कोई एक वास्तविकता होती ही नही। इस एक वास्तविकता की तथा इसमें भी कई वास्तविकता की परते होती हैं एवम वास्तविकता के समानांतर भी सारी सम्भावित वास्तविकताएं।
इन सारी वास्तविकताओं में से कुछ या एक मे हम अस्तित्व में आते हैं और जिस वास्तविकता के हम हिस्से है वह यह तय करती है कि हमे क्या क्या जानना है, क्या कल्पना करनी है; क्या हमारी वास्तविकताएं होगी और क्या हमारे मिथक।
और वास्तविकता यह भी है कि हम इस वास्तविकता द्वारा, जिसके हम हिस्से हैं, हमे दी गई सीमा का अतिक्रमण कर ही नही सकते!
----------●●●●●------------
No comments:
Post a Comment