मनुष्य अपने वातावरण को दूषित करता है, अपनी ज़मीन को बंजर बनाता है, अपनी नदियों को ज़हरीला बनाता है, हवा में विष घोलता है; मनुष्य उसी प्रकृति का विनाश करता है जिससे वह अस्तित्वमान है।
लेकिन, यह मनुष्य का ही स्वभाव नही है बल्कि यह जीवन का ही स्वभाव लगता है।
कल्पना करिए कि कोविड 19 पूरी मानव प्रजाति को मार देता है तो वह फिर स्वयम भी नष्ट हो जाएगा क्योकि मनुष्य से इतर अन्य किसी प्रजाति को वह अपनी प्रकृति, वह वातावरण बना ही नही सकता जिसमे वो स्वयम को रेप्लिकेट करे, अपना प्रतिरूप बनाए!
कोविड-19 की पृष्ठभूमि में तत्त्व व ज्ञानमीमांसा (एक)
कोविड 19 से उपजी वैश्विक आपात की पृष्ठभूमि "ज्ञान क्या है और इसका उद्देश्य क्या है", इस प्रश्न के उत्तर को ज्यादा स्प्ष्ट तरीके से देखा जा सकता है। मौजूदा आपात ज्ञानमीमांसा के कई प्रश्नों की उत्तर दे सकता है।
ज्ञान क्या है, कोई रहस्मय सत्ता/वस्तु जो हमे इसलिए मिला है कि हम मोक्ष का प्रयास करें?
यदि इस आपात स्थिति में इस प्रश्न पर विचार किया जाय तो इससे सम्बंधित इस प्रश्न का उत्तर भी बड़ी सहजता से मिल जाता है कि जीवन का क्या कोई इहलोक से इतर कोई ट्रांसेन्डेटल उद्देश्य है?
मोक्ष, निर्वाण, कैवल्य, पुरुष का प्रकृति के बंधनों से मुक्त होकर अपने आप मे स्थपित हो जाना, जन्नत, स्वर्ग, वैकुंठ आदि को जीवन पर कब्जा करके अज्ञानी ज्ञानियों द्वारा असल उद्देश्य के रूप में प्रचारित किया जाता है। इन अज्ञानी ज्ञानियों में तो कुछ अविद्या में इतने अंधे हो जाते हैं कि उनको इहलोक ही मिथ्या लगने लगती है।
इहलोक मिथ्या नही है क्योंकि उहलोक है ही नही और ज्ञान कोई रहस्य की वस्तु नही जिसे आपके असल सत्व आत्मा को परमात्मा से एकाकार का बोध कराना है।
ज्ञान अपने अस्तित्व, इहलौकिक अस्तित्व को बचाए रखने के लिए अंतर, अंतरा और परि प्रजातीय संघर्ष में उपजी एक उपकरण मात्र है और इसका आखरी और सबसे मूल उद्देश्य है अपनी प्रजाति की रक्षा।
यदि कोई ज्ञान सी दिखनेवाली चीज आपके अस्तित्व की, आपके प्रजाति के अस्तित्व की रक्षा नही कर पाती तो वह ज्ञान नही है।
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ध्यान रहे शंकर और बुद्ध के वक़्त कोविड 19 नही थी वरना उनका निष्कर्ष कुछ और होता!
कोविड-19 की पृष्ठभूमि में तत्त्व व ज्ञानमीमांसा (दो)
मनुष्य सच मे बहुत बेबस है कि मेरा ही अमिगडेला ज्यादा सक्रिय हो गया है! सड़क पर सामान्य से कम भीड़ देख कर लग रहा है कि हॉलीवुड की कोई एपोकैलिप्टिक फ़िल्म देख रहा हूँ। ट्रेन में अभी मात्र दस प्रतिशत लोग मास्क लगाए दिखे, अजीब लग रहे थे लेकिन हमारा मष्तिष्क हमारी चेतना, यदि यही स्थिति रही तो, मास्क में भी सौंदर्यबोध महसूस करने की माया रच लेगा। बहुत सी चीजो के लिए उसने अतीत में भी रचा है।
काश कि ईश्वर होता, काश एलियन होते जो इस घड़ी मानवों की मदद कर देते या काश हिमालय की किसी अज्ञात कंदरा में बैठा कोई महायोगी सामने निकल मनुष्य जाति पर आई इस आपात को खत्म कर देता!
अरे ये क्या, अतीत में कही ऐसे ही पुराण-मिथकों और ईश्वर ने मनुष्य के मन मे तो जन्म नही लिया है जैसे विशफूल चिंतन के लिए मैं बाध्य हूँ क्योंकि मैं वास्तव में डरा हुआ हूँ।
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