Tuesday, February 4, 2020

हाड़ा हाड़ा ह रे

एक गाँव था उसमे विदेशी बाभन रहते। उनकी होली गायन प्रसिद्ध थी। बगल में ही एक दूसरा गांव था मूलवासियों का। मूलवासी परेशान नही थे कि हम यहाँ के मूलनिवासी होकर भी हमे होली गानी नही आती क्योंकि उनको इसकी कोई ज़रूरत नही थी चूंकि उनके द्वारा बनाए ढोल और तबले पर ही वो बभनगाँवा के लोग होली गाते। लेकिन एक दिन मुलवासो गाँव का एक लड़का स्नातक हो गया प्रयाग विश्वविद्यालय से और कोट भी पहनने लगा।
उसे यह नागवार गुजरा की ढोल बनाए हम और होली के चर्चे हो बभनगांव के।
उसने मुलवासो गाँव के लोगो को भड़काना शुरू किया कि हम अपनी होली सीखेंगे और बभनगांवां के लोगो को ऐसा ढोल और तबला देंगे जो एक ही थाप में फट जाय। फिर देखते है कि कैसे गाते है होली!
उस साल बभनगांव की होली बिगड़ गई। कोटहा बाबू बहुत खुश की आधा काम तो पूरा हो गया अब
 खुद होली गाना सिख लेते हैं अतः कोट वाले बाबू ने फेक आई डी बनाकर  बभनगाँव का एक  फेसबुक ग्रुप ज्वाइन किया " होली की टोली" ।
बभनगांव के लोगो को ऐसा नही था कि पूरी बात पता न थी और कोटहा बाबू को पहचान नही पाए।
अब बारी इनकी थी। 
एक ने सीरीज चलाई की होली कैसे गाएं और उसमें साफ लिख दिया कि उसके लिए ढोल पर पहले मंत्र फूंकना होता है फिर ढोल लेकर अंदर एक कमरे में बंद हो जाना पड़ता है फिर बाहर से दरवाजा बंद और चाहे कुछ भी हो शाम तक दरवाजा नही खुलना चाहिए। हाँ भीतर से जो आवाज आएगी उसी को बाहरी लोग ढोल झाल लेके रिपीट करें बस एक नम्बर की होली।

कोटहा बाबू को होली गायन का रहस्य मिल चुका था अब मंत्र वाली ढोल वापस पानी थी। गांव में हिसाब करवाया तो एक ढोल का पैसा अभी बभनगांव पर बाकी था। कोटहा बाबू पहुंचे बभनगाँव और दिस दैट करके वो ढोल वापस मांग लाए।

होली का दिन था, कोटहा बाबू ढोल लेकर एक कोठरी में घुसे और सख्त चेतावनी दी कि शाम तक दरवाजा न खोला जाय और जो लाईन मैं बोलू उसको बाहर से ढोलक झाल से रिपीट किया जाय।

कोठरी से आवाज आई: हाड़ा ह रे
बाहर ढोलक झाल के साथ : हाड़ा ह रे
अंदर से: अरे हाड़ा हाड़ा ह रे
बाहर : अरे हाड़ा हाड़ा ह रे
अंदर से: अरे कटलस रे
बाहर: अरे कटलस रे
अंदर: अरे मुवनी रे
बाहर: अरे मुवनी रे
अंदर: अरे सरवा खोलs सs रे
बाहर: अरे सरवे खोलs सs रे
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शाम तक होली चली, शाम में दरवाजा खुला तो कोटहा भाई का अंग अंग सूजा था।

दरअसल उस एक थाप से टूट जाने वाले ढोलक में बभनगँवा के लोगो ने छेद करके हज़ार दो हज़ार हाड़ा/बर्रे डाल दिया था।
कथा गईल बन में, सोंचs अपना मन मे!


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