Friday, September 25, 2020

अर्थक्रियाकरित्व सत लक्षणम

(एक साथ--असंपादित)

फँक्शनल कॉन्सेप्शन ऑफ नॉलेज; रिप्लेसिंग ट्रुथ विथ यूज़फुलनेस 【एक】
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हम कुछ भी सीखते ही क्यों हैं इसका एक पंक्ति में उत्तर है सर्वाइव करने के लिए।  विकास क्रम में निम्न स्पीशीज में सम्बंधित बेहेवियर इंस्टिक्ट में होता है। एक मधुमक्खी अपना छत्ता बनाना कहीं सीखती नही है, यह उसके अंदर है। एक चिड़िया अपने घोंसले बनाने के लिए विश्विद्यालय नही जाती, उसके अंदर है। विकास क्रम में चेतना के विस्तारण के साथ, मन के इमर्ज होने के बाद, मस्तिष्क के और जटिल होने के बाद इंस्टिक्ट के अलावा लर्नड बिहेवियर इमर्ज होता है। अब सूचना हमारे इंस्टिंक्ट के बाहर भी स्टोर किया जा सकता है और बिना किसी जेनेटिक्स के इसको अगली पीढ़ी में ट्रांसफर किया जा सकता है।
इस जेनेटिक्स के बाहर उपस्थित सूचना का भी मूल अभिप्राय इंस्टिंक्टिव बिहेवियर की तरह सर्वाइवल ही है, अंतर मात्र यह है कि इस सूचना पर आधारित व्यवहार अतःस्फूर्त नही होता है।
विकास क्रम में उच्चतर जीव के आने के बाद व्यवहार का एक अनुषांगिक पक्ष भी होता है:
हमारे लिए भोजन मात्र स्वयम को जीवित रखने के लिए नही है, इससे सम्बंधित एक अनुषांगिक पक्ष भी है: स्वाद। और हम इसके लिए भी पाकशास्त्र सीखते है। सेक्स हमारे लिए अब मात्र अपनी प्रजाति को जीवित रखने का करण नही है, सेक्स अब हम मजा के लिए भी करते हैं।
ज्ञान का भी मात्र और मात्र सर्वाइवल मूल्य जो आज तक होता था, मानव में इससे सम्वन्धित एक अनुषांगिक पक्ष भी उभरता है और इसमें ज्ञान का सर्वाइवल मूल्य प्रमुख नही होता।

हममें अब्स्ट्रेक्शन, जेनरलाइजेशन और पैटर्न पहचानने का बोध अन्य जीवों से ज्यादा है जिसका कोई रहस्यात्मक कारण नही बल्कि विकास क्रम में मात्र यह एक सर्वाइवल उपकरण है। हमने आकाश को देखा उसके चमकते तारो में एक पैटर्न था, हमने अपने अगल-बगल की घटनाओं को देखा, उसमे एक पैटर्न था, हमने जेनरलाइजेशन किया, एब्स्ट्रैक्ट चिंतन की।  हमारे पैटर्न पहचानने के बोध, सामान्यीकरण तथा अमूर्तकरण की क्षमता ने मिथक-दर्शन-विज्ञान आदि को जन्म दिया हैं, लेकिन फिर वही बात की यह मात्र हमारे सर्वाइवल टूल हैं; विज्ञान अब तक का सबसे बेहतर।

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【दो】

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गणित सर्वाधिक व्यववस्थित व संरचनाकृत या स्ट्रक्चर्ड चिंतन है। भौतिकी गणित के माध्ययम से चिंतन मनन करती है। गणित के विषय मे दो मत हैं: हमारी चेतना इस सर्वाधिक स्ट्रक्चर्ड वे को   ब्रह्मांड, प्रकृति पर आरोपित करती है या दूसरे मत के अनुसार मैथमेटिक्स इज़ ऑलरेडी आउट देयर। 
खैर, जो भी हो भौतिकी के लिए गणित अपरिहार्य है। यदि समग्र भौतिकी से गणित निकाल दिया जाय तो भौतिकी अधिभौतिकी या मेटाफिजिक्स के आस पास आ जाती है या स्वयम ही मेटाफ़िजिक्स बन जाती है। 
ऐसा नही है कि इस मेटाफिजिकल चिंतन में गणित युक्त भौतिकी के निष्कर्ष नही आते लेकिन  अधिभौतिकी को भौतिकी के समान गणितीय चिंतन की अनुपस्थिति में जगत के ऊपर नियंत्रण स्थापित करने का करण नही बनाया जा सकता। 
ज्ञान का कार्य सामर्थ्यवान बनाना है शरणागत नही या ज्ञान यदि ज्ञेय से बिल्कुल डिटेचड़ हो तो भी वह ज्ञान एक बायोलॉजिकल बीइंग के रूप में हमारे लिए किस काम का?

अतः हमारे एक जैविक बीइंग के रूप में भौतिकी हमारे लिए अधिभौतिकी से अधिक, बल्कि बहुत अधिक उपयोगी है।

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फँक्शनल कॉन्सेप्शन ऑफ नॉलेज; रिप्लेसिंग ट्रुथ विथ यूज़फुलनेस  【तीन】

ज्ञान की आदर्श सीमा (आइंस्टिन)--क
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वैज्ञानिक प्रज्ञा जब दार्शनिक चिंतन करती है तो वह बड़ी सावधान होती है और उन बड़े बड़े दावों,   रसेल के शब्दों में बॉम्बेस्टिक नॉनसेंस, से बचते हुए बड़ी शालीनता से अपनी बात कहती है। 
वैज्ञानिक चेतना प्रायः निरपेक्ष और सत्य ज्ञान जैसे दार्शनिक सम्प्रत्यय के प्रयोग से बचती है। 
वस्तुतः वैज्ञानिक चेतना में निरपेक्ष, वास्तविकता आदि शब्दो का प्रयोग नही होता क्योकि वैज्ञानिक विधि में "आगमन की समस्या" "थ्योरी लैडननेस" और हमारी "संवेदनात्मक सीमितता" इसकी विधि में ही इन्हेरेंट है। इन कारकों की उपस्थिति में निरपेक्ष ज्ञान या यथार्थ आदि की बात करना आत्मव्याघात है।

हॉकिंग "समय का संक्षिप्त इतिहास" इस पंक्ति से प्रारम्भ करते हैं कि कही कोई एक ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक (कुछ के अनुसार बर्ट्रेंड रसल) ने खगोलशास्त्र पर एक पब्लिक व्य्याख्यान दिया। व्य्याख्यान की समाप्ति पर व्य्याख्यानशाला के पीछे की पंक्ति में बैठी एक बुजुर्ग महिला उठीं और उन ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक से कहा कि अब तक आपने जो कुछ भी बताया है वह कूड़ा है--असल मे विश्व एक बहुत बड़े कछुवे की पीठ पर रखी एक बहुत बड़ी थाली है---।
हॉकिंग आगे अपनी बात रखते हैं कि विश्व विषयक बहुत सारे प्रश्नों के जवाब आज हमारे पास है लेकिन हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए ये भी यह जवाब वास्तविक जवाब ही होंगे या उसी कछुआ और थाली की तरह एक हास्यास्पद नॉनसेंस यह केवल समय ही बता सकता है!
-----इतनी अनिश्चितता?
वास्तव में यह अनिश्चितता विज्ञान में समाहित है और यह अनिश्चितता हमे तबतक ही अजीब लग सकता है जबतक हम भौतिकी के सिद्धांतों को यूजफुल की बजाय सत्य माने। एक बार सत्य को यूजफुल से प्रतिस्थापित कर दिया जाय, यह अनिश्चितता हमे सहर्ष स्वीकार हो जाती है, कोई कॉग्निटिव डिज़ोनेंस उतपन्न नही होता क्योकि भविष्य में हमे और अधिक उपयोगी सिद्धान्त मिलते है न कि और अधिक सत्य।

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फँक्शनल कॉन्सेप्शन ऑफ नॉलेज; रिप्लेसिंग ट्रुथ विथ यूज़फुलनेस  【चार】

ज्ञान की आदर्श सीमा (आइंस्टिन)--ख
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क्या यह सम्भव नही है कि हम भौतिकी के माध्ययम से प्रतिज्ञप्तियों या प्रोपोजिशन्स का एक ऐसा तन्त्र रच रहे हों जो आपस मे सुसंगठित और  कोहरेन्ट तो हो किन्तु इस तंत्र के अनुरूप कोई वाह्य सता न हो अर्थात इस सुव्यस्थित, सुसंगठित और कोहरेन्ट तन्त्र के अनुरूप कोई कोरोस्पोंडेंस या संवादिता न हो? 
ऐसा सम्भव है की हमारी थ्योरी, हमारे मॉडल के अनुरूप एक्सटर्नल रियलिटी हो ही नही बावजूद इसके हमारी थ्योरी सेल्फ कंसिस्टेंट हो और काम कर रही हो। यहाँ काम करने और सेल्फ कंसिस्टेंट होने का अर्थ मात्र इतना है कि हमारी थ्योरी में प्रेडिक्टिव पावर हो, अपवादों की संख्या न्यूनतम हो तथा इस थ्योरी-तन्त्र के लिए कम से कम अज़्मप्शन्स बनाने पड़े।
आइंस्टीन के शब्दों में हमने घड़ी नही खोली किंतु घड़ी हमारे लिए काम कर रही है, घड़ी से सम्बंधित हमारी अवधारणाओं का तंत्र काम कर रहा है अर्थात हमारी थ्योरी सेल्फ कंसिस्टेंट है, इसमें प्रेडिक्टिव पावर है तथा यह हमारे आनुभविक जगत की घटनाओं की व्याख्या कर दे रहा है बावजूद इसके की हम घड़ी के अंदर नही झाँक सकते। आइंस्टीन इसे ही ज्ञान की आदर्श सीमा कहते हैं (एवोल्यूशन ऑफ फ़िजिक्स)

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"अर्थक्रियाकरित्व लक्ष्मण सत" 

सत के लक्षण के विषय मे कहा गया है-"अर्थक्रियाकरित्व सत लक्षणम"। अर्थ का अभिप्राय, प्रयोजन को पूर्ण करने का सामर्थ्य है। इसी आधार पर अनुवादकों ने  "प्रैगमटिज़्म" का अनुवाद "उपयोगितावाद" के साथ "अर्थक्रियावाद" भी किया है। अतः सत  प्रयोजन को पूर्ण करने के सामर्थ्य की स्थिति है।

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फँक्शनल कॉन्सेप्शन ऑफ नॉलेज; रिप्लेसिंग ट्रुथ विथ यूज़फुलनेस  【पाँच】
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विज्ञान का चरित्र छद्मविज्ञान से इस अर्थ में भी भिन्न होता है कि कालांतर में इसके पूर्वमान्यताओ की पृष्ठभूमि में प्रारम्भ किए गए अन्वेषण यदि किसी ऐसे निष्कर्ष की ओर ले जाते हैं जो अब उस पूर्वमान्यता से ही संगति नही रखते तो विज्ञान इन नवीन निष्कर्षो को अपनी पूर्वमान्यताओ में ही ढालने के लिए तोड़-मरोड़ नही करता बल्कि अपनी पूर्वमान्यता की ही जाँच करता है और उसमे अपेक्षित सुधार करता है। यदि सुधार से भी काम न बना तो फिर विज्ञान उनका परित्याग करने से भी नही हिचकता और एक नवीन पूर्वमान्यता को स्थापित कर उसे आगे के अनुसंधानों के लिए लिए पृष्ठभूमि में स्थापित करता है।
इस सन्दर्भ में दृष्टांत के लिए निरपेक्ष देश और काल, जिनमे घटनाएँ घटती थी, से जनरल रिलेटिविटी के उस देश-काल तक, जो मात्र कोई स्टेज न होकर घटनाओ में हिस्सा लेता है, की यात्रा बड़ी मनोरंजक है।
यहाँ दार्शनिक एक प्रश्न उठाते हैं कि क्या इस द्वितीय स्तर की पूर्वमान्यतावो के अस्तित्व में आने के बाद भी क्या यह कहा जा सकता है कि इन मान्यताओं के अनुरूप वाह्य जगत में भी वैसी ही सत्ता है? क्या यह सम्भव नही है कि हम प्रतिज्ञप्तियों या ज्ञान का एक ऐसा तन्त्र रच रहे है या हमारी बुद्धि हमसे धोखा करते हुए एक ऐसा ज्ञानतन्त्र रचवा रही हो जिसमें इस तंत्र के अव्ययों में संगति और सुसंगतता तो है किंतु उस पूर्वमान्यता के अनुरूप कोई सत्ता ही न हो?
अपनी बात को पुष्ट करते हुए एक ऐसे स्वप्न का उदाहरण दिया जा सकता है जिसमें सुख-दुख आदि की अनुभूति तो होती है किंतु यह बोध नही होता कि स्वप्न में हम स्वप्न-जगत में रहते हैं और उस स्वप्न के "मैं" मे भी मैं और जगत विषयक कुछ पूर्वमान्यता विद्यमान होती है।  
यहाँ व्यक्ति की "ज्ञान" विषयक क्या अवधारणा है यह निर्धारित करता है कि वह अज्ञेयवादी, संशयवादी, शून्यवादी, मायावादी या अर्थक्रियावादी विश्वदृष्टि अपनाएगा। 
वैज्ञानिक दृष्टिकोण ज्ञान के विषय मे एक अर्थक्रियावादी समझ रखता है। इसके अनुसार ज्ञान किसी अतीन्द्रिय सत्ता के निमित्त नही है बल्कि इसका केवल और केवल सर्वाइवल मूल्य है हालांकि विकास वृक्ष में अपनी अब तक सबसे विशिष्ट अवस्थिति के कारण मनुष्य इसका कुछ उपयोग ठीक उसी प्रकार अलग भी कर सकता है ज्यों हम अपने कंकाल तन्त्र और पेशी तन्त्र का उपयोग ब्रेकडान्स के लिए भी कर लेते है हालांकि हमारी पेशियाँ और कंकाल ब्रेक-डांस करने के निमित नही विकसित हुए।

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फ़िलोसॉफिकल एपिलेप्सी

फ़िलोसॉफिकल एपिलेप्सी 【एक】
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ज्ञान, बौद्धिक या आनुभविक उतना ही पारदर्शी और सत्य है जितना गुरुत्वाकर्षण या विकासवाद या E=Mc^2.।
ज्ञान ब्रह्मण्ड का ही हिस्सा है, उसी की एक घटना अतः ब्रह्मांड हमे धोखा नही देता बल्कि वह अपना असल स्वरूप ही दिखाता है, हाँ यह और बात है कि वास्तविकता की कई परते हैं लेकिन हर परत उतनी ही सत्य है जितनी कोई दूसरी, और यह ब्रह्मांड की विशेषता है।
क्लासिकल भौतिकी का डिटरमिनिज़्म  क्लासिकल स्तर पर उतना ही सत्य है जितना क्वांटम भौतिकी की अन्सरटेंती क्वांटम लेवल पर।

ज्ञान का मीमांसा दर्शन प्रतिपादित प्रभाकर के आख्यातिवाद  सिद्धान्त के अनुसार कोई भी ज्ञान असत्य नही होता मात्र अस्पष्ट होता है। ख्याति या  भ्रम वस्तुतः ज्ञान का अभाव नही, ज्ञान होने की प्रक्रिया का वह कदम है जहाँ ज्ञान पूरी तरह स्पष्ट नही हुवा है।

स्वप्न, जाग्रत और सुसुप्तावस्था की अनालोजी पर आधारित वेदांत तुरीयावस्था की कल्पना करता है क्योकि यह इन तीनो अवस्थाओं को एक दूसरे से पृथक और अलग मानता है लेकिन आधुनिक शोधों में यह निष्कर्ष आ रहे हैं कि स्वप्न हमारे जागृत जगत का ही विस्तार है और जब स्वप्न हमारे जागृत जगत के ही विस्तार हैं तो जागृत अवस्था की तुलना में स्वप्न मिथ्या कैसे?

ब्रह्म भी सत्य है और जगत भी उतना ही सत्य!

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फ़ॉलोसॉफिकल एपिलेप्सी : 【 दो】
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द कॉस्मॉस या एंथ्रोपिसिटी के कारण ए कॉस्मॉस इन द केयोस:
(The Cosmos or A cosmos in the Chaos due to
Anthropicity?)

भौतिकवाद या आज भूत द्रव्य की मौलिक स्तर की अनुपस्थिति के कारण प्रकृतिकी "फिजिकलिज़्म" का तार्किक निष्कर्ष वैज्ञानिक निहिलिज़्म होगा और वैज्ञानिक निहिलिस्म का मानवीय जीवन मे विस्तार करने पर यह दृष्टि सामने आती है कि जगत में जो व्यवस्था दिखाई देती है वह "केयोस" के अनायासिक स्वरूप के कारण उतपन्न, जीवन और चेतना में व्याप्त इसी आकस्मिकता का आवर्धित रूप है, जो केयोस के निःसार, असंगत, उद्देश्यहीन और अराजक स्वरूप को "फेथ" की उपस्थिति  में समग्र रूप से ढक लेता है।

निरुद्देश्य, यांत्रिक ब्रह्मांड में भला कोई नियम और व्ययवस्था या ऑर्डर कैसे हो सकता है?
यह ऑर्डर और नियमबद्ध नही वरन जिसे हम कॉस्मॉस कहते है वह विशुद्ध केयोस के किसी छोटे से हिस्से की तस्वीर है और मानव उस वेंटज पॉइंट पर खड़ा है जहाँ से उसे यह केयोस कॉस्मॉस दिखता है।

एक प्रयोग किया जा सकता है: हम ढेर सारे रंगों को लेकर बार-बार बेतरतीब ढंग से उसमे ब्रश डालकर बेतरतीब ढंग से कैनवास पर ब्रश चला कर एक केयोस रचे फिर ध्यान से देखने पर उसका कोई हिस्सा कही न कही पैटर्न बनाता दिखाई देता है। मनुष्य उसी पैटर्न देखने वाले वेंटज पॉइंट पर अस्तित्वमान है और वहां खड़े होकर उस पैटर्न को ही समग्र मान बैठता है और कभी भौतिकी के सहारे तो कभी दर्शन के सहारे उस पैटर्न को जो केयोस में एक्सीडेंट वश उभर गया, उस पैटर्न में एकत्व की खोज कर पूरे केयोस ओर आरोपित करने की भूल करता है।

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Saturday, September 12, 2020

गणित का दर्शन

गणित सर्वाधिक व्यववस्थित व संरचनाकृत या स्ट्रक्चर्ड चिंतन है। भौतिकी गणित के माध्ययम से चिंतन मनन करती है। गणित के विषय मे दो मत हैं: हमारी चेतना इस सर्वाधिक स्ट्रक्चर्ड वे को   ब्रह्मांड, प्रकृति पर आरोपित करती है या दूसरे मत के अनुसार मैथमेटिक्स इज़ ऑलरेडी आउट देयर। 
खैर, जो भी हो भौतिकी के लिए गणित अपरिहार्य है। यदि समग्र भौतिकी से गणित निकाल दिया जाय तो भौतिकी अधिभौतिकी या मेटाफिजिक्स के आस पास आ जाती है या स्वयम ही मेटाफ़िजिक्स बन जाती है। 
ऐसा नही है कि इस मेटाफिजिकल चिंतन में गणित युक्त भौतिकी के निष्कर्ष नही आते लेकिन  अधिभौतिकी को भौतिकी के समान गणितीय चिंतन की अनुपस्थिति में जगत के ऊपर नियंत्रण स्थापित करने का करण नही बनाया जा सकता। 
ज्ञान का कार्य सामर्थ्यवान बनाना है शरणागत नही या ज्ञान यदि ज्ञेय से बिल्कुल डिटेचड़ हो तो भी वह ज्ञान एक बायोलॉजिकल बीइंग के रूप में हमारे लिए किस काम का?

अतः हमारे एक जैविक बीइंग के रूप में भौतिकी हमारे लिए अधिभौतिकी से अधिक, बल्कि बहुत अधिक उपयोगी है।




गणित दर्शन (शून्य)
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आनुभविक विज्ञान के डोमिनेन्स के कारण सामान्यतया हम विज्ञान का अर्थ आनुभविक विज्ञान ही समझते है।
भौतिकी, रसायन, जीव विज्ञान आनुभविक विज्ञान हैं जबकि गणित और तर्कशास्त्र फॉर्मल विज्ञान की श्रेणी में आते हैं।

गणित में 2+2 हमेशा और हर जगह 4 ही होता है अतः इन फॉर्मल विज्ञानों में एक एब्सोल्यूट ट्रुथ मैजूद होता है इसके विपरीत आनुभविक विज्ञान में तीन कारणों से किसी एब्सोल्यूट ट्रुथ की कल्पना करना बेमानी होती है और ये तीन कारण है:
■हमारा संज्ञानत्मक/संवेदनात्मक सीमितता
■ आगमन की समस्या तथा
■थ्योरी लैडननेस
गणित के नियम और ट्रुथ निरपेक्ष होते हैं।
इसका कारण यह है कि गणित में इसके निष्कर्ष आधारवाक्य में निश्चित रूप से होते हैं और निष्कर्ष को बस निगमित किया जाता है वहीं आनुभविक विज्ञान में नया ज्ञान, नई प्रतिज्ञप्ति प्राप्त की जाती है।

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गणित दर्शन (एक)
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गणित के निष्कर्ष निरपेक्ष होते हैं अर्थात 2+2 =4 हर काल और देश मे सत्य है जबकि आनुभविक विज्ञानों के निष्कर्ष सम्भाव्य होते हैं इसका कारण यह है कि गणित के प्राक्कथन "पुनरुक्तियाँ" होती हैं। (रसेल)
एक ऐसा प्राक्कथन बनाया जा सकता है जो हमेशा सत्य ही होगा यथा:

आज या तो तीन तारीख है या तीन तारीख नही है

यह कथन हमेशा सत्य होगी क्योंकि यदि आज तीन तारीख है तो भी यह कथन सत्य है और यदि आज तीन तारीख नही है तो भी यह कथन सत्य है।

और इसीलिए गणित के निष्कर्ष हमेशा सत्य होते हैं।

एक गणितीय अभव्यक्ति में ऐसी कई चीजें इम्प्लाइड हो सकती हैं जिनको ढूंढने में दो चार जेनरेशन का समय लग जाए लेकिन इन ढूंढी गई चीजो को वह गणितीय अभव्यक्ति प्रेडिक्ट कर रही होती है। जगत विषयक किसी भी नवीन ज्ञान की स्थापना आनुभविक विज्ञान द्वारा ही होती है भले ही यह नवीन ज्ञान गणितीय रूप में सूत्रबद्ध हो।

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गणित दर्शन (दो)
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जगत में मात्र क्वांटिफिकेबल सत्ताएं ही नही है इसमें क्वालिटेटिव सत्ता भी है। लाल से सम्बंधित डेविड चालमर का चेतना का हार्ड प्रॉब्लम, क्वालिया की समस्या जो भी हो लेकिन लाल रंग को क्वांटिफाई किया जा सकता है। इसे इसके वेवलेंथ और फ्रीक्वेंसी कोरिलेट्स में संख्यात्मक रूप से व्यक्त किया जा सकता है। अभी भी बहुत सी घटनाएं, सत्ताएं, चीजें हैं जिनका क्वान्टिफिकेशन नही किया जा सकता है। सम्भवतः इनमे से कुछ चीजों का भविष्य में कोई कोरिलेट्स ढूंढ लिया जाय जिसको इन कोरिलेट्स के गणितीय मान से व्यक्त किया जा सके क्योंकि विज्ञान के विकास का आशय इस क्वान्टिफिकेशन के स्कोप का विस्तार करना है; किसने कल्पना की थी कि लालिमा को गणित में अभिव्यक्त किया जा सकता है! सम्भवतः कुछ चीजें ऐसी भी हों जिनका कभी क्वान्टिफिकेशन सम्भव ही न हो लेकिन तब यह भी नही कहा जा सकता कि उनका अस्तित्व नही है।
"वह बहुत लंबा है" इसमें "बहुत" को क्वांटिफाई नही किया जा सकता क्योंकि "बहुत" का कोई मानक नही है हालांकि क्वान्टिफिकेशन के पश्चात "लम्बा" का भी कोई अर्थ नही रह जाता: चीजो की लंबाई होती है जिनको इकाइयों में अभिव्यक्त किया जाता है।
यहाँ यह कहा जा सकता है कि "बहुत" "लंबा" आदि शब्द विषयनिष्ठ कंस्ट्रक्ट हैं और प्रकृति के परिप्रेक्ष्य में "लम्बा" प्रकृति का कोई अपना गुणधर्म नही है।
"वह लम्बा है" निश्चित रूप से यह एक क्वालिटेटिव प्रकथन है और "उसकी लम्बाई 180 सेंटी मीटर है" एक क्वांटिटेटिव। प्रश्न है कि हम कैसे मान लें कि 180 प्रेक्षक निरपेक्ष एक वस्तुनिष्ठ सत्ता है और यह "लम्बा" की भांति ही दस बीस की बजाय सभी मानवो का सब्जेक्टिव कंस्ट्रक्ट नही है जिसका तार्किक निष्कर्ष यह होगा की गणित हमारे अंदर है,  हमारी बुद्धि की संरचना में, वाह्य जगत में नही।

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गणित दर्शन (तीन)
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विश्व के कई महान गणितज्ञ महान दार्शनिक भी हैं; डेकार्ट, लिबिनितज़, रसेल, फ़्रेगे----- दोनों ही विधाएं अमूर्त चिंतन या एब्स्ट्रैक्ट थिंकिंग  के उच्चतम स्तर को उपयोग में लाती हैं। गणित ने दर्शन को चिंतन का मॉडल देने के अलावा कई दार्शनिक प्रश्न भी दिए हैं।

प्राचीन ग्रीक यह मानते थे कि ज्ञान का गणितीय मॉडल सर्वश्रेठ है। उनकी इस मान्यता के पीछे निम्न कारण थे:
 ◆ गणितीय ज्ञान निश्चित होता है। 2+2 किसी भी देश काल मे 4 ही होता है और इस ज्ञान की निश्चितता पर संदेह नही किया जा सकता।
◆ गणितीय ज्ञान में फलिबिलिज्म के लिए कोई जगह नही होती।
◆ गणितीय ज्ञान शाश्वत और निरपेक्ष होता है।
◆ गणितीय ज्ञान अनिवार्य होता है।

दार्शनिकों के लिए गणितीय ज्ञान एक पहेली उपस्थित करती है कि गणित के ज्ञान शाश्वत, अनिवार्य, निरपेक्ष और असन्दिग्ध क्यो होते हैं तथा बाकी डिसिप्लिन के ज्ञान गणितीय ज्ञान की तरह क्यो नही हो सकते।
बहरहाल गणितीय ज्ञान को ज्ञान का मॉडल मानने के कारण  वास्तविक ज्ञान का अर्थ ही वह ज्ञान समझा जाने लगा जिसमे उपरोक्त चारो विशेषताएं  उपस्थित हों। 

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गणित दर्शन (चार)
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निश्चित रूप से गणित ने दार्शनिकों को अनेक दार्शनिक प्रश्न व ज्ञान एवम चिंतन का एक मॉडल दिया है किंतु दार्शनिक इस प्रश्न से भी पज़ज़्ल्ड रहे है की गणित किसके बारे में है (व्हाट इज मैथेमेटिक्स अबाउट)
दो संतरे और तीन संतरे मिल कर पाँच संतरे होते हैं। 2+3=5 यहाँ संतरों के बारे में नही है बल्कि संतरों पर ऐप्लिकेबल है।
तो फिर यह किसके बारे में है? 
यह संख्याओं के बारे में है। 
लेकिन तब प्रश्न आता है कि ये संख्याएं क्या है।
संख्याओं पर जितना गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाता है ये उतने ही अस्पष्ट होते चले जाते हैं।
प्रतीत होता है कि संख्याएं वस्तुनिष्ठ सत्य के कंटेंट हैं तो क्या संख्याएं ऑब्जेक्ट/वस्तु हैं?
यदि संख्याएं ऑब्जेक्ट हैं तो ये एक विशेष प्रकार की वस्तुएं हैं: ये देश-काल में अस्तित्वमान नही हैं, ये हमारे देशीय-कालिय जगत के हिस्से नही हैं, ना इसका क्षरण होता है, न ये पुराने होते हैं और न ही किसी एक संख्या का विकास होता है।  बुद्ध का क्षणिकवाद इन्हें स्पर्श करता दिखाई नही देता, हीगल और मार्क्स की डायलेक्टिक्स से भी ये अछूते हैं,बिल्कुल सत चित आनंद के सत की तरह।

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गणित दर्शन (पाँच)
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गणितीय ज्ञान निरपेक्ष और सत्य होते हैं जबकि आनुभविक विज्ञानों से प्राप्त ज्ञान सापेक्ष और सम्भाव्य। गणितीय ज्ञान की इस विशेषता और चरित्र ने दार्शनिकों को काफी पज़ल्ड किया है और गणितीय ज्ञान तथा गणित की प्रकृति पर चिंतन करने को बाध्य किया है। 
जर्मन दार्शनिक कांट के गणित पर विचार काफी प्रभावी रहे हैं जिसके अनुसार गणितीय प्रतिज्ञप्तियां "संश्लेषणात्मक प्रागानुभविक" होने के कारण ये अनिवार्य रूप से सत्य व निरपेक्ष होती हैं।
काँट दो प्रकार की कथनों के बारे में बात करते हैं:
संश्लेषणात्मक तथा विश्लेषणात्मक।
विधलेष्णात्मक सत्य संश्लेषणात्मक सत्यों के उलट अनिवार्य रूपेण सत्य होते हैं।

संश्लेषणात्मक कथनों में दो अलग पदों या वस्तुओं या घटनाओं के बीच संश्लेषण होता है यथा: 
धातु गर्म होने पर पर फैलता है।
मच्छर काटने पर मलेरिया होता है।
यहाँ धातु और फैलने तथा मच्छर और मलेरिया के मध्य संश्लेषण हुवा है अतः ये संश्लेषणात्मक कथन हैं। ध्यातव्य है कि संश्लेषणात्मक सत्य आपतिक रूप से सत्य होते हैं।

एक और कथन लिया जा सकता है:
त्रिभुज के तीन भुजाएं होती हैं।
दुनिया के सारे कुवांरे अविवाहित हैं।
इन कथनों में दो घटनाओं या वस्तुओं के मध्य संश्लेषण नही हुवा बल्कि किसी एक वस्तु या घटना का ही विश्लेषण हुवा है अतः इस प्रकार के कथन विश्लेषणात्मक कथन हैं।

हम विधलेष्णात्मक कथन के इम्पोर्ट को और अधिक स्पष्ट करने के लिए जनरल रिलेटिविटी के इस समीकरण को लेते हैं: 

यह विश्लेषणात्मक कथन "कुंवारे अविवाहित होते हैं" की तर्ज पर ब्लैक होल, ग्रेविटेशनल वेव, ब्रह्मांड का नॉन स्टेटिक कैरेक्टर व ऐसी ही बहुत सारी चीजें बताता है।

काँट ज्ञान के दो प्रकार में भेद करते हैं: ए प्रिओराई तथा ए पोस्टीरिओराई (प्रागानुभविक और इंद्रियांनुभविक ज्ञान)

■प्रागानुभविक और इंद्रियांनुभविक ज्ञान

इसके पूर्व की उक्त दो ज्ञानो की चर्चा की जाय अनिवार्य सत्य और आपतिक सत्य की संकल्पना को समझना आवश्यक है।
दार्शनिक विमर्शों में "अनिवार्य" तथा "आपतिक" ये दो शब्द विशेषण के रूप में प्रयुक्त हैं: अनिवार्य सत्ता, अनिवार्य सत्य, आपतिक सत्ता, आपतिक सत्य आदि।

जगत के सम्बंध में एक प्रश्न किया जाता है कि इसकी सत्ता की प्रकृति कैसी है: अनिवार्य अथवा आपतिक अर्थात क्या जगत जैसा है वैसा उसे होना ही था या यह जैसा है उससे अलग भी हो सकता था।
यदि जगत जैसा है वैसा होना ही था तो जगत की सत्ता  इस अर्थ में एक अनिवार्य सत्ता है और यदि हम माने की जगत इस रूप से अलग रूप में भी विद्यमान हो सकता था तो तो इस संदर्भ में जगत की आपतिक सत्ता है।
गणितिय ज्ञान अनिवार्य होते हैं--दो और दो का जोड़ चार के अलावा कुछ और हो ही नही सकता। हमे कोई भी इंस्टेन्स नही मिल सकता जहाँ दो और दो का योग चार न हो जबकि गर्म करने पर धातुएं फैलती है के अपवाद मिलने की पूरी सम्भाव्यता है।
विज्ञान दार्शनिक कार्ल पॉपर तो फौलसिफिकेशन  को ही बल्कि वैज्ञानिक क्रिया मानते हैं। आशय यह कि विज्ञान का कार्य सचेतन रूप से इस कथन की पुष्टि की "गर्म होने पर धातुएं फैलती हैं" कि बजाय ऐसे अपवादों को ढूंढना है जिसमे गर्म होने पर धातुएं नही फैलती।

खैर, हम वापस प्रागानुभविक और इंद्रियांनुभविक ज्ञान पर आते हैं।

ज्ञान प्रतिज्ञप्तियों के माध्ययम से व्यक्त होता है। यद्यपि रहस्वादियो, धार्मिक व्यक्तियों द्वारा बहुधा ऐसे ज्ञान की बात भी की जाती है जिन्हें व्यक्त नही किया जा सकता। यह ज्ञान ज्ञाता का नितांत व्यक्तिगत और निजी होने के कारण ज्ञानमीमांसा के लिए इसका अपेक्षाकृत कम मूल्य है और यह मीमांसा के लिए प्रायः दुरूह है। 

प्रागानुभविक और इंद्रियांनुभविक शब्द का उपयोग मुख्यतया उन आधारों के संदर्भ में होता है जिन पर प्रतिज्ञप्तियों की रचना होती है।
प्रागानुभविक प्रतिज्ञप्तियों की रचना के लिए  न तो इन्द्रियानुभव की आवश्यकता  होती है और न ही इनके वेरिफिकेशन की आवश्यकता पड़ती है जबकि इंद्रियांनुभविक प्रतिज्ञप्तियों की रचना ही इंद्रियानुभव के माध्ययम से होती है। 
सरलता के लिए यूक्लिडियन ज्यामिति की स्वयमसिद्धियाँ को प्रागानुभविक ज्ञान के उदारहण के रूप में लिया जा सकता है।

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गणित दर्शन (छह)
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काँट के अनुसार गणितीय ज्ञान संश्लेषणात्मक प्रागानुभविक ज्ञान है और इसमे अवस्थित उक्त प्रागानुभविक तत्त्व के कारण ही गणितीय ज्ञान अनिवार्य और निरपेक्ष होते हैं।

प्रश्न है कि हम संश्लेषणात्मक  प्रगानुभओ को कैसे जानते है?

जो कुछ भी जाना जा सकता है अपने अस्तित्व के परिप्रेक्ष्य में ही जाना जा सकता है। अस्तित्व को ट्रांसेन्डेन्ट कर कुछ जाना ही नही जा सकता।

आधुनिक विज्ञान के जनक गैलीलियो का कथन है कि ब्रह्मांड गणित की भाषा  में लिखा गया है। निश्चित रूप से ब्रह्मांड गणित की भाषा मे लिपिबद्ध है लेकिन सवाल यह नही है बल्कि सवाल यह है कि  क्या हम गणित को ब्रह्मांड से लेते हैं या फिर हम ही गणित को ब्रह्मांड पर आरोपित करते हैं?
काँट कहते हैं कि हम गणित को ब्रह्मांड से नही लेते बल्कि गणित हमारे अंदर है। हम गणित के फिल्टर से ही जगत को देखते है और इसी कारण जगत की  भाषा हमे गणित दिखती है। 
काँट की मान्यता है कि गणित के दो विभाग हैं: ज्यामिति और अर्थमेटिक।
जगत देश और काल के ढांचे पर खड़ा है। हमारे ज्ञान की फेकल्टी के साथ अनिवार्य रूप से गुंथी हुई ज्यामिति - फिल्टर हमे जगत के देशीय आयाम का बोध देती है तथा अर्थिमेटिक-फिल्टर जगत के कालीय आयाम का।
या यूं कहें कि ज्यामिति हमारे देशीय अंत प्रज्ञा/इंट्यूशन एवम अरिथमेटिक हमारी कालीय या टेम्पोरल इंट्यूशन का हिस्सा है।

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चतुष्कोटी

जगत के ज्ञान के परिप्रेक्ष्य में चार सम्भावनाए बनती है:

◆ जगत वास्तव में है ही नही, इसे हमारी चेतना रच रही है।
◆ जगत है और यह जैसा और जहां तक वास्तव में है हमे वैसा और वहाँ तक ज्ञान होता है/हो सकता है।
◆ जगत है लेकिन हम इसको इसके वास्तविक स्वरूप में (जैसा वह है बिल्कुल वैसा) उसी सीमा तक जान सकते है, जहाँ तक जानने की आज़ादी जगत ने हमे दी है।
◆ जगत है लेकिन हम इसको इसके डिस्टिर्टेड रूप में ही जानने के लिए जगत द्वारा प्रोग्राम्ड हैं।

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कैसे प्रत्ययवाद भौतिकवाद की छाया मात्र है?

कैसे प्रत्ययवाद भौतिकवाद की छाया मात्र है?

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कल्पना कीजिए उस काल की जब हम पशुता से अभी अभी ऊपर उठे है और अभी भी हमारी सहज प्रेरण का स्थान हमारी तार्किकता ने नही लिया है।
क्या खाना है और क्या पीना है इसको तो हर पशु यहां तक की जीवन का सरलतम रूप अमीबा भी जानता है क्योंकि यह उसे जीवन के साथ गूंथा हुवा है।

मनुष्यो को भूख लगी है और शिकार पर गए है लेकिन तभी उनसे ताक़तवर जानवरो के झुण्ड ने उनपर हमला कर दिया है; मनुष्यो का झुण्ड प्राण बचाने के लिए भाग रहा है।
भूखे है मनुष्य तब भी भाग रहे है, सहज वृति!

इसी भागने के क्रम में मनुष्यों के उस झुण्ड का वह मनुष्य जिसकी घ्राण शक्ति अन्यो के मुकाबले तीव्र है एक ऐसी चीज को देखता है जो वृक्ष से जुडी दिखाई देती है और  उस चीज के गन्ध से यह स्वयं निर्धारित है कि वह एक खाद्य वस्तु है।

मनुष्यो का झुण्ड कही रुकता है और वह तीव्र घ्राण शक्ति वाला मनुष्य चुकी बुढ़ापे में भागने के कारण मरने को है, अपने साथियों से कहता है कि एक वस्तु है अमुक जगह पर जिससे भूख मिटाई जा सकती है।

वृद्ध की मृत्यु के पश्चात और उन जानवरो के गुजर जाने के बाद मनुष्यो की टोली वहां पहुंचती है और उस वृद्ध के कथनानुसार देखती है कि हाँ कुछ लगा तो है।
मनुष्यो की टोली उस चीज को तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाती है लेकिन यह क्या- वह चीज तो पकड़ में ही नही आ रही। यह चीज तो न पत्थर से कट रही है और न ही धात्विक हथियारों से।
इसे तो अग्नि भी नही जला पा रही है।

मनुष्यो की टोली में से कुछ मनुष्य निराश है लेकिन कुछ शब्द प्रमाण को मानते है इसलिए वह प्रयास करना नही छोड़ेंगे।
अब चुकी वह चीज उन्हें मिल नही रही है अतः उस चीज को, स्वयं को और उससे अपने सम्बन्ध को पुनर्परिभाषित करते है: यह न प्राप्त होने वाली चीज वास्तव में हमेशा के लिए भूख खत्म कर देगा-हाँ, हाँ इसीलिए हम इसे पकड़ नही पा रहे इत्यादि इत्यादि (मोक्ष त्रिविध दुःखो का आत्यंतिक विनाश है)
काल बीतता जा रहा है और मनुष्यो ने भूख मिटाने के लिए खेती करना सीख लिया है लेकिन जीवन का असल उद्देश्य तो अब हमेशा के लिए भूख को मिटा देने वाले उस वस्तु (यहां हम उसको फल कह सकते है) को प्राप्त करना है।
वह फल उन्हें अब भी नही मिलेगा क्योंकि वह उस समय से उस वृक्ष की छाया पर लगे फल की छाया को पकड़ने का प्रयास कर रहे हैं। लाख कोशिश कर लीजिए आप उस फल से उतपन्न संवेदना को उसकी छाया छूकर महसूस कर ही नही सकते (यते वाचो निवर्तन्ति अप्राप्य मनसा सह)

नज़र बदल दीजिए आपको आज भी वह वृक्ष और वह फल दिखेंगे लेकिन सावधान, वह घण्टे दो घण्टे के लिए भूख मिटा सकता है हमेशा के लिए नही!

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इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप

मुझे लगता है कि मैं समझ गया हूँ कि  लाईट माइक्रोस्कोप के लिमिटेशन को इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप कैसे दूर करता है। 

इंटर आदि में जो पढ़ना था पढ़ लिया किन्तु अब कल इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप का नाम सुना तो नाम सुनते ही मस्तिष्क ने प्रश्न किया कि प्रोटोन माइक्रोस्कोप क्यो नही? 
मस्तिष्क ने ही उत्तर दिया कि क्योकि प्रोटोन का साइज इलेक्ट्रॉन के साईज से बहुत बड़ा होता है। 
किसी छोटी चीज पर प्रोटोन बीम को टकराने से हो सकता है कि प्रोटोन को टकराने के लिए कम से कम वो चार छोटी चीज की ज़रूरत हो और हमे अधयन्न करना है उस अकेली छोटी चीज का उसके आईशोलेशन में अतः इलेक्ट्रॉन बीम ही ठीक रहेगा।

अब लाईट माइक्रोस्कोप का क्या लिमिटेशन था कि इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की ज़रूरत पड़ी?

विसिबल लाईट का वेवलेंथ यदि अध्ययन करने वाली चीज के साईज से बड़ी होगी तो लाईट तो सीधे आगे बढ़ जाएगी जबकि उस चीज को देखने के लिए लाईट को उस चीज से टकराकर हमारी आँखों तक पहुंचना होता है। 

इलेक्ट्रॉन के बीम के केस में इसकी वेवलेंथ छोटी होगी और इसे उस छोटी चीज से टकराकर एक सेंसेटिव स्क्रीन पर रिकार्ड किया जा सकता है जहां चीज की बनावट के हिसाब से सेंसेटिव स्क्रीन पर पैटर्न बनेगा और हमारी चीज, वह छोटी चीज हमे दिख जाएगी।

लेकिन फिर मस्तिष्क ने प्रश्न किया----क्या हम एक्स रे, गामा रे माइक्रोस्कोप नही बना सकते?

मुझे लगता है बना तो सकते हैं लेकिन पता नही वो छोटी चीज इन हाई एनर्जी रेज़ को सह भी पाएंगी की नही!
★★★

मैं बड़ा खुश की कुछ नया सोच रहा हूँ किन्तु गूगल किया और---यह पहले से ही सोचा जा चुका है।
खैर इस बात की खुशी है कि साइंटिफिकली सोचने लगा हूँ!


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द्वैत-अद्वैत

हमारा अनुभव इस बात की गवाही देता रहा है कि हमारे अनुभव में आया द्वैत सत्ता की गहराइयों में उतरते ही तिरोहित हो जाता है और हमे सत्ता के इस नए रूप को संज्ञा देने हेतु नवीन शब्द नवीन भाव की आवश्यकता होती है। सामान्य जीवन, सामान्य अनुभव का कण-तरंग का द्वैत मौलिक स्तर पर युग्मित हो जाता है। दिक और काल का विभाजन दिक्काल बन जाता है। पार्टिकल फिजिसिस्ट अपने दार्शनिक मोड में इसे सत्ता की वास्तविक सच्चाई कहने की जगह लेयर्स ऑफ रियलिटी कहना ज्यादा पसंद करते हैं। दोनों ही बाते सत्य हैं: इलरक्ट्रॉन पार्टिकल भी है और वेव भी और पार्टिकल-वेव भी, बस ये बाते रियलिटी या सत्ता के विविध स्तर की अभिव्यक्तियां है।
यह तो हुई एक बात! अब इस घटना पर की सत्ता की गहराईयों में द्वैत का अद्वैत हो जाना एक नए विचार को भी जन्म देता है, एक नए प्रश्न भी सामने खड़े कर देता है: कही वास्तव में ये अभिव्यक्तियां कण, तरंग, कण-तरंग और इलेक्टोन हमारे परिप्रेक्ष्य से हमारी चेतना द्वारा हमारे काम के लिए रचित करणमात्र ही तो नही हैं अर्थात "एन्टी रियलिस्ट थ्योरी ऑफ साइंस!"

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समकालीन सैद्धांतिक भौतिकी की पाँच अनसुलझी समस्याएं

समकालीन सैद्धांतिक भौतिकी की पाँच अनसुलझी समस्याएं:

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■ क्वांटम ग्रेविटी की समस्या: समकालीन दो आंशिक सिद्धांतो, सापेक्षता और क्वांटम सिद्धान्त का एकीकरण कर ब्रह्मांड विषयक एक सिद्धान्त की खोज।

■ क्वांटम मैकेनिक्स के आधार में उपस्थित समस्याओं को सुलझाना। वास्तविकता यह है कि क्वांटम मैकेनिक्स का क्या अर्थ है यह किसी को सही रूप से नही मालूम।
एफ एस सी नॉर्थरोप "साइंस एंड फर्स्ट प्रिंसिपल" में लिखते हैं: वर्तमान युग मे तकनीकी वैज्ञानिकों के सामने ऐसे समीकरण हैं जिनकी व्यख्या वे स्वयम नही कर पाते तथा कुछ ऐसे सिद्धान्त भी है जिन्हें वे बिना दार्शनिक रंग चढ़ाए बोधगम्य नही बना पाते, परंतु इसे उनके कुछ सहयोगी स्वीकार नही करते। यदि स्पष्ट रूप से कहा जाय तो वैज्ञानिक अपनी खोजो को स्वयम ही सही रूप से नही समझते क्योकि प्रथम सिद्धान्त जो तकनीकी खोजो को बुद्धिगम्य बनाते है वह स्वयम एक अस्थिर स्थिति में हैं।"

■ सैद्धांतिक भौतिकी की तीसरी समस्या यह सुनिश्चित करना है कि विविध कणों और अन्तःक्रियाओ को समेट कर एक किया जा सकता है कि नही ताकि यह बताया जा सके कि ये सब एक मौलिक एन्टिटी की अभिव्यक्ति हैं या नही हैं।

■ चौथी समस्या इस बात की व्याख्या है कि स्टैंडर्ड मॉडल ऑफ पार्टिकल फ़िजिक्स के अंतर्गत मुक्त नियतांकों (फ्री कांस्टेंट्स) का मान प्रकृति में वही क्यो होते हैं।

■ पांचवी समस्या डार्क मैटर और डार्क एनर्जी की व्याख्या है।

इन पाँच प्रश्नों को लिए समय रूपी यक्ष खड़ा है और इन प्रश्नों के उत्तर के बाद ही भौतिकी को यह यक्ष मुक्त करेगा और कुंती की प्यास बुझेगी!
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ब्रह्मांडोतपत्ति

सत तम रज की 
साम्यवस्था या 
क्वांटम विचलने,
ऊर्जा का नृत्य,
कण-प्रतिकण के जन्म-मृत्यु
विकृति की लय, 
प्रकृति का साज,
निरपेक्ष अनस्तित्व का
अस्तित्व बन जाना, 
ब्रह्मांड की उतपत्ति!
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फ़िलोसॉफिकल एपिलेप्सी 【एक】

फ़िलोसॉफिकल एपिलेप्सी 【एक】
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ज्ञान, बौद्धिक या आनुभविक उतना ही पारदर्शी और सत्य है जितना गुरुत्वाकर्षण या विकासवाद या E=Mc^2.।
ज्ञान ब्रह्मण्ड का ही हिस्सा है, उसी की एक घटना अतः ब्रह्मांड हमे धोखा नही देता बल्कि वह अपना असल स्वरूप ही दिखाता है, हाँ यह और बात है कि वास्तविकता की कई परते हैं लेकिन हर परत उतनी ही सत्य है जितनी कोई दूसरी, और यह ब्रह्मांड की विशेषता है।
क्लासिकल भौतिकी का डिटरमिनिज़्म  क्लासिकल स्तर पर उतना ही सत्य है जितना क्वांटम भौतिकी की अन्सरटेंती क्वांटम लेवल पर।

ज्ञान का मीमांसा दर्शन प्रतिपादित प्रभाकर के आख्यातिवाद  सिद्धान्त के अनुसार कोई भी ज्ञान असत्य नही होता मात्र अस्पष्ट होता है। ख्याति या  भ्रम वस्तुतः ज्ञान का अभाव नही, ज्ञान होने की प्रक्रिया का वह कदम है जहाँ ज्ञान पूरी तरह स्पष्ट नही हुवा है।

स्वप्न, जाग्रत और सुसुप्तावस्था की अनालोजी पर आधारित वेदांत तुरीयावस्था की कल्पना करता है क्योकि यह इन तीनो अवस्थाओं को एक दूसरे से पृथक और अलग मानता है लेकिन आधुनिक शोधों में यह निष्कर्ष आ रहे हैं कि स्वप्न हमारे जागृत जगत का ही विस्तार है और जब स्वप्न हमारे जागृत जगत के ही विस्तार हैं तो जागृत अवस्था की तुलना में स्वप्न मिथ्या कैसे?

ब्रह्म भी सत्य है और जगत भी उतना ही सत्य!

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ब्रह्मांड फैल रहा है

ब्रह्मांड फैल रहा है।
किसमे?
शायद अपने आप मे या
शायद निरपेक्ष अनस्तित्व में या
हम नही जानते, लेकिन
ब्रह्मांड फैल रहा है!
समस्या यह है कि
जब पूछते हैं यह प्रश्न
हम ब्रह्मांड के पूर्व
दिक का अस्तित्व मान लेते है जबकि
दिक तो स्वयं ब्रह्मांड की रचना है,लेकिन
ब्रह्मांड फैल रहा है!
डार्क एनर्जी इसके फैलाव को
त्वरित कर रही है
रस्साकशी भी है डार्क एनर्जी
और ग्रेविटी में!
ग्रेविटी जीतेगी तो
समा जाएगा ब्रह्मांड उसी में
जहाँ से वह निकला और उसके पूर्व
चारो बल जुड़ जाएंगे एकसाथ
विशाल लघु हो जाएगा और
यदि जीतती है गहन ऊर्जा गुरुत्व से
टूट जाएंगे सारे कण
अणु परमाणु
और तब पता नही क्या होगा
हम नही जानते!!
शायद हमसे विकसित 
किसी नए जीव को
उत्तर पता हो इसका!!!
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ओल्बर का पैराडॉक्स

ओल्बर का पैराडॉक्स
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रात्रि का अंधकारमय होना भी इस बात की गवाही है कि ब्रह्मांड फैल रहा है और इसका जन्म अनन्त काल मे नही बल्कि सीमित समय सीमा  में हुवा है। यदि ब्रह्मांड फैल नही रहा होता या इसका अस्तित्व अनन्त काल से होता तो रात्रि आकाश अंधकारमय होने के बजाय दृश्य प्रकाश से भरा होता। 

एक जर्मन खगोलविद हेनरिक ओल्बर (1758-1840) ने एक पैराडॉक्स का उल्लेख किया। इस पैराडॉक्स को ओलवर्स पैराडॉक्स के नाम से जानते हैं। ओल्बर के काल मे ब्रह्मांड को अनन्त और गतिहीन माना जाता था; ध्यातव्य है कि 1922 के पहले हमारी मंदाकिनी आकाश गंगा को की सम्पूर्ण ब्रह्मांड माना जाता था। 
ओल्बर ने कहा कि यदि ब्रह्मांड अनन्त और गतिहीन है तो फिर रात्रि आकाश को प्रकाश से भरा होना चाहिए। चूंकि रात्रि आकाश प्रकाश से भरा हुआ नही है अतः ब्रह्मांड विषयक यह मान्यताएं की वह अनन्त है तथा वह गतिहीन है, गलत हैं।

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मल्टीवेवलेंथ यूनिवर्स 【दो】

मल्टीवेवलेंथ यूनिवर्स 【दो】
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क्या आपको पता है कि हमारी काली स्याह रातें भी प्रकाश के एक रूप से भरी पड़ी हैं? प्रकाश का यह रूप हर जगह और हर क्षण मौजूद है बस हम नग्न आँखों से इसे देख नही पाते। यह बिग-बैंग से जन्मा प्रकाश था:  आज बिग बैंग की सुलगन !

ब्रह्मांड के फैलाव के कारण इस प्रकाश के तरंगदैधर्य का फैलाव आज तक 1000 के फैक्टर से होने के कारण यह आज माइक्रोवेव के रेंज में चली गई हैं।


मल्टीवेवलेंथ यूनिवर्स'बहुतरंगदैधर्यी ब्रह्मांड' : एक

मल्टीवेवलेंथ यूनिवर्स
'बहुतरंगदैधर्यी ब्रह्मांड' :【एक】
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ऊर्जा--! 
तब जगत में केवल ऊर्जा थी। 
ऊर्जा मैटर और एंटीमैटर में टूटती और पुनः ये जोड़े अनिहिलेट होकर प्रकाश बन जाते और ये क्रीड़ा चलती रहती थी। लेकिन ब्रह्मांड फैल रहा था और ठंढा भी हो रहा था और ऊर्जा अपने  विविध रुपों में, विविध तरंगदैध्र्य और आवृत्ति में स्वयम को अभिव्यक्त कर रही थी।और फिर किसी अज्ञात कारण से मैटर-एंटीमैटर की सिमिट्री टूट गई :प्रत्येक एक अरब एंटीमैटर पार्टिकल पर एक एक्ट्रा मैटर पार्टिकल बन जाते और इस तरह अलख ब्रह्मांड के समग्र मैटर की उतपत्ति हुई -मौलिक कण बने--बोसॉन--फर्मियोन--परमाणु--अणु--ब्रह्मांडीय धूल-तारे--आकाशगंगा और हम।
हमारा आना हालांकि महज एक ब्रह्मांडीय दुर्घटना थी, एक संयोग, एक चान्स लेकिन यह एक अद्भुत घटना थी। एक छोटे से फल ने सम्पूर्ण वृक्ष पर विचार करना आरंभ कर दिया। ब्रह्मांड का एक अंग शेष अंगों को लेकर जिज्ञासु हो उठा।
इस बार मैटर-एंटीमैटर की जगह 'ज्ञाता-ज्ञेय' का युग्म अस्तित्व में आया।

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सांख्य दर्शन के अनुसार सर्ग और प्रतिसर्ग व आधुनिक कॉस्मोलॉजी

भूमिका: त्रिगुणात्मिका प्रकृति की साम्यवस्था भंग हुई ब्रह्मांड का विकास हुवा और मैं पुरुष प्रकृति में  फँस गया।

प्रकृति की साम्यवस्था का भंग होना ही बिग बैंग है क्या और लॉरेंस क्रॉस एवम पीटर अटिक्सन का एब्सोल्यूट नथिंगनेस या निरपेक्ष अनस्तित्व ही त्रिगुणात्मिका प्रसवधर्मीणी प्रकृति?
सर रोजर पेनरोज की सायकल ऑफ टाइम्स (समय के चक्र; सृष्टि और प्रलय) के अनुसार बिग बैंग होता रहता है।

सांख्य दर्शन के अनुसार सर्ग और प्रतिसर्ग व आधुनिक कॉस्मोलॉजी 【क】
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सांख्य दर्शन के सर्ग और प्रतिसर्ग पर बात करने के पूर्व इसके कारणता सिद्धान्त "सत्कार्यवाद" पर बात करना आवश्यक है।  भारतीय दर्शन में कारणता पर दो मत हैं: आरंभवाद या असतकार्यवाद एवम सत्कार्यवाद। असतकार्यवाद  के अनुसार उतपत्ति के पूर्व कारण में कार्य का अभाव होता है; कार्य कारण से बिल्कुल भिन्न एक नवीन सत्ता है। कार्य की सत्ता सर्वथा नवीन होने के कारण असतकार्यवाद को आरम्भवाद भी कहते हैं: कार्य पूर्णरूपेण एक नवीन सृष्टि होती है। भारतीय परम्परा में न्याय-वैशेषिक आरम्भवादी हैं।
न्याय वैशेषिक के कार्य-कारण सिद्धान्त के विपरीत सांख्य और वेदांत कार्य को कारण में पूर्व रूप से अवस्थित मानते हैं जो कार्य-करण की शृंखला में मात्र अभिव्यक्त होते हैं। 
भारतीय दर्शन में सत्कार्यवाद के दो रूप मिलते हैं: परिणामवाद और विवर्तवाद। 
सांख्य दर्शन जहाँ परिणामवादी है वहीं  अद्वैत वेदांत विवर्तवादी।
परिणामवादी कार्य को कारण का परिणाम मानते हैं, वास्तविक रूपांतरण, तात्त्विक परिवर्तन: कार्य मे कारण का वास्तविक व तात्विक रूपांतरण हो जाता है। सांख्य प्रकृति-परिणामवादी है जबकि रामानुज का विशिष्टाद्वैत ब्रह्म-परिणामवादी।
विवर्तवाद में कार्य को कारण का वास्तविक और तात्विक रूपांतरण न मानकर कार्य को कारण का विवर्त या आभास माना जाता है। शंकर का अद्वैत वेदांत विवर्तवाद का समर्थक है-यह प्रपंचात्मक जगत ब्रह्म का यथार्थ रूपांतरण न होकर विवर्त या आभासमात्र है।

प्रश्न यह है कि भौतिकीविद जिस थ्योरी ऑफ एवरीथिंग की खोज कर रहे हैं उस थ्योरी ऑफ एवरीथिंग में बाद के चारो मौलिक बल :गुरुत्वाकर्षण, स्ट्रांग न्यूक्लियर, वीक नाभिकीय और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक बल पहले से मौजूद हैं कि नही?  ऐसा नही है कि उस थ्योरी ऑफ एवरीथिंग के कोरोसोस्पॉन्डिंग तत्व, कॉन्सेप्ट या वह जो कुछ भी है उससे बिल्कुल अलग ये चारों मौकिल बल बिल्कुल नवीन सत्ता हैं। 
अर्थात, थ्योरी और एवरीथिंग में सांख्य का सत्कार्यवाद इम्प्लॉयड है न कि वैशेषिक और न्याय का असतकार्य या आरंभवाद।
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सांख्य दर्शन के अनुसार सर्ग और प्रतिसर्ग व आधुनिक कॉस्मोलॉजी 【ख】
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ट्रू नथिंग, एब्सोल्यूट नथिंग, निरपेक्ष अनस्तित्व या सांख्य की प्रकृति: 

भौतिकीविद लॉरेंस क्रॉस लिखते हैं कि यह जगत अपने आप से उतपन्न क्यो नही हो सकता, हमे एक स्रष्टा की आवश्यकता क्यो पड़ती है? जब  धर्मशास्त्रियों यह कहते हैं कि ईश्वर ने शून्य(नथिंग) से इस जगत की रचना की और मैं पूछता हूँ कि इस नथिंग को थोड़ा और विस्तृत करें तो धर्मशास्त्री मौन हो जाते हैं। 
लॉरेंस की एक पुस्तक है: यूनिवर्स फ्रॉम नथिंग, व्हाई देयर इज़ समथिंग रैदर दैन नथिंग। उसमे वह लिखते हैं कि ट्रू नथिंग कुछ होता ही नही। वैक्यूम नथिंग नही है वहाँ फील्ड्स मौजूद हैं। जिस नथिंग की बात धर्मज्ञ करते हैं वह नथिंग नही हो सकता क्योंकि वह कुछ है जिसमे समथिंग होने की सम्भाव्यता है जिसे एक वाह्य कारक आकार देता है। भौतिकी के समीकरण भी यह बताते हो कि नथिंग, ट्रू नथिंग नही है; इनमे कवांटम फलक्चुवेशन मौजूद हैं और यह नथिंग  अनस्टेबल है। 

क्रॉस लिखते हैं कि मैं उस नथिंग की बात कर रहा हूँ जो प्लेटो और एक्वाइन्स का नथिंग है: निर्वात/ एम्प्टी स्पेस। 
मैटर और रेडिएशन की अनुपस्थिति के बावजूद इस नथिंग का नॉन-ज़ीरो ऊर्जा अवस्था हो सकती है। जेनरल रिलेटिविटी कहती है कि यह लघु स्पेस एक्सपोनेंशियली इतना विस्तृत हो सकता है कि आगे चलकर इसमें हमारा सम्पूर्ण ब्रह्मांड समा जाय। ज्यो ज्यो हमारा ब्रह्मांड विस्तृत होता है इस तवीरत विस्तारण के समय वह हिस्सा जिसमें हमारा ब्रह्मांड है, वह सपाट होता जाता है बावजूद इसके की उसकी एनर्जी कंटेंट बढ़ रही है। यह सम्भव है क्योंकि इस प्रकार के एम्प्टी स्पेस में ऊर्जा से सम्बंधित गुरुत्वाकर्षण दाब नकारात्मक होता है। ज्यों ज्यो विस्तार होता है यह विस्तारण स्पेश में ऊर्जा डंप करता है न कि इसके उलट (पृष्ठ 204-5)

मुझे यह  नथिंग सांख्य की प्रकृति क्यों लग रही है?

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सांख्य दर्शन के अनुसार सर्ग और प्रतिसर्ग व आधुनिक कॉस्मोलॉजी 【ग】
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सांख्य दर्शन का सामान्य परिचय

डॉक्टर राधाकृष्ण अपनी पुस्तक भारतीय दर्शन के अध्याय सांख्य दर्शन की प्रस्तावना में लिखते है: 'सृष्टिरचना के स्थान पर विकासवाद का प्रतिपादन करके सांख्य ने अलौकिक धर्म की नींव पर ही कुठाराघात किया है। इसके अनुसार, यह संसार किसी सृष्टिकर्त्ता ईश्वर का कार्य नही है, जिसने अपनी इच्छा के चमत्कार से अपने से सर्वथा भिन्न इस संसार को आह्वान करके उतपन्न किया है, बल्कि यह असंख्य आत्माओं तथा सदा कर्मशील प्रकृति की परस्पर प्रक्रिया का परिणाम है।'

मैक्समूलर मानते है कि अद्वैत वेदांत के बाद हिंदुओ का सबसे प्रमुख दर्शन सांख्य दर्शन है। आचार्य शंकर ने तो सांख्य को "प्रधान मल्ल" तक कहकर संकेतित किया है। 

सांख्य आस्तिक किंतु अनीश्वरवादी दर्शन है। ध्यातव्य है कि भारतीय दार्शनिक परंपरा में नास्तिक का अर्थ वेदों की सत्ता न मानना है (नास्तिको वेदनिन्दक:) और इस अर्थ में चार्वाक, जैन और बौद्ध भारतीय दर्शन के नास्तिक सम्प्रदाय हैं। सांख्य वेदों की सत्ता मानने के बावजूद ईश्वर की सत्ता को नही मानने के कारण एक आस्तिक अनीश्वरवादी दर्शन है।

सांख्य द्वैतवादी दर्शन है और साथ ही वास्तववाद का समर्थक भी है। यह अंतिम रूप से दो प्रकार की सत्ताओं को मानता है जो एक दूसरे से पूर्णतया भिन्न हैं: पुरुष और प्रकृति। पुरूष जगत का चेतन सिद्धान्त है जबकि प्रकृति इस समस्त विकृति या अलख ब्रह्मांड का जड़ सिद्धान्त।
सांख्य के वास्तववादी होने का अर्थ यह है कि वह  यह नही मानता कि जगत या उसके संगठक चेतना में रचे जाते हैं: प्रकृति, पुरुष, विकृति, सर्ग, प्रतिसर्ग आदि सब वास्तविक हैं।

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निरपेक्ष अनस्तित्व

प्रकृति के नियम कहा से आए?
पीटर एटकिन्स कहते है "एब्सोल्यूट नथिंगनेस" निरपेक्ष अनअस्तित्व से। इस निरपेक्ष अनअस्तित्व से ही इस अस्तित्वगत ब्रह्मांड, इसके नियम, हमरा जन्म हुआ है।
निरपेक्ष अनअस्तित्व के बारे में एटकिन्स कहते हैं कि उनके द्वारा कल्पित अननिरपेक्ष अस्तित्व की निम्न विशेषताएं हैं:
खालीपन---एम्प्टीनेस
होमोजेनिटी---समरूपता
आइसोट्रोपिसिटी----समदेशिकता

जगत के नियम अनअस्तित्व की  उपरोक्त इन्ही तीन विशेषताओं के रूपांतरण हैं क्योकि अनस्तित्व अस्तित्व होने की प्रोपेन्सिटी रखता है।

प्रश्न यह है कि निरपेक्ष अनस्तित्व का कोई गुणधर्म कैसे हो सकता है और जब वह अस्तित्व होने की प्रोपेन्सिटी रखता है तो वह निरपेक्ष अनस्तित्व कैसे हुवा।

फिलोसोफीकल सन्निपात

एक
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मनुष्य पशुओ की अपेक्षा चांस और रैंडमनेश के विकास के गुण के सबब एक बड़ा मस्तिष्क पा जाने की खुमारी से आज भी बाहर नही निकल पाया है। चांस और रैंडमनेश, क्योकि आप जैव विकास की प्रक्रिया को रिवाइंड करते हुए फिर वही से प्रारम्भ करिए जहाँ से सब प्रारम्भ हुवा और इस बात की कोई गारंटी नही की उत्परिवर्तन और प्राकृतिक चयन इस स्तर तक आते आते या बीच मे ही कहीं आपको वही स्पीशीज देगी जो इसके पूर्व रही है, और हमारे स्तर तक आते-आते शायद एक बहुत बड़े सर वाला कॉकरोच हो जो जीवन के इस प्रकृति के एवम अन्य प्रजातियों के साथ हो रहे संघर्ष में सबसे ज्यादा फिट हो। एक फोटोन पानी पर गिरता है और हम नही बता सकते कि वह फोटोन पानी से होकर गुजरेगा या परावर्तित हो जाएगा। एक प्रेक्षकीय चेतना के परिप्रेक्ष्य से जगत क्वाण्टम लेवल पर किसी उस नियतिवाद का पालन नही करता जिससे हम इस क्वाण्टम की दुनिया मे प्रवेश करने से पहले परिचित थे, जिसके अभ्यस्त थे और जगत के विषय मे हमने बड़े-बड़े दावे ठोक दिए थे; जैव विकास की घटना में उत्परिवर्तन या जेनेटिक म्यूटेशन एक क्वाण्टम इवेंट की तरह है--हम नही जानते कि कौन सा जीन उत्परिवर्तित होगा---कौन सी नई स्पीशीज सामने आएगी।
प्रश्न यह है कि जब हम अपने ही अस्तित्व के बारे में इतने अनिश्चित हैं तो फिर हम उन बड़े-बड़े दावों को कैसे कर बैठते हैं यथा: मुक्ति, निर्वाण, कैवल्य, ब्रह्म।
केवल एक घटना, इस विशाल जगत में एक बहुत ही इनसीगनिफिकेन्ट घटाना नही हुई होती और हम उन विशाल सर वाले कॉकरोचों की दुनिया मे बीमारी फैला रहे होते तथा उनके स्प्रे और हिट से छुपते फिर रहे होते।

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दो

हम बने ही ऐसे हैं कि प्रथम दृष्टया हमे लगता है कि हम सबके केंद्र में हैं। हम एक निर्जन स्थान पर हों तो हम उस वृत के जो हमारी आँखे देखती हैं उसके केंद्र में नज़र आते हैं। अपनी दृष्टि थोड़ी विस्तृत करें तो हमे हमारी पृथ्वी पूरे दृश्य आकाशगंगा के केंद्र में लगती है। अगर हम अपनी आकाशगंगा के परिप्रेक्ष्य से ब्रह्मांड को देखें तो फिर शेष दृश्य ब्रह्मांड के केंद्र में हमारी आकाश गंगा होती है।
हर जीव और जीवन के केंद्र में हमे अपना अस्तित्व और मानव जाति दिखती है जैसे यह सब हमारे लिए ही बना हो या हम सबसे महत्वपूर्ण, सबसे उच्च जीव हों लेकिन परिप्रेक्ष्य बदलिए और दृश्य बदल जाता है हालांकि परिप्रेक्ष्य बदलना बहुत हिम्मत का काम है क्योंकि यह हमारे अंदर एक भावात्मक तूफान खड़ा कर देता है। यह स्थिति बड़ी पीड़ादायी होती है और हम इससे बचना चाहते हैं इसीलिए हम अपने उस मिले, बने बनाए ककून में खुश रहते हैं। 
अपनी अहमकेन्द्रित विष्मवस्था में खुश रहने में कोई दिक्कत नही है लेकिन किसी और को जो उस ककून को तोड़ कर बाहर निकलना चाहता है उसको संस्कृति, पूर्वज आदि की दुहाई देकर या कई बार उसके प्रति हिंसक होकर उसे रोकना बुद्धिमता और मानवीयता नही स्वार्थ है।चुकी उसके द्वारा उद्घाटित नया सत्य भी अंततः आपके अंदर वही पीड़ादायी भावात्मक तूफान ला सकता है अतः यह संस्कृति नही बल्कि छद्म रूप से आपके अपने उस ककून की रक्षा है।

परमसत, परमसत्ता आदि की जब हम बात करते हैं तो अचेतन रूप से हम एक गतिहीन, मानव केंद्रित जगत में विश्वास कर रहे होते हैं ज्यों मनुष्य जाति की कॉग्निटिव फेकल्टी और एस्थेटिक सेंस उस निरपेक्ष को जानने, उसके सौंदर्यबोध को विकसित है। निम्नतर जन्तुओ के कॉग्निशन की तुलना में हमारी यह फेकल्टी अवश्य विकसित है लेकिन आज से एक लाख वर्ष भविष्य में जो प्रजाति हमसे विकसित होगी उसकी तुलना में हमारी संज्ञानात्मकता, एस्थेटिक सेंस अत्यंत निम्न है; उनकी परमसत्ता कुछ और होगी क्योंकि परमसत्ता हमारे फ्रोन्टल लोब में रचा जाता है।

एक मित्र ने कहा कि आपके पूर्वज बंदर होंगे हमारे तो ऋषि थे। आज से एक दो लाख वर्ष भविष्य में स्वयम को प्रोजेक्ट करिए और देखिए हमसे विकसित कुछ लोग शर्म के मारे यह स्वीकार ही नही कर पा रहे हैं कि उनके पूर्वज मानव थे। उस समय "अरे आदमी" एक गाली है।

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【तीन】

हम कुछ भी सीखते ही क्यों हैं इसका एक पंक्ति में उत्तर है सर्वाइव करने के लिए।  विकास क्रम में निम्न स्पीशीज में सम्बंधित बेहेवियर इंस्टिक्ट में होता है। एक मधुमक्खी अपना छत्ता बनाना कहीं सीखती नही है, यह उसके अंदर है। एक चिड़िया अपने घोंसले बनाने के लिए विश्विद्यालय नही जाती, उसके अंदर है। विकास क्रम में चेतना के विस्तारण के साथ, मन के इमर्ज होने के बाद, मस्तिष्क के और जटिल होने के बाद इंस्टिक्ट के अलावा लर्नड बिहेवियर इमर्ज होता है। अब सूचना हमारे इंस्टिंक्ट के बाहर भी स्टोर किया जा सकता है और बिना किसी जेनेटिक्स के इसको अगली पीढ़ी में ट्रांसफर किया जा सकता है।
इस जेनेटिक्स के बाहर उपस्थित सूचना का भी मूल अभिप्राय इंस्टिंक्टिव बिहेवियर की तरह सर्वाइवल ही है, अंतर मात्र यह है कि इस सूचना पर आधारित व्यवहार अतःस्फूर्त नही होता है।
विकास क्रम में उच्चतर जीव के आने के बाद व्यवहार का एक अनुषांगिक पक्ष भी होता है:
हमारे लिए भोजन मात्र स्वयम को जीवित रखने के लिए नही है, इससे सम्बंधित एक अनुषांगिक पक्ष भी है: स्वाद। और हम इसके लिए भी पाकशास्त्र सीखते है। सेक्स हमारे लिए अब मात्र अपनी प्रजाति को जीवित रखने का करण नही है, सेक्स अब हम मजा के लिए भी करते हैं।
ज्ञान का भी मात्र और मात्र सर्वाइवल मूल्य जो आज तक होता था, मानव में इससे सम्वन्धित एक अनुषांगिक पक्ष भी उभरता है।
 
एब्स्ट्रेक्शन, जेनरलाइजेशन और पैटर्न पहचानने का बोध अन्य जीवों से ज्यादा है जिसका कोई रहस्यात्मक कारण नही बल्कि विकास क्रम में मात्र यह एक सर्वाइवल उपकरण है। हमने आकाश को देखा उसके चमकते तारो में एक पैटर्न था, हमने अपने अगल-बगल की घटनाओं को देखा, उसमे एक पैटर्न था, हमने जेनरलाइजेशन किया, एब्स्ट्रैक्ट चिंतन की।  हमारे पैटर्न पहचानने के बोध, सामान्यीकरण तथा अमूर्तकरण की क्षमता ने मिथक-दर्शन-विज्ञान आदि को जन्म दिया हैं, लेकिन फिर वही बात की यह मात्र हमारे सर्वाइवल टूल हैं; विज्ञान अब तक का सबसे बेहतर।
परमसत या परम सत्ता को जाना जा सकता है या यह है भी इसके बारे में मैं आश्वश्त नही हूँ। सब व्हाइट मैटर और ग्रे मैटर का खेल है और यह सफेद और भूरा गुदा इस प्रकार ऑर्गनाइज हुवा है कि हम मात्र बेहतर तरीके से वातावरण के साथ अनुकूलित हो सकें, हम और हमारी प्रजाति जिंदा रह सके। इस अनुकूलन में यदि कोई परमसत्ता आता है तो वह फिर परम-सत्ता है ही नही क्योकि वह, अनुकूलन, हमारे और हमारे प्रजाति के जीवित रहने के अभिप्रेरण से कंडिशन्ड है।

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चार

वैज्ञानिक ज्ञान की एक सीमा है, जगत की नही। विज्ञानं क्या है? दरअसल यह अमीबा के उस उद्दीपन-प्रतिक्रिया का ही अत्यन्त जटिल रूप है, उस क्रिया-प्रतिक्रिया का मात्रात्मक-गुणात्मक विकास है। उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रिया करने की आज तक की सबसे अच्छी प्रक्रिया, सबसे सफल प्रक्रिया है,और इसीलिए इसने इतने कम समय में हमारी चेतना के जगत को हमारे लिए इतना अनुकूलित कर दिया है।
यह प्रकृति के नए नए रहस्यों को खोल रहा है।
अणु में इसने अथाह शक्ति ढूंढ लिया और बस ढूंढा ही नही उसे मानव का पालतू भी बना दिया। प्रकृति पर आज हम किसी हद तक नकेल कस सकते है। हाँ वो शक्तियां जिनसे अभी मात्र पांच हज़ार साल पहले हमारे पुरखे डर कर विनती करते थे वो आज हमारे नियंत्रण में हैं,और क्रमशः होती जा रही हैं। हमारे पुरखे जहाँ तक सोच नही सकते थे उन जगहों पर हम अपने पदचिन्ह छोड़ रहे हैं। 
अनुकूलन की विविध चेतन प्रक्रियाओं में विज्ञान की बराबरी तो कोई कर ही नही सकता, न धर्म, न आदिम जादू (फ्रेजर) न सहज वृति, न अपने परंपरिमक मायनो में दर्शन।
लेकिन, विज्ञानं की एक सीमा है जगत की कोई सीमा नही है।
हमे जो ज्ञान प्राप्त हो रहा है, हम जिन रहस्यों को जान रहे हैं क्या वो निरपेक्ष है, वास्तव में वैसे है या हमारी चेतना उन्हें वैसा प्रदर्शित करती है? चेतना, जिसका विकास प्रकृति से अनुकूलन के लिए हुवा है, हमारे न्यूरॉन के फंक्शन पर ही तो अवलम्बित है।
और यह अवलम्बन स्वयं एक विकास का परिणाम है।
दरअसल हम देखने के लिए स्वतंत्र नही है, हम वही तक देखने के लिए स्वतंत्र है जहाँ तक हमारी चेतना हमे स्वतंत्रता देती है और हम उसी प्रकार देखने को स्वतंत्र है जिस प्रकार देखने की स्वतंत्रता हमारी चेतना देती है।
तो क्या हम संच में स्वतंत्र है?
नही और यही बन्धन मैट्रिक्स है जो है
विज्ञानं की सीमा है, जगत असीमित है।

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पाँच

जो कुछ भी जाना जा सकता है अपने अस्तित्व के परिप्रेक्ष्य में ही जाना जा सकता है। अस्तित्व को ट्रांसेन्डेन्ट कर कुछ जाना ही नही जा सकता इस प्रकार हर जानना अस्तित्वकेन्द्रित विषमावस्था से ग्रसित है। यदि थोड़ा और बौद्धिक अनुशाषित हुवा जाय तो हम नही जानते कि हमारे अस्तित्वकेन्द्रित विषमावस्था में प्राप्त ज्ञान के बाहर कुछ है भी। वह अज्ञात अस्तित्वमान हो,तब भी न तो वह हमे प्रभावित करता है और न हम उसे। हमारे और उसके बीच कोई अन्तःक्रिया सम्भव नही फिर उसके बारे में चिंतन बौद्धिक अपव्यय भी हो सकता है।
उस तक हमारी वाणी नही पहुंच सकती, उस तक हमारे विचार नही पहुंच सकते तब वह हमें रिस्पॉन्ड भी नही करेगा फिर मानव एक अनावश्यक सत्ता का बोझ क्यो ढोए?

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छह

प्रश्न है कि क्या बिग बैंग प्रारम्भ है और इस ब्रह्मांड का अंत सम्भव है?
प्रायः ब्रह्मांड क्यो का जवाब दिया जाता है कि ह्यूमैन मोटिव को ब्रह्मांड पर आरोपित नही किया जा सकता। ब्रह्मांड किसमे फैल रहा है का उत्तर होता है कि यह प्रश्न सार्थक नही है और यह ठीक वैसा ही प्रश्न है कि उत्तरी ध्रुव के उत्तर में क्या है। 【हॉकिंग】
कहा जाता है कि हम ब्रह्मांड को अंदर से जानते है  और इन अंदर की कोटियों पर आधारित प्रश्न ब्रह्मांड पर लागू नही हो सकते। बिगनिग और एंड, अथ और इति ब्रह्मांड के अंदर की घटना तो निश्चित रूप से है। प्रारम्भ और समाप्ति तो निश्चित रूप से ब्रह्मांड के अंदर पाए जाते है लेकिन इसके उलट अथ और इति के अंदर ब्रह्मांड है यह हम निश्चितता के साथ कैसे कह सकते हैं? क्या यह रोजमर्रा की घटनाओ का इस वृहत पर आरोपण नही है?
क्या कोई बता सकता है कि "कब" "कैसे" "क्यों" कहाँ" में से कौन-कौन किस-किस सन्दर्भ में पूछना नॉनसेंस नही है और इसके निर्धारण का मानक क्या है?

बिग-बैंग हुवा है, बिग फ्रीज़, बिग रिप या बिग क्रंच भी हो सकता है लेकिन यह ब्रह्माण्ड का प्रारम्भ या खात्मा नही हो सकता। यह उस वृहत की एक प्रक्रिया का पूर्ण हो जाना मात्र लगता है।
प्रतीत होता है कि बिग बैंग से बिग क्रंच या बिग फ्रीज़, रिप तक की प्रक्रिया यदि ब्रह्मांड है तो यह सीमित है और कॉस्मोलॉजिस्ट का यह ब्रह्मांड भले ही देश-काल मे अनन्त हो लेकिन यह असीम नही है और #वह ससीम नही है। ये कॉस्मोलॉजिस्ट हमारी चेतना में आए ब्रह्मांड की एक एड होक व्याख्या कर रहे हैं।
कुछ ज्ञात ज्ञात हैं, कुछ ज्ञात अज्ञात हैं और कुछ अज्ञात अज्ञात है। हम उस अज्ञात अज्ञात तक पहुँच ही नही सकते।

क्वाण्टम भौतिकी के विकसित होने के साथ भौतिकी में प्रेक्षक या ऑब्जर्वर की भूमिका बढ़ती जा रही है। कहा तो यह भी जाने लगा है कि जिसे हम सत्यता कहते हैं वह ज्ञाता और ज्ञेय के मध्य अन्तःक्रिया में उभरता है और इस अंतः क्रिया के बाहर इस सत्यता का कोई अस्तित्व नही रहता।【व्हीलर】
इस विचार पर आधारित व्हीलर ने ब्रह्मांड में मौजूद फाइन ट्यूनिग की व्याख्या करने के लिए पार्टिसिपेटरी एंथ्रोपिक प्रिंसिपल दिया जिसके अनुसार वेव फंक्शन के ध्वस्त होने के लिए एक वास्तविक प्रेक्षक की आवश्यकता है। जॉन बैरो और फ्रैंक टिपलर कहते हैं की ब्रह्मांड अस्तित्व में तब आता है जब कोई प्रेक्षक ब्रह्मांड का प्रेक्षण कर रहा होता है। 【द एंथ्रोपिक कॉस्मोलॉजिकल प्रिंसिपल】
नील द ग्रास टायसन अपनी पुस्तक ओरिजिन्स में लिखते हैं कि प्रारम्भ में भौतिकी के नियम थे।
जीव विज्ञानी रूपर्ट शेल्ड्रेक कहते हैं कि हम एक ऐसी स्थिति में आ जाते हैं जहाँ भौतिकी के नियम की पूर्वमान्यता माइंड या मनस है। 【द साइंस डेलयूज़न】

यदि भौतिकी के नियम वास्तव में मनस की प्रागपेक्षा रखते हों तो फिर बिग-बैंग को हमारा मनस रच रहा है। ब्रह्मांड की शुरुआत और अंत का प्रत्यय हमारा मनस रच रहा है। ब्रह्मांड का आदि या अंत है हम नही कह सकते।

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सात

ब्रह्मांड में चेतना का इमर्ज होना एक अद्भुत घटना है। कार्ल सेगन कहते हैं कि जो कुछ भी था, जो कुछ भी है और जो कुछ भी होगा वह कॉस्मॉस है।
अर्थात हम ज्ञाता हो जाने से ब्रह्मांड से बाहर नही हो जाते बल्कि हम भी ब्रह्मांड के हिस्से हैं।
अब यह उद्वेलित नही करता कि ब्रह्मांड का एक हिस्सा ब्रह्मांड ने ऐसा रचा जो ब्रह्मांड को जानने लगता है और जानने ही नही लगता बल्कि ब्रह्मांड में एक नए स्तर से पार्टिसिपेट करने लगता है।इस स्तर पर ब्रह्मांड में पार्टिसिपेट कोई नही करता: न कोई ग्रह, नक्षत्र, तारे, निहारिका या बैक्टेरिया, वायरस, वृक्ष, पशु कोई भी नही।
एक अल्टरनेट ब्रह्मांड में सम्भव है कि वह इंटेलिजेंट लाईफ को तो छोड़िए, लाइफ को ही नही इमर्ज होने देता। हमारे ब्रह्मांड ने हमे यह या तो मौका दिया है या यह हमारे ब्रह्मांड के अस्तित्व में आने की शर्तों में ही है।
क्या यह असम्भव है कि ब्रह्मांड ने हमे इसलिए रचा है कि हम ब्रह्मांड को रचे?
हमारे माता-पिता हमे जन्म देते हैं और हम अपने बच्चों को जन्म देते हैं लेकिन दरअसल जीन के स्तर पर हमारे माता पिता हमारे माध्ययम से स्वयम को जन्म देते हैं और हम अपने बच्चों के माध्ययम से स्वयम को। दृष्टि को थोड़ा और विस्तार दिया जाय तो हम अपनी सन्तति के माध्ययम से अपने पूर्वजो को जन्म दे रहे होते हैं।
हम ब्रह्मांड के बच्चे हैं, शायद ब्रह्मांड ने हमे इसलिए इंटेलिजेंस दिया है कि हम ब्रह्मांड को जन्म दें और अनुकूलन के बहाने ही सही इसलिए भी ब्रह्मांड अपने रहस्य हमे बताता है।

सम्भव है कि कल हम ब्रह्मांड को जन्म दे रहे हों और ब्रह्मांड ने हमे इसीलिए रचा हो।
वैसे अभी यह मात्र एक विज्ञान गल्प है।

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आठ

यह ब्रह्मांड क्यों है?
जब हम यह प्रश्न करते हैं तो इसका अर्थ क्या होता है? मेरे सामने यह पुस्तक क्यों है? क्योंकि इस पुस्तक के माध्ययम से मेरा एक प्रयोजन सिद्ध होना है। ब्रह्मांड के विषय मे जब हम क्यो का प्रश्न करते हैं तो हम अचेतन रूप से इस बात को मान रहे होते हैं कि ब्रह्मांड का प्रयोजन है लेकिन क्या हो यदि सत्य यह हो कि ब्रह्मांड का कोई प्रयोजन ही न हो और इस प्रकार ब्रह्मांड क्यों एक निरथर्क प्रश्न हो।
 ब्रहांड बस हो जैसा बर्ट्रेंड रसेल कहते हैं। विश्व मे कोई प्रयोजनवत्ता नही हो और यह मात्र यांत्रिकता के नियम और सिद्धान्त से संचालित होता हो?
भौतिकी के आधुनिक सिद्धान्त हमे बताते हैं कि जगत में कोई प्रयोजन नही है। यह उस घड़ी की तरह है जिसका कोई न तो घड़ीसाज है न किसी के लिए ही यह निर्मित है: यह बस है,इसके पुर्जे आपस मे एक दूसरे से जुड़े हुए 14 खरब वर्षो से अनन्त(?) काल तक टिक-टिक-टिक-टिक।
हमारी बुद्धि यह आसानी से मान लेती है कि ईश्वर अपना स्वयम का कारण हो सकता है लेकिन जगत में प्रयोजन देखने को हम इतने अभ्यस्त हैं कि जगत भी स्वयम्भू हो सकता है यह बात हमे अटपटी लगती है लेकिन ऐसा क्यों नही हो सकता?
जगत अपने आप से अपनी रचना क्यो नही कर सकता? जगत अपने एकत्व से ही अपने अंदर के नानात्व को क्यो नही रच सकता?

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नौ

कोई भी यूनिफाइड सिद्धान्त, चाहे वह ब्रह्म हो, परमसत्ता हो या बहुप्रतीक्षित भौतिकी की थ्योरी ऑफ एवरीथिंग, यदि वह मानव की पीड़ा का इसी व्यवहारिक दुनिया मे निवारण नही करती तो वह एकीकृत सिद्धान्त कैसे है?
पीड़ा, मनुष्य को व्यवहार से बाँधे भी रखती है और मनुष्य से परमार्थ के रूप में पलायन की अधिभौतिकी भी रचवाती है।
सत चित आनंद का नही पता, सत और चित का भी नही मालूम लेकिन वेदना है, यह निर्विवाद है।
परमार्थ का बोध में पीड़ा का निवारण हो न हो पीड़ा से पलायन के प्रयास में परमार्थ अवश्य रचा जाता है।

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दस

कब-क्यों-कहाँ-कैसे-कितना
हमारे पास यह पाँच ही प्रश्न है, हमारा मस्तिष्क इतना ही पूछने के लिए विकसित हुवा है लेकिन #सत्ता (ब्रह्मांड) अपनी वस्तुगतता में जाने कितने #वेरिएब्ल्स (चरों) को लिए बैठा है अतः हम ब्रह्मांड को उसकी वस्तुगतता में नही समझ सकते।

हाँ हम अपने सन्दर्भ से कब-क्यों-कहाँ-कैसे ढूंढते चले जा सकते है और परत दर परत, रहस्य दर रहस्य उद्घाटित करते जाएंगे लेकिन हम यह भी दावे के साथ नही कह सकते ही ब्रह्मांड की वस्तुगतता के परिप्रेक्ष्य से यह कब-कहाँ-कैसे-क्यों सही प्रश्न हैं भी या नही!

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ग्यारह

मनुष्यों, यह संसार केवल तुम्हारा नही है। तुम किसी प्रयोजन के निमित्त यहाँ नही हो-------------बस हो!

तुम नही भी हो तो प्रकृति को कोई फर्क नही पड़ेगा। तुम्हारे पुरुष की कल्पना बस अपने मन की तुष्टि के लिए है। 
पुरुष है ही नही, केवल प्रकृति है: सत तम रज से युक्त, उन्मुक्त!

उन्मुक्त क्योकि उसका कोई नियंता नही है और वह स्वयम भी सचेतन कोई कार्य नही करती।
देश-काल के द्वि पदों से वह बस विचरण करती रहती है, निरुद्देश्य।

उस प्रारंभिक बीज से वह प्रस्फुटित है या वह बीज भी उसने ही जना है यह तुम नही जान सकते क्योंकि उसने तुम्हे यह स्वतंत्रता दी ही नही है।
उसके किसी कदम पर तुम्हारे होने की घटना घट गई, बस यूं ही, निरूद्देश्य और यंत्रवत और तुमने समझा तुम उस प्रकृति के पुरुष हो!

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आवारा विचार ----

सम्भवतः हम आपस मे "कठिन और चुनौतीपूर्ण" शब्द के प्रयोग में समसन्दर्भिक नही हैं। मेरे उक्त शब्द का सन्दर्भ मानवीय अस्तित्व है, कम से कम मेरा अस्तित्व तो है ही। नास्तिक की बजाय आस्तिक एक सीधी रेखा पर चलता है, बल्कि चलना होता है जबकि नास्तिक ज्ञात रास्तों के सीमांत/ सिवान पर खड़ा होता है और उस सीमांत के आगे सब कुछ अनिश्चित और अज्ञात होता होता है। 

दरअसल नास्तिकता ही बौद्धिक चेतना की उत्प्रेरक रही है और इसको आदम ईव और फॉरबिडन फ्रूट के अब्राहमिक मिथक ने बड़ी शटल तरीके से हमारे सामने रखा है जब ईश्वर की आज्ञा की अवहेलना में मनुष्य फॉरबिडन फ्रूट खाकर ज्ञानवान हो जाता है और उसे पैराडाइज़ से बाहर कर दिया जाता है।

नास्तिक हुए नही की आप उस काल्पनिक/अकाल्पनिक स्वर्ग से बाहर निकल जाते है और आपको आदम और ईव की तरह अपने अस्तिव की बहुत सी बातो के बारे में पहली बार पता चलता है!

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...