में मारांग बुरु सबसे बड़ा पहाड़ की कल्पना/परिकल्पना के जन्म के पृष्ठभूमि भी स्पष्ट होती दिखती है।
इनकी स्मृति-श्रुतियों में इनके राह को एक बहुत बड़े पर्वत ने अवरुद्ध कर दिया तब इन्होंने मारांग बुरु (सबसे बड़े पहाड़) की आराधना की और इन्हें रास्ता मिल गया और इनकी यात्रा जारी हुई।
सन्थाल लोककथाओं के अनुसार लिटा गोसाईं या मरांग बुरु (सबसे बड़े देवता) ने प्रथम पुरुष और प्रथम स्त्री, पिलछु हड़ाम तथा पिलछु बूढ़ी की रचना के पश्चात उनके सम्मुख आकर उन्हें हँड़िया बनाने की विधि बताई। इसे पीकर इन आद्य पूर्वजो ने आपस मे सम्बन्ध बनाए तथा मानवता की शुरुवात हुई।
अभी हाल ही में ज्ञानेश्वर चौबे ने अपने शोध से यह प्रमाणित कर दिया है कि भारत मे सन्थाल, मुंडा आदि दक्षिण पूर्व से आए थे। यह शोधपत्र नेचर पत्रिका में मौजूद है।
सन्थाल लोककथाओं में सासांगबेड़ा आता है । सासांग का अर्थ पिला और बेड़ा का अर्थ घाटी होता है। क्या यह संयोग मात्र है कि ह्वांगहो या पीली नदी चीन में है और सन्थाल, मुंडा आदि ज्ञानेश्वर चौबे के शोध के अनुसार उधर से आए?
इन लोगो को इनकी कथा के अनुसार एक बहुत बड़ा पहाड़ (मरांग बुरु) मरांग का अर्थ बड़ा और बुरु का अर्थ पहाड़ होता है, मिला था। क्या वह हिमालय नही था?
यहाँ इन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की और फिर उन्हें रास्ता मिल गया।
एक दिन बॉडिंग की द सन्थाल एंड देयर ट्रेडिशन दिखी तो उत्सुकतावश उसके पन्ने पलटने लगा क्योंकि जहाँ मैं काम करता हूँ वहाँ सन्थाल जनजाति के लोग रहते है। पुस्तक के पन्ने पलट रहा था कि निगाह एक शब्द पर आकर अटक गई-खरवार!
बीस पच्चीस साल पहले की स्मृति ताज़ा हो गई: मेरे पैतृक गाँव, जो की बिहार के बक्सर जिले में है, में एक छोटी से पहाड़ी नुमा सरचना है। इसे लोग गढ़ कहते हैं। गढ़ के ऊपर आज गढ़पति परमार राजपूतों के वंशजो की बैठक है। उस वक़्त मैंने किसी से पूछा की ये गढ़ किसने बनाया तो उसने बताया कि हमने अपने बाप-दादाओं से सुना है कि इसमें पहले कन्दरा नुमा संरचनाये थी जिसमे शायद चिरो-खरवार रहते थे।
उस वक़्त मैंने सोचा की शायद इस व्यक्ति को कुछ भी पता नही इसलिए यह एक झूठ-मुठ के नकली शब्द से मुझे बहला रहा है लेकिन, खरवार शब्द मेरे मन में अंकित हो गया।
खैर पन्द्रह-बीस सालों तक वह शब्द मन के किसी कोने में दबा रहा लेकिन यहाँ तो बॉडिंग भी इस शब्द को लिख रहे हैं!
हो-सन्थाल-बिरहोर और कुडुम्बी (कुड़मी) जनजातियों को सामूहिक रूप से एक कोलिया, जिसकी कथा बॉडिंग रिकार्ड कर रहे है,आज से 137 साल पूर्व खरवार कह कह रहा है।
मेरा पैतृक गाँव गङ्गा के मैदानी इलाके में अवस्थित है। प्रश्न यह है कि क्या मेरे पुरखों ने झारखण्ड के आज के आदिवासी के पुरखों से कुछ छिना है?
इस प्रश्न का उत्तर मैं समय और परिस्थिति के अनुसार देता हूँ। झारखण्ड में मेरा उत्तर #नही होता है लेकिन सत्य यह है कि #हाँ।
हमारे पुरखो ने इस उपजाऊ जमीन को उनसे छीना है और उन्हें पठार की ओर खदेड़ा है।
मेरे पास अपनी बात को सिद्ध करने के लिए आदिवासियों के उनके विस्मृत गीत हैं, उनकी लोककथाएं हैं, गङ्गा के मैदान के प्रति उनके गीतों में उनका क्रंदन है।
हमारे यहाँ जब किसी को जंगली या असभ्य कहना होता है तो लोग कहते है कि चिरो खरवार हो क्या?
नटुआ का नाच मत करो आदि
जिन शब्दों से हम धिक्कार अभिव्यक्त करते है वह उन शब्दों के नीचे यहाँ के आदिवासी आज भी जीते हैं और ये शब्द उनके लिए गर्व की बात है।
ये स्वयम को खरवार कहते हैं। खरवार खेड़वाड़ का विकृत रूप है जिसका अर्थ है चिड़िया का वंश
समग्र खरवार स्वयम को कॉस्मिक हंस और हंसिनी के कॉस्मिक अंडे से उतपन्न मानते हैं।
इनकी इस सृष्टि विषयक कथा को मिशनरियों ने कैसे एक्सप्लॉयट किया है यह भी कभी बताऊंगा लेकिन यहां यह भी बताना चाहता हूं कि उनका यह विस्थापन और विस्थापन के पूर्व का दो अलग संस्कृतियों के एनकाउंटर आज भी उनके शब्द हमारी भाषा मे और हमारे शब्द उनकी भाषा मे क्रियात्मक होकर उस एनकाउंटर की गवाही देता है।
पीड़िया के कहनी
सरनेम से आसक्ति या अनासक्त भाव से सरनेम?
साहेब का गणित (व्यंग)
Wednesday, February 12, 2020
बोतल का मुँह और मुँह का बोतल
Tuesday, February 11, 2020
मेरी बेहूदगी और मी गरदम
स्यादवाद और मेरा सन्निपात
मित्र, चेतना उत्तरोत्तर विकसित होती रहती है। हम स्थूल से सूक्ष्म की और बढ़ते हैं। कभी सोचा है कि किसी आदिम सभ्यता को अविकसित और आधुनिक सभ्यता को विकसित क्यों कहते हैं? मेरा मानना है कि विकसित सभ्यता सत्ता और अस्तित्व , जिसमे प्रकृति भी शामिल है, के सूक्ष्म तक पहुंच चुकी होती है। इस अर्थ में संहिताओं के काल से विकसित औपनिषदिक काल होंगे, औपनिषदिक काल से विकसित दर्शन का काल रहा होगा और दर्शन कालों में सर्वाधिक विकसित शून्यवाद और अद्वैतकाल रहे होंगे।
मित्र, जब आप भारतवर्ष के दार्शनिक इतिहास पर दृष्टिपात करेंगे तो आप पाएंगे कि आदर्शवादी विचारकों ने जिनके अनुसार ईस्वर, चेतना, प्राथमिक है और भूत गौण अपनी व्याख्या में एक सरल वैज्ञानिक सत्य की,' उत्तरोत्तर विकास होता है ,"के साथ संगति स्थापित नहीं कर पाए है।
आइए ऋग्वेद के प्रथम संहिता को लेते हैं
अग्निमिदे पुरोहितम। यज्ञस्य देवम ऋत्विजम। होतारम। रत्नोधात्मम!
अब इस मंत्र की व्याख्या कई तरीकों से की जा सकती है ।
आचार्य सायण आधारित ग्रिफ्फिथ के अनुसार,
"I laud Agni, the chosen priest, God, Minister of sacrifice, the Hotar, the lavishest of wealth."
अब देखिए स्वामी दयानंद सरस्वती इसमें कैसे अर्थ विस्तार करते हैं:
"He is like Energy. He leads. He has been present from before. I adore him. He sheds light on this interconnected spectacle. He creates at the appointed time. He gives and reclaims. He sustains jewels in an incomparable manner"
मित्र, दयानद की चेतना किसी देश काल की उपज थी। वह काल था भारतियों को जगाने का काल अतः ऐसी व्याख्या आत्म स्वाभिमान को बनाए रखने के लिए आवश्यक थी। उस वक्त की मांग थी की स्थूल से जुड़े भारतीय मनस को पुनः सूक्ष्म से संबद्ध किया जाय लेकिन हम आज क्या कर रहे हैं-आज परमाणु बम और सपेक्षिता के सिद्धांत को वेदों में ढूंढ रहे है, क्वांटम भौतिकी के सिद्धांतों और वेड की अद्वैत वादी धाराओं में ज़बरदस्ती सामाजस्य बिठाने का प्रयास कर रहे हैं जबकि वेद मात्र और मात्र मानवीय चेतना के स्थूल से सूक्ष्म की ऒर प्रयाण की गवाही हैं।
कुछ दिनों पहले संघ विचारक श्री राकेश सिन्हा जी का "डेकोलोनैज़ेश ऑफ़ इंडियन माइंड' पर व्याख्यान सुन रहा था। बड़ी अच्छी बात कही उन्होंने : हम भारत महान के माइक्रो नैरेटिव में फंस कर रह गए है हमने आइडिया ऑफ़ इंडिया के मेटा नैरेटिव को क्रिएट ही नहीं किया है। यदि भारत की सृजनात्मकता को बहार लाना है तो कम से कम 50 सालो के लिए मेरा भारत महान, वेद उपनिषद और लछछेदार संस्कृत के श्लोको पर मोराटोरियम लगाना होगा।
Sunday, February 9, 2020
एक बदफैलसुफ़ का सन्निपात
सन्निपात 【एक】
Friday, February 7, 2020
Silence
तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा:
बुदबुदा
Thursday, February 6, 2020
एक थी तरंगिणी
अपना रिश्ता, दिल्ली की नौकरी
तुम्हारी संस्कृति
काफ़िर
Wednesday, February 5, 2020
अगीत गाता हूँ
डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण
डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...
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●एकेश्वरवाद, मार्ग और मतिग्रस्ति: अब्राहमीय एकेश्वरवाद के सापेक्ष यदि भारतीय एकेश्वरवाद को रखें तो यह इसे अन्य कई मार्गों की भांति केवल एक...
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For them death was a celebration... end of all suffering.....begning of new joureny. They mytholized death, mystified it...extolled the v...
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नहाना एक सामान्य क्रिया है। कही भी नहाया जा सकता है लेकिन गङ्गा नहाना एक धार्मिक क्रिया है। इसके मुहावरे वाले अर्थ को दरकिनार करते हुए गङ्ग...
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एक मिथक उठाइए, विज्ञान की टांग तोड़िए, हाथ मरोडीए और उस अंग-भंग विज्ञान के द्वारा उस मिथक को पुष्ट करिए। लोग बाग खुश हो जाएंगे कि विज्ञान का...
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मेरे वामपंथी प्रोफेसर और मित्र श्री राम में मेरी आस्था को अंधविश्वास कहते हैं और उनके अनुसार मार्क्सवाद एक विज्ञान है। सर्वप्रथम मार्क्सवा...
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पिंड़ीया के कहनी। परूवा के दिन सोहराई की रात ह गाई दाढ़ लागेला भइस पखेरेले चेर मोरिनिया पिंडिया लावेले लावे के दिन गईली हा छोडवे के दिन अईली ह...
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जो कुछ भी जाना जा सकता है अपने अस्तित्व के परिप्रेक्ष्य में ही जाना जा सकता है। अस्तित्व को ट्रांसेन्डेन्ट कर कुछ जाना ही नही जा सकता इस प्...
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अव्वल हम किसी निश्चितता से नही कह सकते कि सृष्टि चक्रीय है। यह कारणता के प्रतीत्य उत्पाद की अवधारणा पर घटनाओ की एक अनन्त शृंखला भी हो सकती ह...
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माना जाता है कि हम जितनी ऊर्जा की खपत करते है उसकी तुलना में बौद्धिकता के आउटपुट के मामले में बहुत ही इनएफिशिएंट मशीन हैं। ●●इसका कारण यह ...
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विज्ञान: निरपेक्ष सत्य कुछ नही होता, हम किसी के बारे में आखरी बात कह ही नही सकते। धर्म: निरपेक्ष भी होता है और आखरी बात भी होती है, विज्ञ...