Saturday, February 15, 2020

आवारा विचार 【2】: माचिस और चरनी

बब्बा के बब्बा चिंतित थे मानो प्रलय की घड़ी आने ही वाली है। बब्बा पिछले चार पांच घण्टो से चरनी चला रहे थे लेकिन अग्नि प्रज्वलित होने का नाम ही नही ले रही थी। बब्बा के सहयोगी बैठे जोर जोर से गाते जाते थे: 
अग्नि तुम आओ, अग्नि अपनी अनेक जिव्हाएं फैलाओ, अग्नि अपना अंश ग्रहण करने हेतु प्रकट हो, प्रकट हो।

एक आदमी बब्बा के बगल से गुजर रहा था। शायद भविष्य से आया था। उसने अपनी बीड़ी सुलगाई बब्बा की और चवन्नी की माचिस  फेंकी और आगे बढ़ गया।

उधर भविष्य में इस बात पर चर्चा चल रही थी कि क्या फॉस्फोरस की रगड़ से जलने वाली आग पवित्र है और शीघ्र ही इस विषय पर एक अंतराष्ट्रीय सेमिनार करने की तैयारी चलने वाली थी।

-------------●●●●----------

No comments:

Post a Comment

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...