जिस मनःस्थिति के साथ हमारे आज के वैज्ञानिक लार्ज हाइड्रोन कोलाइडर, लीगो ऑब्जर्वेटरी आदि में जगत और इसके रहस्यों का अनुसन्धान करते हैं उन्ही मनःस्थितियों में वैदिक ऋषियों ने जगत का अनुसन्धान किया था क्या हम कह सकते हैं?
आज के वैज्ञानिक भावना-निरपेक्ष रहने की हर सम्भव कोशिश करते हैं, एक डिटैचमेंट की स्थिति को वो अपनाते हैं लेकिन वैदिक ऋषियों के साथ ऐसा नही था। उनके लिए जगत भय मिश्रित आश्चर्य (awe-inspiring) का था और उनका यह जगत का अनुसन्धान कम और एक पोएटिक उद्गार अधिक था।
'वह पूर्ण है, यह भी पूर्ण है-------पूर्ण ही शेष रहता है।'
हालांकि यह कथन उपनिषद का है तथापि इसका कोई संज्ञानात्मक मूल्य है तो वह मेरी समझ से बाहर है। भाषा का केवल सूचनात्मक अभिप्राय ही नही होता, इनका इमोटिव और डायरेक्टिव प्रयोग भी होता है यद्यपि शब्द वही होते हैं, व्याकरण वही होता है।
मेरी समझ से औपनिषदिक यह कथन कोई सूचना देने के बजाय कुछ भाव विशेष की जागृति के लिए है। ऐसे कथनों को एक्स्टरपोलेट करते हुए इनके सदृश किसी सत्ता की कल्पना एक तर्क दोष है बाकी यह कथन एक अद्वितीय भाव जागृत करती है इसमें कोई संदेह नही।
आधुनकि वैज्ञानिक जब जगत का अनुसन्धान करते है तो जगत उनके लिए न तो ब्यूटीफुल होता है और न सबलाइम, यह एक तथ्य होता है लेकिन वैदिक-औपनिषदिक ऋषियो के लिए स्थिति ऐसी न थी।
उपनिषद काल मे इस पोएटिक उद्गार की जगह परिकल्पनात्मक चितन ने ले लिया। गुढ़ से गूढ़तम अमूर्त कॉन्सेप्ट्स रचे गए और यह मान लिया गया कि हमारी परिकल्पनात्मक चितन जगत की, इसके कारण की वास्तविक तस्वीर खींच सकती है। सनातन, परम् सत आदि इसी परिकल्पनात्मक चितन प्रक्रिया में निकले शब्द हैं।
यह ब्रह्मांड तो स्वयम सनातन नही है फिर इसके अंदर किसी काल विशेष की चेतना कैसे सनातन हो सकती है?
क्या कुछ भी सनातन हो सकता है?
मुझे तो यह सम्प्रत्यय मानव मन द्वारा परिवर्तनशील जगत के निषेध में रचित एक अमूर्त प्रत्यय लगता है। इसके अनुरूप कोई वाह्य सत्ता है यह कहने का कोई आधार नही मिला मुझे आज तक।
विचारों के इतिहास में पाश्चत्य परम्परा में भी परिकल्पनात्मक और अमूर्त चितन को प्रयोग-प्रेक्षण के ऊपर प्लेटो-अरस्तू के बाद लगभग दो हज़ार वर्षो तक प्रमुखता दिया जाता रहा है। लेकिन इस प्रवृत्ति ने वैज्ञानिक चितन और पद्धति के विकास में अवरोधक का ही काम किया।
ध्यान रहे कि जगत की एक मिथकीय समझ है, इसकी एक तत्वमीमांसिय समझ है और इसकी एक वैज्ञानिक समझ है। इनमे हमे अपने वातावरण के साथ अनुकूलन करने में सबसे अधिक सक्षम जगत की वैज्ञानिक समझ ने ही किया है।
बाकी यदि विज्ञान का जगत ही मिथ्या हो तो फिर तो बात ही खत्म हो जाती है।
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आज के वैज्ञानिक भावना-निरपेक्ष रहने की हर सम्भव कोशिश करते हैं, एक डिटैचमेंट की स्थिति को वो अपनाते हैं लेकिन वैदिक ऋषियों के साथ ऐसा नही था। उनके लिए जगत भय मिश्रित आश्चर्य (awe-inspiring) का था और उनका यह जगत का अनुसन्धान कम और एक पोएटिक उद्गार अधिक था।
'वह पूर्ण है, यह भी पूर्ण है-------पूर्ण ही शेष रहता है।'
हालांकि यह कथन उपनिषद का है तथापि इसका कोई संज्ञानात्मक मूल्य है तो वह मेरी समझ से बाहर है। भाषा का केवल सूचनात्मक अभिप्राय ही नही होता, इनका इमोटिव और डायरेक्टिव प्रयोग भी होता है यद्यपि शब्द वही होते हैं, व्याकरण वही होता है।
मेरी समझ से औपनिषदिक यह कथन कोई सूचना देने के बजाय कुछ भाव विशेष की जागृति के लिए है। ऐसे कथनों को एक्स्टरपोलेट करते हुए इनके सदृश किसी सत्ता की कल्पना एक तर्क दोष है बाकी यह कथन एक अद्वितीय भाव जागृत करती है इसमें कोई संदेह नही।
आधुनकि वैज्ञानिक जब जगत का अनुसन्धान करते है तो जगत उनके लिए न तो ब्यूटीफुल होता है और न सबलाइम, यह एक तथ्य होता है लेकिन वैदिक-औपनिषदिक ऋषियो के लिए स्थिति ऐसी न थी।
उपनिषद काल मे इस पोएटिक उद्गार की जगह परिकल्पनात्मक चितन ने ले लिया। गुढ़ से गूढ़तम अमूर्त कॉन्सेप्ट्स रचे गए और यह मान लिया गया कि हमारी परिकल्पनात्मक चितन जगत की, इसके कारण की वास्तविक तस्वीर खींच सकती है। सनातन, परम् सत आदि इसी परिकल्पनात्मक चितन प्रक्रिया में निकले शब्द हैं।
यह ब्रह्मांड तो स्वयम सनातन नही है फिर इसके अंदर किसी काल विशेष की चेतना कैसे सनातन हो सकती है?
क्या कुछ भी सनातन हो सकता है?
मुझे तो यह सम्प्रत्यय मानव मन द्वारा परिवर्तनशील जगत के निषेध में रचित एक अमूर्त प्रत्यय लगता है। इसके अनुरूप कोई वाह्य सत्ता है यह कहने का कोई आधार नही मिला मुझे आज तक।
विचारों के इतिहास में पाश्चत्य परम्परा में भी परिकल्पनात्मक और अमूर्त चितन को प्रयोग-प्रेक्षण के ऊपर प्लेटो-अरस्तू के बाद लगभग दो हज़ार वर्षो तक प्रमुखता दिया जाता रहा है। लेकिन इस प्रवृत्ति ने वैज्ञानिक चितन और पद्धति के विकास में अवरोधक का ही काम किया।
ध्यान रहे कि जगत की एक मिथकीय समझ है, इसकी एक तत्वमीमांसिय समझ है और इसकी एक वैज्ञानिक समझ है। इनमे हमे अपने वातावरण के साथ अनुकूलन करने में सबसे अधिक सक्षम जगत की वैज्ञानिक समझ ने ही किया है।
बाकी यदि विज्ञान का जगत ही मिथ्या हो तो फिर तो बात ही खत्म हो जाती है।
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