Wednesday, December 4, 2019

असुर महिषासुर

झारखण्ड के लातेहार और गुमला जिले में एक आदिम जनजाति पाई जाती है, असुर। जनजातियों में आदिम जनजाति वह होती है जो आज भी अत्यंत पिछड़ी है। झारखण्ड में असुर जनजाति के अलावा और 8 आदिम जनजातियाँ पाई जाती हैं हालांकि झारखण्ड में कुल 32 जनजातियाँ अस्तित्व में हैं। आदिम जनजातियां आज विलुप्ति के कगार पर हैं।
बोकारो में जहाँ मेरा पदस्थापन है वहां भी एक आदिम जनजाति पाई जाती है: बिरहोर। ये आज भी पत्तो से बने घरों में रहते हैं।
झारखण्ड में आदिवासियों का वर्गीकरण निम्न वर्गों में राँची विश्विद्यालय के नृवैज्ञानिक "विद्यार्थी" ने किया है:
1. हंटर-गेदरर- बिरहोर, कोरवा आदि
2. शिफ्टिंग एग्रीकल्चर- सौर पहाड़िया आदि
3. सिंपल आर्टिसन- करमाली, महली आदि
4. सेटल्ड अग्रिकलचरीस्ट- सन्थाल, ओरांव, मुंडा आदि

भाषाई वर्गीकरण के आधार पर झारखण्ड की जनजातियाँ दो वर्गों में विभाजित हैं:
1. द्रविड़ियन- ओरांव, माल्टो आदि
2.ऑस्ट्रोएशिएटिक- यथा सन्थाल, मुंडा, हो आदि।
असुर ऑस्ट्रोएशिएटिक भाषा बोलने वाले लोग हैं।

प्रश्न यह है कि क्या यह वही असुर हैं जिनका वर्णन हिन्दू धर्मशास्त्रों एवम आख्यानों में मिलता है?

इसका सीधा और सपाट उत्तर है कि नही। इन्हें एक विचारधारा विशेष के तहत हिन्दू आख्यानों में वर्णित असुरो के साथ सम्बध कर दिया गया है।  कभी इनके उपनाम 'असुर' का प्रयोग मिशनरी लेखको द्वारा अपने फायदे के लिए किया गया है, तो हाल में ही इनके इस उपनाम का उपयोग 'महिषासुर विवाद' को जन्म देने के लिए किया गया।
इसके लिए देवी द्वारा महिषासुर वध के पौराणिक आख्यान के समानांतर पुराणों के पुनर्पाठ के नाम पर एक नया मिथ गढ़ने का प्रयास किया गया जिसमें महिषासुर एक न्यायप्रिय राजा बनता है और उक्त पौराणिक आख्यान को आर्य अनार्य की थ्योरी के अनुरूप आर्यो द्वारा अनार्यो के ऊपर अत्याचार की एक कड़ी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

जे एन यू को इसका केंद्र बनाया जाता है और फिर जे एन यू समेत पूरे उत्तर भारत मे महिषासुर जयंती आयोजित की जाती है।

बहरहाल, असुर लोहा गलाने वाली जनजाति है। मानवता को लोहा गलाने की तकनीक सिखाने वाली विश्व के सबसे प्राचीन तकनीशियनों में यह अफ्रीका की कुछ जनजातियों की तरह यह सबसे प्राचीन तकनीशियन हैं।

इनका जीवन भठ्ठी के इर्द-गिर्द ही घूमता है। इनके कथा कहानियों में भट्ठी, इनके गीतों में भट्ठी। यही नही सन्थाल जो इनकी भांति ही प्रोट्रो ऑस्ट्रेलॉयड हैं बोंगा को कुछ चढ़ाते समय जो कथा कहते हैं उसके अनुसार असरों ने अपनी भट्ठी में सुप्रीम बोंगा को जलाने का षड्यंत्र किया था।
यह शायद इनके आपसी तनाव की अभिव्यक्ति है क्योंकि असुरो के विपरीत सन्थाल कृषि करने लगे।

संथाली और आसुरी भाषा मे एक शब्द है : बेरहासुर जिसका अर्थ होता है सूर्यास्त होना। बेरहा~ बेड़ा
ज्यों भोजपुरी में भी कहते हैं "बेरा डूब गइल"।

असुर अपनी भठ्ठी रात में ही जलाते है  क्योंकि रात में ही लोहा और इसके कचरे को अलग अलग पहचाना जा सकता है। सूर्य की रोशनी में यह विभेद नही किया जा सकता।
अतः यह रात में काम करने वाले लोग हैं। जब बेरहासुर हो जाए अतः हासुर~असुर।

यह व्याख्या सन्थाल आदिवासियों की सिंगा बोंगा अर्थात सूर्य का असुरो द्वारा अपनी भट्ठी में जलाने के प्रयास की कथा की भी व्याख्या कर देता है।


No comments:

Post a Comment

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...