एक मिथक उठाइए, विज्ञान की टांग तोड़िए, हाथ मरोडीए और उस अंग-भंग विज्ञान के द्वारा उस मिथक को पुष्ट करिए। लोग बाग खुश हो जाएंगे कि विज्ञान का यह आधुनिक सिद्धान्त तो हमारे मिथकों में पहले से मौजूद है और हम तो इसको पहले से ही जानते थे।
जय-जय!! जय-जय!!
क्वाण्टम लंगोटा, रिलेटिविस्टिक लोटा!!
लाख का मोल राख, राख का मोल लाख!!
आखिर ऐसा क्या हुवा की हम ज्ञान विज्ञान के शीर्ष से गिरकर इस हद तक नीचे आ गए कि हम आज भी अपने पूर्वजो के ज्ञान को ही भंजाना चाहते हैं? हमारे पूर्वज मन्त्रद्रष्टा थे तो हम क्यों नही बन सकते? उन्होंने छंदबद्ध मंत्र दिए हम गणितबद्ध दें लेकिन मंत्र अपने मौलिक हों इसका प्रयास कोई क्यो नही करता?
प्रयास स्वयम से नवीन मन्त्रो के साक्षात्कार के होने चाहिएं न कि पूर्वजो के मन्त्रो में यह भी था, वह भी था यह सिद्ध करने के।
जय-जय!! जय-जय!!
क्वाण्टम लंगोटा, रिलेटिविस्टिक लोटा!!
लाख का मोल राख, राख का मोल लाख!!
आखिर ऐसा क्या हुवा की हम ज्ञान विज्ञान के शीर्ष से गिरकर इस हद तक नीचे आ गए कि हम आज भी अपने पूर्वजो के ज्ञान को ही भंजाना चाहते हैं? हमारे पूर्वज मन्त्रद्रष्टा थे तो हम क्यों नही बन सकते? उन्होंने छंदबद्ध मंत्र दिए हम गणितबद्ध दें लेकिन मंत्र अपने मौलिक हों इसका प्रयास कोई क्यो नही करता?
प्रयास स्वयम से नवीन मन्त्रो के साक्षात्कार के होने चाहिएं न कि पूर्वजो के मन्त्रो में यह भी था, वह भी था यह सिद्ध करने के।
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