क्या यह आश्चर्य नही है कि ज्यों ही विज्ञान कदम बढ़ा कर प्रकृति के कुछ नए रहस्यों का उद्घाटन करता है, धार्मिक मंडनशास्त्री (अपोलोजेटिक) अपने अपने धर्मग्रन्थो से विज्ञानं की उस नयी खोज को अपने अपने धर्मग्रन्थो में ढूंढ निकालते है।
विज्ञान का अनुगामी बनने का क्या फायदा, जगत में कई ऐसे सवाल और वैज्ञानिक समीकरण मौजूद है जिनको हल करने की दिशा में विज्ञान प्रयासरत है तो मंडनशास्त्री अपने अपने धर्मग्रन्थों से उनका हल क्यों नही ढूंढ लाते?
पुनः विज्ञान तो कभी यह दावा नही करता की अमुक आध्यात्मिक-धर्मिक सत्य को तो हमारे वैज्ञानिकों ने तो अमुक विज्ञान की किताब में पहले ही उद्घाटित कर दिया था जबकि अक्सरहाँ धार्मिक मन्डनशात्रियों की यह बाध्यता होती है कि वह विज्ञानं की इस नई खोज का अपने धर्मशास्त्रों से समायोजन करे।
आखिर यह कौन सी मजबूरी है?
यह मजबूरी क्या इशारा करती है?
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वर्तमान में भौतिकी की सबसे बड़ी समस्या है सापेक्षता के सिद्धांत और क्वांटम सिद्धान्त का एकीकरण, इनका कोई एक आधार ढूंढ लेना जो दोनों की ही व्याख्या कर दे। यह सामान्य आधार मिला नही की हम गुरुत्वाकर्षण बल और अत्यंत छोटे कणों के मध्य लगनेवाले बलों का एक सामान्य बल ढूंढ लेंगे और इसका परिणाम होगा जगत-पदार्थ-समय-दिक्-ऊर्जा के उत्तपत्ति की व्याख्या।
सैद्धान्तिक भौतिकी में इन दो स्तम्भो: सापेक्षता और क्वांटम सिद्धान्त के सामान्य आधार को ढूंढने का प्रयास के फलस्वरूप हमारे पास स्ट्रीन्ग थियोरी जैसे सिद्धान्त मौजूद है और इसे और विकसित किया जा रहा है। शायद यह वैज्ञानिक मानको के अनुरूप इनके एकीकृत सामान्य सिद्धान्त की व्याख्या प्रस्तुत कर दे!
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है इसका हल किसी मन्डनशास्त्री के पास?
विज्ञान का अनुगामी बनने का क्या फायदा, जगत में कई ऐसे सवाल और वैज्ञानिक समीकरण मौजूद है जिनको हल करने की दिशा में विज्ञान प्रयासरत है तो मंडनशास्त्री अपने अपने धर्मग्रन्थों से उनका हल क्यों नही ढूंढ लाते?
पुनः विज्ञान तो कभी यह दावा नही करता की अमुक आध्यात्मिक-धर्मिक सत्य को तो हमारे वैज्ञानिकों ने तो अमुक विज्ञान की किताब में पहले ही उद्घाटित कर दिया था जबकि अक्सरहाँ धार्मिक मन्डनशात्रियों की यह बाध्यता होती है कि वह विज्ञानं की इस नई खोज का अपने धर्मशास्त्रों से समायोजन करे।
आखिर यह कौन सी मजबूरी है?
यह मजबूरी क्या इशारा करती है?
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वर्तमान में भौतिकी की सबसे बड़ी समस्या है सापेक्षता के सिद्धांत और क्वांटम सिद्धान्त का एकीकरण, इनका कोई एक आधार ढूंढ लेना जो दोनों की ही व्याख्या कर दे। यह सामान्य आधार मिला नही की हम गुरुत्वाकर्षण बल और अत्यंत छोटे कणों के मध्य लगनेवाले बलों का एक सामान्य बल ढूंढ लेंगे और इसका परिणाम होगा जगत-पदार्थ-समय-दिक्-ऊर्जा के उत्तपत्ति की व्याख्या।
सैद्धान्तिक भौतिकी में इन दो स्तम्भो: सापेक्षता और क्वांटम सिद्धान्त के सामान्य आधार को ढूंढने का प्रयास के फलस्वरूप हमारे पास स्ट्रीन्ग थियोरी जैसे सिद्धान्त मौजूद है और इसे और विकसित किया जा रहा है। शायद यह वैज्ञानिक मानको के अनुरूप इनके एकीकृत सामान्य सिद्धान्त की व्याख्या प्रस्तुत कर दे!
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है इसका हल किसी मन्डनशास्त्री के पास?
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