मेरा परमपिता
सर्वशक्तिमान नही है,
बोध!
आदमी बनने की कीमत!
ना, पतित देवदूत नही हूँ,
शैतान या इबलीस भी नही,
और इडिपस ग्रन्थि तो कतई नही
-माँ तो केवल उस क्षण होती है,
जब पैदा करती है मुझे,
असभ्य आवाजो के साथ,
ततपूर्व और ततपश्च वह तो विभ्रम है,
किसी पागल की!
अतिशय पुरुषवाद?
-सारा भार पिता पर है,
जो बधिया किया हुआ है,
एक बैल सा,
मैने जिब्रील से कहा!
Tuesday, December 31, 2019
परशुराम
Saturday, December 21, 2019
वेद, गोमांस भक्षण और कुछ प्रश्न
प्रोफेसर डी एन झा की "द मिथ ऑफ़ हौली काऊ" पढ़ रहा हूँ। वेदों में गोभक्षण नहीं है के सारे दावे टूट रहे हैं। यधपि गोभक्षण के सारे दावे टूट रहे है तथापि एक हिन्दू के रूप में किसी भी प्रकार की कोई आत्मग्लानि नहीं है।
गोभक्षण के इतिहास से, गऊ माता की रक्षा हो और गोघ्न के बीच,हिंदुओं का गऊ, गीता, गायत्री, गंगा और गुरु में विश्वाश पाखण्ड प्रमाणित नहीं होता।
यह ठीक उसी प्रकार पाखण्ड नही है,जिस प्रकार किसी विश्व सुंदरी की "सुंदरता" ताज पहनते समय, इस लिए पाखण्ड नही है क्योंकि उस वक़्त उसके फेफड़ो में बलगम, आंतो में मल और मूत्राशय में मूत्र मौजूद है ;
किसी दूसरी नारी को एक माँ द्वारा अपनी पुत्रवधु चुनना इसलिए पाखण्ड नही है कि किसी काल में "माताएँ अपने पुत्रों में से सबसे वलिष्ठ पुत्र का वरण कर उनके संग सम्भोग करती थीं" (वोल्गा से गंगा: महापंडित राहुल सांकृत्यायन)।
अब आप कहेंगे, "नो नो यु आर कमिटिंग द लॉजिकल फालेसी ऑफ़ अपीलिंग टू इमोशन" इसलिए कुछ जेनुइन प्रश्न पूछना चाहता हूँ।
■ क्या हज़ारो वृषभो की सामूहिक बलि का कोई आर्कियोलॉजिक्ल कॉरोबोरैशन मिलता है?
दो- चार- दस आर्कियोलॉजिक्ल साइट्स तो कम से कम ऐसी ज़रूर मिली होंगी जहाँ बलि वेदिका, बृषभों की अस्थियाँ, बलि के रिचुअल में उपयुक्त अन्य सामान प्राप्त हुए होंगे।
■वाद विवाद की परंपरा के इस देश में जहाँ हर कर्मकांड और दार्शनिक सम्प्रत्य पर वाद विवाद हुए है, मधुपर्क से पंचगव्य होने की स्थिति में पक्ष और विपक्ष तो अवश्य रहा होगा। खंडन मंडन का साहित्य तो अवश्य होगा। कृपया उस ग्रन्थ का नाम बताएं क्योंकि अचानक और चुपके से बौद्ध धर्म के प्रभाव में आकर भी यह परंपरा बन्द हो जाए यह बात अपाच्य है।
■वर्तमान ब्राह्मणों के किसी गोत्र, किसी प्रवर, किसी, शाखा, किसी पाद में यह परंपरा आज भी कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में तो अवश्य मौजूद होगी। कृपया उस शाखा, उस पाद, उस गोत्र को उदृत करें जिसने भौतिक रूप से नही तो अपनी लोककथाओं में ही गोबलि की परम्परा को आज भी जीवित रखा है।
■वेद में ही मौजूद कई ऐसे सूक्त है जो गोवध को तो छोड़िए, किसी भी पशु की हिंसा का विरोध करते है। आप उनमे और गोवध को पुष्ट करने वाले श्लोकों में किस प्रकार संगति बैठाते है?
चलिए हम परिपक्वता दिखाते हुए इस बात को भूल जाते है कि श्रीमति इंदिरा गांधी ने गौ रक्षकों पर गोलियां बरसाईं थी। चलिए हम यह भी भूल जाते है कि आपने हमे चिढ़ाने के लिए केरल में टीवी पर लाइव गाय काटकर बीफ पार्टी की। चलिए हम यह भी भूल जाते हैं कि आप हमरा माखौल उड़ाने के लिए जे एन यू में बीफ फेस्ट करते हैं लेकिन मित्र आपको भी यह याद रखना होगा की गऊ-गंगा-गीता-गायत्री-गुरु से हिंदुओं की आस्था जुडी है।
आप हमारी आस्था पर प्रहार करके भी उस भीड़ को जन्म देते है जो अख़लाक़ की पिट पिट कर हत्या कर देती है ।
Sunday, December 15, 2019
स्मृति-पुराण और कुरान आदि की व्याख्या से सम्बंधित कुछ तर्कदोष (एक)
:
विगत एक माह से स्मृतियों, श्रुतियों एवं पुराणों पर दो अलग अलग पक्षों की व्याख्याएं एवं उनके मन्तव्य को पढ़कर वर्तमान में इनकी स्थिति को समझने का प्रयत्न कर रहा हूँ। हालांकि मेरा निजी मत यह है कि हमे उक्त पुस्तको में अपनी ऊर्जा खपाने के बजाय भौतिकी, जीवविज्ञान, रसायन जैविक प्रद्योगिकी आदि की पुस्तकों को पढ़ना चाहिए लेकिन स्मृतियों एवं पुराणों का संदर्भ लेकर जब समाज आपस में गाली गलौज करना प्रारंभ कर दे तो उस वक़्त "ताओ ऑफ़ फिजिक्स" को किनारे रखकर उन किताबों एवं आज के उनके व्याख्याकारों के विषय में चिंतन बलात चला आता है।
हालाकि मुझे उन किताबों पर विभाजित दो पक्षों का नाम नहीं लेना चाहिए लेकिन मैं उनका नाम लूंगा : पहले व्यख्याकार है उग्र दक्षिणपंथी और दूसरा व्यख्याकार है मिशनरी-वामपंथी-वामसेफी गठजोड़|
जहाँ मिशनरी-वामपंथी-वामसेफी गठजोड़ की उन किताबों से जातीय आग भड़कती दिखती है वही उग्र दक्षिणपंथ उन किताबों के माध्यम से हिंदुत्व के उग्र रूप की पैरोकारी करता द्रष्टव्य होता है।
स्मृतियों/पुराणों की आज के सन्दर्भ में दोनों ही व्याख्यायों में मुझे तीन दोष दिखाई देते है जिन्हें मैं क्रमशः
1. डिफेन्स इन द नेम ऑफ़ कॉन्टेक्स्ट
2. डिफेन्स इन द नेम ऑफ़ लिंग्विस्टिक्स तथा
3. डिफेन्स इन द नेम ऑफ़ अडल्ट्रेशन
का नाम दूंगा।
सर्प्रथम हम "डिफेन्स इन द नेम ऑफ़ रॉंग कॉन्टेक्स्ट" को लेते हैं। इस तर्कदोष के माध्ययम से जब कोई बात वर्तमान के सन्दर्भ में ऐसी होती है कि उस पर सवाल उठाया जा सके अथवा उसकी आलोचना की जा सके तो ऐसी स्थिति में समर्थक गलत अथवा सन्दर्भ के बाहर का सहारा लेकर उन बातों को जस्टिफाई करने का प्रयास करते है जो सवालों के घेरे में थी। इस तर्कदोष का प्रयोग हिन्दू दक्षिणपंथी अपेक्षाकृत कम करते हैं लेकिन मुस्लिम और क्रिस्चियन मंडनशास्त्रियों का यह फेवरेट डिफेन्स है। प्रायः जब क़ुरान की काफिरों के प्रति हिंसा का समर्थन करने वाली आयतों का उल्लेख किया जाता है तो वह झट से यह कहकर इसे सही ठहराने का प्रयास करते हैं कि ये आयतें किसी सन्दर्भ विशेष के लिए ही प्रासंगिक हैं। हिन्दू मंडनशास्त्री भी कुछ ऐसे ही तर्कों का हवाला देते हुए स्मृतियों, पुराणों की बातों को जस्टिफाई करते हैं।
यहां एक विरोधाभास उतपन्न होता है जिसे उल्लेखित करना आवश्यक है। यदि उन बातों को सन्दर्भ विशेष में ही एप्लीकेबल माना जाय तो यह मानना होगा की ईष्वरीय वाणी सर्वदा निरपेक्ष नहीं होती उसका देश काल से सम्बन्ध होता है। अब यदि कुछ बातें सापेक्षिक हैं तो पूरा का पूरा ग्रन्थ ही आज के सन्दर्भ में अप्रासंगिक क्यों नहीं हो सकता?
**क़ुरान की कुछ बातें उस काल में ही प्रासंगिक थी अर्थात क़ुरान अपनी सम्पूर्णता में निरपेक्ष नही है अतः यह विचार अपनी तार्किक परिणति में सम्पूर्ण क़ुरान को भी आज अप्रासंगिक बना सकता है।
Friday, December 6, 2019
धर्म के निरसन की सम्भाव्यता:
धर्म की उत्पत्ति के साथ ही धर्म की प्रसांगिकता पर प्रश्न किया जाने लगा और इसके निरसन का प्रयत्न प्रारंभ हो गया, अतः धर्म के निरसन की संभाव्यता प्रश्न का उत्तर मानवीय इसिहास में धर्म की स्थिति के आधार पर दिया जा सकता है।
ऐतिहिसिक परिदृश्य में धर्म का निषेध अ-धर्म नही बल्कि एक नया धर्म रहा है जो पुराने सार और उसके अस्तित्विकरण की प्रक्रिया को एक नए सार एवम अस्तित्विकरण की नवीन प्रकिया से प्रतिस्थापित कर देता है। जाहिलियत का तौहीद से तथा ओलोम्पियन धर्म का ईसाईयत से प्रतिस्थापन्न इसके कुछेक उदाहरण हैं।
यदि जीवन और जगत के बारे में वस्तुगत तथ्य निःसारता ही है तो फिर इस केयोस और अराजकता में किसी भी वाद, किसी भी प्रश्न की उपादेयता क्या है? विचारको के उपरोक्त प्रश्न और विश्लेषण उनके अपने ही जगत की व्याख्या में, जहाँ केयोस और अराजकता है, किस तरह संगतिपूर्ण है, क्योंकि इन विचारको ने धर्म की उक्त आलोचना के बावजूद जीवन के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त करने का प्रयास किया है।
धर्म की परम्परागत परिभाषाओं में मौजूद यदि कुछेक शर्ते हटा दी जायँ तो नास्तिकता भी धर्म की परिधि में आ जाती है और इन शर्तों को ढीला करके ही दार्शनिक और विचारक "मानववाद" को धर्म की श्रेणी में डाल पाते हैं। मानववाद, जो परम्परागत धर्मो का नवीनतम प्रतिस्थापन है। यही नही कुछ विचारक दबे शब्दों में मार्क्सवाद को भी इस आधार पर धर्म सिद्ध करने का प्रयास करते हैं।
रिक्तता और पीड़ा मनुष्य के जीवन का अनिवार्य तत्व है क्योंकि यदि जगत निरुद्देश्य, निरर्थक और अराजक है तब भी मनुष्य के जीवन में रिक्तता है, और यदि जगत उद्देश्यपूर्ण और सार्थक है तब भी जब तक वह अपने अर्थ को प्राप्त नही कर लेता उसके अस्तित्व में रिक्तता है।
धर्म इन दोनों ही स्थितियों में उतपन्न रिक्तता को भरने की मानवीय अन्तःप्रवृति है जो मानवीय अस्तित्व में व्याप्त विशिष्ट चेतना और विशिष्ट पीड़ा के साथ ही अविर्भूत हुई है।
रोडनी स्टार्क एवम डब्लू सिम्स वेनब्रिज अपनी पुस्तक “द फ्यूचर ऑफ रिलीजन” में लिखते हैं, “धर्म वह मानवीय गठन है जिसके माध्ययम से मानव मूलतया अतिप्रकृतिक मान्यता के द्वारा जीवन एवम जगत में अभाव की सम्पूर्ति करने में प्रयत्नशील है।“
अर्थात जब तक मानव में पीड़ा, अभाव और रिक्तता है, धर्म की उपस्थिति एक यथार्थ है।
Thursday, December 5, 2019
कर्म सिद्धान्त और अमानवीयकरण
यदि अब्राहमीय धर्मो में एकेश्वरवाद को लेकर मतिग्रस्ति है तथा ईश्वर और मनुष्य के मध्य मध्यस्थता एक आवश्यक तत्व है जिसके आधार पर जगत की विविधता को नष्ट करते हुए इन तत्वों के नाम पर कई सभ्यताओ के संहार को न्यायोचित ठहराया जाता है तो धर्म भी अपने सामाजिक सन्दर्भ में इन नकारात्मकताओं से अछूता नही रहा है। जहाँ रिलीजन में एकेश्वरवाद को लेकर मतिग्रस्ति है वहीं धर्म, वर्णाश्रम धर्म तथा कर्म सिद्धान्त को लेकर व्यामोहित रहा है। कर्म सिद्धान्त और वर्णाश्रम धर्म मे यह संभावना उपस्थित है कि व्यक्ति अतिशय भाग्यवादी बन जाता है तथा वर्ण जन्मना बन कर व्यक्ति और व्यक्ति के मध्य विभेद स्थापित करता है।
सामाजिक सन्दर्भ में धर्म या रिलीजन प्रायः अपनी श्रेष्ठता के दावा का करण बन कर भी उभरे हैं। रिलीजन में विस्तारवादी प्रवृति होने के कारण जहाँ इसके नाम पर अपनी श्रेष्ठता का दावा अन्य धर्मो, संस्कृतियों एवम सभ्यताओ के दमन के रूप में उपस्थित है वही धर्म मे विस्तारवादी प्रवृति की अनुपस्थिति के कारण अपनी श्रेष्ठता के दावा को अभिव्यक्त करने के लिए एक आंतरिक विभेद और अंत:मुखी विस्तारवाद उपस्थित है जिसका परिणाम समाज के एक वृहत हिस्से का अमानवीयकरण रहा है। अमानवीयकरण को कर्म सिद्धान्त द्वारा न्यायोचित ठहराना एक ऐतिहासिक यथार्थ के रूप में उपस्थित है।
Wednesday, December 4, 2019
लालबेगी
लालबेगी
यह इतिहास की, नहीं नहीं समाज की, नही धर्म की ,नहीं------- - रहने दीजिए क्या फर्क पड़ता है कि किसकी विडम्बना रही है लेकिन गुड्डू लालबेगी मुजाविर और उसका भाई मंगल राम मंदिर बने या बबरी मस्जिद की दुबारा तामीर हो, इस प्रश्न पर कंफ्यूज हो जाते हैं।
तो क्या ये दोनों अपनी रिलिजियस आइडेंटिटी को लेकर कंफ्यूज हैं?
मंगल अपनी दुकान खोलते ही सबसे पहले काली माता को अगरबत्ती दिखाता है और गुड्डू एक मुजाविर है। मुजाविर अर्थात मजार की देख रेख करने वाला। दिन में गुड्डू लालबेगी एक सरकारी अस्पताल में मेस्तर है और अस्पताल से लौटने के बाद मुजाविर। तब तक मंगल की दुकान भी बंद हो जाती है और शाम को वह अपने बड़े भाई के साथ मजार पर जाता है । मजार की साफ सफाई करता है और गुड्डू की मदद करता है।
यहां गंगा के किनारे लगभग 3-4 किमी के दायरे में बबूल की झाड़ियां फैली है जिसके कारण लोग इस जगह को बबुराही कहते हैं।
इसी बबुराही में तीन मजार है और इन तीनो मजारो के बीच एक मस्जिद जिसका नाम जिन्नाती मस्ज़िद है। मस्ज़िद के बाएं जो दो मज़ार है उनका मुजाविर गुड्डू है और मस्ज़िद के दाएं वाली मज़ार का मुजाविर परवेज जमाल।
एक दिन यु ही परवेज जमाल से मुलाकात हो गई तो मैंने उनसे अनायास ही पूछ लिया की मुजीवीर जी यह किनके मज़ार हैं?
परवेज़ जमाल का जवाब सुनकर मैं चौक गया।
'वह असली जिन्न का मज़ार है जहाँ का मुजाविर मैं हूँ लेकिन वो बुतपरस्त का जना काफीर उन मजारो को जिन्न का मज़ार कहता है जहाँ वह बैठता है।'
मैं इसलिए नहीं चौका की ये जिन्न के मज़ार है मैं इस लिए चौका की गुड्डू बुतपरस्त का जना है।
-एक बुतपरस्त का जना मुजाविर?
-हाँ साला मेस्तर है।
-तो क्या गुड्डू मुसलमान नहीं है, मैंने पूछा।
-अरे नहीं दोगला है, दोगला।
-मतलब?
-अब रहने दीजिए कभी बाद में बताऊंगा।
-अरे बता भी दीजिए
-गुड्डू लालबेगी है।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, यहूदी, बहाई तो सुना था लेकिन लालबेगी पहली बार सुन रहा था। यह लालबेगी कौन सा नया धर्म पैदा हो गया?
मैंने फैसला किया कि गुड्डु से ही पूछूँगा।
गुड्डु से चुकी नज़दीकी बढ़ानी थी अतः मैंने मज़ार पर जाना शुरू कर दिया। कभी उर्स में चंदा दिया तो कभी अपने आप को गुडु से झड़वाया तो कभी वहाँ खीचड़ा खाया । धीरे धीरे गुडु से मेरी पहचान हो गयी। एक दिन मैं गुडु के साथ नौ बजे तक मज़ार पर बैठा रहा। नौ बजे के बाद सब कुछ समेट कर जब गुडु जाने लगा तो मैं भी उसके साथ हो लिया। रास्ते में मैंने गुडु से पूछा गुड्डु भाई ये लालबेगी क्या होते हैं?
गुडु ने कहा कि आदमी होते हैं
मैंने कहा भाई आप समझे नहीं मैं ये पूछना चाहता हूँ कि आप हिन्दू है या मुसलमान?
गुड्डु हंसने लगा फिर उसने मुझसे ही पुछा की इंसान का हिन्दू या मुसलमान होना ज़रूरी है क्या?
अब मुझे खीज हो रही था, जिसे शायद उसने पढ़ लिया और मुझसे बोला,
'भाई हम लालबेगी एक तरह से हिन्दू भी होते है और मुसलमान भी और दूसरी तरह से ना हिन्दू होते हैं न मुसलमान ही।'
'देखिए भाई हम मस्जिद भी जाते हैं और मंदिर भी। हम ईद भी मानते है और होली भी।
हमारा खतना नहीं होता, लेकिन हम दफनाए जाते हैं। जन्म होने पर हमारी छठिहारी भी नहीं होती, मरने पर चालीसा भी नहीं होता।'
अब चाहे यह जिसकी भी विडम्बना रही हो हुवा यूँ की जब इस्लाम का इस शहर में प्रचार हो रहा था तो गुडु के पुरखे जो मैला ढोते थे उन्होंने इस्लाम में अपनी मुक्ति देखी। उन्होंने इस्लाम अपना लिया लेकिन चुकी यहाँ 'अशराफ',संभ्रांत मुसलमान थे, अतः इस्लाम ने उन्हें नहीं अपनाया और हिंदुओं ने तो इनको बेदख़ल कर ही दिया था।
अब ये ना हिन्दू थे न मुसलमान लेकिन चुकी ये हिन्दू और मुसलमान के पाखाना ढोते थे, उनके रहमो करम पर जीना था इसलिए इन्हें कभी हिन्दू बनना पड़ता था तो कभी मुसलमान।
जिन्नाती मस्जिद को बने लगभग 400 साल बीत चुके है अतः आज लालबेगियों की चौथी पांचवी पीढ़ी है। यह पीढ़ी अपने आपबीती भूल कर स्वयं को मुस्लमान भी मानती है और हिन्दू भी।
विडम्बना ने लालबेगियों के रूप में "इंसान" को जन्म दे दिया।
हाँ ये अभी भी कन्फ्यूज़ है कि अयोध्या में राम मंदिर बनना चाहिए या बबरी मस्ज़िद की दुबारा तामीर हो।
यह इतिहास की, नहीं नहीं समाज की, नही धर्म की ,नहीं------- - रहने दीजिए क्या फर्क पड़ता है कि किसकी विडम्बना रही है लेकिन गुड्डू लालबेगी मुजाविर और उसका भाई मंगल राम मंदिर बने या बबरी मस्जिद की दुबारा तामीर हो, इस प्रश्न पर कंफ्यूज हो जाते हैं।
तो क्या ये दोनों अपनी रिलिजियस आइडेंटिटी को लेकर कंफ्यूज हैं?
मंगल अपनी दुकान खोलते ही सबसे पहले काली माता को अगरबत्ती दिखाता है और गुड्डू एक मुजाविर है। मुजाविर अर्थात मजार की देख रेख करने वाला। दिन में गुड्डू लालबेगी एक सरकारी अस्पताल में मेस्तर है और अस्पताल से लौटने के बाद मुजाविर। तब तक मंगल की दुकान भी बंद हो जाती है और शाम को वह अपने बड़े भाई के साथ मजार पर जाता है । मजार की साफ सफाई करता है और गुड्डू की मदद करता है।
यहां गंगा के किनारे लगभग 3-4 किमी के दायरे में बबूल की झाड़ियां फैली है जिसके कारण लोग इस जगह को बबुराही कहते हैं।
इसी बबुराही में तीन मजार है और इन तीनो मजारो के बीच एक मस्जिद जिसका नाम जिन्नाती मस्ज़िद है। मस्ज़िद के बाएं जो दो मज़ार है उनका मुजाविर गुड्डू है और मस्ज़िद के दाएं वाली मज़ार का मुजाविर परवेज जमाल।
एक दिन यु ही परवेज जमाल से मुलाकात हो गई तो मैंने उनसे अनायास ही पूछ लिया की मुजीवीर जी यह किनके मज़ार हैं?
परवेज़ जमाल का जवाब सुनकर मैं चौक गया।
'वह असली जिन्न का मज़ार है जहाँ का मुजाविर मैं हूँ लेकिन वो बुतपरस्त का जना काफीर उन मजारो को जिन्न का मज़ार कहता है जहाँ वह बैठता है।'
मैं इसलिए नहीं चौका की ये जिन्न के मज़ार है मैं इस लिए चौका की गुड्डू बुतपरस्त का जना है।
-एक बुतपरस्त का जना मुजाविर?
-हाँ साला मेस्तर है।
-तो क्या गुड्डू मुसलमान नहीं है, मैंने पूछा।
-अरे नहीं दोगला है, दोगला।
-मतलब?
-अब रहने दीजिए कभी बाद में बताऊंगा।
-अरे बता भी दीजिए
-गुड्डू लालबेगी है।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, यहूदी, बहाई तो सुना था लेकिन लालबेगी पहली बार सुन रहा था। यह लालबेगी कौन सा नया धर्म पैदा हो गया?
मैंने फैसला किया कि गुड्डु से ही पूछूँगा।
गुड्डु से चुकी नज़दीकी बढ़ानी थी अतः मैंने मज़ार पर जाना शुरू कर दिया। कभी उर्स में चंदा दिया तो कभी अपने आप को गुडु से झड़वाया तो कभी वहाँ खीचड़ा खाया । धीरे धीरे गुडु से मेरी पहचान हो गयी। एक दिन मैं गुडु के साथ नौ बजे तक मज़ार पर बैठा रहा। नौ बजे के बाद सब कुछ समेट कर जब गुडु जाने लगा तो मैं भी उसके साथ हो लिया। रास्ते में मैंने गुडु से पूछा गुड्डु भाई ये लालबेगी क्या होते हैं?
गुडु ने कहा कि आदमी होते हैं
मैंने कहा भाई आप समझे नहीं मैं ये पूछना चाहता हूँ कि आप हिन्दू है या मुसलमान?
गुड्डु हंसने लगा फिर उसने मुझसे ही पुछा की इंसान का हिन्दू या मुसलमान होना ज़रूरी है क्या?
अब मुझे खीज हो रही था, जिसे शायद उसने पढ़ लिया और मुझसे बोला,
'भाई हम लालबेगी एक तरह से हिन्दू भी होते है और मुसलमान भी और दूसरी तरह से ना हिन्दू होते हैं न मुसलमान ही।'
'देखिए भाई हम मस्जिद भी जाते हैं और मंदिर भी। हम ईद भी मानते है और होली भी।
हमारा खतना नहीं होता, लेकिन हम दफनाए जाते हैं। जन्म होने पर हमारी छठिहारी भी नहीं होती, मरने पर चालीसा भी नहीं होता।'
अब चाहे यह जिसकी भी विडम्बना रही हो हुवा यूँ की जब इस्लाम का इस शहर में प्रचार हो रहा था तो गुडु के पुरखे जो मैला ढोते थे उन्होंने इस्लाम में अपनी मुक्ति देखी। उन्होंने इस्लाम अपना लिया लेकिन चुकी यहाँ 'अशराफ',संभ्रांत मुसलमान थे, अतः इस्लाम ने उन्हें नहीं अपनाया और हिंदुओं ने तो इनको बेदख़ल कर ही दिया था।
अब ये ना हिन्दू थे न मुसलमान लेकिन चुकी ये हिन्दू और मुसलमान के पाखाना ढोते थे, उनके रहमो करम पर जीना था इसलिए इन्हें कभी हिन्दू बनना पड़ता था तो कभी मुसलमान।
जिन्नाती मस्जिद को बने लगभग 400 साल बीत चुके है अतः आज लालबेगियों की चौथी पांचवी पीढ़ी है। यह पीढ़ी अपने आपबीती भूल कर स्वयं को मुस्लमान भी मानती है और हिन्दू भी।
विडम्बना ने लालबेगियों के रूप में "इंसान" को जन्म दे दिया।
हाँ ये अभी भी कन्फ्यूज़ है कि अयोध्या में राम मंदिर बनना चाहिए या बबरी मस्ज़िद की दुबारा तामीर हो।
ओरंग ओटान
आदमी को अपने भीतर के ओरांग ओटान को बाहर लाने का मौका चाहिए। ओरांग ओटान जो नीति-अनीति नहीं जानता; कोपरनिकस, गैलेलियो और आइंस्टीन से उसे क्या मतलब?
सभ्यता के नाम पर हमने अपने भीतर के ओरांग ओटान को दबाया तो है ही। वह तो बाहर आने का बहाना ढूंढेगा ही।
अब हर कोई तो "मुक्तिबोध" नही हो सकता न जो अपने भीतर के ओरांग ओटान को कलम थमा दे।
लेकिन कलम थमाने पर भी क्या हुवा?
ओरांग ओटान की चेतना जागी और उसने सत चित आनंद की जगह सत चित वेदना लिख दिया।
हमारा बड्डपन, हमारी विशालता क्या इतनी छोटी है कि हम एक दिन उस ओरंग ओटान को नहीं दे सकते?
क्या हमारी सभ्यता इतनी कमज़ोर है, संस्कृति इतनी नाज़ुक है कि बस एक दिन उसका अपने अतीत से सामना हो जाए और वह ऑफन्डेड फील करती है?
तर्क वितर्क नहीं करूंगा और न ही अहम को पुष्ट करने की कोई इक्षा है लेकिन इतना ज़रूर कहुंगा की आप जो तर्क देंगे दरअसल वह बुद्धि प्रपंच आपके अपने अंदर के ओरंग ओटान की रक्षा है।
लेकिन ओरंग ओटान आता रहेगा।
देखिए न अगर मैं नाख़ून बढ़ा लूँ, प्रकृति प्रदत्त एक मात्र हथियार तो आप कहेंगे कैसे जंगलियों, जानवरों सा नाख़ून बढ़ा लिया है लेकिन वही अंगुलियां मनिक्युर करवाके जब पिस्तौल की ट्रिगर को छूती है तो क्या अद्भुत आनंद आता है(नीत्से का विल टू पावर)!
ओरांग ओटान आता रहेगा!!!
कोबाद गाँधी और इण्डिया और भारत और लाल सलाम और भारत माता की जय!
एक स्त्री
निस्तेज, रक्तहीन,
चीथड़ों से ढकती अपने जिस्म।
विडम्बना!!!
सर पर पीत मुकुट:
सोना? रॉल गोल्ड!
तीन आंसूं रोती है-
तीन पुत्रों के लिए।
सर पर बैठा इण्डिया,
कोसता है,
मां जीन्स-टॉप नही पहनती,
पूछने पर बाप का नाम भी बताती है,
साली गंवार!!!
दूसरे को कपड़ा चाहिए,
:ताला खोल रे नौटँकी बुढ़िया!!!
तीसरा आंसू पोछना चाहता था,
देश की सड़कों को लाल खून से पाट कर,
तेनुघाट जेल में बंद है आजकल।
और,यह स्त्री हमारी भारत माँ है।
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अमृतम तव दर्शनम
लग्न-योग-संयोग,
गौरवर्णा, मोहिनी,
प्रकृति का अद्भुत रूप,
वागीश्वरी का अधिष्ठान तुम्हारे स्वर,
वृतियों की डोर,
गूँथती भावों को तुम पोर पोर।
मृत्यु के घाट पर,
जीवन की अठखेलियाँ,
वृति, प्यास, प्रवृति,
अस्तित्व कम्प, भाव तरंग, बुद्धि प्रपंच,
प्रकृति सृष्ट पुरुष चाहे,
पुरुष कल्पित प्रकृति,
एक अकिंचक का जन्म।
प्रारम्भ इष्ट-अभीष्ट महाकाव्य,
नव सृजन, नवकल्पना, नव भावना,
मरघट के वासी को,
अमृत साक्षात्।
सुदर्शनम,
अमृतम तव दर्शनम!!
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गौरवर्णा, मोहिनी,
प्रकृति का अद्भुत रूप,
वागीश्वरी का अधिष्ठान तुम्हारे स्वर,
वृतियों की डोर,
गूँथती भावों को तुम पोर पोर।
मृत्यु के घाट पर,
जीवन की अठखेलियाँ,
वृति, प्यास, प्रवृति,
अस्तित्व कम्प, भाव तरंग, बुद्धि प्रपंच,
प्रकृति सृष्ट पुरुष चाहे,
पुरुष कल्पित प्रकृति,
एक अकिंचक का जन्म।
प्रारम्भ इष्ट-अभीष्ट महाकाव्य,
नव सृजन, नवकल्पना, नव भावना,
मरघट के वासी को,
अमृत साक्षात्।
सुदर्शनम,
अमृतम तव दर्शनम!!
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समस्या और समस्या के भ्रम की समस्या
जिंदगी में समस्याएं हैं, जीवन जब तक है तब तक समस्याएं है लेकिन तब कुछ समस्याएं वास्तविक हैं और कुछ समस्याओं के वास्तविक होने का भ्रम पैदा किया जाता है। यह भ्रम मात्र राजनीति ही पैदा नही करती बल्कि परिवार, समाज और शिक्षा पद्धति भी इसमें बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती है। दुःखद यह है कि परिवार और समाज राजनैतिक नियंत्रण से शिक्षा के वनिस्पत बाहर होने के कारण सचेत नही होता और पीढ़ी दर पीढ़ी इस अवास्तविक समस्या के प्रभाव में आकर इन्हें सत्य मानने लगता है और उसे पता ही नही होता की वह नयी पीढ़ी को जिन बातों को समस्या बता कर प्रस्तुत कर रहा है दरअसल वह इसलिए वजूद में हैं कि पीढ़ियों पहले मूल समस्या के प्रति उसकी आँखे बंद करने के लिए किसी ने यह अवास्तविक समस्याएं उसके अंदर प्लांट की थीं।
आप, आपके विचार सब ठीक है लेकिन नयी पीढ़ी उस प्रोपोगेंडा में न जिए जिस प्रोपोगेंडा में आप जी रहे हैं और जाने अनजाने उस प्रोपोगेंडा का आगे बढ़ा रहे हैं।
दरअसल दुनिया का कोई एक केंद्र नही है। हर व्यक्ति दुनिया का केंद्र है ऐसे में दुनिया में कोई एक सत्य नही है , सबके अपने सत्य हैं और सबके अपने मार्ग।
नयी पीढ़ी को यह सिखाने के कि, "यही सत्य है" और "यही मार्ग है" यह सिखाया जाना जरूरी है कि "तुम अपना सत्य स्वयं ढूंढो" एवम "तुम्हे अपने मार्ग का निर्माण स्वयं करना होता है"।
पुनः स्वयं के लिए हमेशा अपने परसेप्शन को चुनौती देते रहना चाहिए, हमेशा उसकी समीक्षा होती रहनी आवश्यक है ।
ध्यान रहे, एक रेस के रूप में हमने कई हज़ार वर्ष अवास्तविक समस्याओ के ऊपर बर्बाद कर दिए है और इनकी भरपाई सम्भव नही है।
आप, आपके विचार सब ठीक है लेकिन नयी पीढ़ी उस प्रोपोगेंडा में न जिए जिस प्रोपोगेंडा में आप जी रहे हैं और जाने अनजाने उस प्रोपोगेंडा का आगे बढ़ा रहे हैं।
दरअसल दुनिया का कोई एक केंद्र नही है। हर व्यक्ति दुनिया का केंद्र है ऐसे में दुनिया में कोई एक सत्य नही है , सबके अपने सत्य हैं और सबके अपने मार्ग।
नयी पीढ़ी को यह सिखाने के कि, "यही सत्य है" और "यही मार्ग है" यह सिखाया जाना जरूरी है कि "तुम अपना सत्य स्वयं ढूंढो" एवम "तुम्हे अपने मार्ग का निर्माण स्वयं करना होता है"।
पुनः स्वयं के लिए हमेशा अपने परसेप्शन को चुनौती देते रहना चाहिए, हमेशा उसकी समीक्षा होती रहनी आवश्यक है ।
ध्यान रहे, एक रेस के रूप में हमने कई हज़ार वर्ष अवास्तविक समस्याओ के ऊपर बर्बाद कर दिए है और इनकी भरपाई सम्भव नही है।
कॉस्मिक कैलेंडर
#कॉस्मिक_कैलेंडर
कोस्मिक कैलेंडर #बिगबैंग से लेकर आजतक के 13•8 अरब साल के ब्रह्मांडीय इतिहास को एक वर्ष के सन्दर्भ में रखकर समझने का प्रयास है। इस स्केल पर हर #माह_लगभग_1_अरब_साल_तथा_एक_दिन_लगभग_4_करोड़_साल के बराबर है•
आइए देखते है कब क्या हुवा:
#1_जनवरी: बिगबैंग होता है।
#22_जनवरी अर्थात आज से 12•85 अरब वर्ष पूर्व प्रथम ज्ञात #गैलेक्सी बनती है।
#16_मार्च को हमारी #आकाश_गंगा बनती है लेकिन अभी भी हमारा #सौरमण्डल नही बना है। हमारे #सूर्य का निर्माण #31_अगस्त को होता है।
हमारे सौरमण्डल का निर्माण #2_सितम्बर अर्थात आज से #4•57 अरब वर्ष पूर्व होता है लेकिन पृथ्वी पर अभी भी चट्टाने बननी प्रारम्भ नही हुई हैं। पृथ्वी पर चट्टान बननी #6_सितम्बर अर्थात 4•4अरब वर्ष पूर्व प्रारम्भ होती है।
#31_दिसम्बर को रात 10 बजकर 24 मिनट पर आदिमानव पटल पर आते है जिन्होंने अभी आग जलाना नही सीखा है। मानव इसी दिन 10 बजकर 44 मिनट पर आग जलाना सीखते हैं और खेती?
मानव खेती करना 31 दिसम्बर की रात 11 बजकर 59 मिनट और32 सेकेण्ड पर सीखता है।
नया वर्ष आने के 5 सेकेण्ड पूर्व बुद्ध का जन्म हुवा है और अभी एक सेकेण्ड से भी कम समय में मानव ने वैज्ञानिक तरीके से सोचना सीखा है।
कोस्मिक कैलेंडर #बिगबैंग से लेकर आजतक के 13•8 अरब साल के ब्रह्मांडीय इतिहास को एक वर्ष के सन्दर्भ में रखकर समझने का प्रयास है। इस स्केल पर हर #माह_लगभग_1_अरब_साल_तथा_एक_दिन_लगभग_4_करोड़_साल के बराबर है•
आइए देखते है कब क्या हुवा:
#1_जनवरी: बिगबैंग होता है।
#22_जनवरी अर्थात आज से 12•85 अरब वर्ष पूर्व प्रथम ज्ञात #गैलेक्सी बनती है।
#16_मार्च को हमारी #आकाश_गंगा बनती है लेकिन अभी भी हमारा #सौरमण्डल नही बना है। हमारे #सूर्य का निर्माण #31_अगस्त को होता है।
हमारे सौरमण्डल का निर्माण #2_सितम्बर अर्थात आज से #4•57 अरब वर्ष पूर्व होता है लेकिन पृथ्वी पर अभी भी चट्टाने बननी प्रारम्भ नही हुई हैं। पृथ्वी पर चट्टान बननी #6_सितम्बर अर्थात 4•4अरब वर्ष पूर्व प्रारम्भ होती है।
#31_दिसम्बर को रात 10 बजकर 24 मिनट पर आदिमानव पटल पर आते है जिन्होंने अभी आग जलाना नही सीखा है। मानव इसी दिन 10 बजकर 44 मिनट पर आग जलाना सीखते हैं और खेती?
मानव खेती करना 31 दिसम्बर की रात 11 बजकर 59 मिनट और32 सेकेण्ड पर सीखता है।
नया वर्ष आने के 5 सेकेण्ड पूर्व बुद्ध का जन्म हुवा है और अभी एक सेकेण्ड से भी कम समय में मानव ने वैज्ञानिक तरीके से सोचना सीखा है।
पेल ब्लयू डॉट
नासा ने सितम्बर 1977 में वाह्य सौरमण्डल (#Outer_solar_system) तथा #इंट्रस्टीलर अंतरिक्ष के अध्ययन हेतु #वॉयेजर 1 यान प्रक्षेपित किया। वैज्ञानिक #कार्ल_सेगन ने नासा को मना लिया कि जब वॉययज़र नेप्च्यून की कक्षा को पार करने लगे तो उस वक़्त इस यान के कैमरे को पीछे कर पृथ्वी की एक तस्वीर ली जाय।
( सूर्य की तरफ कैमरे को फोकस करने के कारण व्योइज़र की इमेजिंग सिस्टम डैमेज हो सकती थी लेकिन आखिरकार #सेगन ने नासा को मना ही लिया)
वॉयेजर 1 ने यह ऐतिहासिक तस्वीर खींची थी जिसे #pale_blue_dot के नाम से जानते हैं।
यह तस्वीर 14 फरवरी 1990 को पृथ्वी से लगभग 6 करोड़ किलोमीटर की दूरी से ली गई थी।
आज से 5 अरब वर्ष भविष्य में जब पृथ्वी या तो जल चुकी होगी या सूर्य द्वारा निगल ली गई होगी (सूर्य अपने अंत काल मे मंगल तक फैल जाएंगे और इस क्रम में पृथ्वी उनका ग्रास बनेगी) तब तक कई दूसरी गैलेक्सिस, तारे अस्तित्व में आ चुके होंगे और शायद कहीं दूसरे इंटेलिजेंट बीइंग भी लेकिन उनको शायद यह कभी पता नही चलेगा की इस ब्रह्मांड में पृथ्वी नाम का कोई ग्रह भी था, या उनके अलावा अतीत में भी एक #बुद्धिमान_जीवन विकसित हुआ था।
( सूर्य की तरफ कैमरे को फोकस करने के कारण व्योइज़र की इमेजिंग सिस्टम डैमेज हो सकती थी लेकिन आखिरकार #सेगन ने नासा को मना ही लिया)
वॉयेजर 1 ने यह ऐतिहासिक तस्वीर खींची थी जिसे #pale_blue_dot के नाम से जानते हैं।
यह तस्वीर 14 फरवरी 1990 को पृथ्वी से लगभग 6 करोड़ किलोमीटर की दूरी से ली गई थी।
आज से 5 अरब वर्ष भविष्य में जब पृथ्वी या तो जल चुकी होगी या सूर्य द्वारा निगल ली गई होगी (सूर्य अपने अंत काल मे मंगल तक फैल जाएंगे और इस क्रम में पृथ्वी उनका ग्रास बनेगी) तब तक कई दूसरी गैलेक्सिस, तारे अस्तित्व में आ चुके होंगे और शायद कहीं दूसरे इंटेलिजेंट बीइंग भी लेकिन उनको शायद यह कभी पता नही चलेगा की इस ब्रह्मांड में पृथ्वी नाम का कोई ग्रह भी था, या उनके अलावा अतीत में भी एक #बुद्धिमान_जीवन विकसित हुआ था।
गुरुत्व तरंग
दो ब्लैक होल के आपस में मर्ज होने की घटना का अध्ययन किया गया। पहले ब्लैक होल का द्रव्यमान 36 सूर्यो के द्रव्यमान के बराबर था। दूसरे ब्लैकहोल का द्रव्यमान 29सूर्यो के लेकिन जब ये आपस मे मर्ज हो गए तो जो ब्लैक होल बना उसका द्र्व्यमान 36+29= 65 होने की जगह 62 सूर्यो के द्र्व्यमान के ही बराबर पाया गया।
3 सूर्य के द्र्व्यमान कहाँ गया?
तीन सूर्यो के द्र्व्यमान के बराबर का द्र्व्यमान ऊर्जा बन गई और ग्रेविटेशनल वेव के रूप में ब्रहांड में फैल गई।
स्पेश-टाइम के फैब्रिक में द्र्व्यमान कर्व बनाता है लेकिन यह स्पेश-टाईम के फैब्रिक/मीडियम में तरंग भी बनाता है जैसे पानी मे पत्थर डालिए और इससे पानी मे तरंग पैदा होगी।
ग्रेविटेशनल वेव को हमने डिटेक्ट किया। हम जिस प्रयोग और वेधशाला द्वारा ग्रेविटेशनल वेव्स को पकड़ते हैं उसे LIGO 【 Laser Interferometer Gravitational-Wave Observatory】 कहते हैं और एक ऐसा डिटेक्टर भारत मे भी है: LiGO INDIA.
3 सूर्य के द्र्व्यमान कहाँ गया?
तीन सूर्यो के द्र्व्यमान के बराबर का द्र्व्यमान ऊर्जा बन गई और ग्रेविटेशनल वेव के रूप में ब्रहांड में फैल गई।
स्पेश-टाइम के फैब्रिक में द्र्व्यमान कर्व बनाता है लेकिन यह स्पेश-टाईम के फैब्रिक/मीडियम में तरंग भी बनाता है जैसे पानी मे पत्थर डालिए और इससे पानी मे तरंग पैदा होगी।
ग्रेविटेशनल वेव को हमने डिटेक्ट किया। हम जिस प्रयोग और वेधशाला द्वारा ग्रेविटेशनल वेव्स को पकड़ते हैं उसे LIGO 【 Laser Interferometer Gravitational-Wave Observatory】 कहते हैं और एक ऐसा डिटेक्टर भारत मे भी है: LiGO INDIA.
नौ की पहेली
ये नौ संख्याएं हमारे ब्रह्मांड का विवरण देती हैं लेकिन ये संख्याएं क्यों हैं, इनका मान यही क्यों है हम यह नही जानते।
ससकिंड इसके चार हल बताते हैं:
●शायद ईश्वर
●शायद कोई एक सिद्धान्त हो जो इनके इस मान की व्याख्या कर दे।
● शायद कोई एक्सीडेंट
●शायद इन संख्याओं के सारे सम्भावित मान अन्य ब्रह्मांडो में मौजूद हों और हम एक मल्टीवर्स या जैसा स्ट्रिंग सिद्धान्त के एक जनक लियोनार्ड ससकिंड कहते हैं, एक मेगावर्स के निवासी हों और उपरोक्त मान में हमारा अपना ब्रहांड आता हो।
ससकिंड इसके चार हल बताते हैं:
●शायद ईश्वर
●शायद कोई एक सिद्धान्त हो जो इनके इस मान की व्याख्या कर दे।
● शायद कोई एक्सीडेंट
●शायद इन संख्याओं के सारे सम्भावित मान अन्य ब्रह्मांडो में मौजूद हों और हम एक मल्टीवर्स या जैसा स्ट्रिंग सिद्धान्त के एक जनक लियोनार्ड ससकिंड कहते हैं, एक मेगावर्स के निवासी हों और उपरोक्त मान में हमारा अपना ब्रहांड आता हो।
हॉकिंग और ससकिंड
स्टीफेन हॉकिंग आज एक घर-घर जाने वाले नाम हैं। एक बहुत बड़े वैज्ञानिक और उससे भी बड़े मानव लेकिन उन्होंने भी गलती की थी और उनको उनकी गलती का एहसास दिलाया था लियोनार्ड ससकिंड ने।
लियोनार्ड ससकिंड भले ही उतने बड़े नाम नही हैं लेकिन स्टीफेन हॉकिंग की "ब्लैक होल इन्फॉर्मेशन पैराडॉक्स" में ससकिंड ने कहा था कि ब्लैक होल में इन्फॉर्मेशन नष्ट नही होता और अंततः हॉकिंग को यह स्वीकार करना पड़ा कि वह गलत थे।
https://www.telegraph.co.uk/culture/books/10654762/The-man-who-proved-Stephen-Hawking-wrong.html
ससकिंड ने थियोरेटिकल मिनिमम सीरीज से क्लासिकल मैकेनिक्स, स्पेशल रिलेटिविटी और क्लासिकल फील्ड थ्योरी तथा क़वान्तम मैकेनिक्स पर सेमी टेक्निकल भाषा मे किताबे लिखी हैं। आप स्ट्रिंग थ्योरी के जनको में से एक हैं। इनकी पुस्तक "द ब्लैक होल वॉर, माई बैटल विथ स्टीफेन हॉकिंग टू मेक वर्ल्ड सेफ फॉर क्वाण्टम मैकेनिक्स" उसी ब्लैक होल इन्फॉर्मेशन पैराडुक्स से सम्वन्धित है।
ससकिंड स्टैनफर्ड विश्विद्यालय में थ्योरेटिकल भौतिकीविद हैं।
लियोनार्ड ससकिंड भले ही उतने बड़े नाम नही हैं लेकिन स्टीफेन हॉकिंग की "ब्लैक होल इन्फॉर्मेशन पैराडॉक्स" में ससकिंड ने कहा था कि ब्लैक होल में इन्फॉर्मेशन नष्ट नही होता और अंततः हॉकिंग को यह स्वीकार करना पड़ा कि वह गलत थे।
https://www.telegraph.co.uk/culture/books/10654762/The-man-who-proved-Stephen-Hawking-wrong.html
ससकिंड ने थियोरेटिकल मिनिमम सीरीज से क्लासिकल मैकेनिक्स, स्पेशल रिलेटिविटी और क्लासिकल फील्ड थ्योरी तथा क़वान्तम मैकेनिक्स पर सेमी टेक्निकल भाषा मे किताबे लिखी हैं। आप स्ट्रिंग थ्योरी के जनको में से एक हैं। इनकी पुस्तक "द ब्लैक होल वॉर, माई बैटल विथ स्टीफेन हॉकिंग टू मेक वर्ल्ड सेफ फॉर क्वाण्टम मैकेनिक्स" उसी ब्लैक होल इन्फॉर्मेशन पैराडुक्स से सम्वन्धित है।
ससकिंड स्टैनफर्ड विश्विद्यालय में थ्योरेटिकल भौतिकीविद हैं।
धर्म का संस्थानीकरण और सामाजिक समस्या
धर्म के संस्थानीकरण के साथ समस्या अपने भारतीय संस्करण में भी उपस्थित रही है जहाँ वर्ण व्यवस्था के स्वरूप की विकृति के साथ धर्म शोषण का माध्ययम बन गया और मानव के एक बहुत बड़े हिस्से को अस्पृश्य बनाकर उनके सच्चिदानन्द स्वरूप को ही नही बल्कि उनके मानव होने की अनुभूति को ही हर लिया गया। अब इनके लिए धर्म एक बाध्यता थी, कुलीन वर्गों के विस्तारवादी मनस्थिति की अभिव्यक्ति! अतः कबीर, रैदास का आना एक ऐतिहिसिक यथार्थता बनी।
यदि अब्राहमीय धर्म बहुधा इस तथ्य को नकार देते है हैं कि उनकी धर्मिक मान्यताएं काल विशेष में किसी ऐतिहिसिक समस्या का समाधान थीं और उनकी वही व्याख्या जो उस काल मे उपस्थित थी, आज की परिस्थितियों में उसी रूप में लागू नही हो सकतीं तो यह भी मानते रहना की धर्म का जो अभिप्राय था, इसकी जो अवधारणा थी, वह आज भी अपने उसी रूप में विद्यमान है, केवल आत्मप्रवंचना और इतिहास में जीना है। इतिहास में जीना और आत्मप्रवंचना किसी संस्कृति को नष्ट करने के लिए काफी होता है।
यदि भारतीय संस्कृति को बचना है तो हमे धर्म और इसके द्वारा उतपन्न विसंगतियों को स्वीकार करना ही होगा तथा उस मूल स्थिति में लौटना होगा जहाँ धर्म की अवधारणा और अभिप्राय मानवीय सत्ता को उसके दिव्य रूप से साक्षत्कार कराना है। इस मूल अवधारणा में वर्तमान की विसंगतियों के लिए कोई जगह नही हो सकती।
धर्म के अध्ययन की प्रविधि
धर्म की अवधारणा एवम अभिप्राय का अध्ययन-विश्लेषण करने में "प्रविधि का निर्धारण" सबसे पहली बाधा है। मानवीय जीवन का शायद ही कोई पहलू है जो धर्म से अछूता हो साथ ही 'धर्म व्यापार में मानव का सम्पूर्णत्व लगा रहता है'।¶अपनी इस व्यापकता के कारण धर्म के अध्ययन की कोई एक प्रविधि असंगत होगी अतः इंटरडिसिप्लिनरी, मल्टीडिसिप्लिनरी तथा ट्रांसडीसीलपिंरी अप्रोच का उपयोग धर्म के अध्ययन में वांछित होगा।
¶【सामान्य धर्म दर्शन एवम दार्शनिक विश्लेषण: या मसीह पृष्ठ 23】
इन्टरडिसिप्लिनरी, मल्टीडिसिप्लिनरी तथा ट्रांसडीसीप्लिनरी अप्रोचेज़ को इस प्रकार परिभाषित किया जाता है:
●इंट्राडिसिप्लिनरी:
●मल्टीडिसिप्लिनरी:
●ट्रांसडीसीप्लिनरी:
इन पदों को आरेखों द्वारा उपरोक्त तरीके से दर्शाया जा सकता है:
स्पष्ट है कि सरल समस्याओं को डिसिप्लिनरी, जटिल समस्याओं को मल्टीडिसिप्लिनरी तथा दुरूह समस्याओं को ट्रांसडीसीप्लिनरी प्रविधि द्वारा हल किया जाता है।
प्रश्न है कि धर्म किस श्रेणी की समस्या है, सरल, जटिल अथवा दुरूह?
दर्शन द्वितीय स्तर का अन्वेक्षण है अतः धर्म के अध्ययन में प्रथम स्तर पर प्रयुक्त प्रविधियों से प्राप्त निष्कर्षों का विविध दार्शनिक प्रविधियों के माध्यम से चिंतन, विश्लेषण और व्याख्या धर्म की अवधारणा को स्पष्ट करने की एक संगत विधि हो सकती है।
मानवीय विचारों के इतिहास में व्याप्त प्रवृत्तियो को विविध शीर्षकों के अंदर विभाजित किया जा सकता है: शास्त्रीय युग, मध्यकाल, आधुनिक काल की विविध प्रवृतियां यथा: बुद्धिवाद, अनुभववाद, संशयवाद, समीक्षावाद, निर्पेक्षवाद तथा समकालीन वैचारिक प्रवृतियां जैसे विश्लेषणात्मक पद्धति, अस्तित्ववाद, प्रैगमटिज़्म, फेनोमेनोलॉजी, मार्क्सवाद तथा उत्तर आधुनिकतावाद और इसकी विविध शाखाएं।
धर्म, रिलीजन और मानवीय परिप्रेक्ष्य
कहा जा सकता है कि संस्कृति विशेष से सम्बंधित होने के कारण धर्म और रिलीजन के भावार्थ में भेद अवश्य है किन्तु यदि इन्हें मानवीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो यह समानार्थी है और इस रूप में इनके अभिप्राय और अवधारणा को किसी भी एक शब्द द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। अतः धर्म धार्यता अथवा बन्धन के रूप में मनुष्य का अपनी आपात स्थिति, यथा अस्तित्वगत पीड़ा, पराधीनता, आपसी संगर्ष, अपनी ससीमता का बोध, के निवारण की प्रक्रिया है। जिस प्रकार की आपात स्थिति होती है मनुष्य उसकी के अनुरूप उपागम, ईश्वर विषयक मान्यता, अपनी अवधारणा आदि का निर्माण करता है। साथ ही धर्म मे कुछ ऐसी मान्यताएं अवश्य उपस्थित होती हैं जिनके प्रति मानव के व्यामोहित होने की संभावना विद्यमान होती है जिसका प्रकटीकरण धर्म के मूल लक्ष्य के विरुद्ध होता है।
मैं, पतित देवदूत!
मेरा परमपिता
सर्वशक्तिमान नही है,
बोध!
आदमी बनने की कीमत!
ना, पतित देवदूत नही हूँ,
शैतान या इबलीस भी नही,
और इडिपस ग्रन्थि तो कतई नही
-माँ तो केवल उस क्षण होती है,
जब पैदा करती है मुझे,
असभ्य आवाजो के साथ,
ततपूर्व और ततपश्च वह तो विभ्रम है,
किसी पागल की!
अतिशय पुरुषवाद?
-सारा भार पिता पर है,
जो बधिया किया हुआ है,
एक बैल सा,
मैने जिब्रील से कहा!
सर्वशक्तिमान नही है,
बोध!
आदमी बनने की कीमत!
ना, पतित देवदूत नही हूँ,
शैतान या इबलीस भी नही,
और इडिपस ग्रन्थि तो कतई नही
-माँ तो केवल उस क्षण होती है,
जब पैदा करती है मुझे,
असभ्य आवाजो के साथ,
ततपूर्व और ततपश्च वह तो विभ्रम है,
किसी पागल की!
अतिशय पुरुषवाद?
-सारा भार पिता पर है,
जो बधिया किया हुआ है,
एक बैल सा,
मैने जिब्रील से कहा!
भौतिकी के नियम और ब्रह्मांड का सम्बंध
भौतिकी के नियम क्या स्पेस-टाईम में रहते हैं या इनकी सत्ता देश-काल से परे है? आक्षेप करते हुए कहा जा सकता है कि भौतिकी के नियमो को उक्त शब्दावली के साथ सम्वन्धित कर एक अनावश्यक तत्वमीमांसिय प्रश्न खड़ा किया जा रहा है और इसका सामान्य ज्ञान पर आधिरित उत्तर है कि यह ब्रह्मांड के साथ अस्तित्वमान है बल्कि ये ब्रह्मांड के देश-कालातीत वह घटक है जो यह निर्धारित करते हैं कि ब्रह्मांड में ऊर्जा द्र्व्यमान आदि कैसा व्यवहार करेंगे।
इन्हें देश-कालातीत इसलिए कहा जा रहा है कि हमारी भौतिकी की आधुनिक समझ के अनुसार देश-काल स्वयम ही निरपेक्ष नही हैं किंतु भौतिकी के नियम की सापेक्षता विषयक अभी तक सम्भवतः कोई सिद्धान्त नही है हाँ स्ट्रिंग थ्योरी के मेगावर्स में ब्रह्मांड के अलग अलग हिस्सों में भौतिकी के अलग अलग नियम हो सकते हैं या मल्टीवर्स में विभिन्न ब्रह्मांडीय बुलबुलों में अलग अलग ब्रह्मांड के बुलबुलों में हो सकता है कि भौतिकी के अलग अलग नियम हों। मल्टीवर्स या मेगावर्स में भैतिकी के अलग अलग नियम की यह कल्पना सही भी हो सकती है और नही भी क्योकि अभी हमारे पास इसे सही सिद्ध करने या गलत प्रमाणित करने का कोई साधन नही है। अतः
हम अपने ब्रह्मांड पर ध्यान केंद्रित करते है और अपने इस ब्रह्मांड के सन्दर्भ में ऊपर के प्रश्न की भाषा में थोड़ा सुधार करते हुए यह तो पूछा ही जा सकता है कि भौतिकी के नियम इस ब्रह्मांड से किस प्रकार सम्बंधित हैं?
कहा जा सकता है कि भौतिकी के नियम ब्रह्मांड से उसी प्रकार सम्बंधित है ज्यों एक वाशिंग मशीन, मोटर या कोई भी यंत्र उन नियमो से सम्बंधित हैं लेकिन यह जवाब ठीक नही है क्योंकि एक वाशिंग मशीन, मोटर या यंत्रों से पूर्व भौतिकी के नियम हैं और इन नियमो के आधार पर ये उपकरण काम करते है और बनते हैं।
इन्हें देश-कालातीत इसलिए कहा जा रहा है कि हमारी भौतिकी की आधुनिक समझ के अनुसार देश-काल स्वयम ही निरपेक्ष नही हैं किंतु भौतिकी के नियम की सापेक्षता विषयक अभी तक सम्भवतः कोई सिद्धान्त नही है हाँ स्ट्रिंग थ्योरी के मेगावर्स में ब्रह्मांड के अलग अलग हिस्सों में भौतिकी के अलग अलग नियम हो सकते हैं या मल्टीवर्स में विभिन्न ब्रह्मांडीय बुलबुलों में अलग अलग ब्रह्मांड के बुलबुलों में हो सकता है कि भौतिकी के अलग अलग नियम हों। मल्टीवर्स या मेगावर्स में भैतिकी के अलग अलग नियम की यह कल्पना सही भी हो सकती है और नही भी क्योकि अभी हमारे पास इसे सही सिद्ध करने या गलत प्रमाणित करने का कोई साधन नही है। अतः
हम अपने ब्रह्मांड पर ध्यान केंद्रित करते है और अपने इस ब्रह्मांड के सन्दर्भ में ऊपर के प्रश्न की भाषा में थोड़ा सुधार करते हुए यह तो पूछा ही जा सकता है कि भौतिकी के नियम इस ब्रह्मांड से किस प्रकार सम्बंधित हैं?
कहा जा सकता है कि भौतिकी के नियम ब्रह्मांड से उसी प्रकार सम्बंधित है ज्यों एक वाशिंग मशीन, मोटर या कोई भी यंत्र उन नियमो से सम्बंधित हैं लेकिन यह जवाब ठीक नही है क्योंकि एक वाशिंग मशीन, मोटर या यंत्रों से पूर्व भौतिकी के नियम हैं और इन नियमो के आधार पर ये उपकरण काम करते है और बनते हैं।
तर्क, भाव और आस्तिकता
एक पुष्प है। वह खूबसूरत है। अच्छा लगा।
लेकिन एक दृष्टि और है, बुद्धि की दृष्टि: यह उसके दलपत्र हैं, यह उसके पुमंग, यह उसके जायांग, यह पुंकेसर, यह इतने वर्णों से परिपूर्ण है क्योंकि अलग अलग पिगमेंट्स अलग अलग प्रकाश को प्रवर्तित कर रहे हैं। इसके विभिन्न भाग दरअसल कार्बन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन से ही मिलकर बने हैं। ये फिर इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन, फिर ये क्वार्क●●●और यह कांटा भी लेकिन खूबसूरत फूल ही लगता है और यदि मैं यह जानता हूँ और कहता हूं कि मौलिक स्तर पर कांटे और फूल एक ही चीज से बने हैं। पुष्प उस वृक्ष, उस पौधे के प्रजनन हेतु है तो मैं उस पुष्प के सौंदर्य बोध का अधिकार नही खो देता। मैं अपनी प्रेयसी को वह पुष्प भेंट करने का भी अधिकार नही खो देता।
लेकिन एक दृष्टि और है, बुद्धि की दृष्टि: यह उसके दलपत्र हैं, यह उसके पुमंग, यह उसके जायांग, यह पुंकेसर, यह इतने वर्णों से परिपूर्ण है क्योंकि अलग अलग पिगमेंट्स अलग अलग प्रकाश को प्रवर्तित कर रहे हैं। इसके विभिन्न भाग दरअसल कार्बन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन से ही मिलकर बने हैं। ये फिर इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन, फिर ये क्वार्क●●●और यह कांटा भी लेकिन खूबसूरत फूल ही लगता है और यदि मैं यह जानता हूँ और कहता हूं कि मौलिक स्तर पर कांटे और फूल एक ही चीज से बने हैं। पुष्प उस वृक्ष, उस पौधे के प्रजनन हेतु है तो मैं उस पुष्प के सौंदर्य बोध का अधिकार नही खो देता। मैं अपनी प्रेयसी को वह पुष्प भेंट करने का भी अधिकार नही खो देता।
चैत्र मास में मत्स्यावतार
चैत्र मास है।
सूर्य मीन राशि में है। सूर्य के मीन राशि में प्रवेश की परिघटना के साथ ही नए सम्वत्सर का प्रारम्भ हुवा।
भगवान का पहला अवतार मत्स्य का है और सूर्य जब मीन राशि में प्रवेश करते है तो नए वर्ष एवम सम्वत्सर का प्रारम्भ होता है:
यह केवल संयोग मात्र है कि कोई गहरी बात छुपी है इसमें?
पुनः नवरात्र चल रही है। हम इसे नवदिवस भी तो कह सकते थे लेकिन क्या कन्या राशि पूरी रात्रि इन दिनों रात्रि में ही नही उदित होतीं?
क्या हर कन्या में माई का रूप हम नही देखते?
कन्या राशि से ठीक १८० अंश का कोण मीन राशि बनाती है तो क्या माई सूर्य का मीन में प्रवेश (अवतरण) नही देख रही हैं?
यदि कल्पना शास्त्रों से अनुशाषित न हो और उस पर गुरु की कृपा न हो तो वह अयथार्य को यथार्थ और यथार्थ का स्वरूप विकृत करके प्रस्तुत कर देती है।
दुर्भाग्य से मेरे पास न तो शास्त्र सम्मत बुद्धि है और न हि गुरु कृपा अतः यदि मेरी कल्पना यथार्थ का विकृत रूप प्रस्तुत कर रही है तो उसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ लेकिन मुझे कन्या सूर्य और मीन के सम्बंध के देखकर यह लग रहा है कि #माई मत्स्यावतार देख रही हैं!
सूर्य मीन राशि में है। सूर्य के मीन राशि में प्रवेश की परिघटना के साथ ही नए सम्वत्सर का प्रारम्भ हुवा।
भगवान का पहला अवतार मत्स्य का है और सूर्य जब मीन राशि में प्रवेश करते है तो नए वर्ष एवम सम्वत्सर का प्रारम्भ होता है:
यह केवल संयोग मात्र है कि कोई गहरी बात छुपी है इसमें?
पुनः नवरात्र चल रही है। हम इसे नवदिवस भी तो कह सकते थे लेकिन क्या कन्या राशि पूरी रात्रि इन दिनों रात्रि में ही नही उदित होतीं?
क्या हर कन्या में माई का रूप हम नही देखते?
कन्या राशि से ठीक १८० अंश का कोण मीन राशि बनाती है तो क्या माई सूर्य का मीन में प्रवेश (अवतरण) नही देख रही हैं?
यदि कल्पना शास्त्रों से अनुशाषित न हो और उस पर गुरु की कृपा न हो तो वह अयथार्य को यथार्थ और यथार्थ का स्वरूप विकृत करके प्रस्तुत कर देती है।
दुर्भाग्य से मेरे पास न तो शास्त्र सम्मत बुद्धि है और न हि गुरु कृपा अतः यदि मेरी कल्पना यथार्थ का विकृत रूप प्रस्तुत कर रही है तो उसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ लेकिन मुझे कन्या सूर्य और मीन के सम्बंध के देखकर यह लग रहा है कि #माई मत्स्यावतार देख रही हैं!
रति और काम
मिलन से पूर्व
मैं होता हूँ
क्योंकि तुम होती हो
तुम होती हो
क्योंकि मैं होता हूँ
मैं-तुम का द्वैत
सापेक्षता का नग्न नृत्य
मिलन में न तो तुम हो
न ही मैं
हम भी नही है
सापेक्ष पिघल जाता है
द्वैत मिट जाता है
विशुद्ध अद्वैत
केवल आनन्द!
परमानंद!!!!
मैं होता हूँ
क्योंकि तुम होती हो
तुम होती हो
क्योंकि मैं होता हूँ
मैं-तुम का द्वैत
सापेक्षता का नग्न नृत्य
मिलन में न तो तुम हो
न ही मैं
हम भी नही है
सापेक्ष पिघल जाता है
द्वैत मिट जाता है
विशुद्ध अद्वैत
केवल आनन्द!
परमानंद!!!!
उपनाम
दुर्भाग्य से हमारी संस्कृति से उस ओर मुड़ गई जहाँ उपनामो का वजन व्यक्ति को दाबे रखता है वरना व्यक्ति हमारी इस महान संस्कृति की आंधी में ही उड़ कर गुमनाम हो जाएगा।
विडम्बना है कि हमने ऐसी सोंच विकसित कर ली है जिसमे अतीत का होना, एक महान अतीत का होना आवश्यक है।
और यह विडंबना केवल हमारी नही, किसी व्यक्ति की नही बल्कि मानवीय है।
उपनामो की संस्कृति ने तीन प्रकार की मानवीय अपसंस्कारो को जन्म दिया है:
1. उपनामो पर दम्भ करने की आत्ममुग्धता
2.उपनामो को बोझ मानने की विकृति
3.उपनामो की बराबरी के लिए तरस
दरअसल ये तीनो अपसंस्कार सांस्कृतिक बीमारीयां है और यह बीमारी कही बाहर से नही आई बल्कि हमारे खुद की संस्कृति के अंदर से आई है और इस बीमारी को अनपढ़ और जाहिलो ने जितना फैलाया है ठीक उतना ही पढ़े लिखे बुद्धिपिशाचों ने भी फैलाया है ।
मुझे एक अजीब सा विरोधाभास दीखता है समाज मे, पढ़ेलिखो के समाज में।
समाज के एक छोर् पर जातिगत पह्चान लिए खड़े व्यक्ति को बुद्धिजीवी लताड़ लगाते है और कहते है कि यह एक अनावश्यक बोझ है वही समाज के दूसरे छोर पर खड़े एक गुमनाम आदिवासी को वह उनका पूर्वज महिसासुर के रूप में ढूंढकर देते है और 'महिसासुर एक जननायक' किताब छपती है।
भाई जब जातिगत पहचान गलत है तो फिर यह बाभन के लिए और उस आदिवासी दोनों के लिए गलत है न?
अब आप खुद ही पूरा दम खम लगा कर आदिवासी, उस आदिवासी के लिए पहचान के नाम पर एक जातिगत इतिहास, उनकी जाति का इतिहास गढ़ते है।
आप एक ऐसी परिस्थिति का निर्माण क्यों नही करते जहाँ इतिहास ही अप्रासंगिक हो जाए?
नही दोहरे मानदंड बनाए रखना तो जरूरी है आपके लिए क्योकि आप को सामंजस्य तो दीखता ही नही केवल और केवल संगर्ष दीखता है और संघर्ष के लिए "दो" का होना तो आवश्यक है।
बुद्धिपिशाचो की इस दोमुही बात के प्रतिरोध में अपना उपनाम नही छोडूंगा!
विडम्बना है कि हमने ऐसी सोंच विकसित कर ली है जिसमे अतीत का होना, एक महान अतीत का होना आवश्यक है।
और यह विडंबना केवल हमारी नही, किसी व्यक्ति की नही बल्कि मानवीय है।
उपनामो की संस्कृति ने तीन प्रकार की मानवीय अपसंस्कारो को जन्म दिया है:
1. उपनामो पर दम्भ करने की आत्ममुग्धता
2.उपनामो को बोझ मानने की विकृति
3.उपनामो की बराबरी के लिए तरस
दरअसल ये तीनो अपसंस्कार सांस्कृतिक बीमारीयां है और यह बीमारी कही बाहर से नही आई बल्कि हमारे खुद की संस्कृति के अंदर से आई है और इस बीमारी को अनपढ़ और जाहिलो ने जितना फैलाया है ठीक उतना ही पढ़े लिखे बुद्धिपिशाचों ने भी फैलाया है ।
मुझे एक अजीब सा विरोधाभास दीखता है समाज मे, पढ़ेलिखो के समाज में।
समाज के एक छोर् पर जातिगत पह्चान लिए खड़े व्यक्ति को बुद्धिजीवी लताड़ लगाते है और कहते है कि यह एक अनावश्यक बोझ है वही समाज के दूसरे छोर पर खड़े एक गुमनाम आदिवासी को वह उनका पूर्वज महिसासुर के रूप में ढूंढकर देते है और 'महिसासुर एक जननायक' किताब छपती है।
भाई जब जातिगत पहचान गलत है तो फिर यह बाभन के लिए और उस आदिवासी दोनों के लिए गलत है न?
अब आप खुद ही पूरा दम खम लगा कर आदिवासी, उस आदिवासी के लिए पहचान के नाम पर एक जातिगत इतिहास, उनकी जाति का इतिहास गढ़ते है।
आप एक ऐसी परिस्थिति का निर्माण क्यों नही करते जहाँ इतिहास ही अप्रासंगिक हो जाए?
नही दोहरे मानदंड बनाए रखना तो जरूरी है आपके लिए क्योकि आप को सामंजस्य तो दीखता ही नही केवल और केवल संगर्ष दीखता है और संघर्ष के लिए "दो" का होना तो आवश्यक है।
बुद्धिपिशाचो की इस दोमुही बात के प्रतिरोध में अपना उपनाम नही छोडूंगा!
उद्दरेद्धात्मानः
मस्तिष्क विकसित हुवा,
तदनुरूप चेतना विस्तृत हुई,
अब आत्मा में बुद्धि, भावना, संकल्प तीनो थे।
बुद्धि ने प्रश्न किया,
भावना ने उत्तर दिया और सामने ईष्वर खड़ा था।
भावना ने प्रश्न किया और बुद्धि घबरा गई और बस अज्ञेय पद तक ही पहुंच पाई।
ईश्वर वाणी के लिए गूंगे का गुड़ था।
बस अपना स्वाद।
वैखरी से अव्यक्त।
लेकिन गुड़ के लिए संकल्प आवश्यक है।
अपना प्रश्न,
अपना संकल्प ही दे सकता है,
उत्तर।
उद्दरेद्धात्मानः!!!!
तदनुरूप चेतना विस्तृत हुई,
अब आत्मा में बुद्धि, भावना, संकल्प तीनो थे।
बुद्धि ने प्रश्न किया,
भावना ने उत्तर दिया और सामने ईष्वर खड़ा था।
भावना ने प्रश्न किया और बुद्धि घबरा गई और बस अज्ञेय पद तक ही पहुंच पाई।
ईश्वर वाणी के लिए गूंगे का गुड़ था।
बस अपना स्वाद।
वैखरी से अव्यक्त।
लेकिन गुड़ के लिए संकल्प आवश्यक है।
अपना प्रश्न,
अपना संकल्प ही दे सकता है,
उत्तर।
उद्दरेद्धात्मानः!!!!
प्रश्न और अप्रश्न
मेरी डेढ़ वर्ष की पुत्री है, छोटे मोटे शब्दो का उच्चारण कर लेती है। समझ विकसित हो रही है। बो बो से तुता (कुत्ता) और मम से पापी (पानी) पर आ रही है।
कल नैना (मेरी बेटी) खेलते खेलते सोफे से लड़ गयी। कुछ चोट जरूर लगी होगी क्योंकि उसने रोना शुरू कर दिया। बगल में उसके नाना जी थे।गोद में उठाया और कहा कि राजा बेटा को चोट लग गई। थोड़ा दुलारा पुचकारा और फिर नैना से उन्होंने कहा कि लाओ लाओ जहाँ चोट लगी है वहाँ फूंक देता हूँ।
नाना ने नैना के चोट पर फूँक मार दिया।
हालांकि नैना चुप हो गयी है लेकिन उसके नाना यह जानते हैं कि फूंकने वुकने से कोई फर्क नही पड़ा है।
लेकिन नैना शायद समझ रही है कि फुकने से चोट खत्म हो जाति है।
फूंकने से चोट खत्म हो जाती है यह नैना का ज्ञान है जो दरअसल ज्ञान नही है।
लेकिन, नैना की चेत्तना अभी उतनी विकसित नही है। उसके पास उतने शब्द नही है।
आदमी के पास तो कोई नाना भी नही था जो उसे फूंक मारता उसे तो स्वयं ही यह फूंक भी मारनी थी और इसके साथ कालो तक जीना था; तब तक जबतक उसके साथ विज्ञानं न घटित हो जाए ।
मैं जानता हूं कि नैना अगले कुछ ही सालो में यह समझ जाएगी की फूँक मारने से चोट मिट जाती है, उसकी यह अवधारणा गलत थी क्योंकि यह ज्ञान था ही नही लेकिन, आज भी कई आदमी है जो सभ्यता के उसी काल में जी रहे है।
खैर, मुझे उससे क्या मुझे तो यह सोचना है कि जब लाईट चली जाए और नैना यह सुने की बिजली चली गयी है और नैना यह पूछ ही दे की पापा लाईट का घर कहाँ है तो उसे कैसे समझाऊंगा।
प्रश्न और अ-प्रश्न में फर्क होता है; अ-प्रश्नों के चाहे कितने ही गुढ़ उत्तर दू वह ज्ञान नही होंगे।
ज्ञान के लिए तो सार्थक प्रश्न पूछने होते है।
क्या हमें सार्थक प्रश्न पूछना आ गया है या आज भी हम #जगत विषयक #बिजली_कहाँ_रहती_है का प्रश्न ही कर रहे है?
कल नैना (मेरी बेटी) खेलते खेलते सोफे से लड़ गयी। कुछ चोट जरूर लगी होगी क्योंकि उसने रोना शुरू कर दिया। बगल में उसके नाना जी थे।गोद में उठाया और कहा कि राजा बेटा को चोट लग गई। थोड़ा दुलारा पुचकारा और फिर नैना से उन्होंने कहा कि लाओ लाओ जहाँ चोट लगी है वहाँ फूंक देता हूँ।
नाना ने नैना के चोट पर फूँक मार दिया।
हालांकि नैना चुप हो गयी है लेकिन उसके नाना यह जानते हैं कि फूंकने वुकने से कोई फर्क नही पड़ा है।
लेकिन नैना शायद समझ रही है कि फुकने से चोट खत्म हो जाति है।
फूंकने से चोट खत्म हो जाती है यह नैना का ज्ञान है जो दरअसल ज्ञान नही है।
लेकिन, नैना की चेत्तना अभी उतनी विकसित नही है। उसके पास उतने शब्द नही है।
आदमी के पास तो कोई नाना भी नही था जो उसे फूंक मारता उसे तो स्वयं ही यह फूंक भी मारनी थी और इसके साथ कालो तक जीना था; तब तक जबतक उसके साथ विज्ञानं न घटित हो जाए ।
मैं जानता हूं कि नैना अगले कुछ ही सालो में यह समझ जाएगी की फूँक मारने से चोट मिट जाती है, उसकी यह अवधारणा गलत थी क्योंकि यह ज्ञान था ही नही लेकिन, आज भी कई आदमी है जो सभ्यता के उसी काल में जी रहे है।
खैर, मुझे उससे क्या मुझे तो यह सोचना है कि जब लाईट चली जाए और नैना यह सुने की बिजली चली गयी है और नैना यह पूछ ही दे की पापा लाईट का घर कहाँ है तो उसे कैसे समझाऊंगा।
प्रश्न और अ-प्रश्न में फर्क होता है; अ-प्रश्नों के चाहे कितने ही गुढ़ उत्तर दू वह ज्ञान नही होंगे।
ज्ञान के लिए तो सार्थक प्रश्न पूछने होते है।
क्या हमें सार्थक प्रश्न पूछना आ गया है या आज भी हम #जगत विषयक #बिजली_कहाँ_रहती_है का प्रश्न ही कर रहे है?
प्रकृति और पुरुष का सृजन
वर्जनाएँ,
पीड़ा, वेदना,
आत्मा नीलाभ,
गांठ गांठ हलाहल।
अकस्मात!
आत्मिक आमंत्रण
प्रकृति का।
लाल हरे रंगों में,
उन्मत्त रेचित वृत्तियाँ,
मीठी सी प्यास,
अपनेपन की घूँट,
तुम्हारी हंसी, तुम्हारी ठिठोली,
मन की भाषा,
चुपके से तुम बोली:
जीवन का मधुपर्व 'आज'।
कवि का करुण राग,
या समर भूमि?
हलाहल से संघर्ष,
माटी का उत्कर्ष,
महामानव का बीजवपन,
संकल्प की सृष्टि,
मेरा सृजन!
पुरुष, मेरा सृजन!!
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पीड़ा, वेदना,
आत्मा नीलाभ,
गांठ गांठ हलाहल।
अकस्मात!
आत्मिक आमंत्रण
प्रकृति का।
लाल हरे रंगों में,
उन्मत्त रेचित वृत्तियाँ,
मीठी सी प्यास,
अपनेपन की घूँट,
तुम्हारी हंसी, तुम्हारी ठिठोली,
मन की भाषा,
चुपके से तुम बोली:
जीवन का मधुपर्व 'आज'।
कवि का करुण राग,
या समर भूमि?
हलाहल से संघर्ष,
माटी का उत्कर्ष,
महामानव का बीजवपन,
संकल्प की सृष्टि,
मेरा सृजन!
पुरुष, मेरा सृजन!!
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हैलोपेरिडॉल
हर रात
जिब्रील आता है
मेरे सपने में
मुझे याद दिलाता है
वह त'आला एक है।
मैं रटता हूँ चुपके से
आखरी पैगम्बर हूँ
अपने लिए उसका।
हर सुबह
एक शीर्षकहीन अगीत
जो वह उतरता है
मेरे ह्रदय पर
कागज पर लिख लेता हूँ।
कल रात
उसने कहा कड़कती आवाज में
दुहराओ उसके नाम पर
जो ह्रदय पर विद्रोह उतारता है तुहारे
वह जो करीम है, वह जो रहीम है।
मैंने दुहराया
वह सर्वशक्तिमान नही है
लेकिन मैं कमज़ोर हूँ
----बोध, आदमी बनने की कीमत
एक नए पतित देवदूत का जन्म!
जनता हूँ खुल्द तजना होगा,
आदम की संतानें नफरत भी करेगी मुझसे
लेकिन, आदमी बनने की कीमत ही है पतित देवदूत बन जाना!
जिब्रील आता है
मेरे सपने में
मुझे याद दिलाता है
वह त'आला एक है।
मैं रटता हूँ चुपके से
आखरी पैगम्बर हूँ
अपने लिए उसका।
हर सुबह
एक शीर्षकहीन अगीत
जो वह उतरता है
मेरे ह्रदय पर
कागज पर लिख लेता हूँ।
कल रात
उसने कहा कड़कती आवाज में
दुहराओ उसके नाम पर
जो ह्रदय पर विद्रोह उतारता है तुहारे
वह जो करीम है, वह जो रहीम है।
मैंने दुहराया
वह सर्वशक्तिमान नही है
लेकिन मैं कमज़ोर हूँ
----बोध, आदमी बनने की कीमत
एक नए पतित देवदूत का जन्म!
जनता हूँ खुल्द तजना होगा,
आदम की संतानें नफरत भी करेगी मुझसे
लेकिन, आदमी बनने की कीमत ही है पतित देवदूत बन जाना!
बद फैलसुफ़ की कलम से
एक बद फैलसुफ की कलम से,
फलसफा, वह इल्म जो बातिनी ओ जाहिरी खुलक के राजो को जाहिर करने का दावा करती है। फलसफा के अपने कुछ सवालात हैं, मसलन, यह दुनिया किस शै से बनी है? यह दुनिया बनी ही क्यों है? हम यह सवालात करते ही क्यों है?
एक खूब फैलसुफ का दावा करने वाले इस गफलत में जीते हैं कि फलसफा के पास इन सवालों के जवाब मालूम हैं लेकिन दौर के अदिम से दौर ए कदीम तक यह सवाल जयों के त्यों हैं।
तब फिर क्या बद फलसफाई और क्या खूब फ्लसफाई!
फलसफा, वह इल्म जो बातिनी ओ जाहिरी खुलक के राजो को जाहिर करने का दावा करती है। फलसफा के अपने कुछ सवालात हैं, मसलन, यह दुनिया किस शै से बनी है? यह दुनिया बनी ही क्यों है? हम यह सवालात करते ही क्यों है?
एक खूब फैलसुफ का दावा करने वाले इस गफलत में जीते हैं कि फलसफा के पास इन सवालों के जवाब मालूम हैं लेकिन दौर के अदिम से दौर ए कदीम तक यह सवाल जयों के त्यों हैं।
तब फिर क्या बद फलसफाई और क्या खूब फ्लसफाई!
एक ॐकार सतनाम
तौहीद ही सच्चा
बाकी सब कच्चा
यह तो मुल्ला कहता है
मौला कहता है
मूरत, माटी के शिफ़ाअत
शिफ़ाअत, शब्दो के मूरत
बाकी सब कच्चा
यह तो मुल्ला कहता है
मौला कहता है
मूरत, माटी के शिफ़ाअत
शिफ़ाअत, शब्दो के मूरत
माटी को तोड़ा तो हरफ़ मिले
हरफो को जोड़ो तो माटी
हरफो को जोड़ो तो माटी
विज्ञान सीमित है ब्रह्मांड अनन्त है।
कब
क्यों
कहाँ
कैसे
कितना
हमारे पास यह पाँच ही प्रश्न है, हमारा मस्तिष्क इतना ही पूछने के लिए विकसित हुवा है लेकिन #सत्ता (ब्रह्मांड) अपनी वस्तुगतता में जाने कितने #वेरिएब्ल्स (चरों) को लिए बैठा है अतः हम ब्रह्मांड को उसकी वस्तुगतता में नही समझ सकते।
हाँ हम अपने सन्दर्भ से कब-क्यों-कहाँ-कैसे ढूंढते चले जा सकते है और परत दर परत, रहस्य दर रहस्य उद्घाटित करते जाएंगे लेकिन हम यह भी दावे के साथ नही कह सकते ही ब्रह्मांड की वस्तुगतता के परिप्रेक्ष्य से यह कब-कहाँ-कैसे-क्यों सही प्रश्न हैं भी या नही!
■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■
वैज्ञानिक ज्ञान की एक सीमा है, जगत की नही।
विज्ञान क्या है? दरअसल यह अमीबा के उस उद्दीपन-प्रतिक्रिया का ही अत्यन्त जटिल रूप है, उस क्रिया-प्रतिक्रिया का मात्रात्मक-गुणात्मक विकास है। उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रिया करने की आज तक की सबसे अच्छी प्रक्रिया, सबसे सफल प्रक्रिया है,और इसीलिए इसने इतने कम समय में हमारी चेतना के जगत को हमारे लिए इतना अनुकूलित कर दिया है।
यह प्रकृति के नए नए रहस्यों को खोल रहा है।
अणु में इसने अथाह शक्ति ढूंढ लिया और बस ढूंढा ही नही उसे मानव का पालतू भी बना दिया। प्रकृति पर आज हम किसी हद तक नकेल कस सकते है। हाँ वो शक्तियां जिनसे अभी मात्र पांच हज़ार साल पहले हमारे पुरखे डर कर विनती करते थे वो आज हमारे नियंत्रण में हैं,और क्रमशः होती जा रही हैं। हमारे पुरखे जहाँ तक सोच नही सकते थे उन जगहों पर हम अपने पदचिन्ह छोड़ रहे हैं।
अनुकूलन की विविध चेतन प्रक्रियाओं में विज्ञान की बराबरी तो कोई कर ही नही सकता, न धर्म, न आदिम जादू (फ्रेजर) न सहज वृति, न अपने परंपरिमक मायनो में दर्शन।
लेकिन, विज्ञान की एक सीमा है जगत की कोई सीमा नही है।
हमे जो ज्ञान प्राप्त हो रहा है, हम जिन रहस्यों को जान रहे हैं क्या वो निरपेक्ष है, वास्तव में वैसे है या हमारी चेतना उन्हें वैसा प्रदर्शित करती है? चेतना, जिसका विकास प्रकृति से अनुकूलन के लिए हुवा है, हमारे न्यूरॉन के फंक्शन पर ही तो अवलम्बित है।
और यह अवलम्बन स्वयं एक विकास का परिणाम है।
दरअसल हम देखने के लिए स्वतंत्र नही है, हम वही तक देखने के लिए स्वतंत्र है जहाँ तक हमारी चेतना हमे स्वतंत्रता देती है और हम उसी प्रकार देखने को स्वतंत्र है जिस प्रकार देखने की स्वतंत्रता हमारी चेतना देती है।
तो क्या हम संच में स्वतंत्र है?
नही और यही बन्धन #माया है।
#विज्ञान_की_सीमा_है, #जगत_असीमित_है।
क्यों
कहाँ
कैसे
कितना
हमारे पास यह पाँच ही प्रश्न है, हमारा मस्तिष्क इतना ही पूछने के लिए विकसित हुवा है लेकिन #सत्ता (ब्रह्मांड) अपनी वस्तुगतता में जाने कितने #वेरिएब्ल्स (चरों) को लिए बैठा है अतः हम ब्रह्मांड को उसकी वस्तुगतता में नही समझ सकते।
हाँ हम अपने सन्दर्भ से कब-क्यों-कहाँ-कैसे ढूंढते चले जा सकते है और परत दर परत, रहस्य दर रहस्य उद्घाटित करते जाएंगे लेकिन हम यह भी दावे के साथ नही कह सकते ही ब्रह्मांड की वस्तुगतता के परिप्रेक्ष्य से यह कब-कहाँ-कैसे-क्यों सही प्रश्न हैं भी या नही!
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वैज्ञानिक ज्ञान की एक सीमा है, जगत की नही।
विज्ञान क्या है? दरअसल यह अमीबा के उस उद्दीपन-प्रतिक्रिया का ही अत्यन्त जटिल रूप है, उस क्रिया-प्रतिक्रिया का मात्रात्मक-गुणात्मक विकास है। उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रिया करने की आज तक की सबसे अच्छी प्रक्रिया, सबसे सफल प्रक्रिया है,और इसीलिए इसने इतने कम समय में हमारी चेतना के जगत को हमारे लिए इतना अनुकूलित कर दिया है।
यह प्रकृति के नए नए रहस्यों को खोल रहा है।
अणु में इसने अथाह शक्ति ढूंढ लिया और बस ढूंढा ही नही उसे मानव का पालतू भी बना दिया। प्रकृति पर आज हम किसी हद तक नकेल कस सकते है। हाँ वो शक्तियां जिनसे अभी मात्र पांच हज़ार साल पहले हमारे पुरखे डर कर विनती करते थे वो आज हमारे नियंत्रण में हैं,और क्रमशः होती जा रही हैं। हमारे पुरखे जहाँ तक सोच नही सकते थे उन जगहों पर हम अपने पदचिन्ह छोड़ रहे हैं।
अनुकूलन की विविध चेतन प्रक्रियाओं में विज्ञान की बराबरी तो कोई कर ही नही सकता, न धर्म, न आदिम जादू (फ्रेजर) न सहज वृति, न अपने परंपरिमक मायनो में दर्शन।
लेकिन, विज्ञान की एक सीमा है जगत की कोई सीमा नही है।
हमे जो ज्ञान प्राप्त हो रहा है, हम जिन रहस्यों को जान रहे हैं क्या वो निरपेक्ष है, वास्तव में वैसे है या हमारी चेतना उन्हें वैसा प्रदर्शित करती है? चेतना, जिसका विकास प्रकृति से अनुकूलन के लिए हुवा है, हमारे न्यूरॉन के फंक्शन पर ही तो अवलम्बित है।
और यह अवलम्बन स्वयं एक विकास का परिणाम है।
दरअसल हम देखने के लिए स्वतंत्र नही है, हम वही तक देखने के लिए स्वतंत्र है जहाँ तक हमारी चेतना हमे स्वतंत्रता देती है और हम उसी प्रकार देखने को स्वतंत्र है जिस प्रकार देखने की स्वतंत्रता हमारी चेतना देती है।
तो क्या हम संच में स्वतंत्र है?
नही और यही बन्धन #माया है।
#विज्ञान_की_सीमा_है, #जगत_असीमित_है।
ट्विंकल ट्विकल लिटिल स्टार
टी एच हक्सले लिखते हैं:
"ज्ञात ससीम और अज्ञात असीम; बौद्धिक रूप से हम अवर्णनीय महासागर के जिसकी कोई सीमा नही है, के मध्य एक छोटे से टापू पर खड़े हैं। प्रत्येक पीढ़ी में हमारा यह कर्तव्य है कि हम उस टापू की थोड़ी और ज़मीन हासिल करें।"
आखिर हमे उस महान और विस्तृत महासागर की गहराइयाँ जो नापनी हैं!
जॉर्ज थॉमस पैट्रिक्स अपनी पुस्तक में एक उदाहरण देते हैं कि एक नन्ही सी बच्ची वातायन से आकाश को निहार रही है फिर पलटकर अपनी माँ से पूछती है कि माँ यह दुनिया कहाँ से आई। यह बच्ची तत्क्षण दार्शनिक बन गई है।
विज्ञान का जन्म दर्शन की गर्भ से हुवा है और दर्शन के बारे में सुकरात कहते हैं कि #दर्शन_का_जन्म_आश्चर्य_में_होता_है।
यहाँ इस बात का कोई मतलब नही है कि दर्शन आश्चर्य में जनमता है अथवा जीवन के दुखों को दूर करने के प्रयास के रूप में।
बच्चे स्वाभाविक रूप से आश्चर्य करते हैं:
ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार,
हाऊ आई वंडर व्हाट यु आर!!
हम हक्सले के उस टापू पर थोड़ी जमीन तो हासिल कर ही चुके है और इसलिए बच्चो को उस हासिल जमीन के बारे में भी बताना चाहिए ताकि उनका आश्चर्य और उनके प्रश्न वैज्ञानिक दिशा में मोड़ी जा सके।
तो मैं अपनी सवा दो साल की बिटिया को यह सिखाता हूँ यदि आपको अच्छा लगे तो आप भी सिखाएँ;
ट्विंकल ट्विकल लिटिल स्टार
हाऊ आई वंडर व्हाट यु आर
#जाएंट_थर्मोन्यूक्लियर_रिएक्शन
हेल्ड बाई #ग्रैविटेशनल_एट्रेक्शन
ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार
यु लुक स्मॉल कॉज़ यु आर सो फार
ऐज़ यु बर्न थ्रू कॉन्स्टेंट #फ्यूज़न
योर ट्विंकल इज़ जस्ट एन #ऑप्टिकल_इलूज़न
दैट हैपेन्स व्हेन योर लाईट गेट्स नियर
डिस्टॉर्टेड बाई आवर एटमोस्फेयर
ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार
स्प्रेडिंग लाईट एंड हीट सो फार
ऐज़ यु यूज़ अप फ्यूएल यु विल ग्रो
एंड गिव ऑफ ए #स्कारलेट_ग्लो
मे बी यु विल गो #सुपरनोवा
#एक्सप्लोडिंग_एलिमेंट्स ऑल ओवर
नाऊ आई नो जस्ट व्हाट यु आर
एंड आई नो आई एम मेड ऑफ स्टार
◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆
"ज्ञात ससीम और अज्ञात असीम; बौद्धिक रूप से हम अवर्णनीय महासागर के जिसकी कोई सीमा नही है, के मध्य एक छोटे से टापू पर खड़े हैं। प्रत्येक पीढ़ी में हमारा यह कर्तव्य है कि हम उस टापू की थोड़ी और ज़मीन हासिल करें।"
आखिर हमे उस महान और विस्तृत महासागर की गहराइयाँ जो नापनी हैं!
जॉर्ज थॉमस पैट्रिक्स अपनी पुस्तक में एक उदाहरण देते हैं कि एक नन्ही सी बच्ची वातायन से आकाश को निहार रही है फिर पलटकर अपनी माँ से पूछती है कि माँ यह दुनिया कहाँ से आई। यह बच्ची तत्क्षण दार्शनिक बन गई है।
विज्ञान का जन्म दर्शन की गर्भ से हुवा है और दर्शन के बारे में सुकरात कहते हैं कि #दर्शन_का_जन्म_आश्चर्य_में_होता_है।
यहाँ इस बात का कोई मतलब नही है कि दर्शन आश्चर्य में जनमता है अथवा जीवन के दुखों को दूर करने के प्रयास के रूप में।
बच्चे स्वाभाविक रूप से आश्चर्य करते हैं:
ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार,
हाऊ आई वंडर व्हाट यु आर!!
हम हक्सले के उस टापू पर थोड़ी जमीन तो हासिल कर ही चुके है और इसलिए बच्चो को उस हासिल जमीन के बारे में भी बताना चाहिए ताकि उनका आश्चर्य और उनके प्रश्न वैज्ञानिक दिशा में मोड़ी जा सके।
तो मैं अपनी सवा दो साल की बिटिया को यह सिखाता हूँ यदि आपको अच्छा लगे तो आप भी सिखाएँ;
ट्विंकल ट्विकल लिटिल स्टार
हाऊ आई वंडर व्हाट यु आर
#जाएंट_थर्मोन्यूक्लियर_रिएक्शन
हेल्ड बाई #ग्रैविटेशनल_एट्रेक्शन
ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार
यु लुक स्मॉल कॉज़ यु आर सो फार
ऐज़ यु बर्न थ्रू कॉन्स्टेंट #फ्यूज़न
योर ट्विंकल इज़ जस्ट एन #ऑप्टिकल_इलूज़न
दैट हैपेन्स व्हेन योर लाईट गेट्स नियर
डिस्टॉर्टेड बाई आवर एटमोस्फेयर
ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार
स्प्रेडिंग लाईट एंड हीट सो फार
ऐज़ यु यूज़ अप फ्यूएल यु विल ग्रो
एंड गिव ऑफ ए #स्कारलेट_ग्लो
मे बी यु विल गो #सुपरनोवा
#एक्सप्लोडिंग_एलिमेंट्स ऑल ओवर
नाऊ आई नो जस्ट व्हाट यु आर
एंड आई नो आई एम मेड ऑफ स्टार
◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆
धर्म की व्यापकता
धर्म एक बहुत ही व्यापक शब्द है जो जीवन के समस्त व्यापारों को अपने अंदर समाहित कर लेता है। धर्म की व्यपकता के कारण जीवन और जगत को देखने की वह विशिष्ट भारतीय दृष्टि है जो जगत को स्व का विस्तार मानती है। जगत स्व का ही विस्तार होने के कारण अभौतिक स्तर पर समस्त सृष्टि एक ही तत्व है। अतः यहाँ मनुष्य और प्रकृति, प्राणी और प्राणी, पथ और पथ का भेद उपस्थित नही होता।
इस दृष्टि के कारण धर्म का अभिप्राय बाध्यकारी नियम नही बल्कि धारिता है। मनुष्य अपने यथार्थ रूप में अनन्तताओं से युक्त एक आध्यात्मिक सत्ता है अतः सद्गुण उसके स्वभावधर्म हैं। इन सद्गुणों को धारण करना ही धर्म है। पुनः मनुष्य निष्क्रिय प्राणी नही है, वह कर्ता है। कर्म सिद्धान्त कभी उल्लंघित नही होते, ऋत का पालन सृष्टि ही नही देवता भी करते है अतः धर्म की अवधारणा में कर्म भी समाहित हैं। जीवन की आवश्यकताओं और व्यक्ति विशेष की प्रवृतिगत विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए धर्म विविध कर्मो को भी प्रस्तावित करता है। यह कर्म उसके सामाजिक तथा व्यक्तिगत आयामो में संतुलन बनाते हुए उसे उसके यथार्थ रूप की ओर अग्रसारित करते हैं क्योंकि इस यथार्थ रूप को प्राप्त किए बिना मनुष्य पीड़ा से मुक्त नही हो सकता।
इस दृष्टि के कारण धर्म का अभिप्राय बाध्यकारी नियम नही बल्कि धारिता है। मनुष्य अपने यथार्थ रूप में अनन्तताओं से युक्त एक आध्यात्मिक सत्ता है अतः सद्गुण उसके स्वभावधर्म हैं। इन सद्गुणों को धारण करना ही धर्म है। पुनः मनुष्य निष्क्रिय प्राणी नही है, वह कर्ता है। कर्म सिद्धान्त कभी उल्लंघित नही होते, ऋत का पालन सृष्टि ही नही देवता भी करते है अतः धर्म की अवधारणा में कर्म भी समाहित हैं। जीवन की आवश्यकताओं और व्यक्ति विशेष की प्रवृतिगत विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए धर्म विविध कर्मो को भी प्रस्तावित करता है। यह कर्म उसके सामाजिक तथा व्यक्तिगत आयामो में संतुलन बनाते हुए उसे उसके यथार्थ रूप की ओर अग्रसारित करते हैं क्योंकि इस यथार्थ रूप को प्राप्त किए बिना मनुष्य पीड़ा से मुक्त नही हो सकता।
धर्म की उतपत्ति
धर्म की उत्पत्ति पीड़ा में होती है। मानव अन्य प्राणियों की तुलना में विशिष्ट है। इसकी विशिष्टता का कारण मानवीय चेतना ही नही बल्कि इसकी पीड़ा भी है। मानव में जीवन मे पीड़ा के प्रति बोध और आनंद का भाव मानवीय पीड़ा को एक सर्वथा नवीन सत्तमीमांसीय कोटि में डाल देता है। मानव के सन्दर्भ में पीड़ा मात्र तत्कालिक उद्दीपन और इसके प्रति प्रतिक्रिया न रहकर इस तथ्य का भी अवबोध है कि "दुःख है" (सर्वम दुःखम)। मनुष्य इसके निवारण हेतु सर्वप्रथम पीड़ा का कारण ढूंढता है जिसे वह अपने प्रदत अस्तित्व में आधारित पाता है: जब तक अस्तित्व की बेड़ियां हैं, पीड़ा है। प्रदत अस्तित्व के निषेध द्वारा इसका शमन किया जा सकता है। प्रदत अस्तित्व का निषेध कैसे किया जाय यह धर्म प्रस्तावित करता है और धर्म-विशेष की प्रकृति के अनुरूप तत्वमीमांसीय, मिथकीय, प्रतीकात्मक निषेध अपनाया जाता है। इन निषेधों में मानव एक सत्ता अथवा सत्व रचता है। यह सत्ता चुकि जीवन और जगत के आनुभविक आयाम से इतर होती है अतः इसको आनुभविक जगत में स्व से सम्बंधित करने के लिए इसका मूर्तकरण किया जाता है। इस मूर्तकरण द्वारा मनुष्य अपने स्व का पुनर्अस्तित्विकरण भी करता है जिसमे न तो कोई पीड़ा होती है न मृत्यु क्योंकि यह पुनर्स्थापित स्व जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होता है। धर्म प्रदत अस्तित्व के निषेध में एक सार निर्माण और इस सार को अपने आनुभविक जीवन जगत में संयुक्त करने की सम्मिलित प्रक्रिया है।
एकेश्वरवाद, मार्ग और मतिग्रस्ति
●एकेश्वरवाद, मार्ग और मतिग्रस्ति:
अब्राहमीय एकेश्वरवाद के सापेक्ष यदि भारतीय एकेश्वरवाद को रखें तो यह इसे अन्य कई मार्गों की भांति केवल एक मार्ग के रूप में स्वीकार करता है, क्योंकि "ईश्वर एक है", इस कथन का अभिप्राय भारतीय तथा अब्राहमीय परम्परा में गुणात्मक रूप से अलग है। जहाँ अब्राहमीय परम्परा में "एक" अलगाव और यूनिकनेस का भाव व्यक्त करता है वहीं, भारतीय परम्परा "एक" शब्द के अंदर सबको समाहित कर लेती है।
भारतीय परंपरा में एकेश्वरवाद की वैचारिक स्तर पर जगत के विविध घटनाक्रमो में एक सामान्य सिद्धान्त ढूंढ़ने के क्रम में एक आंतरिक निष्पत्ति है। मैक्सम्यूलर इसे बहुदेववाद से एकाधिदेववाद तथा एकाधिदेववाद से एकेश्वरवाद की स्थापना, इस क्रम में स्वीकार करते हैं। वैदिक युगीन मानव ने घटनाक्रम के अलग-अलग कारणों की जगह उनमे एक आदि कारण का अन्वेषण प्रारम्भ किया। यह प्रवृति शीघ्र ही "एकाधिदेववाद" या "हिनोथीइज्म" के रूप में अभिव्यक्त हुई। मैक्सम्यूलर ने इसे एकत्व की दिशा में जाने की सहज प्रवृति की अचेतन अभिव्यक्ति मानते हुए इसे बहुदेववाद और एकेश्वरवाद के मध्य विकास की एक निश्चित व्वयस्था माना।
प्रो● एम●हिरियन्ना लिखते हैं, "यह माना जा सकता है कि यह 'अवसरवादी सर्वेश्वरवाद', जैसा कि मैक्सम्यूलर के "हिनोथीइज्म" को नामान्तर से कहा गया है, सब मिलाकर पिछले समय के नाना देवताओं के स्थान पर अकेले ईश्वर में विश्वास पैदा करने में सहायक हुआ" 【भारतीय दर्शन की रूपरेखा, पृष्ठ 37】
अब्राहमीय परम्परा में एकेश्वरवाद की स्थापना का क्रम यह नही रहा है। यहाँ एकेश्वरवाद का सन्दर्भ अपेक्षाकृत सामाजिक अधिक रहा है तथा कई परिस्थितियों में इसे वाह्य रूप से अथवा समझौते के रूप में आरोपित किया गया है।
याहवा यहूदी धर्म के देवता हैं। प्रारम्भ में यह एक जनजातीय देवता थे जो जनजातियों के आपसी संघर्ष में इनके माध्ययम से उस जनजाति की, जिसके यह देवता थे, अपने मे उत्कृष्टता के विश्वास को, याहवा के एकमात्र स्वामित्व या लॉर्डशीप के द्वारा व्यक्त किया गया है।
जनजातियों द्वारा शासन तंत्र और राज्य के विकास के साथ यह उनके एकमात्र राष्ट्रीय देवता बन गए और तत्कालीन मौजूद अन्य जनजातियों के देवताओं की विशेषताओं और गुणों का इनमे विलय कर दिया गया।
तौहीद इस्लामी एकेश्वरवाद की अभिव्यक्ति है। शिर्क, तौहीद की प्रतिपक्षता है। इस्लामी शरीअत की शब्दावली में शिर्क का अर्थ अल्लाह के साथ उस के स्वामित्व, इबादत या नाम और गुणों में कोई साझीदार या सदृश बनाना है। शिर्क इस्लाम मे घोरतम पाप है।
क़ुरान में आया है, "अल्लाह त'आला अपने साथ शिर्क किए जाने को माफ़ नही करेगा, और इसके अतिरिक्त जिसे चाहेगा क्षमा कर देगा और जो अल्लाह के साथ शिर्क करे उसने अल्लाह पर भारी आरोप गढ़ा 【सुरतुन निसा :48】
सम्भवतः अरब समाज की तत्कालीन परिस्थितियों में एकेश्वरवाद की यह व्याख्या और आरोपण एक ऐतिहासिक बाध्यता रही हो लेकिन, तत्कालीन ऐतिहिसिक परिस्थितियों का हल आज के समाज पर आरोपण समय और इतिहास को ही नकार देना है। यह इनकार प्रायः अब्राहमीय धर्मो में एकेश्वरवाद के प्रति मतिग्रस्ति उतपन्न करता है जिसका परिणाम अब्राहमीय धर्मो के आपसी टकराहट के साथ-साथ उनके साथ भी टकराहट में परिलक्षित होता है जो अहल-ए-किताब नही हैं।
अब्राहमीय एकेश्वरवाद के सापेक्ष यदि भारतीय एकेश्वरवाद को रखें तो यह इसे अन्य कई मार्गों की भांति केवल एक मार्ग के रूप में स्वीकार करता है, क्योंकि "ईश्वर एक है", इस कथन का अभिप्राय भारतीय तथा अब्राहमीय परम्परा में गुणात्मक रूप से अलग है। जहाँ अब्राहमीय परम्परा में "एक" अलगाव और यूनिकनेस का भाव व्यक्त करता है वहीं, भारतीय परम्परा "एक" शब्द के अंदर सबको समाहित कर लेती है।
भारतीय परंपरा में एकेश्वरवाद की वैचारिक स्तर पर जगत के विविध घटनाक्रमो में एक सामान्य सिद्धान्त ढूंढ़ने के क्रम में एक आंतरिक निष्पत्ति है। मैक्सम्यूलर इसे बहुदेववाद से एकाधिदेववाद तथा एकाधिदेववाद से एकेश्वरवाद की स्थापना, इस क्रम में स्वीकार करते हैं। वैदिक युगीन मानव ने घटनाक्रम के अलग-अलग कारणों की जगह उनमे एक आदि कारण का अन्वेषण प्रारम्भ किया। यह प्रवृति शीघ्र ही "एकाधिदेववाद" या "हिनोथीइज्म" के रूप में अभिव्यक्त हुई। मैक्सम्यूलर ने इसे एकत्व की दिशा में जाने की सहज प्रवृति की अचेतन अभिव्यक्ति मानते हुए इसे बहुदेववाद और एकेश्वरवाद के मध्य विकास की एक निश्चित व्वयस्था माना।
प्रो● एम●हिरियन्ना लिखते हैं, "यह माना जा सकता है कि यह 'अवसरवादी सर्वेश्वरवाद', जैसा कि मैक्सम्यूलर के "हिनोथीइज्म" को नामान्तर से कहा गया है, सब मिलाकर पिछले समय के नाना देवताओं के स्थान पर अकेले ईश्वर में विश्वास पैदा करने में सहायक हुआ" 【भारतीय दर्शन की रूपरेखा, पृष्ठ 37】
अब्राहमीय परम्परा में एकेश्वरवाद की स्थापना का क्रम यह नही रहा है। यहाँ एकेश्वरवाद का सन्दर्भ अपेक्षाकृत सामाजिक अधिक रहा है तथा कई परिस्थितियों में इसे वाह्य रूप से अथवा समझौते के रूप में आरोपित किया गया है।
याहवा यहूदी धर्म के देवता हैं। प्रारम्भ में यह एक जनजातीय देवता थे जो जनजातियों के आपसी संघर्ष में इनके माध्ययम से उस जनजाति की, जिसके यह देवता थे, अपने मे उत्कृष्टता के विश्वास को, याहवा के एकमात्र स्वामित्व या लॉर्डशीप के द्वारा व्यक्त किया गया है।
जनजातियों द्वारा शासन तंत्र और राज्य के विकास के साथ यह उनके एकमात्र राष्ट्रीय देवता बन गए और तत्कालीन मौजूद अन्य जनजातियों के देवताओं की विशेषताओं और गुणों का इनमे विलय कर दिया गया।
तौहीद इस्लामी एकेश्वरवाद की अभिव्यक्ति है। शिर्क, तौहीद की प्रतिपक्षता है। इस्लामी शरीअत की शब्दावली में शिर्क का अर्थ अल्लाह के साथ उस के स्वामित्व, इबादत या नाम और गुणों में कोई साझीदार या सदृश बनाना है। शिर्क इस्लाम मे घोरतम पाप है।
क़ुरान में आया है, "अल्लाह त'आला अपने साथ शिर्क किए जाने को माफ़ नही करेगा, और इसके अतिरिक्त जिसे चाहेगा क्षमा कर देगा और जो अल्लाह के साथ शिर्क करे उसने अल्लाह पर भारी आरोप गढ़ा 【सुरतुन निसा :48】
सम्भवतः अरब समाज की तत्कालीन परिस्थितियों में एकेश्वरवाद की यह व्याख्या और आरोपण एक ऐतिहासिक बाध्यता रही हो लेकिन, तत्कालीन ऐतिहिसिक परिस्थितियों का हल आज के समाज पर आरोपण समय और इतिहास को ही नकार देना है। यह इनकार प्रायः अब्राहमीय धर्मो में एकेश्वरवाद के प्रति मतिग्रस्ति उतपन्न करता है जिसका परिणाम अब्राहमीय धर्मो के आपसी टकराहट के साथ-साथ उनके साथ भी टकराहट में परिलक्षित होता है जो अहल-ए-किताब नही हैं।
हिन्दू धर्म के चार स्तम्भ
सर्वप्रथम मैं हिन्दू शब्द को वैदिक परम्परा तक और वैदिक् विचारधारा तक ही सीमित रखने का पक्षधर नही हूँ। ऐसी कोई भी विचारधारा सनातन परपरा की विशेषता #समायोजन को इससे दूर कर देती है अंततः इसे भी #वहाबिज़्म ही बना देती है।
धर्म, विचार दर्शन स्टेटिक नही होता: उसमे निरन्तरता होती है, सातत्यता होती है।
हिन्दू धर्म मात्र अद्वैत नही है और न ही मात्र वैदिक विचारधारा:
हिन्दू धर्म #वैदिक, #पौराणिक, #तांत्रिक (वाममार्ग) और #शाबर विचारों का अद्भुत संगम है।
यहाँ मेरा आपसे एक प्रश्न है कि हम निगम को ही संस्कृति क्यों माने और् आगमो को विकृति क्यों माने?
पुनः पुराणों के विषय मे:
कल्पना कहाँ उपजती है?
चेतना में
चेत्तना का विषय वस्तु क्या है?
वाह्य-आंतरिक #यथार्थ
अब चेत्तना इस वाह्यान्तर के यथार्थ को प्रचलित किस रूप में प्रस्तुत करती है वह प्रस्तुतिकरण मात्र ततसमय के प्रचलित मानक के अनुसार मिथक या यथार्थवाद बन जाता है।
कहानियां हमेशा काल्पनिक होती है लेकिन कल्पना में हमेशा एक हक़ीक़त होती है।
हम देख न सके तो हमारी गलती।।
धर्म, विचार दर्शन स्टेटिक नही होता: उसमे निरन्तरता होती है, सातत्यता होती है।
हिन्दू धर्म मात्र अद्वैत नही है और न ही मात्र वैदिक विचारधारा:
हिन्दू धर्म #वैदिक, #पौराणिक, #तांत्रिक (वाममार्ग) और #शाबर विचारों का अद्भुत संगम है।
यहाँ मेरा आपसे एक प्रश्न है कि हम निगम को ही संस्कृति क्यों माने और् आगमो को विकृति क्यों माने?
पुनः पुराणों के विषय मे:
कल्पना कहाँ उपजती है?
चेतना में
चेत्तना का विषय वस्तु क्या है?
वाह्य-आंतरिक #यथार्थ
अब चेत्तना इस वाह्यान्तर के यथार्थ को प्रचलित किस रूप में प्रस्तुत करती है वह प्रस्तुतिकरण मात्र ततसमय के प्रचलित मानक के अनुसार मिथक या यथार्थवाद बन जाता है।
कहानियां हमेशा काल्पनिक होती है लेकिन कल्पना में हमेशा एक हक़ीक़त होती है।
हम देख न सके तो हमारी गलती।।
रिलेटिविटी
आइंस्टीन की स्पेशल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी ने स्पेश और समय की पुरानी समझ बदल दी। अब स्पेश और समय अलग अलग न होकर स्पेश-समय के रूप में समझे जाने लगे अतः सही शब्द दिक-काल है न कि दिक और काल।
भौतिकी के सिद्धान्त हमे बताते हैं कि बिग बैंग के समय सिंगुलैरिटी थी। सिंगुलैरिटी में दिक-काल का कोई अर्थ नही रह जाता। हमारी भौतिकी उस सिंगुलैरिटी के साथ डील नही कर सकती।
ब्रह्मांड में दिक-काल है, या यूं कहें कि ब्रह्मांड चतुर्विमिय है: तीन विमा दिक के और चौथा विमा काल हालांकि नई नई कुछ थ्योरियों में ब्रह्मांड के 10 विमा तक होने की बात की जाती है।
आपके प्रश्न का सीधा उत्तर तो यही है कि ब्रह्मांड बनने के बाद दिक-काल बने लेकिन फिर आप पूछेंगे की वह बिग बैंग कहा हुवा या ब्रह्मांड कहा फैल रहा है या जब समय नही था तो क्या था?
इस प्रश्न को समझने के लिए हमे अपने कॉन्सेप्ट में सुधार करना पड़ता है और उच्च गणित की आवश्यकता पड़ती है।
एम उदाहरण देता हूं : मेरी पुत्री देखती है कि पड़ोस वाली आंटी आती हैं और अपने घर जाती हैं।एक दिन वह सुनती है कि लाइट चली गई। वह पूछती है: पापा लाइट का घर कहा है?
अब उसे कैसे समझाऊं की लाईट उन अर्थों में नही जाती जिन अर्थों में आंटी आती या जाती हैं।
भौतिकी के सिद्धान्त हमे बताते हैं कि बिग बैंग के समय सिंगुलैरिटी थी। सिंगुलैरिटी में दिक-काल का कोई अर्थ नही रह जाता। हमारी भौतिकी उस सिंगुलैरिटी के साथ डील नही कर सकती।
ब्रह्मांड में दिक-काल है, या यूं कहें कि ब्रह्मांड चतुर्विमिय है: तीन विमा दिक के और चौथा विमा काल हालांकि नई नई कुछ थ्योरियों में ब्रह्मांड के 10 विमा तक होने की बात की जाती है।
आपके प्रश्न का सीधा उत्तर तो यही है कि ब्रह्मांड बनने के बाद दिक-काल बने लेकिन फिर आप पूछेंगे की वह बिग बैंग कहा हुवा या ब्रह्मांड कहा फैल रहा है या जब समय नही था तो क्या था?
इस प्रश्न को समझने के लिए हमे अपने कॉन्सेप्ट में सुधार करना पड़ता है और उच्च गणित की आवश्यकता पड़ती है।
एम उदाहरण देता हूं : मेरी पुत्री देखती है कि पड़ोस वाली आंटी आती हैं और अपने घर जाती हैं।एक दिन वह सुनती है कि लाइट चली गई। वह पूछती है: पापा लाइट का घर कहा है?
अब उसे कैसे समझाऊं की लाईट उन अर्थों में नही जाती जिन अर्थों में आंटी आती या जाती हैं।
वेदांत की फिनोमेनोलॉजी
वेदांत पर एक प्रवचन सुना। आधे घण्टे के इस प्रवचन में कुछेक शब्दो की कई बार पुनरावृति हुई: आत्मा, अहंकार, मन, चित्त, प्राण, देह, तादात्म्य आदि लेकिन उक्त प्रवचन में जिस शब्द पर अफिकाधिक ज़ोर था वह शब्द है: मृत्यु।
जहां तक मुझे लगा सारा प्रवचन इस एक शब्द के ही इर्द गिर्द घूमता रहा। हालांकि प्रवचन का उद्देश्य मृत्यु के भय को दूर करना है।
मृत्यु होनी है और मनुष्य की विडम्बना यह है कि वह इस बात को जनता है कि मृत्यु होनी है।
एक अंतहीन अंधकार-आज मैं हूँ कल नही रहूंगा-काल निगल जाएगा इसको जिसे मैं दर्पण में देखता हूँ, किसका पिता और किसका पुत्र?
सारी चेत्तना पता नही कहाँ विलीन हो जाएगी।
कुछ नही बचेगा जब बिखर जाएंगे पंचतत्व अपने पीछे क्षणिक भाव छोड़कर!!
ओह! इस भय से बाहर निकलना है। इस भय पर कैसे जीत हासिल करे?
चलो द्वैत में सोचते है:
जाति है तो मृत्यु भी है। अस्तित्व है तो अनस्तित्वव भी है। चेतना है तो जड़ता भी है।
असल क्या है?
जाति या मरण?
लेकिन यह प्रश्न ही क्यों?
क्योंकि मृत्यु का भय है। इससे इंकार नही किया जा सकता!
लेकिन यदि भय की स्थिति है तो #अभय भी तो है। भय का निषेध तो है।
तब निश्चित रूप से मृत्यु का निषेध भी होगा।
असत है तो सत भी होगा। न होना है तो होना भी होगा।
वहाँ कल शव जड़वत पड़ा हुवा है तो उसका निषेध चैतन्यता भी अवश्य होगी।।
लेकिन मेरे शव हो जाने के बाद फिर सत, उस चित उस भय का निषेध #आनन्द किसको प्राप्त होगा?
चलिए किसको प्राप्त होगा यह प्रश्न हटा देते है यही कर देते है कि एक ऐसा तत्व ही है जो स्वयं सत चित आनंद है।।
तज्जलाल!!
अहम ब्रम्हास्मि!!!
अयमात्मा ब्रह्म!!!!
दरअसल आत्मा मृत्यु और उससे उत्तपन्न पीड़ा का मानसिक निषेध है और कुछ नही!
असहमत है?
तो ठीक है फिर मुझे "शरीर में आत्मा रहती है'
"अहंकार और देह का तादात्म्य होता है"
"आत्मा का कभी नाश नही होता" आदि वाक्यों का अर्थ समझा दीजिए लेकिन हाँ मुझे आपसे रूपक नही सुनने क्योंकि एक दिन जब मेरी 3 साल की बेटी मेरी यह बात सुनकर की "लाइट चली गई" यह पूछेगी की पापा लाइट कहाँ रहती है तो मैं मैं उसे रूपकों से ही समझाऊंगा लेकिन वह रूपक एलेक्ट्रोमैग्नेटिज़्म, इलेक्ट्रॉन फ्लो, इंडक्शन और सर्किट आदि प्रत्ययों से दूर दूर तक जुड़े नही होंगे।
बावजूद इसके मुझे वेदांत में विश्वाश करना है वरना मृत्यु का भय वही मुमुक्क्षत्व मुझे पागल कर देगा।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः॥
फिर से प्रवचन सुनने जा रहा हूँ।।।
■■■■■
जहां तक मुझे लगा सारा प्रवचन इस एक शब्द के ही इर्द गिर्द घूमता रहा। हालांकि प्रवचन का उद्देश्य मृत्यु के भय को दूर करना है।
मृत्यु होनी है और मनुष्य की विडम्बना यह है कि वह इस बात को जनता है कि मृत्यु होनी है।
एक अंतहीन अंधकार-आज मैं हूँ कल नही रहूंगा-काल निगल जाएगा इसको जिसे मैं दर्पण में देखता हूँ, किसका पिता और किसका पुत्र?
सारी चेत्तना पता नही कहाँ विलीन हो जाएगी।
कुछ नही बचेगा जब बिखर जाएंगे पंचतत्व अपने पीछे क्षणिक भाव छोड़कर!!
ओह! इस भय से बाहर निकलना है। इस भय पर कैसे जीत हासिल करे?
चलो द्वैत में सोचते है:
जाति है तो मृत्यु भी है। अस्तित्व है तो अनस्तित्वव भी है। चेतना है तो जड़ता भी है।
असल क्या है?
जाति या मरण?
लेकिन यह प्रश्न ही क्यों?
क्योंकि मृत्यु का भय है। इससे इंकार नही किया जा सकता!
लेकिन यदि भय की स्थिति है तो #अभय भी तो है। भय का निषेध तो है।
तब निश्चित रूप से मृत्यु का निषेध भी होगा।
असत है तो सत भी होगा। न होना है तो होना भी होगा।
वहाँ कल शव जड़वत पड़ा हुवा है तो उसका निषेध चैतन्यता भी अवश्य होगी।।
लेकिन मेरे शव हो जाने के बाद फिर सत, उस चित उस भय का निषेध #आनन्द किसको प्राप्त होगा?
चलिए किसको प्राप्त होगा यह प्रश्न हटा देते है यही कर देते है कि एक ऐसा तत्व ही है जो स्वयं सत चित आनंद है।।
तज्जलाल!!
अहम ब्रम्हास्मि!!!
अयमात्मा ब्रह्म!!!!
दरअसल आत्मा मृत्यु और उससे उत्तपन्न पीड़ा का मानसिक निषेध है और कुछ नही!
असहमत है?
तो ठीक है फिर मुझे "शरीर में आत्मा रहती है'
"अहंकार और देह का तादात्म्य होता है"
"आत्मा का कभी नाश नही होता" आदि वाक्यों का अर्थ समझा दीजिए लेकिन हाँ मुझे आपसे रूपक नही सुनने क्योंकि एक दिन जब मेरी 3 साल की बेटी मेरी यह बात सुनकर की "लाइट चली गई" यह पूछेगी की पापा लाइट कहाँ रहती है तो मैं मैं उसे रूपकों से ही समझाऊंगा लेकिन वह रूपक एलेक्ट्रोमैग्नेटिज़्म, इलेक्ट्रॉन फ्लो, इंडक्शन और सर्किट आदि प्रत्ययों से दूर दूर तक जुड़े नही होंगे।
बावजूद इसके मुझे वेदांत में विश्वाश करना है वरना मृत्यु का भय वही मुमुक्क्षत्व मुझे पागल कर देगा।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः॥
फिर से प्रवचन सुनने जा रहा हूँ।।।
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यूनिफाइड यूनिफाइड सिद्धान्त
कोई भी यूनिफाइड सिद्धान्त, चाहे वह ब्रह्म हो, परमसत्ता हो या बहुप्रतीक्षित भौतिकी की थ्योरी ऑफ एवरीथिंग, यदि वह मानव की पीड़ा का इसी व्यवहारिक दुनिया मे निवारण नही करती तो वह एकीकृत सिद्धान्त कैसे है?
पीड़ा, मनुष्य को व्यवहार से बाँधे भी रखती है और मनुष्य से परमार्थ के रूप में पलायन की अधिभौतिकी भी रचवाती है।
सत चित आनंद का नही पता, सत और चित का भी नही मालूम लेकिन वेदना है, यह निर्विवाद है।
परमार्थ का बोध में पीड़ा का निवारण हो न हो पीड़ा से पलायन के प्रयास में परमार्थ अवश्य रचा जाता है।
एक बित्ता पेट
एक बार सड़क पर एक मदारी जादू दिखा रहा था। मैं उधर से गुजर रहा था तो मैंने सोचा कि देखूं क्या कर रहा है। उसने जो जादू दिखाया वह मैंने पकड़ लिया और चूंकि उसके दर्शक गण में मैं ही थोड़ा अलग था अतः मदारी की निगाह मुझ पर बराबर बनी थी।
उसके जादू को पकड़ कर मैं जादू का भेद बोलने वाला ही था कि मदारी मेरी मंशा को भांपते हुए बोला:
सत्य यही है साहब, एक बित्ता पेट, फिर उसने अपने पेट को बित्ता से नापते हुए कहा: बाकी सब जादू है, सब माया!
मैं माया को भेदते हुए सत्य को जानने के लिए शरमाया था।
और मदारी गा रहा था:
एक पीस मछरी कड़ाही भर झोर
दौड़ दौड़ मांगे समधी लाजो न होय।
उसके जादू को पकड़ कर मैं जादू का भेद बोलने वाला ही था कि मदारी मेरी मंशा को भांपते हुए बोला:
सत्य यही है साहब, एक बित्ता पेट, फिर उसने अपने पेट को बित्ता से नापते हुए कहा: बाकी सब जादू है, सब माया!
मैं माया को भेदते हुए सत्य को जानने के लिए शरमाया था।
और मदारी गा रहा था:
एक पीस मछरी कड़ाही भर झोर
दौड़ दौड़ मांगे समधी लाजो न होय।
झारखण्ड में कुछ जगहों के नाम और उनके निहितार्थ:
झारखण्ड में कुछ जगहों के नाम और उनके निहितार्थ:
■बेड़ा: आपको झारखण्ड के कई ग्रामो के नाम में बेड़ा शब्द मिल जाएगा यथा, खुडिबेड़ा, अस्ताबेड़ा, प्रसाबेड़ा
बेड़ा एक ऑस्ट्रिक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ #घाटी होता है। सन्थाल लोककथाओं में #सासांगबेड़ा एक बहुत ही प्रमुख स्थान है। सासांग का अर्थ #पिला/हल्दी होता है। अतः इसका अर्थ हुआ #पीलीघाटी।
कुछ विद्वानों के अनुसार यह स्थान #ह्वांगहो की घाटी है।
■आतु: यह भी एक आस्ट्रिक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ गांव है। पतरातू, बरियातू आदि ऐसे कई स्थान हैं जिनके अंत मे #आतु आता है।
■दा: इसका अर्थ ऑस्ट्रिक भाषा मे पानी होता है। झारखण्ड और समीपवर्ती बंगाल में कई ऐसे स्थान मिल जाएंगे जिनके अंत मे #दा है यथा, झालदा, बागदा।
दामोदर नदी के नामकरण के सम्बंध में एक मत यह भी है कि दामोदर वस्तुतः दामू दा का विकृत रूप है।
■बुरु: बुरु का अर्थ #पहाड़ होता है। झारखण्ड में कई स्थानों के नाम के साथ बुरु लगा हुआ है यथा किरीबुरू जहाँ लौह अयस्क की खान है, लुगूबुरु, संथालों का एक प्रमुख तीर्थस्थल।
■बेड़ा: आपको झारखण्ड के कई ग्रामो के नाम में बेड़ा शब्द मिल जाएगा यथा, खुडिबेड़ा, अस्ताबेड़ा, प्रसाबेड़ा
बेड़ा एक ऑस्ट्रिक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ #घाटी होता है। सन्थाल लोककथाओं में #सासांगबेड़ा एक बहुत ही प्रमुख स्थान है। सासांग का अर्थ #पिला/हल्दी होता है। अतः इसका अर्थ हुआ #पीलीघाटी।
कुछ विद्वानों के अनुसार यह स्थान #ह्वांगहो की घाटी है।
■आतु: यह भी एक आस्ट्रिक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ गांव है। पतरातू, बरियातू आदि ऐसे कई स्थान हैं जिनके अंत मे #आतु आता है।
■दा: इसका अर्थ ऑस्ट्रिक भाषा मे पानी होता है। झारखण्ड और समीपवर्ती बंगाल में कई ऐसे स्थान मिल जाएंगे जिनके अंत मे #दा है यथा, झालदा, बागदा।
दामोदर नदी के नामकरण के सम्बंध में एक मत यह भी है कि दामोदर वस्तुतः दामू दा का विकृत रूप है।
■बुरु: बुरु का अर्थ #पहाड़ होता है। झारखण्ड में कई स्थानों के नाम के साथ बुरु लगा हुआ है यथा किरीबुरू जहाँ लौह अयस्क की खान है, लुगूबुरु, संथालों का एक प्रमुख तीर्थस्थल।
आनुभविक विज्ञान और फॉर्मल विज्ञान
आनुभविक विज्ञान के डोमिनेन्स के कारण सामान्यतया हम विज्ञान का अर्थ आनुभविक विज्ञान ही समझते है।
भौतिकी, रसायन, जीव विज्ञान आनुभविक विज्ञान हैं जबकि गणित और तर्कशास्त्र फॉर्मल विज्ञान की श्रेणी में आते हैं।
गणित में 2+2 हमेशा और हर जगह 4 ही होता है अतः इन फॉर्मल विज्ञानों में एक एब्सोल्यूट ट्रुथ मैजूद होता है इसके विपरीत आनुभविक विज्ञान में तीन कारणों से किसी एब्सोल्यूट ट्रुथ की कल्पना करना बेमानी होती है और ये तीन कारण है:
■हमारा संज्ञानत्मक/संवेदनात्मक सीमितता
■ आगमन की समस्या तथा
■थ्योरी लैडननेस
जबकि गणित के नियम और ट्रुथ निरपेक्ष होते हैं।
इसका कारण यह है कि गणित या कोई फॉर्मल विज्ञान कोई नया ज्ञान नही देता बल्कि इसके निष्कर्ष आधारवाक्य में निश्चित रूप से होते हैं और निष्कर्ष को बस निगमित किया जाता है वहीं आनुभविक विज्ञान में नया ज्ञान, नई प्रतिज्ञप्ति प्राप्त की जाती है।
भौतिकी, रसायन, जीव विज्ञान आनुभविक विज्ञान हैं जबकि गणित और तर्कशास्त्र फॉर्मल विज्ञान की श्रेणी में आते हैं।
गणित में 2+2 हमेशा और हर जगह 4 ही होता है अतः इन फॉर्मल विज्ञानों में एक एब्सोल्यूट ट्रुथ मैजूद होता है इसके विपरीत आनुभविक विज्ञान में तीन कारणों से किसी एब्सोल्यूट ट्रुथ की कल्पना करना बेमानी होती है और ये तीन कारण है:
■हमारा संज्ञानत्मक/संवेदनात्मक सीमितता
■ आगमन की समस्या तथा
■थ्योरी लैडननेस
जबकि गणित के नियम और ट्रुथ निरपेक्ष होते हैं।
इसका कारण यह है कि गणित या कोई फॉर्मल विज्ञान कोई नया ज्ञान नही देता बल्कि इसके निष्कर्ष आधारवाक्य में निश्चित रूप से होते हैं और निष्कर्ष को बस निगमित किया जाता है वहीं आनुभविक विज्ञान में नया ज्ञान, नई प्रतिज्ञप्ति प्राप्त की जाती है।
विज्ञान राम अंधविश्वास और सत
मेरे वामपंथी प्रोफेसर और मित्र श्री राम में मेरी आस्था को अंधविश्वास कहते हैं और उनके अनुसार मार्क्सवाद एक विज्ञान है।
सर्वप्रथम मार्क्सवाद एक विज्ञान है यही बात पुष्ट नही है क्योंकि विज्ञान के दार्शनिक #पॉपर के अनुसार विज्ञान को छद्मविज्ञान से जो चीज अलग करती है वह है #फ़ालसिफलिकेबलिटी।
और आज इस सर्वमान्य निकष के आधार पर #पॉपर मार्क्सवाद को विज्ञान नही मानते।
विज्ञान हवा में नही उपजता, एक पद्धति के रूप में यह कुछ पूर्वमान्यताए और स्थापनाओं को बस मान लेता है जैसा मैं बिना प्रश्न के राम को मान लेता हूँ।
विज्ञान की निम्नवत कुछ पूर्वमान्यताए हैं:
■जगत ज्ञेय है
■जगत जैसा है वैसा ही है अर्थात यह हमारी चेतना में जैसा प्रतिबिंबित होता है, हमारी चेतना के बाहर अपने वस्तुगत रूप में भी वैसा ही है।
■ वैज्ञानिक पद्धति #आगमनात्मक होती है। अर्थात विशेष घटनाओं से एक सामान्य नियम पर पहुंचा जाता है।
एक उदाहरण:
मच्छर से मलेरिया होता है, यह एक वैज्ञानिक निष्कर्ष है लेकिन इस निष्कर्ष तक पहुचने में हम दो बातों पर #आँख_बंद_करके विश्वास कर लेते है और वह है: #कार्य_कारण_का_नियम और #प्रकृति_में_एकरूपता_का_नियम
इन दो सामान्य नियमो को सिद्ध नही किया जा सकता बस इनको मानना पड़ता है और इन पर विश्वास करना पड़ता है तथा इनके आधार पर वैज्ञानिक विधि में निष्कर्ष निगमित करने के लिए एक छलांग लगाई जाती है जिसे #आगमनान्तक_छलांग या #इंडक्शन_लिप कहते हैं।
यहाँ हमे अपनी तार्किकता, वैज्ञानिकता की तिलांजलि देनी ही पड़ती है और आस्था, विश्वास या अंधविस्वास का सहारा लेना ही पड़ता है।
मेरे वामपंथी मित्र कहेंगे कि यह अलाउड है क्योंकि इन विश्वासों के आधार पर लिया छलांग के कारण आया निष्कर्ष काम करता है।
सही बात, यहाँ अर्थकरियकरित्व तो है लेकिन भैया राम का नाम भी तो मेरे लिए काम करता है।
राम के नाम मे भी तो अर्थकरियकरित्व है और
#अर्थकरियकरित्व_सत_लक्षणम अतः #राम_सत्य_हैं।
■अर्थक्रियाकरित्व :अर्थ का अभिप्राय, प्रयोजन को पूर्ण करने का सामर्थ्य।
क्या दर्शन आज प्रासंगिक है?
हाँ तो बात हो रही थी दर्शन की तो सर्वप्रथम इसका अंग्रेजी पर्याय #फिलोसोफी अर्थात love for Wisdom, विवेकानुराग।
दर्शन विवेकानुराग से अधिक है और उसकी चर्चा फिर कभी। यहाँ फिर वही प्रश्न की क्या फिलोसोफी प्रासंगिक है?
इस प्रासंगिकता के प्रश्न पर विचार करने के पूर्व हमे डाटा, इन्फॉर्मेशन, नॉलेज तथा विज़डम के अंतर को समझना होगा क्योंकि "वैग्यानिक ज्ञान" तो होता है "वैग्यानिक विवेक" या "साइंटिफिक विज़डम' शब्द मेरा दावा है कि आपने नही सुना होगा। विज़डम हमेशा फ़ॉलोसॉफिकल होती है: फ़ॉलोसॉफिकल विज़डम।
इस विषय पर अल्लामा इक़बाल की एक बहुत ही सुंदर नज़्म है:
ख़िरद के पास खबर के सिवा कुछ और नही
तेरा इलाज नज़र के सिवा कुछ और नही।
ख़िरद का अर्थ मस्तिष्क है, मस्तिष्क विज्ञान करता है लेकिन यह पदार्थ और ऊर्जा विषयक खबर और इल्म केवल चिराग-ए-राह है।
वह लिखते हैं:
गुजर जा अक्ल से आगे के यह नूर
चिराग-ए-राह है मंज़िल नही है।
मंज़िल का पता फिर कौन बताए? मंज़िल का पता विवेक ही बता सकता है और विवेकानुराग ही तो फिलोसोफी है।
रिचर्ड फाइनमेन ने यह कहा था कि विज्ञान का दर्शन #वैज्ञानिक के लिए उतना ही आवश्यक है जितना पक्षियों के लिए पक्षीशास्त्र।
वियतनाम वार के पश्चात MIT ने, जिसकी तर्ज पर भारत के IITs मॉडल्ड हैं अपने पाठ्यक्रमो में मानविकी को शामिल किया क्योंकि उनका मानना था कि #मानवीय_स्पर्श_के_साथ_वैज्ञानिक एक #निरे_वैज्ञानिक से बेहतर मनुष्य है और वैज्ञानिक के पास वैज्ञानिक ज्ञान के अलावा विवेकी चेतना भी होनी चाहिए। (https://youtu.be/8Oh_4McLjuU)
आई आई टीज़ ने भी एम आई टी पर मॉडल्ड होने के कारण आई आई टीज़ में मानविकी का पाठ्यक्रम शामिल किया हालांकि यह किस हद तक सफल रहा उस पर एक अलग चर्चा हो सकती है और इस विषय पर #प्रोफेसर_कौर का विख्यात #पेपर है।
आई आई टी में दर्शन की भी पढ़ाई होती है इस तथ्य को प्रमाणित करने हेतु आई● आई● टी मद्रास द्वारा यह लिंक डाल रहा हूँ
https://www.youtube.com/playlist?list=PLM6LeGBYW4gc0B0ddemhN8XkoVm_IJeKp
क्या दर्शन बकवास और वाग्गजाल है?
मुझे नही लगता कि मुझे इस प्रश्न के उत्तर देने की आवश्यकता है क्योंकि यह आपकी दर्शन विषयक निरक्षरता को दिखाता है। बकवास और वाग्जाल! प्रश्न तो मैंने भी किया था कि बिग बैंग ही क्यो नही बकवास है, आखिर यह क्यो होना चाहिए था और एक तथ्य-मूल्य के संजाल बनने की, विकसित होने की आवश्यकता ही क्या थी?
मुझे मल्यायलम समझ मे नही आती अतः यह भाषा बकवास है ऐसा कह देना मेरी मानसिक और बौद्धिक दिवालियापन है:
बहरहाल बकवास का उल्टा #सार्थकता ले सकते हैं क्योंकि सार्थकता बकवास का निषेध है। प्रश्न है कि सार्थकता क्या है? हम किसे सार्थक कहें?
सार्थकता की यदि सन्धि करें तो यह "स:" उपसर्ग और "अर्थ" शब्द में "ता" प्रत्यय संयुक्त करने पर बना है। "ता" प्रत्यय स्थिति का सूचक है तथा "स:" उपसर्ग का अर्थ "के साथ" होता है। इस प्रकार सार्थकता, अर्थ के साथ उपस्थित रहने की स्थिति है।
क्या दर्शन में अर्थ के साथ उपस्थित रहने की शक्ति है?
अपनी जटिलता और दुरूहता के कारण दर्शन की कोई एक परिभाषा देना मुश्किल है। कभी इसकी परिभाषा #दृश्यते_वस्तु_यथात्मयम_अनेन_इति_दर्शनम है तो
कभी #शब्दे_निष्णात_परे_निष्णात कभी #विज्ञानों_का_विज्ञान (बेकन), कभी #भाषा_को_स्पष्ट_करने_का_शास्त्र ( विश्लेषणात्मक दर्शन), कभी #द्वितीय_स्तर_का_अंवेक्षण तो कभी #जगत_को_बदलने_की_विधि (मार्क्सवाद) रहा है।
इन सबके मध्य जो एक साम्यता ढूंढी जा सकती है वह यह है कि #दर्शन_किसी_विषय_के_तह_तक_विचार_करने_की_कला है। आप प्रश्न करेंगे कि इससे क्या हो जाएगा तो यह प्रश्न मेरे लिए उतना ही फालतू है जितना मेरा यह प्रश्न कि " आप जी क्यो रहे हैं" जी के क्या कर लीजिएगा?
दर्शन जीवन और जगत को समग्रता में समझने का प्रयास है। यह #एक्ज़मींड_लाइफ जीने के लिए एक विधि है क्योंकि एक असंतुष्ट सुकरात होकर मरना एक सन्तुष्ट सुवर होकर मरने से बेहतर नही होता।
विज्ञान बनाम दर्शन, विज्ञान बनाम दर्शन की आपकी समझ भी इस बात को दिखाती है कि न तो आपको विज्ञान के तह के बारे में समझ है और न ही दर्शन की।
जगत विज्ञान, दर्शन, इतिहास आदि में नही विभक्त है। कांत के नुयमोना की यदि बात न भी करें तो फिनोमिना जो है वह है इसे हम अपनी बौद्धिक कोटियों और चेतना द्वारा प्रदत फ्रेमवर्क में समझते हैं। यह विज्ञान, दर्शन, गणित आदि आदि हमारी चेतना द्वारा निर्मित कोटिया हैं और समग्रता की समझ के लिए हर कोटि का एक निश्चित कार्य और सीमा है।
विज्ञान, विज्ञान, विज्ञान
क्या विज्ञान अपनी आलोचना और समीक्षा के अभाव में विज्ञान बना रह सकता है? नही, इसके अभाव में यह शीघ्र ही एक डॉगमा मे तब्दील हो जाएगा। विज्ञान की पूर्वमान्यताओ, इसके फ्रेमवर्क, इसकी प्रविधि आदि की निरंतर समीक्षा और आलोचना कौन करता है?
दर्शन, विज्ञान का दर्शन।
और यहाँ आखिर में:
Science is the captured territory; and behind it are the those secure regions in which knowledge and art build our imperfect and marvellous world. Philosophy seems to stand still, perplexed; but only because she leaves the fruits of victory to her daughter's the sciences, and herself passes on, divinely #discontent, to the uncertain and unexplored.
(Will Durant, The Story of Philosophy)
द्रष्टव्य है कि दर्शन में अर्थ के साथ उपस्थित रहने की शक्ति है।
■अत: दर्शन बकवास और वाग्गजाल नही है।
जिज्ञासा या अप्रश्न?
13.4 बिलियन वर्ष पहले बिगबैंग हुवा, ठीक है। चारो फंडामेंटल फोर्स एक एक करके अलग हुए, ठीक, चलिए कुछ नही से सब कुछ बना जैसा कि आज भौतिकीविद मानते हैं। क्वांटम वैक्यूम, पार्टिकल, एन्टी पार्टिकल, आनाहिलेशन, इनका एनर्जी में कन्वर्जन, प्रत्येक 1करोड़ एन्टी-पार्टिकल पर रहस्मयी तरीके से एक एक्स्ट्रा पार्टिकल का बन जाना, फंडामेंटल पार्टिकल्स, बोसॉन, डार्क मैटर, डार्क एनर्जी ------- सब ठीक लेकिन प्रश्न यह कि यह सब हुवा ही क्यों और फिर काल क्रम में ब्रह्मांड में चेतना विकसित क्यो हुई ? ऐसा नही कहा जा सकता कि हम ब्रह्मांड नही है, हम भी ब्रह्मांड के हिस्से ही है और ब्रह्मांड के बारे में जानने का प्रयास करते हैं। मतलब ब्रह्मांड के एक हिस्से को दूसरे हिस्से के बारे में जानने की आवश्यकता, उत्सुकता या ज्ञाता-ज्ञेय का द्वेत आदि यह सब हुवा ही क्यों?
महादेव
महादेव कौन?
क्या महादेव ईश्वर हैं?
पता नही लेकिन, महादेव को जिसने समझा उसने भारत को समझा।
राम और विष्णु की आलोचना आपको दिख सकती है लेकिन मुझे भारत के किसी जाति, जनजाति द्वारा शिव की आलोचना दिखाइए।
मुझे दिखाइए की शिव की आलोचना किसी ने पौराणिक कथाओं के पुनर्पाठ का आधार लेकर भी किया हो।
शिव: कहीं खूंटा बाबा, कहीं पत्थर कहीं बूढा बाबा, कहीं ब्रह्मेश्वर कहीं रामेश्वर।
कारण क्या है कि शिव पर तथाकथित मूलवासी और विदेशी दोनों सहमत हैं?
यहाँ आड़ा, टेढ़ा, उलटा, सीधा, ज्ञानी, विज्ञानी, अज्ञानी सबको सम्मान है, सबके भारतवर्ष के निर्माण में योगदान का आभार है।
और शिव के विष पीने का क्या मतलब?
केवल कथा?
नही, केवल शिव तत्व ही भारतीय सम्माज की विसंगतियों को पीकर पचा सकता है।
हर हर महादेव!
क्या महादेव ईश्वर हैं?
पता नही लेकिन, महादेव को जिसने समझा उसने भारत को समझा।
राम और विष्णु की आलोचना आपको दिख सकती है लेकिन मुझे भारत के किसी जाति, जनजाति द्वारा शिव की आलोचना दिखाइए।
मुझे दिखाइए की शिव की आलोचना किसी ने पौराणिक कथाओं के पुनर्पाठ का आधार लेकर भी किया हो।
शिव: कहीं खूंटा बाबा, कहीं पत्थर कहीं बूढा बाबा, कहीं ब्रह्मेश्वर कहीं रामेश्वर।
कारण क्या है कि शिव पर तथाकथित मूलवासी और विदेशी दोनों सहमत हैं?
यहाँ आड़ा, टेढ़ा, उलटा, सीधा, ज्ञानी, विज्ञानी, अज्ञानी सबको सम्मान है, सबके भारतवर्ष के निर्माण में योगदान का आभार है।
और शिव के विष पीने का क्या मतलब?
केवल कथा?
नही, केवल शिव तत्व ही भारतीय सम्माज की विसंगतियों को पीकर पचा सकता है।
हर हर महादेव!
स्टीफेन हॉकिंग इमेनुएल कांट के जूते में
:
स्टीफेन हॉकिंग एक पैराडाक्स का उल्लेख करते हैं जिसे निम्न रूप में व्यक्त किया जा सकता है :
यदि वास्तव में एक यूनिफाइड थ्योरी है तो यह हमारे कृत्य, हमारे अनुसन्धान, हमारी जगत को समझने की कोटियों, हमारे वैज्ञानिक फ्रेमवर्क को भी प्रभावित और कंडिशन्ड करेगा और इस प्रकार यह यूनिफाइड सिद्धान्त हमारे यूनिफाइड सिद्धान्त विषयक निष्कर्ष को निश्चित रूप से प्रभावित करेगा। और अब आता है असली प्रश्न: यूनिफाइड थ्योरी द्वारा कंडिशन्ड हमारे अनुसन्धान, हमारा इंटेलिजेंस, हमारे वैज्ञानिक फ्रेमवर्क हमे प्रमाणों से #सही निष्कर्ष, असल यूनिफाइड थ्योरी की ओर ले ही जाएंगे इस बात की क्या गारंटी है?
हाकिंग जब इस पैराडॉक्स का उल्लेख करते हैं तो वह एक वैज्ञानिक की हैसियत से यह बात नही कहते बल्कि वह स्वयम एक दार्शनिक बन जाते हैं जिसके विषय मे उन्होंने कहा कि दर्शन मृत हो गया है क्योंकि दर्शन के उन सारे प्रश्नों का उत्तर वैज्ञानिकों द्वारा दिया जा रहा है।
विज्ञान के पास उनके अपने स्वयम के इस पैराडॉक्स का कोई उत्तर नही है। वैज्ञानिक फ्रेमवर्क में इन प्रश्नों को प्रश्न स्वीकार भी नही किया जाता। हॉकिंग महोदय यहाँ स्वयम दार्शनिक कांट के जूतों में चले जाते है जिनकी उन्होंने आलोचना की है।
कांट ने अपने पूर्ववर्ती अनुभवाद और बुद्धिवाद दोनों की आलोचना, समीक्षा की और फिनामिना तथा न्युमोना के द्वैत को प्रस्तुत किया।
कांट के अनुसार #न्युमोना, थिंग इन इटसेल्फ या अपने आप मे वस्तुए हैं लेकिन यह न्युमोना ज्ञाता में फेनोमेना के रूप में प्रस्तुत होता है। कांट के अनुसार परम् सत्ता है लेकिन इसका ज्ञान (Gnosis) मानव को नही हो सकता। वैज्ञानिक ज्ञान सम्भव है किंतु यह वैज्ञानिक ज्ञान #मानव_मन_के_स्वरूप से नियंत्रित होता है। मानव-मन किसी भी ज्ञान वस्तु को तभी जान सकता है जब वह इस ज्ञेय को अपने a priori या पूर्वानुभविक रूपो के द्वारा अभिरंजित कर देता है। इस स्थिति में जो भी मानव ज्ञान का विषय होगा वह अपने असली रूप में नही जाना जा सकता।
ध्यातव्य है कि जगत पर कोई भी गम्भीर चिंतन जगत को व्यवहार और परमार्थ या फिनामिना और न्युमोना में बांट ही देता है और हाकिंग के उपरोक्त पैराडॉक्स में यह विभाजन अपनी जगह पा ही लेता है।
प्रश्न है कि यदि यह विभाजन आ ही जाता है तो क्या किया जाय?
इसके तीन उत्तर हो सकते हैं: पहला इस विभाजन को स्वीकार करते हुए परमार्थ पर भी चिंतन किया जाय दूसरा इस विभाजन को स्वीकार करने के बावजूद फिनामिना पर अपना ध्यान केन्दित किया जाय या तीसरा न्युमोना को बकवास मानते हुए केवल फेनोमेना की ही बात की जाय।
एक रिगरस वैज्ञानिक के लिए तीसरे विकल्प को चुनना उसकी मजबूरी होती है क्योंकि वैसा कुछ भी जो अनुभव में पकड़ नही आ सकता उसको विज्ञान विषयक कोड ऑफ कंडक्ट के अनुसार विज्ञान के लिए अनआवश्यक विषय है।
निश्चित तौर पर विज्ञान की प्रकृति के कारण न्युमोना को बकवास मानना विज्ञान की बाध्यता है लेकिन चेतना जब जगत पर समग्रता से विचार करती है तो यह प्रश्न मात्र बकवास और बकलोली नही हैं क्योंकि विज्ञान सीमित है और जगत असीमित: जगत मात्र #कैसे चर (वेरिएबल) के साथ मौजूद नही है।
हाकिंग जब इस पैराडॉक्स का उल्लेख करते हैं तो वह एक वैज्ञानिक की हैसियत से यह बात नही कहते बल्कि वह स्वयम एक दार्शनिक बन जाते हैं जिसके विषय मे उन्होंने कहा कि दर्शन मृत हो गया है क्योंकि दर्शन के उन सारे प्रश्नों का उत्तर वैज्ञानिकों द्वारा दिया जा रहा है।
विज्ञान के पास उनके अपने स्वयम के इस पैराडॉक्स का कोई उत्तर नही है। वैज्ञानिक फ्रेमवर्क में इन प्रश्नों को प्रश्न स्वीकार भी नही किया जाता। हॉकिंग महोदय यहाँ स्वयम दार्शनिक कांट के जूतों में चले जाते है जिनकी उन्होंने आलोचना की है।
कांट ने अपने पूर्ववर्ती अनुभवाद और बुद्धिवाद दोनों की आलोचना, समीक्षा की और फिनामिना तथा न्युमोना के द्वैत को प्रस्तुत किया।
कांट के अनुसार #न्युमोना, थिंग इन इटसेल्फ या अपने आप मे वस्तुए हैं लेकिन यह न्युमोना ज्ञाता में फेनोमेना के रूप में प्रस्तुत होता है। कांट के अनुसार परम् सत्ता है लेकिन इसका ज्ञान (Gnosis) मानव को नही हो सकता। वैज्ञानिक ज्ञान सम्भव है किंतु यह वैज्ञानिक ज्ञान #मानव_मन_के_स्वरूप से नियंत्रित होता है। मानव-मन किसी भी ज्ञान वस्तु को तभी जान सकता है जब वह इस ज्ञेय को अपने a priori या पूर्वानुभविक रूपो के द्वारा अभिरंजित कर देता है। इस स्थिति में जो भी मानव ज्ञान का विषय होगा वह अपने असली रूप में नही जाना जा सकता।
ध्यातव्य है कि जगत पर कोई भी गम्भीर चिंतन जगत को व्यवहार और परमार्थ या फिनामिना और न्युमोना में बांट ही देता है और हाकिंग के उपरोक्त पैराडॉक्स में यह विभाजन अपनी जगह पा ही लेता है।
प्रश्न है कि यदि यह विभाजन आ ही जाता है तो क्या किया जाय?
इसके तीन उत्तर हो सकते हैं: पहला इस विभाजन को स्वीकार करते हुए परमार्थ पर भी चिंतन किया जाय दूसरा इस विभाजन को स्वीकार करने के बावजूद फिनामिना पर अपना ध्यान केन्दित किया जाय या तीसरा न्युमोना को बकवास मानते हुए केवल फेनोमेना की ही बात की जाय।
एक रिगरस वैज्ञानिक के लिए तीसरे विकल्प को चुनना उसकी मजबूरी होती है क्योंकि वैसा कुछ भी जो अनुभव में पकड़ नही आ सकता उसको विज्ञान विषयक कोड ऑफ कंडक्ट के अनुसार विज्ञान के लिए अनआवश्यक विषय है।
निश्चित तौर पर विज्ञान की प्रकृति के कारण न्युमोना को बकवास मानना विज्ञान की बाध्यता है लेकिन चेतना जब जगत पर समग्रता से विचार करती है तो यह प्रश्न मात्र बकवास और बकलोली नही हैं क्योंकि विज्ञान सीमित है और जगत असीमित: जगत मात्र #कैसे चर (वेरिएबल) के साथ मौजूद नही है।
जगत, डेटा, ज्ञान और मूल्य
मनुष्य प्रदत्त पा पहले से बने बनाए जगत में नही रहता बल्कि वह अपने जगत का निर्माण स्वयम करता है। जगत विषयक तथ्य का मानव भले ही निर्माण न कर सके किन्तु वह मूल्यों का सृजन स्वयम करता है और इस पकार मानवीय जगत और जीवन मात्र व्यवस्थित तथ्यों का संजाल नही है बल्कि यह तथ्य-मूल्यों की एक समष्टि बन जाती है।
जगत विषयक कोई भी सूझ और समझ इस प्रकार मानवीय सन्दर्भ में मात्र जगत के तथ्यों का अक्यूमलेशन मात्र नही है।
जगत विषयक तथ्य को मात्रतात्मक तथा गुणात्मक रूप से और बेहतर जानने के लिए मानव ने डेटा प्राप्त करने के लिए विविध उपकरण यथा, टेलिस्कोप, माइक्रोस्कोप आदि बनाए हैं जो मानवीय ज्ञान इंद्रियों के विस्तार हैं। इन डेटा को सूचना और ज्ञान बनाने के लिए इन्हें सन्दर्भ और अर्थ एवम आशय देने के लिए मानव आज सुपर कम्प्यूटर ही नही बल्कि क्वाण्टम कम्प्यूटर की भी सहायता लेने को आमादा है। इन जटिल और अत्याधुनिक उपकरणों से हमे एक बहुत ही उदात्त और जटिल ज्ञान मिलता है लेकिन इस उदात्त और जटिल ज्ञान को विवेक बनाने वाली मशीन का, उपकरण का अविष्कार हमने न तो आज तक किया है और न कर पाएंगे हालांकि आज प्रचलित मन के कम्प्यूटेशनल मॉडल के अनुसार मन और मष्तिष्क में हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का सम्बंध है और इस विषय से सम्बंधित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, वीक वर्जन, स्ट्रॉन्ग वर्जन आदि पर विचारकों के मध्य विवाद है।
ध्यातव्य है कि महान भौतिकीविद से जब मन के बारे में प्रश्न किया गया तो उन्होंने मन को मष्तिष्क का सॉफ्टवेयर कहा। प्रसिद्ध दार्शनिक सर्ल ने मन विषयक इस पोजीशन का जमकर खंडन किया है।
थोड़ी देर के लिए हम मान लेते हैं कि मन विषयक उक्त मॉडल सही है और हमने एक एथिकल सुपर कम्प्यूटर भी बना लिया है और उस एथिकल सुपर कम्प्यूटर से हम नीतिशास्त्र और मूल्य मीमांसा सिख रहे हैं। इस स्थिति में क्या हम मानव रह जाएंगे?
■■■■
डेटा, सूचना, ज्ञान और विवेक में अंतर होता है। हमारी ज्ञाननेंद्रियों से होकर जो कुछ भी चेतन या अचेतन रूप से हमारे मन पर संस्कारित होता है वह डेटा है। चेतन मन इन संस्कारो की उपेक्षा भी कर सकता है और इनको आकार और सन्दर्भ भी दे सकता है। हमारा मन इन डेटा को आकार और सन्दर्भ देकर सूचना का निर्माण करता है। सूचना को आशय और अर्थ इसे ज्ञान बनाता है। सूझ के साथ, अंतरदृष्टि के साथ ज्ञान विवेक होता है।
जगत विषयक कोई भी सूझ और समझ इस प्रकार मानवीय सन्दर्भ में मात्र जगत के तथ्यों का अक्यूमलेशन मात्र नही है।
जगत विषयक तथ्य को मात्रतात्मक तथा गुणात्मक रूप से और बेहतर जानने के लिए मानव ने डेटा प्राप्त करने के लिए विविध उपकरण यथा, टेलिस्कोप, माइक्रोस्कोप आदि बनाए हैं जो मानवीय ज्ञान इंद्रियों के विस्तार हैं। इन डेटा को सूचना और ज्ञान बनाने के लिए इन्हें सन्दर्भ और अर्थ एवम आशय देने के लिए मानव आज सुपर कम्प्यूटर ही नही बल्कि क्वाण्टम कम्प्यूटर की भी सहायता लेने को आमादा है। इन जटिल और अत्याधुनिक उपकरणों से हमे एक बहुत ही उदात्त और जटिल ज्ञान मिलता है लेकिन इस उदात्त और जटिल ज्ञान को विवेक बनाने वाली मशीन का, उपकरण का अविष्कार हमने न तो आज तक किया है और न कर पाएंगे हालांकि आज प्रचलित मन के कम्प्यूटेशनल मॉडल के अनुसार मन और मष्तिष्क में हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का सम्बंध है और इस विषय से सम्बंधित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, वीक वर्जन, स्ट्रॉन्ग वर्जन आदि पर विचारकों के मध्य विवाद है।
ध्यातव्य है कि महान भौतिकीविद से जब मन के बारे में प्रश्न किया गया तो उन्होंने मन को मष्तिष्क का सॉफ्टवेयर कहा। प्रसिद्ध दार्शनिक सर्ल ने मन विषयक इस पोजीशन का जमकर खंडन किया है।
थोड़ी देर के लिए हम मान लेते हैं कि मन विषयक उक्त मॉडल सही है और हमने एक एथिकल सुपर कम्प्यूटर भी बना लिया है और उस एथिकल सुपर कम्प्यूटर से हम नीतिशास्त्र और मूल्य मीमांसा सिख रहे हैं। इस स्थिति में क्या हम मानव रह जाएंगे?
■■■■
डेटा, सूचना, ज्ञान और विवेक में अंतर होता है। हमारी ज्ञाननेंद्रियों से होकर जो कुछ भी चेतन या अचेतन रूप से हमारे मन पर संस्कारित होता है वह डेटा है। चेतन मन इन संस्कारो की उपेक्षा भी कर सकता है और इनको आकार और सन्दर्भ भी दे सकता है। हमारा मन इन डेटा को आकार और सन्दर्भ देकर सूचना का निर्माण करता है। सूचना को आशय और अर्थ इसे ज्ञान बनाता है। सूझ के साथ, अंतरदृष्टि के साथ ज्ञान विवेक होता है।
दर्शन या अनवीक्षकी?
फिलॉसफी के लिए दर्शन की अपेक्षा अनवीक्षकी शब्द ज्यादा उचित प्रतीत होता है। दर्शन शब्द भावात्मक रूप से प्री लोडेड है जबकि अनवीक्षकी भाव निरपेक्ष या उदासीन शब्द है। प्रतीत होता है कि भारतीय सन्दर्भ में आध्यात्मवाद या आइडियलिज़्म को पुष्ट करने के निमित्त विचारकों द्वारा आन्वीक्षिकी की जगह दर्शन शब्द का चयन किया गया क्योंकि अनवीक्षकी से जहाँ रेशनल इंक्वायरी का भाव निकलता है वही दर्शन पूर्व में ही अंतःप्रज्ञा को बौद्धिक इन्क्वायरी पर प्रमुखता दे देता है।
माईलेशियन लिगेसी (क)
जगत को आज हम जितना समझते हैं, विज्ञान के बल पर इसे जितना बदल सकते हैं उस विज्ञान की यात्रा प्राचीन ग्रीस के मिलेटस में थेलस के इस प्रश्न से प्रारम्भ हुई थी कि जगत अंततः किस तत्व से बना है। ऐसा नही है कि मानव मन में थेलस के पूर्व यह जिज्ञासा नही थी लेकिन थेलस के पूर्व उत्तर परीक्षण, प्रेक्षण और तार्किकता की जगह भावात्मकता और कल्पना से दिए जाते थे। जगत के विषय मे कल्पना और भावात्मकता के आधार पर इसके विषय मे उठी जिज्ञासा प्रत्येक संस्कृति और सभ्यता की एक सामान्य विशेषता रही है लेकिन अपनी इस प्रवृत्ति से असंतुष्ट होकर प्रेक्षण और तार्किक चिंतन के द्वारा उत्तर देने का प्रयास सर्वप्रथम ग्रीस के मिलेट्स में ही प्रारम्भ हुई। यही कारण है कि थियोरेटिकल फिजिसिस्ट यथा सिन कैरोल या कार्लो रोवेळी जब क्रमशः हिग्स बोसोन या कवांतम ग्रैविटी की बात करते हैं तो इस माईलेशीयन थाती का जिक्र करना नही भूलते।
मिलेट्स एथेंस और स्पार्टा के स्वर्ण युग के पूर्व ग्रीस का सबसे महत्वपूर्ण शहर था जहाँ मेसोपोटामिया से कारवां तथा संपूर्ण भूमध्य सागर से जहाजें एकत्र होती थीं और इनके साथ एकत्र होते थे अलग अलग जगहों से विचार। इन अलग अलग जगहों के विचार ने मिलेट्स में एक बौद्धिक क्रांति पैदा की और अब ये विचारक जगत की मिथकीय व्याख्या से संतुष्ट न थे।
थेलस मिश्र देश से ज्यामिति की परम्परा लाए थे। इनके अनुसार जल ही ऐसा मूल तत्व है जिससे सभी वस्तुवे उतपन्न हुई हैं और जिसमे सब विलीन हो जाती हैं।
ध्यान देना होगा कि उस काल मे कालांतर के वैज्ञानिक एवम मिथकीय चिंतन का भेद मानवीय चेतना मे स्पष्ट नही हो पाया था। थेलस चुम्बक में भी आत्मा के वास को स्वीकार करते थे साथ ही उनका यह भी मानना था कि सभी वस्तुओ में देवता भरे हुए हैं।
आदिवासी और गैर आदिवासी संस्कृति की बाइनरी
आदिवासी संस्कृति और एक विकसित संस्कृति के बीच का अंतर इन संस्कृतियों का प्रकृति के साथ सम्बन्ध है। एक विकसित संस्कृति प्रकृति के साथ सूक्ष्म से सूक्ष्मतर स्तर पर जुड़ती जाती है जबकि एक आदिवासी संस्कृति का प्रकृति से जुड़ाव काफी स्थूल होता है। प्रकृति और संस्कृति का यह सम्बन्ध आदिवासी संस्कृति में जड़वत होता है जबकि एक विकसित संस्कृति में यह सम्वन्ध बहुत ही गतिशील होता है।
अब यदि एक विकसित संस्कृति की बराबरी करनी हो तो आदिवासी समाज को यह कहने के बजाय की "हमारा शोषण हुवा है-हमारा शोषण हुवा है" अपनी और प्रकृति के साथ के सम्बन्धो की समीक्षा करनी चाहिए और उस जड़ता को तोड़ना चाहिए जिसके कारण वह आज तक वही रह गए जहां से उन्होंने और उस विकसित संस्कृति ने प्रारम्भ किया था।
इस जड़ता को तोड़ दें!
विश्व आदिवासी दिवस की शुभकामनाएं!!
आदिवासी संस्कृति और विकसित संस्कृति का बाइनरी क्रिएट करने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ लेकिन सच इस बाइनरी के माध्ययम से भी देखा जाना चाहिए।
अब यदि एक विकसित संस्कृति की बराबरी करनी हो तो आदिवासी समाज को यह कहने के बजाय की "हमारा शोषण हुवा है-हमारा शोषण हुवा है" अपनी और प्रकृति के साथ के सम्बन्धो की समीक्षा करनी चाहिए और उस जड़ता को तोड़ना चाहिए जिसके कारण वह आज तक वही रह गए जहां से उन्होंने और उस विकसित संस्कृति ने प्रारम्भ किया था।
इस जड़ता को तोड़ दें!
विश्व आदिवासी दिवस की शुभकामनाएं!!
आदिवासी संस्कृति और विकसित संस्कृति का बाइनरी क्रिएट करने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ लेकिन सच इस बाइनरी के माध्ययम से भी देखा जाना चाहिए।
माईलेशियन लिगेसी (ख)
प्रायः विचारों का एकाकीपन बौद्धिकता को कुंठित कर देता है। विचार चाहे कितने भी पवित्र क्यों न हो उन पर पुनर्विचार आवश्यक है। श्रद्धा आवश्यक है किंतु गुरु-शिष्य की वह परम्परा ज्यादा फलित है जिसमे शिष्य गुरु के विचारों को आँखें बंद कर आत्मसात नही कर लेता। पश्चिम में विचारों के सम्बंध में यह स्वतंत्रता भी माईलेशियन थाती है जिसके अंतर्गत इस नए चिंतन पद्धति में शिष्य का कार्य गुरु के विचारों के प्रति आस्थावान होकर महज उसका प्रसार नही था बल्कि शिष्यत्व में गुरु के विचारों की समीक्षा और आलोचना भी शामिल थी। इस परंपरा में यदि शिष्य को लगा कि पूर्व के सिद्धान्त में त्रुटि है तो वह इसे सुधार ही नही सकता था बल्कि इसे छोड़ने को वह स्वतंत्र था।
विज्ञान की यही खूबसूरती होती है कि इसमें विचार न तो इतने नाजुक होते हैं कि वह समीक्षा के आगे न ठहर सकें और न ही इतने पवित्र की उन पर पुनर्विचार नही किया जा सकता और उन पर बार-बार प्रश्न न किया जाय।
यद्यपि माईलेशियन विचारकों के प्रश्न यही थे कि जगत का अंतिम तत्व क्या है तथापि अनैक्ज़िमेंडर ने इसका जवाब अपने गुरु थेलस से हट कर दिया और यही नही इस प्रश्न के जवाब में अनएक्सीमेनिज ने भी अपने गुरु अनैक्ज़िमेंडर की बात नही दुहराई।
थेलस ने इस प्रश्न का उत्तर जल के द्वारा दिया था।
अनैक्ज़िमेंडर जल, अग्नि, पवन में से किसी को मूल तत्व स्वीकारने के पक्ष में नही थे। उनका कहना था कि यदि इन तत्वो में से किसी एक को मूल तत्व स्वीकार कर लिया जाय तो अन्य तत्वो में निहित विरोधी गुणों की व्याख्या नही हो सकती।
अतः इन्होंने एक ऐसे तत्व की कल्पना की अपरिमित, नित्य, अनिश्चित तथा अष्पष्ट है। इस तत्व को उन्होंने एपेइरॉन ( apeiron) कहा।
बैलेंस
माना जाता है कि हम जितनी ऊर्जा की खपत करते है उसकी तुलना में बौद्धिकता के आउटपुट के मामले में बहुत ही इनएफिशिएंट मशीन हैं।
●●इसका कारण यह है कि हम मशीन नही हैं।
बौद्धिकता आवश्यक है किंतु मात्र बौद्धिकता मनुष्य से उसकी मनुजता हर लेती है और उसे एक नए प्रकार के जानवर में तब्दील कर देती है। प्रकृति को इसका शायद पूर्वाभास था अतः उसने मनुष्य में भावना भी भरी।
पशु न जननी को मानते हैं न जन्मभूमि को। पशु जिनमे से कुछ बुद्धिहीन हैं तो पशु जिनमे कुछ अत्यंत बुद्धिमान, बुद्धिपैशाचिकता की हद तक।
मात्र भावना भी मनुष्य का कल्याण करने के बजाय उसे "जोम्बी" "द वॉकिंग डेड" बना देती है। पश्चिमी विचार के इतिहास में पूरा मध्यकाल इसका उदाहरण है जब मनुजता थियोलॉजी की जोम्बी बनी कई सौ वर्षों तक भटकती लोगो का खून चूसती रही।
भारत के सन्दर्भ में "अलगु बिगाड़ के डर से ईमान की बात बाद में करेगा।"
●●इसका कारण यह है कि हम मशीन नही हैं।
बौद्धिकता आवश्यक है किंतु मात्र बौद्धिकता मनुष्य से उसकी मनुजता हर लेती है और उसे एक नए प्रकार के जानवर में तब्दील कर देती है। प्रकृति को इसका शायद पूर्वाभास था अतः उसने मनुष्य में भावना भी भरी।
पशु न जननी को मानते हैं न जन्मभूमि को। पशु जिनमे से कुछ बुद्धिहीन हैं तो पशु जिनमे कुछ अत्यंत बुद्धिमान, बुद्धिपैशाचिकता की हद तक।
मात्र भावना भी मनुष्य का कल्याण करने के बजाय उसे "जोम्बी" "द वॉकिंग डेड" बना देती है। पश्चिमी विचार के इतिहास में पूरा मध्यकाल इसका उदाहरण है जब मनुजता थियोलॉजी की जोम्बी बनी कई सौ वर्षों तक भटकती लोगो का खून चूसती रही।
भारत के सन्दर्भ में "अलगु बिगाड़ के डर से ईमान की बात बाद में करेगा।"
दर्शन का एक कार्य यह भी होना चाहिए
विज्ञान विजित क्षेत्र है; इसकी हद में वह सुरक्षित क्षेत्र हैं जिसमे ज्ञान और कला हमारे अद्भुत जगत का निर्माण करते हैं। लेकिन यात्रा यहीं खत्म नही हो जाती। इस विजित क्षेत्र के आगे और अनिश्चित तथा और भी अधिक रहस्य से भरा क्षेत्र जीते जाने के लिए उपलब्ध होता है। दर्शन यहाँ परिकल्पनाओं और विमर्शात्मक चिंतन द्वारा पथ-प्रदर्शक बनने का प्रयास करता है।
ध्यातव्य है कि इस विंदु पर कल्पना की कोई एक दिशा नही होती, कल्पना यहाँ हर दिशा में उड़ान लेती है। चिंतन की पद्धति में एक नया पैराडाइम भी उपस्थित हो सकता है और विज्ञान आगे बढ़ता है।
इन सबो के बीच एक समस्या उतपन्न होती है: विज्ञान द्वारा पुष्ट उन एक या अनेक दार्शनिक परिकल्पनाओं के अलावा शेष परिकल्पनाओं को भी मोह/रूढ़ि/वश मानव नकार नही पाता और उन्हें जीवित रखने के लिए जाने-अनजाने छद्म विज्ञान की रचना करता है। यहाँ दुर्भाग्य से ज्ञान-से दिखनेवाले ऐसे तन्त्रो का एक समूह भी विकसित किया जाता है जिनका वास्तव में कोई मोल नही, ये मात्र अपव्यय हैं।
दर्शन का काम छद्मविज्ञानो को नष्ट करने के साथ साथ इन बन्ध्या परिकल्पनाओं और विचार पद्धतियों को भी नष्ट करना होना चाहिए।
ध्यातव्य है कि इस विंदु पर कल्पना की कोई एक दिशा नही होती, कल्पना यहाँ हर दिशा में उड़ान लेती है। चिंतन की पद्धति में एक नया पैराडाइम भी उपस्थित हो सकता है और विज्ञान आगे बढ़ता है।
इन सबो के बीच एक समस्या उतपन्न होती है: विज्ञान द्वारा पुष्ट उन एक या अनेक दार्शनिक परिकल्पनाओं के अलावा शेष परिकल्पनाओं को भी मोह/रूढ़ि/वश मानव नकार नही पाता और उन्हें जीवित रखने के लिए जाने-अनजाने छद्म विज्ञान की रचना करता है। यहाँ दुर्भाग्य से ज्ञान-से दिखनेवाले ऐसे तन्त्रो का एक समूह भी विकसित किया जाता है जिनका वास्तव में कोई मोल नही, ये मात्र अपव्यय हैं।
दर्शन का काम छद्मविज्ञानो को नष्ट करने के साथ साथ इन बन्ध्या परिकल्पनाओं और विचार पद्धतियों को भी नष्ट करना होना चाहिए।
विज्ञान बचाए रखिए
सब ठीक है साहब, इतिहास खोदिए, वीररस-करुणरस में कविता पाठ करिए, संघर्ष का या सामंजस्य का समाजशास्त्र गढ़िए, राजनीतिशास्त्र के नए आयाम ढूंढिए लेकिन सबसे ज़रूरी है, सबसे ज़रूरी, विज्ञान को बचाए रखिए क्योंकि अंततः क्रांति और परिवर्तन यही लाता है।
किसी काल कोई भक्खा भंगी था, मैला साफ करता, सर पर मैला ढोता।इतिहासकारों ने उसे बताया कि उसके पुरखे ब्राह्मण थे। हलाकि एक दूसरा इतिहासकार कह रहा था कि भक्खा के पूर्वज अनार्य थे जिनको आर्यो ने गुलाम बना लिया।अब इससे उसे इससे क्या फर्क पड़ गया कि उसके पुरखे क्या थे। कुछ साहित्यकारों ने भक्खा के मैला ढोने को वीर रस में ढाल कर तो किसी ने करुण रस में कविता लिख डाली।
क्या हो गया इससे? जब भक्खा ने वीर रस वाली कविता पढ़ी तो उसने उस दिन रोज के मुकाबले तिगुना मैला ढोया और जिस दिन उसने करुण रस वाली कविता पढ़ी उस दिन लुहार के यहाँ से तलवार खरीद लाया । राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र भी उसने पढ़े और उसके अनुरूप तदनुरूप बस प्रतिक्रियाएं ही हुईं। माना भक्खा ने इतिहास, साहित्य, राजनीति शास्त्र और समाज शास्त्रपढ़ के अपना काम छोड़ दिया लेकिन सक्खा का क्या? पंडित आंधी करुणा के वशीभूत स्वयं सर पर मैला ढोने लगे। ठीक, लेकिन कुछ बदला क्या? मानवीय गरिमा स्थापित हो पाई क्या?? चलिए माना कि भंगियों का अधिनायकत्व ही स्थापित हो गया और अब इस व्यवस्था में ब्राह्मण सर पर मैला ढोएंगे।
क्या इस बार भी संचमुच क्रांति हुई??कोई वास्तविक परिवर्तन हुवा?? मानव की गरिमा स्थापित हुई??? ना!! इन सबसे हटकर किसी ने दाब के नियम को समझ कर ऐसी मशीन बना दी जो एकत्रित मल को फेंक देगा, उस व्यक्ति ने एक फ्लश बना दिया। अब न तो इतिहास खोदने की ज़रूरत थी, न काव्य पाठ की, न खुनी क्रांति की , न करुणा युक्त ह्र्दयपरिवर्त की। एक मशीन ने सब कर दिया और मानवीय गरिमा भी स्थापित हो गई।
किसी काल कोई भक्खा भंगी था, मैला साफ करता, सर पर मैला ढोता।इतिहासकारों ने उसे बताया कि उसके पुरखे ब्राह्मण थे। हलाकि एक दूसरा इतिहासकार कह रहा था कि भक्खा के पूर्वज अनार्य थे जिनको आर्यो ने गुलाम बना लिया।अब इससे उसे इससे क्या फर्क पड़ गया कि उसके पुरखे क्या थे। कुछ साहित्यकारों ने भक्खा के मैला ढोने को वीर रस में ढाल कर तो किसी ने करुण रस में कविता लिख डाली।
क्या हो गया इससे? जब भक्खा ने वीर रस वाली कविता पढ़ी तो उसने उस दिन रोज के मुकाबले तिगुना मैला ढोया और जिस दिन उसने करुण रस वाली कविता पढ़ी उस दिन लुहार के यहाँ से तलवार खरीद लाया । राजनीति शास्त्र और समाजशास्त्र भी उसने पढ़े और उसके अनुरूप तदनुरूप बस प्रतिक्रियाएं ही हुईं। माना भक्खा ने इतिहास, साहित्य, राजनीति शास्त्र और समाज शास्त्रपढ़ के अपना काम छोड़ दिया लेकिन सक्खा का क्या? पंडित आंधी करुणा के वशीभूत स्वयं सर पर मैला ढोने लगे। ठीक, लेकिन कुछ बदला क्या? मानवीय गरिमा स्थापित हो पाई क्या?? चलिए माना कि भंगियों का अधिनायकत्व ही स्थापित हो गया और अब इस व्यवस्था में ब्राह्मण सर पर मैला ढोएंगे।
क्या इस बार भी संचमुच क्रांति हुई??कोई वास्तविक परिवर्तन हुवा?? मानव की गरिमा स्थापित हुई??? ना!! इन सबसे हटकर किसी ने दाब के नियम को समझ कर ऐसी मशीन बना दी जो एकत्रित मल को फेंक देगा, उस व्यक्ति ने एक फ्लश बना दिया। अब न तो इतिहास खोदने की ज़रूरत थी, न काव्य पाठ की, न खुनी क्रांति की , न करुणा युक्त ह्र्दयपरिवर्त की। एक मशीन ने सब कर दिया और मानवीय गरिमा भी स्थापित हो गई।
वामपंथ की क्रांति!
कल मुझे एक सपना आया:
बायें हाथों को दलित बता,
किसी ने क्रांति का गीत सुनाया---
काट दो दाएं हाथ को जो स्वयम् तो अन्न
पकड़ता है और तुमसे मल धुलवाता है।
स्वयं तो वह कलम पकड़ता है लेकिन तुमसे ?
●●●यही तो ब्राह्मणवाद है।
"ओ बाएं हाथ, क्या तुमको पता है कि हाँथो के आदिम समतावाद में दाएं और बाएं हाथ में कोई भेद न था: मनुष्य मल त्याग कर बिना हाथों के इस्तेमाल के अंगविशेष धरती में रहड़कर साफ कर लिया करता था लेकिन फिर दाहिने हाथ ने मष्तिस्क को अपनी जकड़ में लिया और मष्तिस्क ने यह फरमान सुनाया की दायाँ हाथ प्रमुख होगा।
अब तुम्हारा काम केवल मल धोना रह गया!!!!
तुम्हे पता है बाएं हाथ, इंग्लिश में जो बाएं हाथ का इस्तेमाल करते है उनको सिनिस्टर अर्थात अभागा कहा जाता है?"
मेरा बयां हाथ अब क्रांति को बेताब था, उसने कटार पकड़ ली और झपटा दाएं हाथ की ओर लेकिन, तभी मेरी नींद टूट गई और मैं जग गया।
हालांकि मै लतरहत्था हूँ तो जग गया लेकिन जो दाहिने हाथ से अन्न खाते है और बाएं से मल धोते है उनका क्या???
■■■■■
वेस्टर्न टॉयलेट के आने से दाएं हाथ और बाएं हाथ का भेद मिट गया और कलम की जगह कीबोर्ड ने दाहिने हाथ की सामन्तशाही को समाप्त कर दिया।
कांटे-चम्मच के इस युग में अब दाहिने हाथ से भोजन?
जंगलीपन है, असभ्यता, गंवारपन की निशानी है।
हमे इस नई तकनीक का स्वागत करना चाहिए जिसने हाथों के बीच समरसता लाकर उस पुराने हाथों के आदिम समतावाद को पुनर्स्थापित कर दिया।
अब हवन की आहुति डालते वक़्त इस बात की परवाह नही करनी की हवि किस हाथ से दी जा रही है।
यद्यपि कुछ पुरातनवादी आज भी मौजूद हैं जो पाश्चात्य शैली के टॉयलेट पर बैठने और प्रेशर वाश के बावजूद हाथ धोने की रूढ़ि से बाहर नही निकल पाए हैं।
और कुछ पुरातनवादी तो इस नई व्यवस्था को स्वीकार ही नही कर पाए और कब्ज से मर गए।
सौ दो सौ सालों तक तक तो सब ठीक चला लेकिन मष्तिस्क इस बात से अंजान न था कि एक नयी सेंसिब्लिटी जन्म ले रही है।
यह सेंसिब्लिटी पहले की तरह स्थूल न थी बल्कि काफी सूक्ष्म थी क्योंकि मानव मष्तिस्क भी स्थूल से सूक्ष्म हो चला था।
इस काल से उस सेंसिब्लिटी को महसूस कर पाना या उसके विषय में क्ह पाना भविष्य में देखने जितना कठिन होगा।
■■■■■
यह क्या???
ये द्विपदी मानव हाँथो और पैरों के बल क्यों चल रहे हैं? मानव चौपाया बनने की कोशिश क्यों कर रहा है?
ओह,तो अब पैरों ने हाथों के खिलाफ विद्रोह कर दिया है!!
पैरों की उंगलियां, हाथों की उँगलियों के बराबर हक़ चाहती हैं।
ये किया लिखा है---
" हमे हज़ारो सालो से भार के नीचे दबाया गया वरना ऐ हाथ हम भी तुम्हारी तरह कीबोर्ड चलाते, हम भी तुम्हारी तरह कांटा-चम्मच उठाते।"
अब तो हमे भी बराबरी का हक़ चाहिए-अब हम अकेले भार नही उठाएंगे, अब मनुष्य को फिर से चार पैरों पर चलना होगा!"
चलना होगा!!चलना होगा!!!
( हमारा दमन हुवा है।)
और अब द्विपदी मनुष्य को पुनः चौपाया बनाने की बात चल रही है !!!
आस्तिकता, नास्तिकता और जीवन चलता रहे।
कथा यूँ है कि किसी काल में कोई व्यक्ति बड़ी दूर की यात्रा करके किसी ढाबे में पँहुचा।
तेज़ धुप में दूर की यात्रा के कारण उसे बहुत तेज़ प्यास लगी थी। ढाबे पर पँहुचते ही उसने ढाबेवाले से कहा
: भाई पानी का एक लोटा देना।
ढाबे वाले ने उसे जो देना था दे दिया लेकिन जिस वक़्त, जिस क्षण वह मुसाफिर पानी का लोटा मांग रहा था ठीक उसी वक़्त दो दार्शनिक, एक वैयकारण और एक अनपढ़ वहाँ से गुजर रहे थे।
अनपढ़ बस गुजर गया, जैसे कुछ हुवा ही न हो लेकिन दार्शनिक और वैयाकणीय बस यूँ ही नही गुजर पाए।
वैयाकरणीय को उस मुसाफिर की जहालत पर तरस आ रही थी की उसने एक लोटा पानी की जगह पानी का एक लोटा माँगा।
भाषा का अपमान!!
पहले दार्शनिक को एक नयी सूझ मिली की यदि पानी का एक लोटा पहो सकता है तो प्यास को ही क्यों नही पिया जा सकता।
फिर तत्त्वशास्त्रीय चितन प्रारम्भ हुवा और एक नये सम्प्रदाय (दार्शनिक सम्प्रदाय) की स्थापना हुई जो पिछले दो ढाई हजार वर्ष से अस्तित्वमान है और उस #पियाईपी या #पिपासामपिपासा सम्प्रदाय के विचारकों को अपना साहित्य है जिसमे प्यास को पिने के दिव्यज्ञान के सम्बन्ध में कम से कम तैतीस पंक्तियां लिखी हुई है।
बात यही खत्म नही हुई दूसरे दार्शनिक ने भी एक परम्परा प्रारंभ की जिसमे पानी के लोटे को एक द्वंद माना गया और इस परम्परा के अनुसार दुनिया लोटाधारी और अलोटाधारी में विभाजित है क्योंकि लोटा पूंजीवाद की देन है। आदिम समाज मे मनुष्य अंजुली से पानी पीता था। इस परम्परा के आधुनिक पुरोधा ने अपने मित्र के साथ मिलकर एक अद्वितीय ग्रन्थ #लोटा लिखा जिसकी प्रेणना पाकर यह सम्प्रदाय #ब्लैक_बुक_ऑफ_अलोटा के अनुसार 10 करोड़ से ज्यादा लोटावालो का नरसंहार कर चुका है। इस सम्प्रदाय से जे एन यू वाले प्रोफेसर साहब आजकल आदिवासियों को यह समझाने में लगे है कि आदिवासियों में जो लोटा-पानी की परंपरा होती है वह ब्राह्मणवाद है और इसका खात्मा जय भीम-लाल सलाम के नारे के साथ सशस्त्र क्रांति ही कर सकती है।
अनपढ़ सम्प्रदाय लोटा का पानी या पानी के लोटे से प्यास बुझा कर आगे बढ़ जाता है।
इनडेटर्मीनिज़्म
एक फोटॉन पानी पर गिरता है अब वह परावर्तित होगा या अपवर्तित यह कोई नही जानता, हमारी भौतिकी के नियम कहते है कि 80℅ चांस है कि वह अपवर्तित हो जाय लेकिन निश्चित तौर पर क्या होगा यह पता नही है क्योंकि शायद जगत ऐसा ही हो: पासो का खेल या हमारी चेतना हमारी बुद्धि में वह ऐसे ही समझ मे आते हों।
9000000000 डॉलर और हज़ारों वैज्ञानिकों ने सर्न में कई वर्ष प्रतीक्षा किया तब जाकर 2012 में हमे गॉड पार्टिकल्स या हिग्स बोसोन मिले क्योंकि मूलभूत स्तर पर सब कुछ समान होने पर एक प्रयोग समान निष्कर्ष नही देते। उस स्तर पर समान परिस्थिति में दुहराया गया समान प्रयोग अलग अलग निष्कर्ष देता है लेकिन ऐसा क्यों होता है हम नही जानते; शायद जगत ऐसा ही है।
बिग बैंग के बाद ब्रह्मांड में ऊर्जा भरी पड़ी थी। यह ऊर्जा पार्टीकल और एन्टी पार्टीकल में टूटती या पुनः ये पार्टीकल और एन्टी पार्टीकल कण आपस मे अन्हाइलेट होकर पुनः ऊर्जा बनते थे लेकिन कुछ रहस्मय घटा प्रत्येक एक अरब पार्टीकल- एन्टी पार्टीकल पेयर पर एक एक्स्ट्रा पार्टीकल बना और इस प्रकार के कई पार्टिकल्स से हमारी दुनिया, हमारा ब्रह्मांड बना।
प्रत्येक एक अरब पार्टीकल-अन्तिपार्टिकल युग्म पर यह एक एक्स्ट्रा पार्टीकल कैसे बना यह भी हम नही जानते।
9000000000 डॉलर और हज़ारों वैज्ञानिकों ने सर्न में कई वर्ष प्रतीक्षा किया तब जाकर 2012 में हमे गॉड पार्टिकल्स या हिग्स बोसोन मिले क्योंकि मूलभूत स्तर पर सब कुछ समान होने पर एक प्रयोग समान निष्कर्ष नही देते। उस स्तर पर समान परिस्थिति में दुहराया गया समान प्रयोग अलग अलग निष्कर्ष देता है लेकिन ऐसा क्यों होता है हम नही जानते; शायद जगत ऐसा ही है।
बिग बैंग के बाद ब्रह्मांड में ऊर्जा भरी पड़ी थी। यह ऊर्जा पार्टीकल और एन्टी पार्टीकल में टूटती या पुनः ये पार्टीकल और एन्टी पार्टीकल कण आपस मे अन्हाइलेट होकर पुनः ऊर्जा बनते थे लेकिन कुछ रहस्मय घटा प्रत्येक एक अरब पार्टीकल- एन्टी पार्टीकल पेयर पर एक एक्स्ट्रा पार्टीकल बना और इस प्रकार के कई पार्टिकल्स से हमारी दुनिया, हमारा ब्रह्मांड बना।
प्रत्येक एक अरब पार्टीकल-अन्तिपार्टिकल युग्म पर यह एक एक्स्ट्रा पार्टीकल कैसे बना यह भी हम नही जानते।
क्या हम कुछ और भी हैं?
निर्जन स्थान पर हूँ। चारो ओर उस वृत में जहाँ धरती और आकाश आपस मे मिलते प्रतीत हो रहे हैं उसके और मेरे बीच कुछ नही है। मैं हूँ, मेरी सम्वेदनाएँ हैं, मेरी स्मृति है, मेरे स्वप्न हैं और धरती और आकाश है।
आकाश की ओर देखता हूँ: यह नीला है लेकिन यह वास्तव में नीला नही है यह जानता हूँ। यह जानता हूँ कि सूर्य से आने वाली दृश्य प्रकाश के नीले किरणों का सर्वाधिक प्रकीर्णन हो रहा है। चारो ओर देखता हूँ तो उस क्षितिज द्वारा बने वृत के केंद्र में स्वयम को पाता हूँ लेकिन मैं जानता हूँ कि यदि कोई दूसरा व्यक्ति मुझसे मात्र एक मिटर भी किसी भी दिशा में हट के खड़ा हो तो वह स्वयम को अपने द्वारा दृश्य अपने वृत के केंद्र में पाएगा। हमे यह समझने में वक्त लगा कि पृथ्वी इस ब्रह्मांड का केंद्र नही है हालांकि ऐसा प्रतीत होता है।
खैर, मुझे जो भी प्रत्यक्षीकरण अपनी ज्ञाननेंद्रियों के माध्ययम से हो रहा है क्या होता यदि मेरी इंद्रियां किसी और दिशा में विकसित हुई होती? क्या मुझे यह आकाश दिखता? क्या मुझे यह पृथ्वी दिखती? क्या मुझे इस हवा की सनसनाहट सुनाई देती जो अभी सुन रहा हूँ?
एक प्रश्न और आ रहा है मन मे, क्या हो यदि अचानक से मेरे मैं का यह मनोवैज्ञानिक बोध खत्म हो जाए? तब भी क्या मैं, मैं रहूंगा?
क्या हो यदि मेरी इंद्रियां लघु से लघु चीजें देखने लग जाएं?
तब क्या मैं अपनी भौतिक सीमा और मेरे इस भौतिक शरीर के बाहर जो कुछ भी है उसमें भेद कर पाऊंगा?आप कहेंगे कि हां अपनी संवेदना के कारण मैं भेद कर पाऊंगा लेकिन मुझे तो दो तीन साल पहले अपने पैर की एक उंगली का ही बोध किसी नर्व के दब जाने के कारण नही होता था। मेरे व्यवहारिक जीवन के लिए क्या ऐसा नही है कि प्रकृति ने मेरे और इस जगत के बीच का नर्व दाब कर रखा हो और यह उस नर्व का दबना भी महज मेरे जैविक विकास का परिणाम हो?
एक सम्भावना तो बनती है कि मैं कुछ और भी हूँ और मेरे सम्वेदना में आने वाला जगत भी कुछ और भी है।
कहीं सच मे मैं/यह जो है और जगत/वह जो है एक ही तो नही हैं?
आकाश की ओर देखता हूँ: यह नीला है लेकिन यह वास्तव में नीला नही है यह जानता हूँ। यह जानता हूँ कि सूर्य से आने वाली दृश्य प्रकाश के नीले किरणों का सर्वाधिक प्रकीर्णन हो रहा है। चारो ओर देखता हूँ तो उस क्षितिज द्वारा बने वृत के केंद्र में स्वयम को पाता हूँ लेकिन मैं जानता हूँ कि यदि कोई दूसरा व्यक्ति मुझसे मात्र एक मिटर भी किसी भी दिशा में हट के खड़ा हो तो वह स्वयम को अपने द्वारा दृश्य अपने वृत के केंद्र में पाएगा। हमे यह समझने में वक्त लगा कि पृथ्वी इस ब्रह्मांड का केंद्र नही है हालांकि ऐसा प्रतीत होता है।
खैर, मुझे जो भी प्रत्यक्षीकरण अपनी ज्ञाननेंद्रियों के माध्ययम से हो रहा है क्या होता यदि मेरी इंद्रियां किसी और दिशा में विकसित हुई होती? क्या मुझे यह आकाश दिखता? क्या मुझे यह पृथ्वी दिखती? क्या मुझे इस हवा की सनसनाहट सुनाई देती जो अभी सुन रहा हूँ?
एक प्रश्न और आ रहा है मन मे, क्या हो यदि अचानक से मेरे मैं का यह मनोवैज्ञानिक बोध खत्म हो जाए? तब भी क्या मैं, मैं रहूंगा?
क्या हो यदि मेरी इंद्रियां लघु से लघु चीजें देखने लग जाएं?
तब क्या मैं अपनी भौतिक सीमा और मेरे इस भौतिक शरीर के बाहर जो कुछ भी है उसमें भेद कर पाऊंगा?आप कहेंगे कि हां अपनी संवेदना के कारण मैं भेद कर पाऊंगा लेकिन मुझे तो दो तीन साल पहले अपने पैर की एक उंगली का ही बोध किसी नर्व के दब जाने के कारण नही होता था। मेरे व्यवहारिक जीवन के लिए क्या ऐसा नही है कि प्रकृति ने मेरे और इस जगत के बीच का नर्व दाब कर रखा हो और यह उस नर्व का दबना भी महज मेरे जैविक विकास का परिणाम हो?
एक सम्भावना तो बनती है कि मैं कुछ और भी हूँ और मेरे सम्वेदना में आने वाला जगत भी कुछ और भी है।
कहीं सच मे मैं/यह जो है और जगत/वह जो है एक ही तो नही हैं?
यह ब्रह्मांड क्यो है?
यह ब्रह्मांड क्यों है?
जब हम यह प्रश्न करते हैं तो इसका अर्थ क्या होता है? मेरे सामने यह पुस्तक क्यों है? क्योंकि इस पुस्तक के माध्ययम से मेरा एक प्रयोजन सिद्ध होना है। ब्रह्मांड के विषय मे जब हम क्यो का प्रश्न करते हैं तो हम अचेतन रूप से इस बात को मान रहे होते हैं कि ब्रह्मांड का प्रयोजन है लेकिन क्या हो यदि सत्य यह हो कि ब्रह्मांड का कोई प्रयोजन ही न हो और इस प्रकार ब्रह्मांड क्यों एक निरथर्क प्रश्न हो।
ब्रहांड बस हो जैसा बर्ट्रेंड रसेल कहते हैं। विश्व मे कोई प्रयोजनवत्ता नही हो और यह मात्र यांत्रिकता के नियम और सिद्धान्त से संचालित होता हो?
भौतिकी के आधुनिक सिद्धान्त हमे बताते हैं कि जगत में कोई प्रयोजन नही है। यह उस घड़ी की तरह है जिसका कोई न तो घड़ीसाज है न किसी के लिए ही यह निर्मित है: यह बस है,इसके पुर्जे आपस मे एक दूसरे से जुड़े हुए 14 खरब वर्षो से अनन्त(?) काल तक टिक-टिक-टिक-टिक।
हमारी बुद्धि यह आसानी से मान लेती है कि ईश्वर अपना स्वयम का कारण हो सकता है लेकिन जगत में प्रयोजन देखने को हम इतने अभ्यस्त हैं कि जगत भी स्वयम्भू हो सकता है यह बात हमे अटपटी लगती है लेकिन ऐसा क्यों नही हो सकता?
जगत अपने आप से अपनी रचना क्यो नही कर सकता? जगत अपने एकत्व से ही अपने अंदर के नानात्व को क्यो नही रच सकता?
मुझे पता है कि यदि इस चिंतन को थोड़ा और आगे ले जाऊं तो मुझे स्पिनोजा का ईश्वर मिल जाएगा अतः यहीं विराम क्योकि स्पिनोज़ा का ईश्वर प्रकृति के लिए बहुत हद तक भवाश्रित एक दूसरा शब्द है।
जब हम यह प्रश्न करते हैं तो इसका अर्थ क्या होता है? मेरे सामने यह पुस्तक क्यों है? क्योंकि इस पुस्तक के माध्ययम से मेरा एक प्रयोजन सिद्ध होना है। ब्रह्मांड के विषय मे जब हम क्यो का प्रश्न करते हैं तो हम अचेतन रूप से इस बात को मान रहे होते हैं कि ब्रह्मांड का प्रयोजन है लेकिन क्या हो यदि सत्य यह हो कि ब्रह्मांड का कोई प्रयोजन ही न हो और इस प्रकार ब्रह्मांड क्यों एक निरथर्क प्रश्न हो।
ब्रहांड बस हो जैसा बर्ट्रेंड रसेल कहते हैं। विश्व मे कोई प्रयोजनवत्ता नही हो और यह मात्र यांत्रिकता के नियम और सिद्धान्त से संचालित होता हो?
भौतिकी के आधुनिक सिद्धान्त हमे बताते हैं कि जगत में कोई प्रयोजन नही है। यह उस घड़ी की तरह है जिसका कोई न तो घड़ीसाज है न किसी के लिए ही यह निर्मित है: यह बस है,इसके पुर्जे आपस मे एक दूसरे से जुड़े हुए 14 खरब वर्षो से अनन्त(?) काल तक टिक-टिक-टिक-टिक।
हमारी बुद्धि यह आसानी से मान लेती है कि ईश्वर अपना स्वयम का कारण हो सकता है लेकिन जगत में प्रयोजन देखने को हम इतने अभ्यस्त हैं कि जगत भी स्वयम्भू हो सकता है यह बात हमे अटपटी लगती है लेकिन ऐसा क्यों नही हो सकता?
जगत अपने आप से अपनी रचना क्यो नही कर सकता? जगत अपने एकत्व से ही अपने अंदर के नानात्व को क्यो नही रच सकता?
मुझे पता है कि यदि इस चिंतन को थोड़ा और आगे ले जाऊं तो मुझे स्पिनोजा का ईश्वर मिल जाएगा अतः यहीं विराम क्योकि स्पिनोज़ा का ईश्वर प्रकृति के लिए बहुत हद तक भवाश्रित एक दूसरा शब्द है।
ब्रह्मांड और चांस
हमारी दुनिया चांस और प्रययिकता का परिणाम क्यो नही हो सकती?
रिचर्ड डॉकिन्स अपनी पुस्तक "द मैजिक ऑफ रियलिटी" में लिखते हैं कि चार मित्र ताश खेल रहे हैं: जब वह पत्ते शो करते हैं तो एक के पास 13 चिड़ी, दूसरे के पास 13 कला पान, तीसरे के पास 13 लाल पान और चौथे के पास 13 ईंट।
चारो आवक की यह ऑर्गनाइजेशन।
यह उन चारों को या हमे आवाक भले ही कर दे लेकिन यह सम्भव है 52 पत्तो को 536444737765488792839237440000 बार बांटा जाय तो 1 बार यह कॉम्बिनेशन आ सकता है। सबके पास एक ही प्रकार के तेरह पत्तो के रहस्य की तरह हमारा जगत इस प्रकार महज चांस और प्रययिकता का परिणाम क्यो नही हो सकता?
रिचर्ड डॉकिन्स अपनी पुस्तक "द मैजिक ऑफ रियलिटी" में लिखते हैं कि चार मित्र ताश खेल रहे हैं: जब वह पत्ते शो करते हैं तो एक के पास 13 चिड़ी, दूसरे के पास 13 कला पान, तीसरे के पास 13 लाल पान और चौथे के पास 13 ईंट।
चारो आवक की यह ऑर्गनाइजेशन।
यह उन चारों को या हमे आवाक भले ही कर दे लेकिन यह सम्भव है 52 पत्तो को 536444737765488792839237440000 बार बांटा जाय तो 1 बार यह कॉम्बिनेशन आ सकता है। सबके पास एक ही प्रकार के तेरह पत्तो के रहस्य की तरह हमारा जगत इस प्रकार महज चांस और प्रययिकता का परिणाम क्यो नही हो सकता?
अहमकेन्द्रिता
सन्निपात
●●●●●●
दो
हम बने ही ऐसे हैं कि प्रथम दृष्टया हमे लगता है कि हम सबके केंद्र में हैं। हम एक निर्जन स्थान पर हों तो हम उस वृत के जो हमारी आँखे देखती हैं उसके केंद्र में नज़र आते हैं। अपनी दृष्टि थोड़ी विस्तृत करें तो हमे हमारी पृथ्वी पूरे दृश्य आकाशगंगा के केंद्र में लगती है। अगर हम अपनी आकाशगंगा के परिप्रेक्ष्य से ब्रह्मांड को देखें तो फिर शेष दृश्य ब्रह्मांड के केंद्र में हमारी आकाश गंगा होती है।
हर जीव और जीवन के केंद्र में हमे अपना अस्तित्व और मानव जाति दिखती है जैसे यह सब हमारे लिए ही बना हो या हम सबसे महत्वपूर्ण, सबसे उच्च जीव हों लेकिन परिप्रेक्ष्य बदलिए और दृश्य बदल जाता है हालांकि परिप्रेक्ष्य बदलना बहुत हिम्मत का काम है क्योंकि यह हमारे अंदर एक भावात्मक तूफान खड़ा कर देता है। यह स्थिति बड़ी पीड़ादायी होती है और हम इससे बचना चाहते हैं इसीलिए हम अपने उस मिले, बने बनाए ककून में खुश रहते हैं।
अपनी अहमकेन्द्रित विष्मवस्था में खुश रहने में कोई दिक्कत नही है लेकिन किसी और को जो उस ककून को तोड़ कर बाहर निकलना चाहता है उसको संस्कृति, पूर्वज आदि की दुहाई देकर या कई बार उसके प्रति हिंसक होकर उसे रोकना बुद्धिमता और मानवीयता नही स्वार्थ है।चुकी उसके द्वारा उद्घाटित नया सत्य भी अंततः आपके अंदर वही पीड़ादायी भावात्मक तूफान ला सकता है अतः यह संस्कृति नही बल्कि छद्म रूप से आपके अपने उस ककून की रक्षा है।
परमसत, परमसत्ता आदि की जब हम बात करते हैं तो अचेतन रूप से हम एक गतिहीन, मानव केंद्रित जगत में विश्वास कर रहे होते हैं ज्यों मनुष्य जाति की कॉग्निटिव फेकल्टी और एस्थेटिक सेंस उस निरपेक्ष को जानने, उसके सौंदर्यबोध को विकसित है। निम्नतर जन्तुओ के कॉग्निशन की तुलना में हमारी यह फेकल्टी अवश्य विकसित है लेकिन आज से एक लाख वर्ष भविष्य में जो प्रजाति हमसे विकसित होगी उसकी तुलना में हमारी संज्ञानात्मकता, एस्थेटिक सेंस अत्यंत निम्न है; उनकी परमसत्ता कुछ और होगी क्योंकि परमसत्ता हमारे फ्रोन्टल लोब में रचा जाता है।
एक मित्र ने कहा कि आपके पूर्वज बंदर होंगे हमारे तो ऋषि थे। आज से एक दो लाख वर्ष भविष्य में स्वयम को प्रोजेक्ट करिए और देखिए हमसे विकसित कुछ लोग शर्म के मारे यह स्वीकार ही नही कर पा रहे हैं कि उनके पूर्वज मानव थे। उस समय "अरे आदमी" एक गाली है।
(किसी की भावना को ठेस पहचाना मेरा उद्देश्य नही लेकिन इस ककून में मेरा दम घुटता है)
मेरा परमसत्य
आदिम युगों से
सींचता रहा पत्थर को
इस गांठ में मिटता रहा मैं
घुट घुटकर अचेतन बन।
युग-युगांतर
तुमने दिए घुटन
मर्यादाएं कहकर।
तुम्हारे छद्म को
नकारता हूँ
मिट्टी हूँ मैं
यही परमसत्य है।
सींचता रहा पत्थर को
इस गांठ में मिटता रहा मैं
घुट घुटकर अचेतन बन।
युग-युगांतर
तुमने दिए घुटन
मर्यादाएं कहकर।
तुम्हारे छद्म को
नकारता हूँ
मिट्टी हूँ मैं
यही परमसत्य है।
ब्रह्म, परमसत और जैविक कंडीशनिंग
हममें अब्स्ट्रेक्शन, जेनरलाइजेशन और पैटर्न पहचानने का बोध अन्य जीवों से ज्यादा है जिसका कोई रहस्यात्मक कारण नही बल्कि विकास क्रम में मात्र यह एक सर्वाइवल उपकरण है। हमने आकाश को देखा उसके चमकते तारो में एक पैटर्न था, हमने अपने अगल-बगल की घटनाओं को देखा, उसमे एक पैटर्न था, हमने जेनरलाइजेशन किया, एब्स्ट्रैक्ट चिंतन की। हमारे पैटर्न पहचानने के बोध, सामान्यीकरण तथा अमूर्तकरण की क्षमता ने मिथक-दर्शन-विज्ञान आदि को जन्म दिया हैं, लेकिन फिर वही बात की यह मात्र हमारे सर्वाइवल टूल हैं; विज्ञान अब तक का सबसे बेहतर।
परमसत या परम सत्ता को जाना जा सकता है या यह है भी इसके बारे में मैं आश्वश्त नही हूँ। सब व्हाइट मैटर और ग्रे मैटर का खेल है और यह सफेद और भूरा गुदा इस प्रकार ऑर्गनाइज हुवा है कि हम मात्र बेहतर तरीके से वातावरण के साथ अनुकूलित हो सकें, हम और हमारी प्रजाति जिंदा रह सके। इस अनुकूलन में यदि कोई परमसत्ता आता है तो वह फिर परम-सत्ता है ही नही क्योकि वह, अनुकूलन, हमारे और हमारे प्रजाति के जीवित रहने के अभिप्रेरण से कंडिशन्ड है।
परमसत या परम सत्ता को जाना जा सकता है या यह है भी इसके बारे में मैं आश्वश्त नही हूँ। सब व्हाइट मैटर और ग्रे मैटर का खेल है और यह सफेद और भूरा गुदा इस प्रकार ऑर्गनाइज हुवा है कि हम मात्र बेहतर तरीके से वातावरण के साथ अनुकूलित हो सकें, हम और हमारी प्रजाति जिंदा रह सके। इस अनुकूलन में यदि कोई परमसत्ता आता है तो वह फिर परम-सत्ता है ही नही क्योकि वह, अनुकूलन, हमारे और हमारे प्रजाति के जीवित रहने के अभिप्रेरण से कंडिशन्ड है।
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