कला का सांख्य दर्शन का सिद्धान्त है जिसमे कला प्रकृति में विकृति को सँवारता है लेकिन यह मात्र कला नही हो सकती। जगत में विद्रूपता भी है, पागलपन भी है इनको यथा रूप रखने में कोई सौंदर्य मीमांसा नही है?
मुझे नानक की कुछ पंक्तियां याद आ रही है:
तुम नाम हो,
बेनाम हो,
अनाम हो,
सर्वनाम हो।
विश्लेसणात्मक विचारक तो तत्वमीमांसा का ही निरसन कर देते है; यह तो भाषाई अज्ञेयों द्वारा मानसिक व्यायाम है।
कहने का मतलब की ये शब्द हैं ही नहीं, शब्दभास मात्र है।
थ्योरी ऑफ़ मिनिग के आधार पर तो इन शब्दों का अस्तित्व ही नही रहता, ये वाष्पीकृत हो जाते हैं।
समसामयिक विचारधारा में एक स्प्लिट है। इस स्प्लिट को कॉन्टिनेंटल-एनालिटिकल स्प्लिट कहते हैं।
कॉन्टिनेंटल पक्ष अनुभूति का विश्लेषण नही करता वह इसके सब्जेक्टिव आस्पेक्ट पर ज़ोर देता है।
चलिए एक उदाहरण देता हूँ:
मैं एक बार पागलखाने गया था। वहां एक पागल था जो कहता : "अकबर मेरा माँ था। अमिताभ बच्चन को मैंने नौ महीने पेट में पाला। शाहरुख़ खान मुझसे चिठ्ठी लिखवाता था" इतना वह कहता और जोर जोर से रोने लगता।
उसके सेंटेंस को लीजिए "अकबर मेरा माँ था"। हलाकि व्याकरण की दृष्टि से वाक्य है लेकिन क्या दरअसल यह एक वाक्य है? क्या यह कोई अर्थ देता है?
विश्लेषण करिए।
ये दरअसल वाक्यभास है।
यह है विश्लेषण की दृष्टि।
आइए उसके वाक्य को दुबारा पढ़िए: अकबर मेरा माँ था। अमिताभ बच्चन को मैंने नौ महीने पेट में पाला। शाहरुख खान मुझसे चिठ्ठी लिखवाता था।
फिर उसका ज़ोर ज़ोर से रोना।
सम्पूर्णता में देखिए। वह कुछ कह रहा है। किसी भावना को अभिव्यक्त कर रहा है। हम उसकी भाषा नही समझ पा रहे क्योंकि हम तो उस भाषा को अभ्यस्थ हैं जो किसी नियम और अर्थ विशेष से जुडी है।
कविता को लय ताल छँदादि से क्यों युक्त होना ही चाहिए? पिंगलशास्त्र का ज्ञान आधुनिक कविता की शर्त नही है। बुद्धि से ही कविता क्यो, अंदर के ओरंग-ओटान को कलम क्यों नही पकड़ा कर उस स्तर के भावों को व्यक्त किया जा सकता है?
कविता में रागों का सौंदर्य ही क्यों? कविता में लयहीनता, छंदमुक्त स्वच्छन्दता और कुरूपता क्यो नही?
कविता में सिजोफ्रेनिक एक्सप्रेशन और नियोलोगिज़म कि मनाही क्यों?
कविता अंदर के ओरांग ओटान, जिसे व्याकरण नही आता, जिसने पिंगल नही पढा, जो नए शब्द गढ़ता है, नए वाक्य विन्यास ढूंढता है, उसके भावों की अभिव्यक्ति क्यो नही?
मुझे नानक की कुछ पंक्तियां याद आ रही है:
तुम नाम हो,
बेनाम हो,
अनाम हो,
सर्वनाम हो।
विश्लेसणात्मक विचारक तो तत्वमीमांसा का ही निरसन कर देते है; यह तो भाषाई अज्ञेयों द्वारा मानसिक व्यायाम है।
कहने का मतलब की ये शब्द हैं ही नहीं, शब्दभास मात्र है।
थ्योरी ऑफ़ मिनिग के आधार पर तो इन शब्दों का अस्तित्व ही नही रहता, ये वाष्पीकृत हो जाते हैं।
समसामयिक विचारधारा में एक स्प्लिट है। इस स्प्लिट को कॉन्टिनेंटल-एनालिटिकल स्प्लिट कहते हैं।
कॉन्टिनेंटल पक्ष अनुभूति का विश्लेषण नही करता वह इसके सब्जेक्टिव आस्पेक्ट पर ज़ोर देता है।
चलिए एक उदाहरण देता हूँ:
मैं एक बार पागलखाने गया था। वहां एक पागल था जो कहता : "अकबर मेरा माँ था। अमिताभ बच्चन को मैंने नौ महीने पेट में पाला। शाहरुख़ खान मुझसे चिठ्ठी लिखवाता था" इतना वह कहता और जोर जोर से रोने लगता।
उसके सेंटेंस को लीजिए "अकबर मेरा माँ था"। हलाकि व्याकरण की दृष्टि से वाक्य है लेकिन क्या दरअसल यह एक वाक्य है? क्या यह कोई अर्थ देता है?
विश्लेषण करिए।
ये दरअसल वाक्यभास है।
यह है विश्लेषण की दृष्टि।
आइए उसके वाक्य को दुबारा पढ़िए: अकबर मेरा माँ था। अमिताभ बच्चन को मैंने नौ महीने पेट में पाला। शाहरुख खान मुझसे चिठ्ठी लिखवाता था।
फिर उसका ज़ोर ज़ोर से रोना।
सम्पूर्णता में देखिए। वह कुछ कह रहा है। किसी भावना को अभिव्यक्त कर रहा है। हम उसकी भाषा नही समझ पा रहे क्योंकि हम तो उस भाषा को अभ्यस्थ हैं जो किसी नियम और अर्थ विशेष से जुडी है।
कविता को लय ताल छँदादि से क्यों युक्त होना ही चाहिए? पिंगलशास्त्र का ज्ञान आधुनिक कविता की शर्त नही है। बुद्धि से ही कविता क्यो, अंदर के ओरंग-ओटान को कलम क्यों नही पकड़ा कर उस स्तर के भावों को व्यक्त किया जा सकता है?
कविता में रागों का सौंदर्य ही क्यों? कविता में लयहीनता, छंदमुक्त स्वच्छन्दता और कुरूपता क्यो नही?
कविता में सिजोफ्रेनिक एक्सप्रेशन और नियोलोगिज़म कि मनाही क्यों?
कविता अंदर के ओरांग ओटान, जिसे व्याकरण नही आता, जिसने पिंगल नही पढा, जो नए शब्द गढ़ता है, नए वाक्य विन्यास ढूंढता है, उसके भावों की अभिव्यक्ति क्यो नही?
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