छोटकऊ-बड़कऊ
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इंटर पास करने के बाद छोटकऊ को अब इलाहाबाद पढ़ने जाना है। इसका सबसे पहला कारण तो यह है कि इलाहबाद में ही बड़कऊ दस साल से रहकर "सिबिल" दे रहे हैं। काफी अनुभवी हैं और विश्वविद्यालय में उनकी सेटिंग भी बहुत जबर है। उन्होंने खुद ही छोटकऊ का इंट्रेस दिया है और उसको "बी ए सी" के इंट्रेस एक्जाम में पास करा दिया है।
छोटकऊ के समान बड़कऊ के कोई बड़कऊ नही थे। उनको बी ए की प्रवेश परीक्षा खुद अपने दम पर पास करनी पड़ी थी। उनके लिए इलाहाबाद इस लिए चुना गया कि इलाहाबाद जौनपुर के काफी नजदीक है: ए जे पैसेंजर से तीन घण्टे का रास्ता, और सबसे बड़ी बात कि यहाँ जौनपुर में ए जे में चावल-गेंहूँ रखो और वहाँ प्रयाग के प्लेटफार्म नम्बर तीन पर उतार लो। यही नही प्लेटफार्म नम्बर तीन को दस कदम डाँका नही की रामप्रिया रोड आ गया जहाँ बड़कऊ के मामा ने कमरा खोज दिया था। रामप्रिया बड़ा अच्छा लोकेशन है: स्टेशन, चाय की दुकान, पान-तम्बाकू की दुकान, मौर्या जी की सब्जी की दुकान, पिसान के लिए चक्की और वहाँ से यूनिवर्सिटी की दूरी मात्र दो-तीन किलोमीटर!
अब ए जे पैसेंजर में डबल चावल-गेंहू जाएगा।
इलाहाबाद में एजुकेशन का माहौल भी बहुत अच्छा है। यहाँ जिसको देखो "सिबिल" देता है, नही बल्कि जिसको जहाँ देखो वहीं सिबिल देता है: ,चाय की दुकान पर सिबिल, पान की दुकान पर सिबिल, दोहरा गुटखा की दुकान पर सिबिल, खाना खाते समय सिबिल, खाना बनाते समय सिबिल।
यह शहर सिबिल में ही जीता है और सिबिल में ही----
बड़कऊ ने शौचालय के दरवाजे पर भी संविधान का कैलेंडर चिपका रखा है-आखिर उस समय का उपयोग भी होना चाहिए!
छोटकऊ बड़कऊ के साथ रहेगा तो बिगड़ेगा भी नही: शायद ही कोई चायवाला, पानवाला, दोहरवाला, दूधवाला, ये वाला, वो वाला होगा जो बड़कऊ को नही पहचानता और बड़कऊ उन्हें नही पहचानते-आखिर दस साल से बड़कऊ सिबिल दे रहे है। अब इसमें उनकी क्या गलती की आज तक प्रिलिम्स भी नही पास कर पाए। असल मे समय ही कम है। 24 घण्टे में 9 घण्टा सोने में निकल जाता है: रात को 6 घण्टे और दिन में दाल-चावल-चोखा खाने के बाद 3 घण्टे। खाना बनाने में दोपहर में एक घण्टा और रात में एक घण्टा। दो वक्त चाय-पान-दोहरा करने में 4 घण्टा क्योकि सामाजिकता भी कोई चीज है। बाकी नौ घण्टे में नहाने-धोने-बर्तन मांजने में 1 घण्टा। अब इस आठ घण्टे में यदि एक एक घण्टा भी एक व्यक्ति को दिया जाय तो दिन भर में केवल आठ लोगो से ही मात्र परिचर्चा हो पाती है। यहाँ तो मुलाकाती ही 24 घण्टे में पूरी नही हो पाती तो बड़कऊ पढ़ेंगे कब बेचारे!
खैर छोटकऊ को इलाहाबाद इसलिए भी जाना है कि वह बड़कऊ के सामने रहेगा तो बिगड़ेगा नही।
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