【एक】
उस राज्य की सबसे सुंदर स्त्री के सौंदर्य के चर्चे होते थे। दूर देश के कवि उसकी एक झलक पाने को बेताब रहते थे ताकि उनकी कविता श्रृंगार और विरह के अब तक अनछुए पक्षो को शब्दों में बांध सके। कुछ दीवानों ने तो उस स्त्री के लिए सम्राट के महल में, जहाँ वह रहती थी और उसका मनोरंजन करती थी, छुपकर प्रवेश करने की कोशिश भी की थी और फिर सम्राट के सजग सैनिकों द्वारा पकड़े गए थे और सम्राट के क्रूर जल्लादों द्वारा चौराहे पर काट डाले गए थे।
उस राज्य के सबसे ज्ञानी व्यक्ति के भी देश विदेश हर जगह चर्चे थे और सम्राट ने उसे सरस्वती-पुत्र की उपाधि भी दे रखी थी। वह समस्त शास्त्रों और समस्त विद्याओं का ज्ञाता था तब भी उसकी ज्ञान पाने की भूख मिटती ही नही थी।
सम्राट अपने सिंहासन के बाएं उस सौंदर्यवान स्त्री को अपने बाएं तथा ज्ञानी को दाएं बिठाकर शासन चलाता।
एक दिन ज्ञानी और सौन्दर्यवती एक दूसरे पर आसक्त हो गए किंतु वह सम्राट से मन ही मन डरते भी थे अतः उनके मन मे इस विचार ने जन्म लिया कि सौंदर्य और ज्ञान मिलकर शासन क्यो न करे, आख़िर हमे इस सम्राट की आवश्यकता क्या है! और यह विचार विद्रोह में बदल गया।
ज्ञानी ने अपने ज्ञान से सबसे घातक विष तैयार किया जिसे उस सौन्दर्यवती स्त्री ने धोखे से सम्राट को उस रात शराब की प्याली में शराब ढालने वक्त मिला दिया।
अगली सुबह सम्राट के सिंहासन के अगल-बगल की जगह खाली थी, पता चला कि कल रात ज्ञानी ने एक विष बनाया था जिसका उसने स्वयम पर प्रयोग किया और उस विष की बेचैनी में उसने उस सौन्दर्यवती को मार दिया तथा स्वयम भी उस विष के प्रभाव से मर गया।
सिंहासन पर बैठे सम्राट की आँखों मे कोई पश्चाताप नही था बल्कि उसके चेहरे को बड़े ध्यान से देखने पर संतोष का भाव दिखता था जो इस बात की चुगली थी कि वह बलवान है।
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【दो】
अपने अंतरंग वार्तालाप के क्षणों में नदी ने सागर से इठलाते हुए उस चट्टान के बारे में बताया: एक अभागा पत्थर था जो बाकी पत्थरो से टूट कर मुझमे गिर गया लेकिन मुझे तो सागर में मिलना था इसलिए मैंने उस पत्थर पर थोड़ी अठखेलिया कर लीं। और दोष मेरा भी नही है क्योंकि यदि मैं उस पर अठखेलिया ना करती तो वो मेरा बहाव रोक देता लेकिन मुझे तो सागर में मिलना है।
सागर अपनी सम्पूर्ण गम्भीरता से बोला: पत्थरो की यही नियति है। मैं कई युगों से उनकी यह नियति देख रहा हूँ।
वही बगल में सागर और उस नदी की आंखों से अदृश्य उनकी बातें एक पतित देवदूत ने सुन लिया।
उसे अपनी और उस चट्टान की नियति एक दिखी--दोनों ही तो पतित थे; दोनों ही ने विद्रोह किया था; आह, दोनों ही ने तो सपने देखे थे!
तभी उस पतित देवदूत को स्मरण हुवा कि उसके पास तो स्वप्न विधाता ने भेजे थे और हाथ जोड़ते हुए यह मिन्नत की थी कि इस स्वप्न को देखो ताकि तुम पतित बनो--तुम पतित बनो क्योकि मेरी बनाई दुनिया अभी अपूर्ण है; मैं इसमें पुण्य डालना चाहता हूँ; मैं इसमें मुक्ति डालना चाहता हूँ; मैं इसमें धवल श्वेत रंग भरना चाहता हूँ लेकिन तब पुण्य के लिए पाप होना ज़रूरी है, धवल श्वेत रंग के लिए गहन तम का कालापन होना ज़रूरी है; मुक्ति के लिए मूल पाप का होना ज़रूरी है।
तो क्या इस पत्थर से भी विधाता ने प्रार्थना किया था, पतित देवदूत ने स्वयम से प्रश्न किया।
उधर सबसे ऊपर के आकाश में रहनेवाले जगत के सृष्टिकर्ता ने प्रयोगवश अपनी शब्दावली से पतित शब्द को मिटा दिया क्योकि वह देखना चाहता था कि इस शब्द के बगैर मानवता बनी रह सकती है कि नही।
पतित शब्द के मिटते ही विधाता का अस्तित्व भी वाष्पीकृत हो गया!
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अखलाक/ नैतिकता
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मजलिस जमी थी, यह रंको की मशहूर चौपाल थी जहाँ उनके बच्चे रंको की तहजीब सीखते। इस मजलिस के सामने जो ऊँची जगह थी वहाँ रखी तख्ती तब से मौजूद है जब से दुनिया मे बादशाहत कायम हुई। दुनिया मे बादशाहत कायम होने के अगले ही दिन वहाँ पहली मजलिस जमी थी। उस तख्त पर उसी दिन एक पहला नासेह बैठा था जिसने रँको को नैतिकता / अखलाकियत की पहली सबक सिखाई थी।
तब से आज तक यह रवायत कायम थी। रंको की दुनिया का सबसे उम्दा नासेह उस तख्ती पर बैठता, सामने बच्चे बैठते और अखलाकियत कि सबक चलती।
नासेह ने एक दास्तान के ज़रिए सबक पढ़ना शुरू किया:
"एक क्रूर राजा था
था एक ज़ालिम बादशाह!"
कहते हैं कि करामन और कातिबीन हर जगह मौजूद होते हैं। इंसान के कर्मों का लेखा-जोखा रखने का काम ईश्वर ने दो फ़रिश्तों को दे रखा है। ये फ़रिश्ते इंसान के हर अच्छे-बुरे कर्म को लिखते हैं। इन फ़रिश्तों को करामन-कातिबीन कहा जाता है। ये फ़रिश्ते जिस रजिस्टर में कर्मों को लिखते हैं उसे नामा-ए-आमाल कहा जाता है।
इस दिन किसी तरह नामा-ए-आमाल करामन कातिबीन के हाथ से फिसलकर नीचे ज़मीन पर गिर पड़ा और किसी ने उसमे लिखी बाते पढ़ लीं। उसमे लिखा था:
"यह रंको कि कौम के नासेह जो कहते हैं कि एक क्रूर राजा था, एक था ज़ालिम बादशाह, हक़ ये है कि वो बादशाह ज़ालिम हो न हो ये कौम बदअख़लाक़ी ज़रूर है, बिल्कुल बेईमान और भगोड़ी।"
आगे एक शेर दर्ज था जिस के नीचे करामन और कातिबीन दोनों के दस्तखत थे---
"तुम भी चाहते तो थे के तेरी ही होती दुनिया
उसकी दुनिया जो हुई, कहते हो ज़ालिम था वो!"
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बी ए प्रोफेट ऑनटू दाईसेल्फ
इस समाचार को सुनने के पश्चात की सम्बुद्ध, वह जिन्हें सारे रहस्य ज्ञात हैं, कल इस पगडंडी से गुजरेंगे, सड़क के किनारे अपनी दुकान लगाने वाला चर्मकार खुशी से झूम उठा--
"मेरी अज्ञानता ने मेरी राह रोक रखी है अतः कल महाज्ञानी से रहस्य को जानूँगा", चर्मकार ने इस प्रकार मन मे विचार और निश्चय किया।
अगली सुबह जब सम्बुद्ध जब उस चर्मकार की अस्थाई दुकान के सामने से गुजर रहे थे तब वह अपनी चटाई से लगभग छलांग लगाते हुए सम्बुद्ध के सामने हाथ जोड़े खड़ा हो गया।
हे परमज्ञानी, मैं आपसे एक सत्य, एक रहस्य जानना चाहता हूँ, चर्मकार ने सम्बुद्ध से कांपते हुए कहा।
-मित्र, सत्य ही केवल उत्तर है, कुछ नही बल्कि मात्र सत्य, प्रश्न करो!
-प्रभु, जूतों की कैसे सिलाई करूँ की वह जूते न कभी घिसे, न फटे?
-एक सम्बुद्ध से इस प्रकार के ओछे प्रश्न करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई!! सम्बुद्ध के अनुयायियों ने उनका अपमान समझते हुए क्रोधित होकर कहा।
-लेकिन प्रभु, मेरे लिए इसी प्रश्न का उत्तर सारे रहस्यों की कुंजी है क्योकि आपके पिता, जो इस राज्य के महाराजधिराज थे, ने मेरे पिता को इसी गलती के लिए सजा दी थी कि मेरे पिता ने उनके लिए जो जूते बनाए वह शाश्वत नही थे, कुछ दिनों के पश्चात उनकी सिलाई खुल गई और मैं भी उस दण्ड को मैं भोग रहा हूँ तथा मेरी आने वाली पीढियां भी भोगेंगी।
सम्बुद्ध हमेशा की भांति मौन होक र आगे बढ़ गए-अव्यक्तानि;अप्रश्नानि!!
चर्मकार के मन मे एक निश्चय आया: अप्पदीपो भव!!
--------☆★★★★☆--------
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