Tuesday, February 18, 2020

इलाहाबाद प्रकरण

तब मैं इलाहाबाद में रहता था। हॉस्टल छूट जाने के बाद डेलीगेसी में एक कमरा बड़ी मुश्किल से मिला था। मकान मालिक की माली हालत थोड़ी औसत से नीचे रहती थी तो हर वर्ष नया नया तंत्र करवाते थे। कभी कोई मौलवी हर कमरे में कील ठोकता तो कभी कोई मकान बांधता। 
इस वर्ष उन्होने 'काल भैरव सोखा" को बुलाया था। मुझे और निशांत पांडेय को पता नही था कि अंदर तंत्र-मंत्र चल रहा है तो हमलोग शायद क्रिकेट का स्कोर जानने अन्दर घुस गए। अंदर धुप्प अंधेरा था। केवल एक दिया जल रही थी। कमरे में दारू, इत्र, अगरबत्ती और पसीने की बदबू फैली पड़ी थी। दिया के एक तरफ मकान मालिक का सारा परिवार बैठा था और दूसरी तरफ एक सत्ताईस अठाईस वर्ष का काला आदमी। हम और निशांत उस्तुकतावश वहां उसके तख्त पर बैठ गए जिसे देखकर वह आदमी हाथ पैरों को ऐंठ कर जमीन पर लौटने लगे और जोर जोर से कहने लगा; मैं काली का पूत काल भैरव हां।
हम और निशांत अभी भी बैठे रहे तो वह आदमी थोड़ी देर लौटने के बाद बैठा गया और हमसे बिना मंतलब पूछा: दारू पिओगे?
हमने और निशांत ने हा कह दी तो अब उस बेचारे ने बोतल से दारू ग्लास में निकला और एक चाकू लेकर अपने हाथ को थोड़ा काटा और कटे हाथ से टपकता खून ग्लास में पड़ी शराब में मिला दिया और हमारी तरफ करते हुए बोला कि लो पियो। हमने कहा कि बिना खून वाला दो तो वो और तेजी से लौटते हुए गाने लगा: मैं काली का पुत काल भैरव हां, मैं काली का पूत काल भैरव हाँ।

हम बैठे रहते लेकिन मकान मालिक के लड़के ने हमे जाने को कह दिया और हम और निशांत बाहर निकल आए।

दो
----

यह हमरा दूसरा अनुभव था, इसके पूर्व मैं और आशुतोष आधी-आधी रात तक जिन्नाती मज़ार के पास जो कि गङ्गा जी के किनारे बबूल की झाड़ियों में है और लोग कहते हैं कि वहाँ जिन्नों का बसेरा है, जिन्न देखने छुपकर बैठे रहते। दरअसल उस बबुराही मे तीन मज़ारे थी और एक बहुत पुराना मस्जिद और उस मस्जिद के बगल में एक भसा हुवा कुवाँ। 
खैर, एक दिन शाम को ही उस वीराने में एक साहब मिल गए तो उन मज़ारो पर माथा टेकने आए थे।  खान साहब वही थोड़ी दूर पर के आई ई आर टी के प्रोफेसर थे। हालाकि वो हमें पहले भी कई बार देख चुके थे लेकिन संयोग से हमने उन्हें नोटिस नही किया था। खान साहब ने हमसे कहा: बेटा आपलोग यहाँ रात में घूमते है, ये अच्छी जगह नही है। 
यह सुनकर हमे लगा खान साहब अब आगे जिन्न वगैरह की बात कटेंगे लेकिन उन्होंने कहा: यहाँ घूमना ठीक नही है क्योंकि इस जगह पुलिस अपराधियो को लाकर इनकाउंटर करती है।
(यदि आप इलाहाबाद के है तो पता करिएगा, आई ई आर टी के पीछे बबूल के जंगल मे कई इनकाउंटर हुए हैं)
हमने पूछा कि सर और वो जिन्न वाली बात?
खान साहब ने बताया कि देखिए बेटा पुराने जमाने मे पानी के लिए कुंए होते थे न?
हमने कहा हां, तो उन्होंने बताया कि यह मस्जिद शायद मुगलों के या उन्ही के आस पास के ज़माने की है और मस्जिद बनाने के लिए ही वह कुवाँ खुदा गया होगा जो बाद में भस गया और लोग उसे जिन्नाती कुँवा कहने लगे।
हमने कहा कि ठीक लेकिन वो जमीन से जो चीजे निकलती है उनका क्या?
खान साहब ने बताया कि वहां उस मस्जिद बनने के बहुत पहले तेलियो की एक बस्ती थी। वहां उस इलाके में तेल की पिराई होती थी और गङ्गा जी से नाव में लादकर उनका व्यापार किया जाता था। उन्ही लोगो ने तलवार भी रखा होगा और फिर किसी कारण से तेलियो की वो बस्ती उजड़ गई होगी और धीरे धीरे उनके समान मिट्टी में दबते चले गए।
वहां प्रयाग विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के लोगो ने खुदाई की थी और उस इलाके में ज़मीन के अंदर से कोल्हू, दैनिक जीवन के समान, तेल रखने का ड्रम और कुछ तलवारे मिली थी जिससे लोग कहते थे कि यह जिन्नों के समान हैं।

बाद में हम और आशुतोष एक दिन आई ई आर टी गए और हमने वहां खान साहब का नाम बताते हुए उनसे मिलने को कहा।
आई ई आर टी वालो ने बताया कि खान साहब तो लगभग सात आठ साल पहले ही गुज़र चुके थे!

फिर हम बबुराही कभी नही गए।

तीन
-------

तीसरा अनुभव सबसे भयावह रहा। मैं और आशुतोष माघ मेले में घूम रहे थे। हमे एक नङ्ग घड़ंग औघड़ दिखा। हम उसे छेड़ने की नीयत से उसके नज़दीक चले गए। मैंने उस समय एक जैकेट पहन रखी थी।  औधड़ ने हमे अपने नजदीक पा कर मुझसे कहा कि अपना जैकेट दो मैं इसे खाऊंगा। मैंने सोंचा की यह जैकेट कैसे खा सकता है।  फिर सोंचा हो सकता है कि जैकेट खा ही जाए जिसे देख कर जैकेट की कीमत वसूल हो जाएगी। 
मैंने उसे अपना जैकेट दे दिया। मेरी जैकेट लेकर उसने उसमे से दाँत से अंदर का कपड़ा फाड़ने की कोशिश की जो उससे नही फटा क्योकि वह गलती से अंदर कॉलर के पास का कपड़ा फाड़ने की कोशिश कर रहा था। एक आध मिनट तक जब वह उसे नही फाड़ पाया तो मैंने तेजी से उससे अपना जैकेट वापस ले लिया। 
औघड़ मुझसे बोला: घमंड तो रावण का भी नही रहा रे घमंडी और यह कहते हुए उसने अपने हाथ पर थोड़ा सा पेशाब किया और तेजी से मेरे माथे पर मल दिया। 
यह उसने इतनी तेजी से किया था कि मुझे समवहलने का मौका ही नही मिला और जब तक मैं सम्भलता वह पेशाब मेरे ललाट पर मल कर जा चुका था।

No comments:

Post a Comment

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...