Monday, March 30, 2020

कोविड-19 की पृष्ठभूमि में तत्त्व व ज्ञानमीमांसा

मनुष्य अपने वातावरण को दूषित करता है, अपनी ज़मीन को बंजर बनाता है, अपनी नदियों को ज़हरीला बनाता है, हवा में विष घोलता है; मनुष्य उसी प्रकृति का विनाश करता है जिससे वह अस्तित्वमान है। 
लेकिन, यह मनुष्य का ही स्वभाव नही है बल्कि यह जीवन का ही स्वभाव लगता है।
कल्पना करिए कि कोविड 19 पूरी मानव प्रजाति को मार देता है तो वह फिर स्वयम भी नष्ट हो जाएगा क्योकि मनुष्य से इतर अन्य किसी प्रजाति को वह अपनी प्रकृति, वह वातावरण बना ही नही सकता जिसमे वो स्वयम को रेप्लिकेट करे, अपना प्रतिरूप बनाए!



कोविड-19 की पृष्ठभूमि में तत्त्व व ज्ञानमीमांसा (एक)

कोविड 19 से उपजी वैश्विक आपात की पृष्ठभूमि "ज्ञान क्या है और इसका उद्देश्य क्या है", इस प्रश्न के उत्तर को ज्यादा स्प्ष्ट तरीके से देखा जा सकता है। मौजूदा आपात ज्ञानमीमांसा के कई प्रश्नों की उत्तर दे सकता है। 

ज्ञान क्या है, कोई रहस्मय सत्ता/वस्तु जो हमे इसलिए मिला है कि हम मोक्ष का प्रयास करें?

यदि इस आपात स्थिति में इस प्रश्न पर विचार किया जाय तो इससे सम्बंधित इस प्रश्न का उत्तर भी बड़ी सहजता से मिल जाता है कि जीवन का क्या कोई इहलोक से इतर कोई ट्रांसेन्डेटल उद्देश्य है?
मोक्ष, निर्वाण, कैवल्य, पुरुष का प्रकृति के बंधनों से मुक्त होकर अपने आप मे स्थपित हो जाना, जन्नत, स्वर्ग, वैकुंठ आदि को जीवन पर कब्जा करके अज्ञानी ज्ञानियों द्वारा असल उद्देश्य के रूप में प्रचारित किया जाता है। इन अज्ञानी ज्ञानियों में तो कुछ अविद्या में इतने अंधे हो जाते हैं कि उनको इहलोक ही मिथ्या लगने लगती है। 
इहलोक मिथ्या नही है क्योंकि उहलोक है ही नही और ज्ञान कोई रहस्य की वस्तु नही जिसे आपके असल सत्व आत्मा को परमात्मा से एकाकार का बोध कराना है। 
ज्ञान अपने अस्तित्व, इहलौकिक अस्तित्व को बचाए रखने के लिए अंतर, अंतरा और परि प्रजातीय संघर्ष में उपजी एक उपकरण मात्र है और इसका आखरी और सबसे मूल उद्देश्य है अपनी प्रजाति की रक्षा।

यदि कोई ज्ञान सी दिखनेवाली चीज आपके अस्तित्व की, आपके प्रजाति के अस्तित्व की रक्षा नही कर पाती तो वह ज्ञान नही है।

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ध्यान रहे शंकर और बुद्ध के वक़्त कोविड 19 नही थी वरना उनका निष्कर्ष कुछ और होता!


कोविड-19 की पृष्ठभूमि में तत्त्व व ज्ञानमीमांसा (दो)

मनुष्य सच मे बहुत बेबस है कि मेरा ही अमिगडेला ज्यादा सक्रिय हो गया है! सड़क पर सामान्य से कम भीड़ देख कर लग रहा है कि हॉलीवुड की कोई एपोकैलिप्टिक फ़िल्म देख रहा हूँ।  ट्रेन में अभी मात्र दस प्रतिशत लोग मास्क लगाए दिखे, अजीब लग रहे थे लेकिन हमारा मष्तिष्क हमारी चेतना, यदि यही स्थिति रही तो, मास्क में भी सौंदर्यबोध महसूस करने की माया रच लेगा। बहुत सी चीजो के लिए उसने अतीत में भी रचा है। 

काश कि ईश्वर होता, काश एलियन होते जो इस घड़ी मानवों की मदद कर देते या काश हिमालय की किसी अज्ञात कंदरा में बैठा कोई महायोगी सामने निकल मनुष्य जाति पर आई इस आपात को खत्म कर देता!

अरे ये क्या, अतीत में कही ऐसे ही पुराण-मिथकों और ईश्वर ने मनुष्य के मन मे तो जन्म नही लिया है जैसे विशफूल चिंतन के लिए मैं बाध्य हूँ क्योंकि मैं वास्तव में डरा हुआ हूँ।

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Friday, March 13, 2020

आवारा विचार 【रिलिजयस टेक्स्ट्स】

रिलीजियस टेक्स्ट का आप लिटरल अर्थ लेकर समझ ही नही सकते। 
रिलिजयस टेक्स्ट की भाषा एक अलग स्तर की होती है, परत दर परत मायने, भाषा का असंज्ञानात्मक प्रयोग, विरोधाभास, टूटे, विचित्र और अजीबो गरीब वाक्य विन्यास, अपने ही अर्थ का अतिक्रमण करते हुए शब्द, चेतना के एक अलग स्तर पर जन्मी प्रतिकात्मताएँ, इतिहास की धूल, तत्कालीन समाज के स्वप्नों पर हजारों साल से हर नए समाज के स्वप्न की चढ़ती परतें, कुछ मृत हो चुके शब्द, कुछ शब्द जिनका कोई मानी ही नही, कुछ मानी जिनके लिए कोई शब्द ही नही, धर्मग्रन्थो को समझने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है जी!

आवारा विचार 【धर्म】

बनमानुषों ने कुछ खोजा ठीक है लेकिन, आज की पीढ़ी के लोग उन बनमानुषों  द्वारा उनके डर, स्वप्न, आशा, निराशा, पलायन, संघर्ष में ढूंढे गए उस कुछ के लिए अपने अंदर के मानुष की हत्या कर देते हैं, यह कुछ समझ मे नही आता; तब उन बनमानुषो द्वारा अपने अंदर के मानुष की हत्या करनी उनकी मजबूरी थी लेकिन आज का मानुष अपने अंदर के मानुष को मारे ये क्या बात हुई!

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Thursday, March 12, 2020

तफ्तीश

तफ्तीश
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संचार के माध्ययम में क्रांतिकारी परिवर्तन हो चुका था। पहले कबूतर के पैर में बांध कर सन्देश भेजे जाते थे जिसमें काफी समय लगता। अब चिड़िया की बीट से सन्देश प्राप्त हो जाता। यहाँ की चिड़िया से कहा नही की उससे जुड़ी जुड़ी वहाँ की चिड़िया ने बीट किया। 
बीटाधिकारी झट से बीट के कूट को सामान्य भाषा मे डिकोड करता और बादशाह के पास सन्देश हाज़िर।
ये बीटकर्मचारी आपस मे इस बीट को ट्वीट कहते।

बादशाह सलामत पिछली पहलवानी मे हार कर गद्दी से बाहर हो गए थे किंतु इस बार की पहलवानी में उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी कि लँगोट उतार ली और विजयी घोषित हुए। 

बादशाह सलामत को उनके निजी बीटाधिकारी ने आज एक चिड़िया के ट्वीट मतलब बीट को डिकोड करते हुए बताया कि आपके राज्य के फलाने सूबे के फलाने मौजा में एक आदमी की भूख से मौत हो गई है। 
महाराज विचलित हुए की प्रतिद्वंदी अब इस बात पर उनकी लँगोट खीचेंगे अतः उन्होंने अपने खाना मंत्री को तलब किया और उसे मामले की जांच कर दोषियों को दंड देने का हुक्म दिया।

वजीर ए खाना ने झटपट अपनी लश्कर सजाई और हकूमत के मरकज़ से वाकये की जगह को रवाना हो गए।

उधर जिस जगह यह वाकया हुवा था वहां के सूबेदार को उसके खबरी ने हांफते-हांफते खबर दी कि वजीर ए खाना आज मौत वाले वाकये की तफ्तीश करने आ रहे हैं।
सूबेदार साहब की सूबेदारी नई थी, कोई अनुभव नही अतः उनके हाथ पाँव फूल गए लेकिन उनके  चीफ किरानी ने मामला संभालते हुए कहा कि साहब घबराने कि कोई बात नही, हमने ऐसे कई वजीर देखे हैं, आप देखिए मैं कैसे मामला सम्भालता हूँ।

खानामंत्री और उनके लश्कर के लिए लज़ीज़ खाने और सबसे महंगी शराब का इंतज़ाम किया गया। एक व्यंजन का वो पहला कौर लेते नही की दूसरा व्यंजन हाज़िर रहता।
खाना मंत्री और उनके लश्कर पर इतना पैसा बहाया गया जितने में भूख से आगे कोई मरने वाला साल भर जिंदा रहता; शायद वो खाने के लिए ही मंत्री बने थे। आगे चलकर उन्हें भूख से मौत की जाँच के नाम पर दावत उड़ाने से रोकने के लिए रियाया उनका नाम बदलकर खाद्य सचिव कर देगी लेकिन प्रजा को यह नही मालूम कि बस उनका नाम बदलेगा। भूख से हुई मौत की जाँच के नाम पर दावत तो वो नाम बदलने के बाद भी उड़ाएंगे और अब पँच सितारा होटलों में महंगे और लजीज व्यंजन एवम महंगी शराब के साथ भूख से हुई मौतों की जाँच होगी!

खैर, अब रिपोर्ट बनाने की बारी थी। वजीर ए खाने ने अपने लश्कर में चल से क्लर्क से कहा कि लिखो उस आदमी कि मौत बीमारी से हुई और इस पर हकीम साहब से भी दस्तखत करवा लो।

बादशाह सलामत की चिड़िया ने अगले दिन बीट किया कि सल्तनत में सब ठीक है और वह एक कुदरती मौत थी।
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Monday, March 9, 2020

वासना

वासना
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हमारे मन की संरचना को इस दृष्टि से फ्रायड ने बड़े अच्छे से समझी-समझाई है। 
इड-ईगो-सुपरईगो

यह वासना इड को सामाजिकता के लिए बलिदान करते हुए सुपरईगो के स्तर का शब्द है।

सामाजिकता के लिए मौलिक प्रवृत्ति का बलिदान देना होता है और आप इसे एक अच्छा शब्द संस्कार कह लीजिए।

समस्या यह है कि एक व्यक्ति में इड-ईगो-सुपर ईगो हमेशा बैलेंस में नही रह पाता, इनमे संघर्ष होता रहता है। 
सुपरईगो इड को नियंत्रण में रखने के लिए कुछ माया रचता है, वासना एक ऐसा ही शब्द है।
भूख प्यास निंद तो जानवर में भी जैविक स्तर पर पाई जाती है, क्या उनमें वासना भी पाया जाता है?
नही, क्योकि यह जैविक चीज है ही नही बल्कि एक आवरण है उस व्यवस्था को संचालित करने के लिए जिसमे एक नर-एक मादा हो, वरना हम आपस मे ही लड़ मरेंगे, धर्म के लिए नही, पैसों के लिए नही, मादाओं के लिए।
लेकिन यह आवरण कोई धोखा नही है बल्कि मनुष्य में घटी एक बिल्कुल नवीन घटना है और मनुष्य मात्र जैविक स्तर पर ही नही बल्कि सांस्कृतिक स्तर पर भी अस्तित्वमान होता है।

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Saturday, March 7, 2020

बदफ़ैलसूफ़ियत

बदफ़ैलसूफ़ियत
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क्रिकेट में तेज गेंदबाजी के नियम जीवन के एक बहुत बड़े रहस्य को उजागर कर देते हैं: गेंद स्विंग करानी हो तो पेस से समझौता करना पड़ेगा और यदि पेस डालनी हो तो गेंद स्विंग नही होगी।
जीवन एक प्रवाह है, एक नदी, एक दरिया। या तो आपका जीवन अपने आप मे डूबकर (अयमात्मा ब्रह्म) बहुत गहरा हो जाएगा या यदि गहरा नही हुवा तो उस पठारी नदियों की तरह उच्छशृंखल, और किसी को भी थोड़ी सी बरसात में छू लेने वाला बन जाएगा। 
आप एक ही साथ गङ्गा और गर्गा नही बन सकते; एक विशेषता के साथ समझौता करना ही पड़ता है हाँ ये ज़रूर है कि यदि आपका जीवन गङ्गा बनता है तो लोग-बाग उसको छूने आते हैं। 
भारतीय दर्शन के महान ज्ञाता "एस एन दासगुप्ता" ने लिखा है कि भारतीय दर्शन ने वैविध्य की दिशा में जो खोया वो गहराई की दिशा में पा लिया, और चूंकि दर्शन भी, संस्कृती भी, निर्जीव नही होते, इनमे और मानवीय जीवन मे एक साम्य ढूंढा जा सकता है। गरज ये कि गहराई की दिशा में जो खो जाए उसे वैविध्य कि दिशा में प्राप्त किया जाय।

और चिंता की बात क्या, गर्गा का पानी भी गङ्गा की तरह सागर में ही मिलना है; पेस हो या स्विंग दोनों ही को या तो बैट्समैन मारेगा या आउट होगा।

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फिर से वही शेर

दानिशमंदी बादशाही न मालो असबाब की फिकर
घनचक्करी करता रहूँ, ज़िंदगी गुजरे मेरी फकीराना।

हद हद जपे सो औलिया, बेहद जपे सो पीर
हद अनहद दोनों जपै सो वाको नाम फकीर

प्रमाण ये रहा

प्रमाण ये रहा
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दीवार से रगड़ खाकर उसका हाथ छिल गया। क्रीम पाउडर जो लगाना था उसने लगाया और दो तीन बाद वहाँ पपड़ी (खोरठी) पड़ गई। 
पहले उसने उस पपड़ी को उंगली से स्पर्श किया, पपड़ी का खुरदुरापन उसे अच्छा लगा और इसलिए उसने पपड़ी को कई बार छुआ लेकिन, शीघ्र ही उसका मन भर गया। 
अब उसने पपड़ी को धीरे-धीरे नोंचना शुरू किया। बड़ी बारीकी से पपड़ी के एक कोने का चुनाव किया और नाखून लगाकर हल्का सा उसे उकसा दिया। काफी हल्का दर्द हुवा लेकिन उसे यह बात ज्यादा मज़ा दे रही थी कि उसकी पपड़ी उखड़ गई।
उसने पपड़ी को और नोचा लेकिन बीच मे पपड़ी की जख्म से पकड़ पक्की थी अतः ज्यादा दर्द होने लगा इसलिए उसने एक दूसरा तरीका अपनाया और पपड़ी के बीच के हिस्से को छोड़कर बाकी चारो तरफ से उसे नोचा। 
लेकिन, उफ, पपड़ी के बीच से जख्म से जुड़े रहते देखकर निकलती वो टीस!
उसने पपड़ी को तर्जनी और अंगूठा के बीच फँसा कर धीरे धीरे कभी वामावर्त तो कभी दक्षिणवर्त घुमाया और आखिर कार पपड़ी को नोच ही दिया। हालांकि पपड़ी के नीचे जख्म अभी जिंदा था जिसके कारण उसे दर्द भी हुवा और जख्म की सतह पर खून भी चला आया लेकिन उसको चेहरे पर संतोष का भाव था, जैसे उसने जग जीत लिया हो।
चूंकि उसने जग जीत ही लिया था तो अब जीत को भोगने की बारी थी अतः उसने पपड़ी को मुँह में रख लिया।

आप कहते हो कि क्या प्रमाण है कि हम पहले बंदर नही थे!



Wednesday, March 4, 2020

खलील जिब्रान को

खलील जिब्रान को
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खलील,
ओ खलील,
सुलग रहा है ओरफेलीज़,
फँसा उनके कब्जे में।
तुम्हारे अलमुस्तफ़ा से 
किसको मतलब,
किसको मकसूद तेरे
पयम्बर से।
चाह सबको बारूद की है।
तेरे किस्से,नज़्में ओ नसीहत,
किसी काम के न रहे,
बिक रहे बाजारों में ये
कौड़ियों के दाम या,
रौंदे जाते हैं बूटों के तले
उन बर्बरों के।
खलील, 
सुलग रहा है ओरफेलीज़।
ओ खलील!

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डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...