Friday, February 21, 2020

ज्ञानमीमांसा

ज्ञानमीमांसा 【शून्य】

मनुष्य प्रदत्त पा पहले से बने बनाए जगत में नही रहता बल्कि वह अपने जगत का निर्माण स्वयम करता है। जगत विषयक तथ्य का मानव भले ही निर्माण न कर सके किन्तु वह मूल्यों का सृजन स्वयम करता है और इस प्रकार 'मानवीय जगत और जीवन', मात्र व्यवस्थित तथ्यों का संजाल नही है बल्कि यह तथ्य-मूल्यों की एक समष्टि बन जाती है।
जगत विषयक कोई भी सूझ और समझ इस प्रकार मानवीय सन्दर्भ में, मात्र जगत के तथ्यों का अक्यूमलेशन ही केवल नही है। 
जगत विषयक तथ्य को मात्रतात्मक तथा गुणात्मक रूप से और बेहतर जानने के लिए मानव ने डेटा प्राप्त करने के लिए विविध उपकरण यथा, टेलिस्कोप, माइक्रोस्कोप आदि बनाए हैं जो मानवीय ज्ञान इंद्रियों के विस्तार हैं। इन डेटा को सूचना और ज्ञान बनाने के लिए इन्हें सन्दर्भ और अर्थ एवम आशय देने के लिए मानव आज सुपर कम्प्यूटर ही नही बल्कि क्वाण्टम कम्प्यूटर की भी सहायता लेने को आमादा है। इन जटिल और अत्याधुनिक उपकरणों से  हमे एक बहुत ही उदात्त और जटिल ज्ञान मिलता है लेकिन इस उदात्त और जटिल ज्ञान को विवेक बनाने वाली मशीन का, उपकरण का अविष्कार हमने न तो आज तक किया है और न कर पाएंगे हालांकि  आज प्रचलित मन के कम्प्यूटेशनल मॉडल के अनुसार मन और मष्तिष्क में हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का सम्बंध है और इस विषय से सम्बंधित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, वीक वर्जन, स्ट्रॉन्ग वर्जन आदि कॉन्सेप्टों पर विचारकों के मध्य विवाद है।
ध्यातव्य है कि महान भौतिकीविद हॉकिंग से जब मन के बारे में प्रश्न किया गया तो उन्होंने मन को मष्तिष्क का सॉफ्टवेयर कहा। प्रसिद्ध दार्शनिक सर्ल ने मन विषयक हॉकिंग की इस पोजीशन का जमकर खंडन किया है।

थोड़ी देर के लिए हम मान लेते हैं कि मन विषयक उक्त मॉडल सही है और हमने एक एथिकल सुपर कम्प्यूटर भी बना लिया है और उस एथिकल सुपर कम्प्यूटर से हम नीतिशास्त्र और मूल्य मीमांसा सिख रहे हैं। इस स्थिति में क्या हम मानव रह जाएंगे?

डेटा, सूचना, ज्ञान और विवेक में अंतर होता है। हमारी ज्ञाननेंद्रियों से होकर जो कुछ भी चेतन या अचेतन रूप से हमारे मन पर संस्कारित होता है वह डेटा है। चेतन मन इन संस्कारो की उपेक्षा भी कर सकता है और इनको आकार और सन्दर्भ भी दे सकता है। हमारा मन इन डेटा को आकार और सन्दर्भ देकर सूचना का निर्माण करता है। सूचना को आशय और अर्थ इसे ज्ञान बनाता है। सूझ के साथ, अंतरदृष्टि के साथ, ज्ञान विवेक होता है।

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ऊपर हुई बीटिंग अबाउट द बुश, कोई भी सूचना जिसका व्यवहारिक (प्रैगमीटिक वैल्यू) मूल्य होता है वह ज्ञान है।

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ज्ञानमीमांसा 【एक】

पाश्चात्य ज्ञानमीमांसा में ज्ञान को परिभाषित करते हुए इसे "न्यायोचित सत्य विश्वास" कहा जाता है: नॉलेज इज़ ए जस्टिफाइड ट्रू बिलीफ।
अर्थात, पाश्चात्य परम्परा में ज्ञान और सत्यता आपस मे सम्बद्ध हैं। इस परम्परा में "असत्य ज्ञान" कहना "बन्ध्या माता" कहने के समान ही व्याघती है। 
भारतीय परम्परा में ज्ञान के साथ सत्य होना कोई बाध्यता नही है। ज्ञान असत्य भी हो सकता है। भारतीय चिंतन पद्धति में सत्य ज्ञान को "प्रमा" तथा असत्य ज्ञान को "अप्रमा" कहते हैं। 
प्रमा को जानने के साधन प्रमाण है यथा: प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, उपमान इत्यादि।
प्रमाणशास्त्र और ज्ञानमीमांसा बड़ा ही रोचक विषय है जिसमे ज्ञान, इसके स्वरूप, ज्ञान के स्रोत, सत्यता की कसौटी, सत्य का स्वरूप, ज्ञान की सीमाओं आदि विषयों का अध्ययन होता है। 

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ज्ञानमीमांसा 【दो】

प्रमाण किसे कहेंगे, कौन सा प्रमाण वैध है, किस परिस्थिति में कौन सा प्रमाण अपनी वैधता खो देता है यह भी बड़ा महत्वपूर्ण विषय है क्योंकि ज्यों ज्यो हम सत्य शब्द को लेकर गम्भीर होते है आगे प्रमाण और सत्य सम्बन्धी उलझने बढ़ती जाती है। 
ज्ञानमीमांसा में दो सिद्धान्त है: वस्तुवादी और  प्रत्ययवादी।

सामान्य जनमानस सहज वस्तुवादी होता है। इसे नाईव रियलिज़्म कहते हैं। रियलिज़्म या वस्तुवाद एक ज्ञानमीमांसीय सिद्धांत है जिसके अनुसार ज्ञेय की सत्ता ज्ञाता से स्वतंत्र होती है। ज्ञानमीमांसा ज्ञान के स्रोत, इसकी वैधता, इसके निकष आदि का अध्ययन करने की दर्शन की शाखा है। 
वस्तुवाद के विपरीत जो दूसरा सिद्धान्त है उसे प्रत्ययवाद कहा जाता है जिसके अनुसार ज्ञेय की सत्ता ज्ञाता पर निर्भर करती है। 
प्रथम दृष्टया यह सिद्धान्त बड़ा अजीब लगता है कि मैं जानता हूँ इसलिए दुनिया है यह कैसा अजीब और बेतुकी बात है लेकिन दर्शन के इतिहास में यह एक बलवती विचारधारा रही है और जी ई मूर द्वारा इसके खंडन के बावजूद यह आज भी अस्तित्वमान है। कवांटम सिद्धान्त के निष्कर्षों द्वारा कुछ दार्शनिक यह निगमित करते है कि सत्यता हमारी चेतना में उतपन्न होती है।

वस्तुवाद भी कई प्रकार का है : 
●नाईव रियलिज़्म---कॉमन सेंस
●रिप्रजेंटेटिव रियलिज़्म---जॉन लॉक
● नियो रियलिज़्म----बर्ट्रेंड रसेल
● क्रिटिकल रियलिज़्म--सेलर

वस्तुवाद या यह विचारधारा की ज्ञेय का ज्ञाता से स्वतंत्र अस्तिव होता है भी अपने आप मे एक नही है बल्कि कई रूपो में बंटा हुआ है। 
प्रश्न है कि एक सहज विचार जिसके अनुसार मैं जानु या न जानु यह दुनिया रहेगी चार प्रतिनिधि शीर्षकों में क्यो विभाजित है?

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ज्ञानमीमांसा 【तीन】

ज्ञेय की सत्ता ज्ञाता पर निर्भर करती है या दृश्यते इति वर्तते या दृष्टि ही सृष्टि करती है, इस अजीब ज्ञानमीमांसीय सिद्धान्त पर कोई कैसे पहुँच गया जबकि यह सामान्य सी बात है कि मैं रहूँ या न रहूँ यह दुनिया रहेगी; मेरे अपने  कमरे से बाहर चले जाने पर उसमे मौजूद मेरी स्टडी टेबल का लोप नही हो जाता। 
पहली बार तो यह ज्ञानमीमांसिय सिद्धान्त ही अनर्गल प्रलाप और पागलपन प्रतीत होता है।
पाश्चात्य परम्परा में दार्शनिक जॉर्ज बर्कली ने अपने पूर्ववर्ती जॉन लॉक के अनुभववाद पर दार्शनिक चिंतन कर यह निष्कर्ष स्थापित किया कि "सत्ता दृश्यता है; टू बी इज़ टू बी प्रसिव्ड।" 

अजीब बात है, बर्कली यह क्या कह रहे हैं! ऐसा नही है कि बर्कली की बात पहली बार मे हमे ही अजीब और अनर्गल लगती है बल्कि उनके समकालीन डॉक्टर जॉनसन ने जब उनका यह सूत्र सुना तो अपने पैर के अंगूठे को एक पत्थर पर पटक के कहा: मैं इस तरह इसका खंडन करता हूँ। 
डॉक्टर जॉनसन ही नही महान वैज्ञानिक स्टीफेन हॉकिंग भी बर्कली की बात को समझ नही पाए और हॉकिंग ने तो बर्कली के बारे में यह लिख दिया कि वह समस्त भौतिक सत्यता, दिक और काल को भ्रम कहते थे। 
हॉकिंग ने केवल बर्कली को ही आधा-अधूरा नही समझा बल्कि दर्शन को भी आधा अधूरा समझते हुए उसे मृत घोषित कर दिया।
हॉकिंग ने कांट की भी आलोचना की लेकिन वह स्वयम ही कांट के जूते में पैर रख देते हैं, बहरहाल हमरा प्रश्न यह है कि यह अजीबोग़रीब सिद्धान्त कि "सत्ता प्रत्यक्षीकरण का होना है" कैसे अस्तित्व में आ गया।

अमेरिकी दार्शनिक अर्चि जे दर्शन को परिभाषित करने का प्रयास करते हुए इसके समस्त पक्षो के विश्लेषण के पश्चात इसे "सामान्य अनुभव की सामान्य अनुभव द्वारा आलोचना"( फिलोसोफी इज़ द कॉमन सेंस क्रिटिसिज़्म ऑफ द कॉमन सेंस) कहते है। दर्शन सेकेंड ऑर्डर इंक्वायरी या द्वितीय स्तर का अन्वेक्षण है और मानवीय चेतना की प्रकृति ऐसी है कि उसके सामान्य अनुभव काल क्रम में और सामान्य होते जाते है। अर्थात कुछ सामान्य अनुभवो का सामान्य कुछ सामान्य अनुभवो से अधिक सामान्य होता है। दरअसल हम ज्ञान के विकास के साथ विशिष्टता से सामान्यता की ओर बढ़ते है। और इसी लिए क्वाण्टम मैकेनिक्स क्लासिकल मैकेनिक्स का कोई विशिष्ट पार्ट नही बल्कि इसके उलट क्लासिकल मैकेनिक्स ही क्वाण्टम मैकेनिक्स का एक विशिष्ट पार्ट है।

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ज्ञानमीमांसा 【चार】
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हमरा सामान्य अनुभव जब विरोधाभासी प्रतीतियां देने लगता है तो उस समय सामान्य अनुभव की आलोचना की आवश्यता पड़ती है। ज्ञानमिमसैय प्रत्ययवाद या यह सिद्धान्त कि ज्ञेय की सत्ता ज्ञाता पर आश्रित है वस्तुतः सामान्य अनुभव की आलोचना और समीक्षा में ही जन्मा है। 
पाश्चात्य परम्परा में डेकार्ट, स्पिनोजा और लिबिनिज़ट्ज़ बुद्धिवादी परम्परा के प्रतिनिधि दार्शनिक हैं। बुद्धिवाद के अनुसार हमारे समस्त ज्ञान बुद्धि द्वारा होते हैं। कुछ प्रत्यय या कॉन्सेप्ट्स ऐसे होते हैं जो सहजात या जन्म से हममें मौजूद होते हैं। 
डेकार्ट ने तो ईश्वर के प्रत्यय को भी सहजात माना है। 
अनुभव के ऊपर बुद्धि की प्रमुखता वास्तव में प्लेटो के दर्शन की हामी ही है। प्लेटो का मानना था कि वास्तविक ज्ञान कूटस्थ होता है और इस कूटस्थ तत्व का बोध हमारी बुद्धि ही हमे करा सकती है क्योंकि अनुभव का विषय ही परिणामी और परिवर्तनशील जगत है और सत्य परिवर्तनशील नही होता। 
अपनी इस पोजीशन के कारण प्लेटो को जगतो का एक द्वैतवाद स्थापित करना पड़ा जिसमे यह आनुभविक जगत भ्रम है और वास्तविक जगत अगोचर किसी और लोक, किसी और आयाम में स्थित है। 

ब्रटिश दार्शनिक जॉन लॉक को अनुभववादी परम्परा का प्रेणता माना जाता है जिन्होंने ज्ञान के स्रोत के रूप में बुद्धिवादियों की बुद्धि की जगह अनुभव को प्रतिष्ठित किया और कहा कि मन जन्म के समय कोरी स्लेट या टेबुला रासा होता है जिसपर इंद्रियों के मध्ययम से अनुभव रूपी संस्कार अंकित होकर ज्ञान के विषय वस्तु बनते हैं। उन्होने अनुभववादी ज्ञानमीमाँसा की स्तपनार्थ डेकार्ट के सहजात प्रत्ययों या इननेट आइडियाज का भी खंडन किया लेकिन लॉक अपनी दार्शनिक मीमांसा में कॉमन सेंस रियलिस्ट या सामान्य अनुभव वस्तुवादी नही रह पाए और उनकी अपनी ही अनुभववादी दृष्टि ने उनको प्रत्ययप्रतिनिधिवाद वस्तुवादी (रिप्रेजेंटेटिव रियलिस्ट)  बना दिया।

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प्रत्यय प्रतिनिधिवाद वस्तुवाद यद्यपि सामान्य अनुभव वस्तुवाद के अनुसार यह मानता है कि वस्तुओं का ज्ञाता से स्वतंत्र अस्तित्व होता है तथापि यह सामान्य अनुभव वस्तुवाद की इस बात को नही मानता कि ज्ञाता ज्ञेय को डायरेक्टली जनता है बल्कि इसके उलट वह समेदन मन और वस्तु की भूमिका का ज्ञान की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया में विश्लेषण कर यह निधकर्ष स्थस्पित करता है कि यद्द्यपि वाह्य वस्तुएं होती हैं, हम उनको नही बल्कि उनके द्वारा उतपन्न समरूप संवेदना को जानते हैं।

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ज्ञानमीमांसा 【पांच】

सामान्य अनुभव वस्तुवाद की विशेषताओं को यदि सारबद्ध करना हो तो उन्हें निम्न 6 विन्दुओ के माध्यम से व्यक्त किया जा सकता है:

■वस्तु जो जाने जाते हैं वह हमारी चेतना से स्वतंत्र वाह्य जगत में अस्तित्वमान हैं अर्थात, हमारी चेतना उन वस्तुओं की रचना नही करती। उनका अस्तित्व तब भी होता है जब वह ज्ञान के विषय नही होते।
■ वस्तुओं में गुण उनकी अपनी निजी विशेषता होती है। उनके गुणधर्म ज्ञाता की चेतना में जन्म नही लेती।
■ वस्तुओं का गुणधर्म ज्ञाता की उपस्थिति में परिवर्तित नही हो जाता अर्थात यह ज्ञाता की चेतना से निरपेक्ष होता है।
■ सत्ता जैसा है वैसा ही हम उसका प्रत्यक्षीकरण करते हैं। आभास ही सत्यता है। 
■ वस्तुओ का अव्यवहित ज्ञान होता है। ज्ञाता की चेतना और ज्ञेय को जोड़ने के लिए किसी अन्य मध्ययम की आवश्यकता नही होती।
■  वस्तु सार्वजनीन होते हैं अर्थात वह किसी ज्ञेय विशेष की चेतना ही उन्हें नही जानती बल्कि सभी ज्ञाता उस वस्तु को एक समान रूप में जानते हैं।

सामान्य जनमानस सामान्य स्थिति में ज्ञान-वस्तु-ज्ञेय के त्रिकोण में ऊपरोक्त 6 बातें चेतन-अचेतन रुप से स्वीकार करता है और इन 6 बातों पर ज्यादा तूल नही देता लेकिन ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञाता का त्रिकोण यदि उपरोक्त 6 बातों को हमेशा पुष्ट ही करता तो क्या बात थी परन्तु समस्या यह है कि सामान्य अनुभव की कई प्रतीतियां आपस मे संगति नही रखती और उस विरोधाभास की व्याख्या करने के लिए हमे अपने सामान्य अनुभव विषयक सामान्य बातों में सुधार करनी पड़ती है। 
इस सधार के पश्चात जो वस्तुवाद जन्म लेता है वह सहज बस्तुवाद या सामान्य अनुभव बस्तुवाद नही रह जाता।

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