Friday, February 28, 2020

वैज्ञानिक तथ्य लिखने वालों की भाषा कैसी होनी चाहिए? 【एक】

वैज्ञानिक तथ्य लिखने वालों की भाषा कैसी होनी 
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चाहिए? 【एक】
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यद्यपि हम जो कुछ जानते है, जो कुछ अभिव्यक्त करते है वह अपने ही परिप्रेक्ष्य में कर सकते है तथापि हमरा परिप्रेक्ष्य जितना बड़ा हो उतना बेहतर होता है। कम से कम वैज्ञानिक तथ्य या वैज्ञानिक विवरण लिखते समय परिप्रेक्ष्य विषयक इस बात की सावधानी बरतनी बहुत आवश्यक है अन्यथा वह तथ्य जो लिखा गया है वैज्ञानिक नही रह जाता। 
ऐसा नही है कि हमने वैज्ञानिक भाषा और उसकी शब्दावली के रूप में एक पूर्णतया वस्तुनिष्ठ अभव्यक्ति का मध्ययम प्राप्त कर लिया है; सम्भव है कि मेटा-साइंटिफिक डिस्कोर्स की भाषा और शब्दावली साइंटिफिक डिस्कोर्स की भाषा और शब्दावली से तुलनात्मक रूप से अधिक वस्तुनिष्ठ हो। लेकिन, यह भविष्य की बात है। वर्तमान में वैज्ञानिक व्याख्याएँ अभिव्यक्त करते समय उन शब्दों के, उन वाक्य विन्यासों के प्रयोग से बचना चाहिए जो शब्द और वाक्य विन्यास भावात्मक और सांस्कृतिक रूप से पूर्वभारित या प्रीलोडेड हैं। ध्यान रहे कि भावात्मक या सांस्कृतिक रूप से पूर्वभारित शब्दावली और वाक्यविन्यास द्वारा वैज्ञानिक व्याख्या एक व्याख्या नही बल्कि एक मंडन या अपोलॉजी बन जाती है। 
विज्ञान के अपने नियम हैं, अपने अनुसाशन हैं और इनका पालन अपरिहार्य है। नवीन तथ्यों की अभिव्यक्ति के लिए विज्ञान ने नवीन शब्दावली, नवीन वाक्य विन्यास रचने की छूट दे रखी है अतः बजाय उस प्राचीन और शास्त्रीय भाषा के प्रयोग के, नवीन भाषा की रचना की जानी चाहिए।

मानवीय जगत तथ्य-मूल्य की समष्टि है। विज्ञान तथ्य का अनुसंधान करता है। इसका क्षेत्र मूल्यो की खोज या व्याख्या कतई नही है। अब, हमारी भाषा के तीन कार्य हैं (इर्विन कॉपी):
■इंफोर्मेटिव यूज ऑफ लैंग्वेज (भाषा का सूचनात्मक कार्य)
■इमोटिव यूज़ ऑफ लैंग्वेज (भाषा का भावात्मक कार्य)
■ डिडेक्टिव यूज़ ऑफ लैंग्वेज (भाषा का निदेशात्मक कार्य)
भाषा यह तीनो कार्य वाक्य विन्यास (सिंटेक्स) और शब्दावली से सम्पन्न करती है और प्रायः होता यह है कि इसके भावात्मक व निदेशात्मक कार्य मे प्रयुक्त शब्द वाक्य से अलग एकांत में भी वही भावात्मक और निदेशात्मक कार्य करना प्रारम्भ कर देते हैं: यह भाषा के साथ एक प्रकार की कंडिशनिग है। 
इन शब्दो का भाषा के सूचनात्मक कार्य मे दो कारण से उपयोग हो सकता है: जानबूझकर या अनजाने में।
मंडनशास्त्री यह जानबूझ कर करते हैं ताकि उनके पक्ष की मान्यता स्थापित हो सके और विज्ञान में कम प्रशिक्षित लोग अनजाने में। इन दोनों ही हालातो में विज्ञान का नुकसान ही होता है और छद्मविज्ञान की ही प्रतिष्ठा होती है। 
वैज्ञानिकों ने इस बात को समझा है और तभी आज प्राकृतिक विज्ञानों के शीर्ष पर बैठी भौतिकी प्रतीकों (सिंबल्स) और गणितीय सम्बन्धो का प्रयोग करती है।
दार्शनिकों ने भी इस बात को समझा और यह स्पष्ट किया कि बहुत सी दार्शनिक समस्याएं तो मात्र भाषाजन्य भ्रम हैं; हमारी भाषा हमे स्प्ष्ट हुई नही की ये समस्याएं वाष्पीकृत हो जाती हैं।
प्रख्यात दार्शनिक और गणितज्ञ बर्ट्रेंड रसेल ने इसी लिए दर्शन के लिए एक अलग वस्तुनिष्ठ, भाव-निदेश निरपेक्ष भाषा विकसित करने की वकालत की और इस सम्बंध में प्रयास किया।

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