दुर्भाग्य से हमारी संस्कृति से उस ओर मुड़ गई जहाँ उपनामो का वजन व्यक्ति को दाबे रखता है वरना व्यक्ति हमारी इस महान संस्कृति की आंधी में ही उड़ कर गुमनाम हो जाएगा।
विडम्बना है कि हमने ऐसी सोंच विकसित कर ली है जिसमे अतीत का होना, एक महान अतीत का होना आवश्यक है।
और यह विडंबना केवल हमारी नही, किसी व्यक्ति की नही बल्कि मानवीय है।
उपनामो की संस्कृति ने तीन प्रकार की मानवीय अपसंस्कारो को जन्म दिया है:
1. उपनामो पर दम्भ करने की आत्ममुग्धता
2.उपनामो को बोझ मानने की विकृति
3.उपनामो की बराबरी के लिए तरस
दरअसल ये तीनो अपसंस्कार सांस्कृतिक बीमारीयां है और यह बीमारी कही बाहर से नही आई बल्कि हमारे खुद की संस्कृति के अंदर से आई है और इस बीमारी को अनपढ़ और जाहिलो ने जितना फैलाया है ठीक उतना ही पढ़े लिखे बुद्धिपिशाचों ने भी फैलाया है ।
मुझे एक अजीब सा विरोधाभास दीखता है समाज मे, पढ़ेलिखो के समाज में।
समाज के एक छोर् पर जातिगत पह्चान लिए खड़े व्यक्ति को बुद्धिजीवी लताड़ लगाते है और कहते है कि यह एक अनावश्यक बोझ है वही समाज के दूसरे छोर पर खड़े एक गुमनाम आदिवासी को वह उनका पूर्वज महिसासुर के रूप में ढूंढकर देते है और 'महिसासुर एक जननायक' किताब छपती है।
भाई जब जातिगत पहचान गलत है तो फिर यह बाभन के लिए और उस आदिवासी दोनों के लिए गलत है न?
अब आप खुद ही पूरा दम खम लगा कर आदिवासी, उस आदिवासी के लिए पहचान के नाम पर एक जातिगत इतिहास, उनकी जाति का इतिहास गढ़ते है।
आप एक ऐसी परिस्थिति का निर्माण क्यों नही करते जहाँ इतिहास ही अप्रासंगिक हो जाए?
नही दोहरे मानदंड बनाए रखना तो जरूरी है आपके लिए क्योकि आप को सामंजस्य तो दीखता ही नही केवल और केवल संगर्ष दीखता है और संघर्ष के लिए "दो" का होना तो आवश्यक है।
बुद्धिपिशाचो की इस दोमुही बात के प्रतिरोध में अपना उपनाम नही छोडूंगा!
विडम्बना है कि हमने ऐसी सोंच विकसित कर ली है जिसमे अतीत का होना, एक महान अतीत का होना आवश्यक है।
और यह विडंबना केवल हमारी नही, किसी व्यक्ति की नही बल्कि मानवीय है।
उपनामो की संस्कृति ने तीन प्रकार की मानवीय अपसंस्कारो को जन्म दिया है:
1. उपनामो पर दम्भ करने की आत्ममुग्धता
2.उपनामो को बोझ मानने की विकृति
3.उपनामो की बराबरी के लिए तरस
दरअसल ये तीनो अपसंस्कार सांस्कृतिक बीमारीयां है और यह बीमारी कही बाहर से नही आई बल्कि हमारे खुद की संस्कृति के अंदर से आई है और इस बीमारी को अनपढ़ और जाहिलो ने जितना फैलाया है ठीक उतना ही पढ़े लिखे बुद्धिपिशाचों ने भी फैलाया है ।
मुझे एक अजीब सा विरोधाभास दीखता है समाज मे, पढ़ेलिखो के समाज में।
समाज के एक छोर् पर जातिगत पह्चान लिए खड़े व्यक्ति को बुद्धिजीवी लताड़ लगाते है और कहते है कि यह एक अनावश्यक बोझ है वही समाज के दूसरे छोर पर खड़े एक गुमनाम आदिवासी को वह उनका पूर्वज महिसासुर के रूप में ढूंढकर देते है और 'महिसासुर एक जननायक' किताब छपती है।
भाई जब जातिगत पहचान गलत है तो फिर यह बाभन के लिए और उस आदिवासी दोनों के लिए गलत है न?
अब आप खुद ही पूरा दम खम लगा कर आदिवासी, उस आदिवासी के लिए पहचान के नाम पर एक जातिगत इतिहास, उनकी जाति का इतिहास गढ़ते है।
आप एक ऐसी परिस्थिति का निर्माण क्यों नही करते जहाँ इतिहास ही अप्रासंगिक हो जाए?
नही दोहरे मानदंड बनाए रखना तो जरूरी है आपके लिए क्योकि आप को सामंजस्य तो दीखता ही नही केवल और केवल संगर्ष दीखता है और संघर्ष के लिए "दो" का होना तो आवश्यक है।
बुद्धिपिशाचो की इस दोमुही बात के प्रतिरोध में अपना उपनाम नही छोडूंगा!
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