मेरी बेहूदगी और मी गरदम
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चीखती रही माटी
जीवन से बंध कर
देव रूप न दो मुझे!
पगली बोध में
ठहरती है तू
तेरे बोध में ही
अमरता है मेरी,
कातर स्वर में बोला देव:
बुद्ध का नहीं होता विखंडन!
रूप में बंध कर
अब माटी ढूंढती है
बोधि का उत्सव
बोधि का उत्सव।
बोधि का उत्सव:
मी गरदम!!
हाँ मन बेहूदा गिरदे
कोहे-ओ-आबसार मी गरदम!!!
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मन: मैं
गिरदे: घूमना/भटकना
कोह: पहाड़
आबसार: झरना
मी गरदम: I whirl
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