ग्यारहवी क्लास में लिखी यह कविता
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जी रहे हैं हम
क्षण क्षण नवीन अनुभूतियों के संग
एक श्रृंखला पंचतत्वो की
जो आज व्याप्त है
जाने कब विलीन हो अनन्त में
दूर कही इस नश्वर संसार से
महाशून्य की गोद मे
परिपूर्णता के विस्तार में
अकेला या मैं होऊंगा मेरे साथ
या कुछ भी नही
यह मात्र कोरी कल्पना है
और सत्य बस यही है कि
बस जी रहे है हम
उतारते कागज पर अनुभूतियां
और एक दिन अनुभूतियां भी
जल जाएंगी चिताओं पर
ह्रदय और मस्तिष्क के संग संग
अपने पीछे कुछ क्षणिक भाव छोड़कर?
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