सन्निपात
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एक
मनुष्य पशुओ की अपेक्षा चांस और रैंडमनेश के विकास के गुण के सबब एक बड़ा मस्तिष्क पा जाने की खुमारी से आज भी बाहर नही निकल पाया है। चांस और रैंडमनेश, क्योकि आप जैव विकास की प्रक्रिया को रिवाइंड करते हुए फिर वही से प्रारम्भ करिए जहाँ से सब प्रारम्भ हुवा और इस बात की कोई गारंटी नही की उत्परिवर्तन और प्राकृतिक चयन इस स्तर तक आते आते या बीच मे ही कहीं आपको वही स्पीशीज देगी जो इसके पूर्व रही है, और हमारे स्तर तक आते-आते शायद एक बहुत बड़े सर वाला कॉकरोच हो जो जीवन के इस प्रकृति के एवम अन्य प्रजातियों के साथ हो रहे संघर्ष में सबसे ज्यादा फिट हो। एक फोटोन पानी पर गिरता है और हम नही बता सकते कि वह फोटोन पानी से होकर गुजरेगा या परावर्तित हो जाएगा। एक प्रेक्षकीय चेतना के परिप्रेक्ष्य से जगत क्वाण्टम लेवल पर किसी उस नियतिवाद का पालन नही करता जिससे हम इस क्वाण्टम की दुनिया मे प्रवेश करने से पहले परिचित थे, जिसके अभ्यस्त थे और जगत के विषय मे हमने बड़े-बड़े दावे ठोक दिए थे; जैव विकास की घटना में उत्परिवर्तन या जेनेटिक म्यूटेशन एक क्वाण्टम इवेंट की तरह है--हम नही जानते कि कौन सा जीन उत्परिवर्तित होगा---कौन सी नई स्पीशीज सामने आएगी।
प्रश्न यह है कि जब हम अपने ही अस्तित्व के बारे में इतने अनिश्चित हैं तो फिर हम उन बड़े-बड़े दावों को कैसे कर बैठते हैं यथा: मुक्ति, निर्वाण, कैवल्य, ब्रह्म।
केवल एक घटना, इस विशाल जगत में एक बहुत ही इनसीगनिफिकेन्ट घटाना नही हुई होती और हम उन विशाल सर वाले कॉकरोचों की दुनिया मे बीमारी फैला रहे होते तथा उनके स्प्रे और हिट से छुपते फिर रहे होते।
सन्निपात
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दो
हम बने ही ऐसे हैं कि प्रथम दृष्टया हमे लगता है कि हम सबके केंद्र में हैं। हम एक निर्जन स्थान पर हों तो हम उस वृत के जो हमारी आँखे देखती हैं उसके केंद्र में नज़र आते हैं। अपनी दृष्टि थोड़ी विस्तृत करें तो हमे हमारी पृथ्वी पूरे दृश्य आकाशगंगा के केंद्र में लगती है। अगर हम अपनी आकाशगंगा के परिप्रेक्ष्य से ब्रह्मांड को देखें तो फिर शेष दृश्य ब्रह्मांड के केंद्र में हमारी आकाश गंगा होती है।
हर जीव और जीवन के केंद्र में हमे अपना अस्तित्व और मानव जाति दिखती है जैसे यह सब हमारे लिए ही बना हो या हम सबसे महत्वपूर्ण, सबसे उच्च जीव हों लेकिन परिप्रेक्ष्य बदलिए और दृश्य बदल जाता है हालांकि परिप्रेक्ष्य बदलना बहुत हिम्मत का काम है क्योंकि यह हमारे अंदर एक भावात्मक तूफान खड़ा कर देता है। यह स्थिति बड़ी पीड़ादायी होती है और हम इससे बचना चाहते हैं इसीलिए हम अपने उस मिले, बने बनाए ककून में खुश रहते हैं।
अपनी अहमकेन्द्रित विष्मवस्था में खुश रहने में कोई दिक्कत नही है लेकिन किसी और को जो उस ककून को तोड़ कर बाहर निकलना चाहता है उसको संस्कृति, पूर्वज आदि की दुहाई देकर या कई बार उसके प्रति हिंसक होकर उसे रोकना बुद्धिमता और मानवीयता नही स्वार्थ है।चुकी उसके द्वारा उद्घाटित नया सत्य भी अंततः आपके अंदर वही पीड़ादायी भावात्मक तूफान ला सकता है अतः यह संस्कृति नही बल्कि छद्म रूप से आपके अपने उस ककून की रक्षा है।
परमसत, परमसत्ता आदि की जब हम बात करते हैं तो अचेतन रूप से हम एक गतिहीन, मानव केंद्रित जगत में विश्वास कर रहे होते हैं ज्यों मनुष्य जाति की कॉग्निटिव फेकल्टी और एस्थेटिक सेंस उस निरपेक्ष को जानने, उसके सौंदर्यबोध को विकसित है। निम्नतर जन्तुओ के कॉग्निशन की तुलना में हमारी यह फेकल्टी अवश्य विकसित है लेकिन आज से एक लाख वर्ष भविष्य में जो प्रजाति हमसे विकसित होगी उसकी तुलना में हमारी संज्ञानात्मकता, एस्थेटिक सेंस अत्यंत निम्न है; उनकी परमसत्ता कुछ और होगी क्योंकि परमसत्ता हमारे फ्रोन्टल लोब में रचा जाता है।
एक मित्र ने कहा कि आपके पूर्वज बंदर होंगे हमारे तो ऋषि थे। आज से एक दो लाख वर्ष भविष्य में स्वयम को प्रोजेक्ट करिए और देखिए हमसे विकसित कुछ लोग शर्म के मारे यह स्वीकार ही नही कर पा रहे हैं कि उनके पूर्वज मानव थे। उस समय "अरे आदमी" एक गाली है।
सन्निपात
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【तीन】
हम कुछ भी सीखते ही क्यों हैं इसका एक पंक्ति में उत्तर है सर्वाइव करने के लिए। विकास क्रम में निम्न स्पीशीज में सम्बंधित बेहेवियर इंस्टिक्ट में होता है। एक मधुमक्खी अपना छत्ता बनाना कहीं सीखती नही है, यह उसके अंदर है। एक चिड़िया अपने घोंसले बनाने के लिए विश्विद्यालय नही जाती, उसके अंदर है। विकास क्रम में चेतना के विस्तारण के साथ, मन के इमर्ज होने के बाद, मस्तिष्क के और जटिल होने के बाद इंस्टिक्ट के अलावा लर्नड बिहेवियर इमर्ज होता है। अब सूचना हमारे इंस्टिंक्ट के बाहर भी स्टोर किया जा सकता है और बिना किसी जेनेटिक्स के इसको अगली पीढ़ी में ट्रांसफर किया जा सकता है।
इस जेनेटिक्स के बाहर उपस्थित सूचना का भी मूल अभिप्राय इंस्टिंक्टिव बिहेवियर की तरह सर्वाइवल ही है, अंतर मात्र यह है कि इस सूचना पर आधारित व्यवहार अतःस्फूर्त नही होता है।
विकास क्रम में उच्चतर जीव के आने के बाद व्यवहार का एक अनुषांगिक पक्ष भी होता है:
हमारे लिए भोजन मात्र स्वयम को जीवित रखने के लिए नही है, इससे सम्बंधित एक अनुषांगिक पक्ष भी है: स्वाद। और हम इसके लिए भी पाकशास्त्र सीखते है। सेक्स हमारे लिए अब मात्र अपनी प्रजाति को जीवित रखने का करण नही है, सेक्स अब हम मजा के लिए भी करते हैं।
ज्ञान का भी मात्र और मात्र सर्वाइवल मूल्य जो आज तक होता था, मानव में इससे सम्वन्धित एक अनुषांगिक पक्ष भी उभरता है।
एब्स्ट्रेक्शन, जेनरलाइजेशन और पैटर्न पहचानने का बोध अन्य जीवों से ज्यादा है जिसका कोई रहस्यात्मक कारण नही बल्कि विकास क्रम में मात्र यह एक सर्वाइवल उपकरण है। हमने आकाश को देखा उसके चमकते तारो में एक पैटर्न था, हमने अपने अगल-बगल की घटनाओं को देखा, उसमे एक पैटर्न था, हमने जेनरलाइजेशन किया, एब्स्ट्रैक्ट चिंतन की। हमारे पैटर्न पहचानने के बोध, सामान्यीकरण तथा अमूर्तकरण की क्षमता ने मिथक-दर्शन-विज्ञान आदि को जन्म दिया हैं, लेकिन फिर वही बात की यह मात्र हमारे सर्वाइवल टूल हैं; विज्ञान अब तक का सबसे बेहतर।
परमसत या परम सत्ता को जाना जा सकता है या यह है भी इसके बारे में मैं आश्वश्त नही हूँ। सब व्हाइट मैटर और ग्रे मैटर का खेल है और यह सफेद और भूरा गुदा इस प्रकार ऑर्गनाइज हुवा है कि हम मात्र बेहतर तरीके से वातावरण के साथ अनुकूलित हो सकें, हम और हमारी प्रजाति जिंदा रह सके। इस अनुकूलन में यदि कोई परमसत्ता आता है तो वह फिर परम-सत्ता है ही नही क्योकि वह, अनुकूलन, हमारे और हमारे प्रजाति के जीवित रहने के अभिप्रेरण से कंडिशन्ड है।
सन्निपात
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चार
वैज्ञानिक ज्ञान की एक सीमा है, जगत की नही। विज्ञानं क्या है? दरअसल यह अमीबा के उस उद्दीपन-प्रतिक्रिया का ही अत्यन्त जटिल रूप है, उस क्रिया-प्रतिक्रिया का मात्रात्मक-गुणात्मक विकास है। उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रिया करने की आज तक की सबसे अच्छी प्रक्रिया, सबसे सफल प्रक्रिया है,और इसीलिए इसने इतने कम समय में हमारी चेतना के जगत को हमारे लिए इतना अनुकूलित कर दिया है।
यह प्रकृति के नए नए रहस्यों को खोल रहा है।
अणु में इसने अथाह शक्ति ढूंढ लिया और बस ढूंढा ही नही उसे मानव का पालतू भी बना दिया। प्रकृति पर आज हम किसी हद तक नकेल कस सकते है। हाँ वो शक्तियां जिनसे अभी मात्र पांच हज़ार साल पहले हमारे पुरखे डर कर विनती करते थे वो आज हमारे नियंत्रण में हैं,और क्रमशः होती जा रही हैं। हमारे पुरखे जहाँ तक सोच नही सकते थे उन जगहों पर हम अपने पदचिन्ह छोड़ रहे हैं।
अनुकूलन की विविध चेतन प्रक्रियाओं में विज्ञान की बराबरी तो कोई कर ही नही सकता, न धर्म, न आदिम जादू (फ्रेजर) न सहज वृति, न अपने परंपरिमक मायनो में दर्शन।
लेकिन, विज्ञानं की एक सीमा है जगत की कोई सीमा नही है।
हमे जो ज्ञान प्राप्त हो रहा है, हम जिन रहस्यों को जान रहे हैं क्या वो निरपेक्ष है, वास्तव में वैसे है या हमारी चेतना उन्हें वैसा प्रदर्शित करती है? चेतना, जिसका विकास प्रकृति से अनुकूलन के लिए हुवा है, हमारे न्यूरॉन के फंक्शन पर ही तो अवलम्बित है।
और यह अवलम्बन स्वयं एक विकास का परिणाम है।
दरअसल हम देखने के लिए स्वतंत्र नही है, हम वही तक देखने के लिए स्वतंत्र है जहाँ तक हमारी चेतना हमे स्वतंत्रता देती है और हम उसी प्रकार देखने को स्वतंत्र है जिस प्रकार देखने की स्वतंत्रता हमारी चेतना देती है।
तो क्या हम संच में स्वतंत्र है?
नही और यही बन्धन मैट्रिक्स है जो है
विज्ञानं की सीमा है, जगत असीमित है।
सन्निपात
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पाँच
जो कुछ भी जाना जा सकता है अपने अस्तित्व के परिप्रेक्ष्य में ही जाना जा सकता है। अस्तित्व को ट्रांसेन्डेन्ट कर कुछ जाना ही नही जा सकता इस प्रकार हर जानना अस्तित्वकेन्द्रित विषमावस्था से ग्रसित है। यदि थोड़ा और बौद्धिक अनुशाषित हुवा जाय तो हम नही जानते कि हमारे अस्तित्वकेन्द्रित विषमावस्था में प्राप्त ज्ञान के बाहर कुछ है भी। वह अज्ञात अस्तित्वमान हो,तब भी न तो वह हमे प्रभावित करता है और न हम उसे। हमारे और उसके बीच कोई अन्तःक्रिया सम्भव नही फिर उसके बारे में चिंतन बौद्धिक अपव्यय भी हो सकता है।
उस तक हमारी वाणी नही पहुंच सकती, उस तक हमारे विचार नही पहुंच सकते तब वह हमें रिस्पॉन्ड भी नही करेगा फिर मानव एक अनावश्यक सत्ता का बोझ क्यो ढोए?
सन्निपात
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छह
प्रश्न है कि क्या बिग बैंग प्रारम्भ है और इस ब्रह्मांड का अंत सम्भव है?
प्रायः ब्रह्मांड क्यो का जवाब दिया जाता है कि ह्यूमैन मोटिव को ब्रह्मांड पर आरोपित नही किया जा सकता। ब्रह्मांड किसमे फैल रहा है का उत्तर होता है कि यह प्रश्न सार्थक नही है और यह ठीक वैसा ही प्रश्न है कि उत्तरी ध्रुव के उत्तर में क्या है। 【हॉकिंग】
कहा जाता है कि हम ब्रह्मांड को अंदर से जानते है और इन अंदर की कोटियों पर आधारित प्रश्न ब्रह्मांड पर लागू नही हो सकते। बिगनिग और एंड, अथ और इति ब्रह्मांड के अंदर की घटना तो निश्चित रूप से है। प्रारम्भ और समाप्ति तो निश्चित रूप से ब्रह्मांड के अंदर पाए जाते है लेकिन इसके उलट अथ और इति के अंदर ब्रह्मांड है यह हम निश्चितता के साथ कैसे कह सकते हैं? क्या यह रोजमर्रा की घटनाओ का इस वृहत पर आरोपण नही है?
क्या कोई बता सकता है कि "कब" "कैसे" "क्यों" कहाँ" में से कौन-कौन किस-किस सन्दर्भ में पूछना नॉनसेंस नही है और इसके निर्धारण का मानक क्या है?
बिग-बैंग हुवा है, बिग फ्रीज़, बिग रिप या बिग क्रंच भी हो सकता है लेकिन यह ब्रह्माण्ड का प्रारम्भ या खात्मा नही हो सकता। यह उस वृहत की एक प्रक्रिया का पूर्ण हो जाना मात्र लगता है।
प्रतीत होता है कि बिग बैंग से बिग क्रंच या बिग फ्रीज़, रिप तक की प्रक्रिया यदि ब्रह्मांड है तो यह सीमित है और कॉस्मोलॉजिस्ट का यह ब्रह्मांड भले ही देश-काल मे अनन्त हो लेकिन यह असीम नही है और #वह ससीम नही है। ये कॉस्मोलॉजिस्ट हमारी चेतना में आए ब्रह्मांड की एक एड होक व्याख्या कर रहे हैं।
कुछ ज्ञात ज्ञात हैं, कुछ ज्ञात अज्ञात हैं और कुछ अज्ञात अज्ञात है। हम उस अज्ञात अज्ञात तक पहुँच ही नही सकते।
क्वाण्टम भौतिकी के विकसित होने के साथ भौतिकी में प्रेक्षक या ऑब्जर्वर की भूमिका बढ़ती जा रही है। कहा तो यह भी जाने लगा है कि जिसे हम सत्यता कहते हैं वह ज्ञाता और ज्ञेय के मध्य अन्तःक्रिया में उभरता है और इस अंतः क्रिया के बाहर इस सत्यता का कोई अस्तित्व नही रहता।【व्हीलर】
इस विचार पर आधारित व्हीलर ने ब्रह्मांड में मौजूद फाइन ट्यूनिग की व्याख्या करने के लिए पार्टिसिपेटरी एंथ्रोपिक प्रिंसिपल दिया जिसके अनुसार वेव फंक्शन के ध्वस्त होने के लिए एक वास्तविक प्रेक्षक की आवश्यकता है। जॉन बैरो और फ्रैंक टिपलर कहते हैं की ब्रह्मांड अस्तित्व में तब आता है जब कोई प्रेक्षक ब्रह्मांड का प्रेक्षण कर रहा होता है। 【द एंथ्रोपिक कॉस्मोलॉजिकल प्रिंसिपल】
नील द ग्रास टायसन अपनी पुस्तक ओरिजिन्स में लिखते हैं कि प्रारम्भ में भौतिकी के नियम थे।
जीव विज्ञानी रूपर्ट शेल्ड्रेक कहते हैं कि हम एक ऐसी स्थिति में आ जाते हैं जहाँ भौतिकी के नियम की पूर्वमान्यता माइंड या मनस है। 【द साइंस डेलयूज़न】
यदि भौतिकी के नियम वास्तव में मनस की प्रागपेक्षा रखते हों तो फिर बिग-बैंग को हमारा मनस रच रहा है। ब्रह्मांड की शुरुआत और अंत का प्रत्यय हमारा मनस रच रहा है। ब्रह्मांड का आदि या अंत है हम नही कह सकते।
सन्निपात
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सात
ब्रह्मांड में चेतना का इमर्ज होना एक अद्भुत घटना है। कार्ल सेगन कहते हैं कि जो कुछ भी था, जो कुछ भी है और जो कुछ भी होगा वह कॉस्मॉस है।
अर्थात हम ज्ञाता हो जाने से ब्रह्मांड से बाहर नही हो जाते बल्कि हम भी ब्रह्मांड के हिस्से हैं।
अब यह उद्वेलित नही करता कि ब्रह्मांड का एक हिस्सा ब्रह्मांड ने ऐसा रचा जो ब्रह्मांड को जानने लगता है और जानने ही नही लगता बल्कि ब्रह्मांड में एक नए स्तर से पार्टिसिपेट करने लगता है।इस स्तर पर ब्रह्मांड में पार्टिसिपेट कोई नही करता: न कोई ग्रह, नक्षत्र, तारे, निहारिका या बैक्टेरिया, वायरस, वृक्ष, पशु कोई भी नही।
एक अल्टरनेट ब्रह्मांड में सम्भव है कि वह इंटेलिजेंट लाईफ को तो छोड़िए, लाइफ को ही नही इमर्ज होने देता। हमारे ब्रह्मांड ने हमे यह या तो मौका दिया है या यह हमारे ब्रह्मांड के अस्तित्व में आने की शर्तों में ही है।
क्या यह असम्भव है कि ब्रह्मांड ने हमे इसलिए रचा है कि हम ब्रह्मांड को रचे?
हमारे माता-पिता हमे जन्म देते हैं और हम अपने बच्चों को जन्म देते हैं लेकिन दरअसल जीन के स्तर पर हमारे माता पिता हमारे माध्ययम से स्वयम को जन्म देते हैं और हम अपने बच्चों के माध्ययम से स्वयम को। दृष्टि को थोड़ा और विस्तार दिया जाय तो हम अपनी सन्तति के माध्ययम से अपने पूर्वजो को जन्म दे रहे होते हैं।
हम ब्रह्मांड के बच्चे हैं, शायद ब्रह्मांड ने हमे इसलिए इंटेलिजेंस दिया है कि हम ब्रह्मांड को जन्म दें और अनुकूलन के बहाने ही सही इसलिए भी ब्रह्मांड अपने रहस्य हमे बताता है।
सम्भव है कि कल हम ब्रह्मांड को जन्म दे रहे हों और ब्रह्मांड ने हमे इसीलिए रचा हो।
वैसे अभी यह मात्र एक विज्ञान गल्प है।
सन्निपात
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आठ
यह ब्रह्मांड क्यों है?
जब हम यह प्रश्न करते हैं तो इसका अर्थ क्या होता है? मेरे सामने यह पुस्तक क्यों है? क्योंकि इस पुस्तक के माध्ययम से मेरा एक प्रयोजन सिद्ध होना है। ब्रह्मांड के विषय मे जब हम क्यो का प्रश्न करते हैं तो हम अचेतन रूप से इस बात को मान रहे होते हैं कि ब्रह्मांड का प्रयोजन है लेकिन क्या हो यदि सत्य यह हो कि ब्रह्मांड का कोई प्रयोजन ही न हो और इस प्रकार ब्रह्मांड क्यों एक निरथर्क प्रश्न हो।
ब्रहांड बस हो जैसा बर्ट्रेंड रसेल कहते हैं। विश्व मे कोई प्रयोजनवत्ता नही हो और यह मात्र यांत्रिकता के नियम और सिद्धान्त से संचालित होता हो?
भौतिकी के आधुनिक सिद्धान्त हमे बताते हैं कि जगत में कोई प्रयोजन नही है। यह उस घड़ी की तरह है जिसका कोई न तो घड़ीसाज है न किसी के लिए ही यह निर्मित है: यह बस है,इसके पुर्जे आपस मे एक दूसरे से जुड़े हुए 14 खरब वर्षो से अनन्त(?) काल तक टिक-टिक-टिक-टिक।
हमारी बुद्धि यह आसानी से मान लेती है कि ईश्वर अपना स्वयम का कारण हो सकता है लेकिन जगत में प्रयोजन देखने को हम इतने अभ्यस्त हैं कि जगत भी स्वयम्भू हो सकता है यह बात हमे अटपटी लगती है लेकिन ऐसा क्यों नही हो सकता?
जगत अपने आप से अपनी रचना क्यो नही कर सकता? जगत अपने एकत्व से ही अपने अंदर के नानात्व को क्यो नही रच सकता?
सन्निपात
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नौ
कोई भी यूनिफाइड सिद्धान्त, चाहे वह ब्रह्म हो, परमसत्ता हो या बहुप्रतीक्षित भौतिकी की थ्योरी ऑफ एवरीथिंग, यदि वह मानव की पीड़ा का इसी व्यवहारिक दुनिया मे निवारण नही करती तो वह एकीकृत सिद्धान्त कैसे है?
पीड़ा, मनुष्य को व्यवहार से बाँधे भी रखती है और मनुष्य से परमार्थ के रूप में पलायन की अधिभौतिकी भी रचवाती है।
सत चित आनंद का नही पता, सत और चित का भी नही मालूम लेकिन वेदना है, यह निर्विवाद है।
परमार्थ का बोध में पीड़ा का निवारण हो न हो पीड़ा से पलायन के प्रयास में परमार्थ अवश्य रचा जाता है।
सन्निपात
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दस
कब-क्यों-कहाँ-कैसे-कितना
हमारे पास यह पाँच ही प्रश्न है, हमारा मस्तिष्क इतना ही पूछने के लिए विकसित हुवा है लेकिन #सत्ता (ब्रह्मांड) अपनी वस्तुगतता में जाने कितने #वेरिएब्ल्स (चरों) को लिए बैठा है अतः हम ब्रह्मांड को उसकी वस्तुगतता में नही समझ सकते।
हाँ हम अपने सन्दर्भ से कब-क्यों-कहाँ-कैसे ढूंढते चले जा सकते है और परत दर परत, रहस्य दर रहस्य उद्घाटित करते जाएंगे लेकिन हम यह भी दावे के साथ नही कह सकते ही ब्रह्मांड की वस्तुगतता के परिप्रेक्ष्य से यह कब-कहाँ-कैसे-क्यों सही प्रश्न हैं भी या नही!
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