असभ्य, जाहिल!
तुम मर्म नही समझते
कविताओं का,
शास्त्री जी ने कहा।
मैं अगीत लिखता हूँ,
अकाव्य गाता हूँ,
और जानते हो शास्त्री
ओरांग ओटान को किसी ने पहचाना था केवल,
मैंने उसे कलम पकड़ा दिया है,
कागज काले करता है,
दूसरे ओरांग ओटानो के लिए!
डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...
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