Thursday, February 13, 2020

सरनेम से आसक्ति या अनासक्त भाव से सरनेम?

सरनेम से आसक्ति या अनासक्त भाव से सरनेम?

भाई अचेतन मन से भेद को स्वीकार करते हुए सरनेम हटाने से अच्छा है कि सरनेम लगाते हुए उससे अनासक्त रहना।
पुनः
जब मैं मिश्र अपने नाम के साथ कहता हूँ तो बहुत दूर, बहुत दूर, बहुत दूर तक की बातें याद आती है। इस छोटे से शब्द में कम से कम 5000 साल का इतिहास फ्रीज़्ड है।उन 5000 सालो के ताले पर लगी एक कुंजी है यह। 
इतिहास संजोने के एक सूत्र परम्परा है, ठीक वैसी ही जिस प्रकार बड़े बड़े गम्भीर विचारो को छोटे छोटे सूत्रों में बांध दिया जाता है।
इसलिए भाई मैं तो अपना उपनाम नही हटाऊंगा।

मनुवादी-ब्राह्मणवादी सोंच??

दुर्भाग्य से हमारी संस्कृति ही उस ओर मुड़ गई जहाँ उपनामो का वजन व्यक्ति को दाबे रखता है वरना व्यक्ति हमारी इस महान संस्कृति की आंधी में ही उड़ कर गुमनाम हो जाएगा।

विडम्बना है कि हमने ऐसी सोंच विकसित कर ली है जिसमे अतीत का होना, एक महान अतीत का होना आवश्यक है।
और यह विडंबना केवल हमारी नही, किसी व्यक्ति की नही बल्कि मानवीय है।

उपनामो की संस्कृति ने तीन प्रकार के मानवीय अपसंस्कारो को जन्म दिया है:

       1.उपनामो पर दम्भ करने की आत्ममुग्धता,
2.उपनामो को बोझ मानने की विकृति,
3.उपनामो की बराबरी के लिए तरस।

दरअसल ये तीनो अपसंस्कार सांस्कृतिक  बीमारियां है और यह बीमारी कही बाहर से नही आई बल्कि हमारे खुद की संस्कृति के अंदर से आई है और इस बीमारी को अनपढ़ और जाहिलो ने जितना फैलाया है ठीक उतना ही पढ़े लिखे बुद्धिपिशाचों ने भी फैलाया है ।

"जो अपना इतिहास भूल जाते हैं, इतिहास उन्हें भूल जाता है" और फिर जेनयू का कोई विद्यर्थी उन पर शोध करता है। और फिर उनके इतिहास का डोक्युमेंट्सन होता है उन व्यर्थ की बातों पर सेमिनार होते हैं-----मुझे एक अजीब सा विरोधाभास दीखता है समाज मे, पढ़े-लिखो के समाज में-----समाज के एक छोर् पर जातिगत पह्चान लिए खड़े व्यक्ति को बुद्धिजीवी लताड़ लगाते है और कहते है कि यह एक अनावश्यक बोझ है वही समाज के दूसरे छोर पर खड़े एक गुमनाम आदिवासी को वह उनका पूर्वज महिसासुर के रूप में ढूंढकर देते है और 'महिसासुर एक जननायक' किताब छपती है।

भाई जब जातिगत पहचान गलत है तो फिर यह बाभन के लिए और उस आदिवासी दोनों के लिए गलत है न?
अब आप खुद ही पूरा दम खम लगा कर आदिवासी, उस आदिवासी के लिए पहचान के नाम पर एक जातिगत इतिहास, उनकी जाति का इतिहास गढ़ते है।

आप एक ऐसी परिस्थिति का निर्माण क्यों नही करते जहाँ इतिहास ही अप्रासंगिक हो जाए?

नही दोहरे मानदंड बनाए रखना तो जरूरी है आपके लिए क्योकि आप को सामंजस्य तो दीखता ही नही केवल और केवल संगर्ष दीखता है और संघर्ष के लिए "दो" का होना तो आवश्यक है।
इस "दो"मुही बात के प्रतिरोध में अपना उपनाम नही छोडूंगा!

सावधान!
मैं बाभन हूँ इसका अहसास मुझे आप दिला रहे है।
अनासक्त से आसक्त आप कर रहे है।
सावधान!!

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