एक थी तरंगिणी,
निश्छल, निर्मल प्रवाहमयी;
अपने किनारों को तोड़ती,
घुमड़ती, लहराती आगे बढ़ती,
मैं, उसके किनारों का शिलाखंड,
प्यासी आँखो से उसे देखता:
मूक था न, अभिशापित!
आह, पालकों पर सपने----!
और एक दिन तुमने
मुझे छू दिया।
अद्वितीय संगीत!
विधाता ने पत्थर की आत्मा को
नाचते देखा, गाते देखा, झूमते देखा।
तरंगिणी, क्या तुमने भी महसूस किया था
उस संगीत को?
फिर तो चट्टान का प्रेम,
जन्म-जन्मांतर का भाव,
उसके सपने मेरे धर्मग्रन्थ,
उसकी स्मृति मेरी श्रुति!
टूटा और मिल गया तुममें।
(स्वर, संगीत, नाद या विप्लव?)
अब तुम्हारी लहरे मुझ पर अठखेलिया करतीं हैं
लेकिन, आत्मा और प्यासी होती चली जाती है,
और प्यासी, और और प्यासी!!
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