Tuesday, February 4, 2020

आत्मकथा

इलाहाबाद से बी एस सी करने के बाद बहुत लोग दिल्ली जाते हैं अतः मैं भी गया। परम्परा यही थी कि जब तक अपना कमरा न मिल जाए तब तक सीनियर के यहाँ लोग गिरे रहते हैं। परम्परा का पालन करते हुए मैं भी अपने ही शहर के रहनेवाले और अपने ही स्कूल के इंटेलिजेंट गिने जाने वाले सीनियर के यहाँ गिरा। सीनियर का ठाट देख कर हैरान, भाई साहब ने एम बी ए करके किसी अंतरराष्ट्रीय बैंक में नौकरी पकड़ लिया है यह जानता था लेकिन यह ठाट, इसकी कल्पना भी न की थी। पहुंचने के अगले ही दिन भाई साहब ने निरुलाज़ में अपनी टीम के साथ मुझे बियर पिलाया। सच बताऊं ग्लास खाली होती और बार बॉय और बियर लेकर खड़ा रहता। एक दिन बीच लगा कर भाई साहब डिस्को ले गए।  दो तीन दिनों बाद भाई साहब ने घर मे ही पार्टी रखी और मैं पहली ही बार इतना पिया की उल्टी पे उल्टी और अगले दिन बीमार पड़ गया।
भाई साहब ने मेरा स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक में खाता खुलवा दिया हालांकि बाद में मैंने उनका वो दस हज़ार रुपया वापस कर दिया जो उस बैंक में खाता खुलवाने के लिए मिनिमम रकम थी। भाई साहब ने अपने और मेरे नाम से एक संयुक्त खाता भी खुलवा दिया जो उस वक़्त मेरी समझ मे नही आया और इसे भी मैने उनका अपने ऊपर एहसान मान लिया। भाई साहब के एहसानों के तले मैं दबता चला जा रहा था लेकिन मुफ्त में ऐश करना अच्छा भी लगता था। 
दुखी मन से अपने नए कमरे में शिफ्ट हो गया जिसे भाई साहब के किसी शागिर्द ने ही मेरे लिए ढूंढ दिया था।

अभी नए कमरे में शिफ्ट किए हुए 10 दिन ही बीते होंगे कि उनका वो शागिर्द मेरे कमरे पर पहुंचा और हाँफता हुवा बोला कि भाई साहब को पुलिस ने पकड़ लिया है। 
एक जासूस की तरह तत्काल मुझे सारी बात समझ में आ गई कि भाई साहब के फ्लैट में एक नितांत निजी कमरा क्यो था,भाई साहब लैपटॉप और ढेरों क्रेडिट-डेबिट कार्ड लेकर क्यों बैठते थे, भाई साहब ने मुझे क्यो कहा था थी मैं तुमको बहुत जल्दी एक काम दूंगा डरोगे तो नही?
भाई साहब का चरित्र तत्क्षण मुझे क्लियर हो गया।

मैंने शागिर्द से कहा: तब अब क्या किया जाय?शागिर्द ने दो झोला समान देते हुए कहा कि इसको अभी रख लो क्योकि वहाँ फ्लैट पर पुलिस का छापा पड़ सकता है। मैंने मना कर दिया कि मैं नही रखूंगा।
शागिर्द चला गया।

अब मेरी भी हालत खराब थी, तरह तरह की आशंका की कहीं पुलिस मुझे न फ्रेम कर दे, कहीं भाई साहब मुझे न सँगबहिनी बना लें। 
संयोग से उस समय दिल्ली पुलिस में एक ऊंचे पद पर मेरे गाँव के ठाकुर साहब थे। मैं सीधा उनके पास गया और सब कुछ सच-सच बता दिया। 
ठाकुर साहब को वो केस पता था उन्होंने मुझसे कहा कि पण्डित कइसन के संगत धर लेले रला हा, ओहनी के त साइबर क्राइम के एगो टीम बा, खाता में से पइसा उड़ावेलेसs। 
मेरे ऊपर मानो घडो पानी पड़ गया हो जिसे भांप कर उन्होंने कहा कि जा बाकी ओहनी के संगत छोड़ द।
जा निश्चिन्त रहs।

वहाँ से निकल कर मैं सीधे रेलवे स्टेशन गया और बोकारो का रिजर्वेशन कराया। दो दिन बाद का रिजर्वेशन था लेकिन कमरे की बजाय पहाड़गंज अपने असली बड़के भैया के साले के पास उनके होटल में चला गया और उनको भी सारी बात बताई। दो दिन बाद बड़के भैया के साले ने अपने स्टाफ को भेजकर मेरा समान मंगवा लिया और मैं रेल से वापस बोकारो।

दिल्ली का अनुभव बुरा रहा अब कोई दूसरा शहर ढूंढना था।
■■■■
दिल्ली से निराश होकर अब एक नया शहर तलाशना था। टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ शोशल साइंस,मुंबई का फॉर्म आया था अतः मुंबई का प्लान बनाया। सलेक्शन लिखित परीक्षा, ग्रुप डिस्कशन और साक्षात्कार के माध्ययम से होना था और लिखित परीक्षा की तारीख तो तय थी किन्तु साक्षात्कार की तारीख निर्धारित नही थी और केवल उनका साक्षात्कार होता जिनने लिखित परीक्षा पास करने के बाद जी डी भी  पास कर लीया हो। 
सुबह सुबह शिवाजी टर्मिनल फिर वहाँ से देवनार और देवनार से कैंपस पहुँचा। टीस्स वालो ने सीमित अभ्यर्थियों के लिए वही रहने की व्यवस्था कर दी थी, बहुत मिनिमल चार्ज और खाली हॉस्टल में आप दो चार दिन तक रह सकते थे। 
धीरे धीरे और भी अभ्यर्थी आने लगे और उनमे से  दो चार  से मेरी दोस्ती भी हो गई।  इन सबमे मेरी सबसे गहरी दोस्ती मणिपुर की इलाटो अचूमी से हो गई और हमने उस दिन ओरिएंटेशन के बाद ऑटो लेके मुंबई की कई जगहों का भ्रमण किया।  गेट वे ऑफ इंडिया पर मैंने आइसक्रीम लिया और इलाटो ने कोल्ड ड्रिंक। इलाटो अपना कोल्डड्रिंक पीते पीते अचानक से मुझसे बोली कि लेट मी टेस्ट योर आइसक्रीम। मुझे लगा कि वह मज़ाक कर रही है और मैंने उसे अपना आइसक्रीम पकड़ा दिया। मैं हतप्रभ, इलाटो ने  थोड़ा आइसक्रीम खा लिया और फिर मुझे कोन वापस कर दिया।
अब मैं धर्मसंकट में, इलाटो की जूठन कैसे खाऊं, पता नही यह कुत्ता भी खाती हो! फेकता तो उसे बुरा लगता और खा पा नही रहा था।
प्लान सुझा और कोन को मुँह तक ले जाते हुए उसको कस के दाब दिया। कोन टूट गया और आइसक्रीम नीचे और मेरे पैंट पर।

अगले दिन लिखित परीक्षा थी और तीन टॉपिक्स दिए हुए थे जिसमें से किसी एक पर 500 शब्दो मे लेख लिखना था। मैंने "न्यूक्लियर विपन एंड साइकोलॉजी ऑफ आर्म रेस" पर निबंध लिखा। शाम को रिजल्ट आया और मैं लिखित परीक्षा पास कर चुका था लेकिन बेचारी इलाटो असफल रही।

■■■■

अगले दिन ग्रुप डिस्कशन थी और हमारे ग्रुप को टॉपिक मिला : वोलेंटियरिज़्म वर्सेस प्रोफेशनलिज़्म इन शोसल सर्विस। ग्रुप डिशक्शन में भी मैं पास कर गया अब एक दिन बाद साक्षात्कार था। इलाटो वापस चली गई थी और नए नए दोस्त बन चुके थे, बल्कि हमारा एक ग्रुप बन चुका था जिसमे शिल्पा रमेज़ा और मनीषा मीणा को छोड़कर और किसी का नाम अब याद नही। आपस मे सुख दुख, आलतू-फालतू, साथ घूमना, साथ कैंटीन में खाना खाना, खाने के बाद रात दस ग्यारह बजे तक कैम्पस में साथ बैठे रहना हम यही सब करते। 
साक्षात्कार का दिन आया और मेरी बारी आई, मैं साक्षात्कार कक्ष में घुसा तो 7 लोग अंदर बैठे थे। सबके बीच मे राउंड टेबल पर एक टकला था जिसके ऑपोज़िट मुझे बैठना था।
टकले ने बैठने का इशारा किया और मैं अपना फोल्डर बढाते हुए थैंक्यू बोलते हुए बैठ गया।
टकले ने फोल्डर लेते हुए प्रश्न किया: 
हाऊ डू यू फाइंड टिस्स?
वेरी गुड सर, द एम्बिएंस इज़ वेरी फाइन, द सीनियर्स आर वेरी कॉपरेटिंग, मैंने जवाब दिया।
डू यु नो एनी सीनियर, एक मैडम ने पूछा
नो मैम पर्सनली आई डोंट बट द वे दे इंटरेक्टेड इन द ओरिएंटेशन वाज़ क्वाइट गुड।
मिस्टर मिश्रा यू स्टडीड साइंस एंड हियर यू आर स्पोज़ड टू स्टडी शोसल साइंसेज, हाउ आर यू गोइंग टू कोप विथ दैट, एक सर ने प्रश्न किया।
सर आई हैव स्टडीड शोशल सांसेज ऑन माई ऑन मैंने कहा।
टकला ने कहा डिफाइन एंथ्रोलपोलॉजी।
मैंने जवाब दिया, स्टडी ऑफ हुमैन ऐज द कल्चरल बीइंग।

बी एस सी किये दो साल हुए अब तक क्या कर रहे थे?
सर तैयारी।
मतलब सिविल सर्विसेज में नही हुवा तो टिस्स में ट्राई मारने चले आए?
सर---आँ----ऊं-------
जाओ सिविल सर्विसेज की तैयारी करो, यहाँ क्या करोगे और बिहारी हो न बिहार को कैसे सुधारोगे?

मैं समझ गया था कि यह सरवा मुझे फेल करेगा 
मैंने टकले से कहा सर कभी बिहार आईए फीर आपको सुधार देंगे।

टकला गुस्सा गया और चिल्लाया: आउट
मैंने अपना फाइल लिया और निकल गया।

टिस्स का सपना भी टूट गया था।

बाहर ग्रुप वालो ने कहा कि यार तुम्हे वैसे रिएक्ट नही करना था वह तुम्हारा टेम्परामेंट चेक कर रहा था। खैर अब क्या हो सकता था, जो होना था हो चुका था।

बाद में यह भी पता चला कि किसी बिहारी छात्र ने उस टकले को लसार लसार मारा था।

■■■■■

नौकरी लग नही रही थी और मैं उन लकी और तेज विद्यार्थियों में से नही जिनकी पढ़ाई पूरी करते ही नौकरी लग जाती है। ऐसा नही है कि आप पढ़ाई पूरी करें और नौकरी न लगे लेकिन पढ़ाई के दौरान यदि आपने खोवा कुटा है तो देर होती है। मैं पढ़ाई के दौरान खोवा कूटने वाले छात्रों में से था। मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे, जैसे उड़ी जहाज को पंछी फिर जहाज पे आवे की तरह सब जगह से थक हार कर दुबारा बैक टू इलाहाबाद।
इलाहाबाद में इस बार पोस्टग्रेजुएट डिप्लोमा इन टूरिज़्म एडमिनिस्ट्रेशन में एडमिशन लिया रिटेन और इन्टरव्यू दोनों पास करते हुए। 
पढ़ाई पूरी की और घर आया था, अब नौकरी कब लगेगी, क्या कर रहे हो टाईप के सवाल उठने लगे थे।
पेपर में देखा राँची में पॉपुलेशन सर्विसेज इंटरनेशनल नामक एन जी ओ में कॉर्डिनेटर या मैनेजर टाईप का पद निकला था। सैलरी अच्छी थी और यह विज्ञापन द हिन्दू में निकला था अतः सोचा वहाँ ट्राई करूँ।
अशोक नगर स्थित इसके ऑफिस में शर्ट-पेंट-टाई-फाईल लेकर पहुँच गया। इंटरवियू में नंबर आया तो केवल एक साहब और एक मैडम इंटरभय्यू ले रहे थे।
मेरा फोल्डर पलटते हुए मैडम ने कहा कि तुमने कोर्स किया है टूरिज़्म का और आए हो यहाँ?
मैंने कहा मैडम दो कारण हैं: पहला तो बाबूजी पूछते हैं कि कौन सी किताब पढ़ रहे हो जिसका चैप्टर खत्म ही नही हो रहा है और दूसरा मेरे कोर्स का नाम टूरिज़्म एडमिनिस्ट्रेशन था तो आप टूरिज़्म भूल जाइए बाकी एडमिनिस्ट्रेशन तो है ही।
सर ने मेरा मार्कशीट देखा उसमे एक पेपर टूरिज़्म मार्केटिंग का भी था। उन्होंने कहा कि हम टूरिज़्म को भूल जाते हैं मार्केटिंग में काम करोगे?
मैंने कहा बिल्कुल और मन ही मन खुश की बड़ा सा ऑफिस होगा और मेरे नेम प्लेट के नीचे मार्केटिंग मैनेजर।
सर ने कहा मान लो गांव में जाकर महिलाओं को कंडोम्स बेचनी हो तो कैसे बेचोगे?
ले सरवा, ई का!!!
मैंने कहा: बहन जी हमारी कम्पनी●●●●●●
सर ने टोकते हुए कहा: बहन को कंडोम बेचोगे?
मुझे अब गुस्सा आ गया कि साला करने क्या आया था और ये करवाने की क्या सोच रहा है।
मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा सर कंडोम तो नही बेच पाऊंगा हाँ कट्टा, बन्दूक, बम बेचवना हो तो बेचवा लीजिएगा।

बाद में फोन आया कि कंडोम बेचने की नौकरी लग गई है लेकिन मुझे वो बेचना ही नही था।

■■■■■■

No comments:

Post a Comment

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...