यह इतिहास की, नहीं नहीं समाज की, नही धर्म की ,नहीं------- - रहने दीजिए क्या फर्क पड़ता है कि किसकी विडम्बना रही है लेकिन गुड्डू लालबेगी मुजाविर और उसका भाई मंगल राम मंदिर बने या बबरी मस्जिद की दुबारा तामीर हो, इस प्रश्न पर कंफ्यूज हो जाते हैं।
तो क्या ये दोनों अपनी रिलिजियस आइडेंटिटी को लेकर कंफ्यूज हैं?
मंगल अपनी दुकान खोलते ही सबसे पहले काली माता को अगरबत्ती दिखाता है और गुड्डू एक मुजाविर है। मुजाविर अर्थात मजार की देख रेख करने वाला। दिन में गुड्डू लालबेगी एक सरकारी अस्पताल में मेस्तर है और अस्पताल से लौटने के बाद मुजाविर। तब तक मंगल की दुकान भी बंद हो जाती है और शाम को वह अपने बड़े भाई के साथ मजार पर जाता है । मजार की साफ सफाई करता है और गुड्डू की मदद करता है।
यहां गंगा के किनारे लगभग 3-4 किमी के दायरे में बबूल की झाड़ियां फैली है जिसके कारण लोग इस जगह को बबुराही कहते हैं।
इसी बबुराही में तीन मजार है और इन तीनो मजारो के बीच एक मस्जिद जिसका नाम जिन्नाती मस्ज़िद है। मस्ज़िद के बाएं जो दो मज़ार है उनका मुजाविर गुड्डू है और मस्ज़िद के दाएं वाली मज़ार का मुजाविर परवेज जमाल।
एक दिन यु ही परवेज जमाल से मुलाकात हो गई तो मैंने उनसे अनायास ही पूछ लिया की मुजीवीर जी यह किनके मज़ार हैं?
परवेज़ जमाल का जवाब सुनकर मैं चौक गया।
'वह असली जिन्न का मज़ार है जहाँ का मुजाविर मैं हूँ लेकिन वो बुतपरस्त का जना काफीर उन मजारो को जिन्न का मज़ार कहता है जहाँ वह बैठता है।'
मैं इसलिए नहीं चौका की ये जिन्न के मज़ार है मैं इस लिए चौका की गुड्डू बुतपरस्त का जना है।
-एक बुतपरस्त का जना मुजाविर?
-हाँ साला मेस्तर है।
-तो क्या गुड्डू मुसलमान नहीं है, मैंने पूछा।
-अरे नहीं दोगला है, दोगला।
-मतलब?
-अब रहने दीजिए कभी बाद में बताऊंगा।
-अरे बता भी दीजिए
-गुड्डू लालबेगी है।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, यहूदी, बहाई तो सुना था लेकिन लालबेगी पहली बार सुन रहा था। यह लालबेगी कौन सा नया धर्म पैदा हो गया?
मैंने फैसला किया कि गुड्डु से ही पूछूँगा।
गुड्डु से चुकी नज़दीकी बढ़ानी थी अतः मैंने मज़ार पर जाना शुरू कर दिया। कभी उर्स में चंदा दिया तो कभी अपने आप को गुडु से झड़वाया तो कभी वहाँ खीचड़ा खाया । धीरे धीरे गुडु से मेरी पहचान हो गयी। एक दिन मैं गुडु के साथ नौ बजे तक मज़ार पर बैठा रहा। नौ बजे के बाद सब कुछ समेट कर जब गुडु जाने लगा तो मैं भी उसके साथ हो लिया। रास्ते में मैंने गुडु से पूछा गुड्डु भाई ये लालबेगी क्या होते हैं?
गुडु ने कहा कि आदमी होते हैं
मैंने कहा भाई आप समझे नहीं मैं ये पूछना चाहता हूँ कि आप हिन्दू है या मुसलमान?
गुड्डु हंसने लगा फिर उसने मुझसे ही पुछा की इंसान का हिन्दू या मुसलमान होना ज़रूरी है क्या?
अब मुझे खीज हो रही था, जिसे शायद उसने पढ़ लिया और मुझसे बोला,
'भाई हम लालबेगी एक तरह से हिन्दू भी होते है और मुसलमान भी और दूसरी तरह से ना हिन्दू होते हैं न मुसलमान ही।'
'देखिए भाई हम मस्जिद भी जाते हैं और मंदिर भी। हम ईद भी मानते है और होली भी।
हमारा खतना नहीं होता, लेकिन हम दफनाए जाते हैं। जन्म होने पर हमारी छठिहारी भी नहीं होती, मरने पर चालीसा भी नहीं होता।'
अब चाहे यह जिसकी भी विडम्बना रही हो हुवा यूँ की जब इस्लाम का इस शहर में प्रचार हो रहा था तो गुडु के पुरखे जो मैला ढोते थे उन्होंने इस्लाम में अपनी मुक्ति देखी। उन्होंने इस्लाम अपना लिया लेकिन चुकी यहाँ 'अशराफ',संभ्रांत मुसलमान थे, अतः इस्लाम ने उन्हें नहीं अपनाया और हिंदुओं ने तो इनको बेदख़ल कर ही दिया था।
अब ये ना हिन्दू थे न मुसलमान लेकिन चुकी ये हिन्दू और मुसलमान के पाखाना ढोते थे, उनके रहमो करम पर जीना था इसलिए इन्हें कभी हिन्दू बनना पड़ता था तो कभी मुसलमान।
जिन्नाती मस्जिद को बने लगभग 400 साल बीत चुके है अतः आज लालबेगियों की चौथी पांचवी पीढ़ी है। यह पीढ़ी अपने आपबीती भूल कर स्वयं को मुस्लमान भी मानती है और हिन्दू भी।
विडम्बना ने लालबेगियों के रूप में "इंसान" को जन्म दे दिया।
हाँ ये अभी भी कन्फ्यूज़ है कि अयोध्या में राम मंदिर बनना चाहिए या बाबरी मस्ज़िद की दुबारा तामीर हो।
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थूक मिर्जई और घड़ा: लालबेगियों की जाति कथा
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थूक, घृणा उत्प्पन करता है, घृणा से उतपन्न होता है। आक थू!!
बदबू आती है तो हम थूक देते हैं। कुछ घृणित सुनकर हम थूक देते हैं। कुछ घ्रीनित देखकर हम थूक देते है
थूक, जिसका स्पर्श हो जाने पर हम एंटीसेप्टिक से हाथ धोते हैं।
हमारी पांचो इंद्रियों का घृणस्पद चीजों से जब संयोग, संपर्क होता है तो मस्तिष्क उस घृणा को थूक के रूप में निकाल देना चाहता है।
अगर यह थूक न हो तो वह इन्द्रियां ही, वह मस्तिष्क ही घृणित हो जाएगा और उन पर मक्खियाँ भिनभिनाने लगेंगी।
थूक पर मख्खियां भिनभिनाती है।
मख्खियों से मेरा मतलब न हिन्दू और न मुसलमान है। नहीं मख्खियों से हिन्दू-मुसलमान को जोड़ कर इस लिए मत देखिए की मैं लालबेगियों के बारे में कह रहा हूँ और आज हिन्दू और मुसलमान दोनों ही उन्हें अपना बनाने का नाटक करने के लिए उनके इर्द गिर्द भिनभिना रहे हैं।
उनके उत्त्पति की कथा में थूक एक केंद्रीय तत्त्व रहा है और इसीलिए वो आज भी थूक ही साफ करते हैं।
जी हां हिंदुओं के थूक और मुसलमानों के थूक।
कथा कुछ यूँ है:
एक मिनट! मै खुद से उनके उत्पत्ति की कथा नहीं रच रहा हूँ। यह कथा मैंने उनके मुंह से सुनी है जिसे मैं अपने बस शब्द दे रहा हूँ।
●थूक
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हाँ तो बात तब की है जब लोग अपने अपने काम चुन रहे थे उस वक़्त उसने झाड़ू मारने का काम चुना ठीक वैसे ही जैसे किसी ने पूजा पाठ का काम चुना था, किसी ने व्यापार का काम चुना था, किसी ने बाल काटने का काम चुना था, किसी ने दूध दुहने का काम चुना था।
मतलब किसी ने कोई काम चुना तो किसी ने कोई काम।
अपना काम चुनने का अधिकार!!
क्या काल रहा होगा? अद्भुत! रामराज्य!!
कुछ लोग कहते है कि स्वर्ग में पैगम्बरों की बैठक चल थी जबकि कुछ लोगो का मानना है कि यह बैठक देवताओं की थी।
बहरहाल, हम इस बैठक को "राम मंदिर-बबरी मस्जिद" विवाद न बना कर कथा को आगे बढ़ाते हैं। स्वर्ग में साफ़ सफाई ज़रूरी थी अतः "उसे" धरती से स्वर्ग बुलाया गया।
इसी बहाने उसने स्वर्ग देख लिया; देवों के, पैगम्बरों के ठाट देख लिए (कुछ लोगो का कहना है कि असल में उसने देवों/पैगम्बरों की अज्ञानता देखी थी)।
अब अपनी स्थिति पर तरस आकर या स्वभाववश उसके मुख में थूक भर गया (कुछ लोग कहते है वह देवों/पैगम्बरों की अज्ञानता पर कुछ कहना चाहता था)। वह इस स्वर्ग की धरती पर थूके तो कहाँ थूके, यह तो देवों की, पैगम्बरों की पवित्र धरती है। अपनी धरती तो वह नीचे छोड़ आया था। उन थूकदानो में भी वह नहीं थूक सकता था जो थूक दान देवों के, पैगम्बरों के थे।
अब क्या करे?
आकाश की और उसने देखा और इन शब्दों को आकाश पर ही थूक दिया:
"आँखों में खालीपन लिए,
आकाश की और देख,
चीखता हूँ जब,
अपनी ही आवाज सुनाई देती है,
हाय, छला गया हूँ"
उफ़ यह क्या अनर्थ कर डाला? ये शव्द देवताओं पर आकर गिरे, पैगम्बरों पर आकर गिरे। एक मेहतर का थूक देवताओं पर, पैगम्बरों पर??
उन्होंने उसे श्राप दे डाला की जा रे अधम आज से तेरे कुल के लोग थूक ही साफ करेंगे।
देवताओं का, पैगम्बरों का श्राप व्यर्थ नहीं गया और आज भी लालबेगी थूक ही साफ करते हैं
● मिर्जई
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मिर्जई ऊपर से कमर तक पहनने का एक वस्त्र होता था।
वस्त्र, खास तौर पर 'मिर्जई' लालबेगियों की जाति कथा का दूसरा पड़ाव है। चुकि वह श्रापित हो चूका था, उसके श्राप में उसकी पीढ़ियों को भी दण्ड भोगना था अतः कुछ सौ, चार सौ, पांच सौ,हज़ार सालों के बाद जब देवताओं ने कमर के ऊपर वाले हिस्सों में स्वर्ण पहनना बन्द कर दिया था और अब अंगरखा पहनते थे तब उसको अपना धड़ नग्न ही रखना पड़ता। हाँ पैगम्बरों ने भी अपने पुराने पहरावे को छोड़कर अब मिर्जई पहनना प्रारम्भ कर दिया था।
खैर, हम मूल कथा से भटक रहे है। चलिए लालबेगी की जाति कथा पर वापस आते हैं।
जब हज़ार, पांच सौ साल आपकी ज़रूरत दबा दी जाती है तो फिर उस जरुरत को पूरा करनेवाली चीज़ ही अनावश्यक लगती है
इस वक़्त बाहर से ही देखने पर पता चलता है कि आपसे कौन सी चीज़ छीन ली गई है।
भारत में पाश्चात्य शिक्षा कभी वह बाहरी नज़र थी लेकिन पाश्चात्य शिक्षा के पूर्व भी कई बहरी नज़रे हमारे इतिहास में मौजूद हैं। इस्लाम इनमे से एक था। मैं उस इस्लाम की बात नहीं कर रहा जो तलवार के बल पर आया। मैं उस इस्लाम की बात कर रहा हूँ जिसमे मेहतरों, हलखोरो और चांडालों ने अपनी मुक्ति देखी और स्वेक्षा से शहादा पढ़ लिया।
एक दिन उस मेहतर के नग्न धड़ को देखकर एक सूफी ने उससे पूछा की तूने मिर्जई क्यों नहीं पहनी है? क्यों तू नग्न धड़ंग है?
उस मेहतर ने जवाब दिया की चूंकि वह गंदगी साफ करता है इसलिए उसे मिर्जई की कोई जरूरत नहीं है। मिर्जई की ज़रूरत तो उनको है जो ऊँची जातियों के हैं।
यदि आपके आत्मसम्मान का हज़ार, दो हज़ार साल तक लगातार दमन किया जाय तो फिर आपको अपना आत्मसम्मान ही अनावश्यक बोझ लगने लगता है।
इन बोझों को उतारने के लिए कभी इस्लाम से कोई सूफी आता तो कभी कोई बौद्ध भिक्खु तो कभी कोई कबीर तो कभी कोई दयानन्द तो कभी पाश्चात्य शिक्षा से लैस कोई अम्बेडकर।
उस दिन वह सूफी आया था इस्लाम को लिए।
सूफी ने उससे कहा की जा उस घड़े को खोल उसमे मिर्जई है।
मेहतर घड़े के पास गया लेकिन उसे खोल न पाया। शायद खोला भी हो और मिर्जई मिली भी हो लेकिन हो सकता है वह मिर्जई उससे "असरफों", सम्भ्रान्त मुसलमानों ने छीन लिया हो।
● घड़ा
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आइए अब हम लालबेगियों की जाति कथा का तीसरा खण्ड प्रारम्भ करते है।
जब सूफी ने उस मेहतर को नंग धड़ंग देखा तो उससे एक घड़े को खोलने को कहा जिसमे मिर्जई थी। अपने पहले प्रयास में मेहतर उस घड़े को खोलने में सक्षम न हुवा।
दरअसल वहाँ घड़ा था ही नहीं।
वह तो उसके अस्तित्व की एक ग्रंथि थी, उसके मन को जकड़ा एक गांठ था। वह गांठ जो हज़ारों सालो से लगा हुवा था। हज़ारो सालो के दलन से लगी गांठ बस यूँ ही कैसे खुलती?
वह निराश हो सूफी के पास लौट आया। सूफी उस जकड़न की ताकत को समझ चुका था। वह जान चुका था कि वह मेहतर उसी रूप में, उसी विश्वास में, उन्ही मर्यादाओं में जिसमे हज़ारों साल से जीता चला आया है इस गांठ को नहीं खोल सकता और जब तक यह गांठ खुलेगी नहीं तब तक उसे मिर्जई प्राप्त हो ही नहीं सकती।
मिर्जई, जो उसे देवों और पैगम्बरों के बीच बराबरी का हक़ देगा।
सूफी ने उस मेहतर से उन मर्यादाओं को, उन परंपराओं को, उन विश्वाशों को लाँघ जाने को कहा और बोला "बिस्मिल्लाहउररहमानउररहीम" कहते हुए खोल इस गांठ को, तोड़ इस घड़े को, फोड़ इस घण्ट को।
अल्लाह के नाम से गांठ खोले एक मेहतर?
हाँ मुसलमान हो जाए मेहतर ताकि वह एक ऐसे समाज में शामिल हो जहाँ कोई जति नहीं, जहाँ कोई पाँत नही।
मेहतर ने अल्लाह का नाम लिया और घड़ा टूट गया, गांठें खुल गईं, लेकिन यह क्या?
इस ग्रंथि से, इस गांठ से, इस घड़े में तो एक बालक था, एक लाल, मेहतरों का लाल,"लाल बेग"।
जी हां जब गांठे खुलती है तभी कोई अम्बेडकर आता है। गांठे खुली थीं, घड़ा टूटा था अतः लाल बेग आया। बाबा लाल बेग, जिसको लाल बेगी अपना पिता मानते हैं और स्वयं को उनकी सन्तान।
◆लाल बेग: लाल भिखु, लाल शाह, वाल्मीकि या हलाल बेग?
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या तो मख्खियाँ भिनभिना रही हैं, या ये बेचारे अपने लिए एक अतीत का सृजन कर रहे है।
या हो सकता है इनके लिये मख्खियाँ द्वारा ही अतीत का सृजन किया जा रहा हो।
अतीत का सृजन?
जी हाँ, अपनी आज की पहचान को आधार देने के लिए, अपने आज के विचार को हाइफनेट करने के लिए आदमी एक अतीत को गढ़ लेता है और फिर इस 'अतीत-आज' को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर संघर्षशील विरोधी विचार धाराओं के आगे या तो ढाल बनाता है या इस 'अतीत-आज' से संघर्षशील विरोधी विचारधारा के अपप्रोप्रिएशन का प्रयास करता है।
चलिए बाबा लाल बेग से थोड़ा समय मांगते हुए इसे स्पष्ट करते हैं:
इस्लाम का जन्म आज से लगभग 1400 साल पहले हुवा था, यह एक ऐतिहासिक तथ्य है। लेकिन समय तो बहुत पहले से, अनंतता से, सृष्टि की उत्तपत्ति से मौजूद है। एक तरफ अल्लाह अल खालिक, सृष्टिकर्ता है और दूसरी तरफ इस्लाम का जन्म 1400 साल पहले होता है।
अब एक अजीब सी धार्मिक विडम्बना उतपन्न होती है। कड़ी टूटती हुई दिखाई देती है।
एक कॉग्निटिव डिससोनेन्स उतपन्न होता है। अब क्या करे?
इस समय का विनियोजन तो करना होगा।
इस समय का विनियोजन करने के लिए एक नए अतीत को गढ़ना होगा।
इस विडम्बना को दूर करने के लिए एक ऐसे अतीत को गढ़ लिया जाता है जो न तो केवल "कुन फायाकुन" को इस्लाम के जन्म से सम्बद्ध ही करता है बल्कि जुडिज़्म और ईसाइयत का भी विनियोजन, अपप्रोप्रिएशन कर देता है।
इस हाइफनेशन के बाद जुडिज़्म और ईसाइयत एक भटकी हुई विचारधारा दिखती है और सारी विडम्बनाएँ, सारे प्रश्न, सारे संज्ञानात्मक प्रतिनाद खत्म हो जाते हैं।
अब अतीत में एक लाख चौबीस हज़ार पैगम्बर खड़े किए जाते हैं और नबुअत की परंपरा मुहमद साहब पर आकर खत्म हो जाती है।
आप समझ सकते है इस हाइफनेशन की ताकत को-इसका इस्तेमाल जुडिज़्म और ईसाइयत के प्रहार से बचने के लिए ढाल के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है और उन पर प्रहार करने के लिए तलवार के रूप में भी।
जो धर्म, ना इसे धर्म नहीं कहुंगा, इसे संप्रदाय कहुंगा। धर्म, संप्रदाय से अलग है।
हाँ, तो जो सम्प्रदाय जितना सिंक्रेटिक होता है, उसके पास विनियोजन, अपप्रोप्रिएशन के उतने ही ज्यादा हथियार होते हैं। इस्लाम चुकी सिंक्रेटिक सम्प्रदाय नहीं है। चुकि यह अपनी उत्तपत्ति में ही किसी दूसरे देवता को जगह नहीं दे सकता अतः अपप्रोप्रिएशन के लिए यह भौतिक माध्यम को अपनाता है; इस्लाम तलवार के बल पर फैला है।
हिंदुइज़्म की बात करें तो यह अपनी आंतरिक संरचना में ही सिंक्रेटिक सम्प्रदाय है हालाकि ईसाईयत भी सिंक्रेटिक होने का दावा करता है लेकिन उसका सिंक्रेटिस्म कृत्रिम है, बिलकुल बनावटी। तभी तो कभी उसे आंकड़ो की सहायता लेनी पड़ती है, कभी प्रलोभन की तो कभी समाज सेवा के ढोंग की।
हिन्दू सम्प्रदाय का सबसे बड़ा हथियार, सबसे मज़बूत ढाल रहा है इसका "अवतारवाद" और इसका "पेनेनथिज़्म"।
आप मुझे केवल "अवतार" और "लीला", इन दो शब्दों का इस्तेमाल करने दें, मैं हिन्दू थियोलोजी के सारे विरोधाभासों, सारी विसंगतियों पर पर्दा डाल दूंगा।
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हलखोर
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जिल्लेइलाही अकबर का दरबार खचाखच भरा हुवा था।
आज उन्हें कुछ मुनादी करनी थी।
आज उन्हें कुछ कर्ज चुकाना था।
''बड़ी सेवा की है, इन मेहतरों ने हमारे खानदान की। हमारी, हमारी बेगमों, हमारे शहज़ादों, हमारी शहजादियों, हमारे नौरत्नों, उनके कुनबों, हमारे सिपहसालारों, पता नहीं और किन किन के पाखाना को इन्होंने कई पुश्तों से साफ़ किया है और हमे, हमारे महलों को, हमारी बेगमों को, हमारे शहज़ादे-शहजादियों को नापाक होने से बचाया है।
अगर ये न होते तो हमारे महल बावजूद गुलाब और केवड़ा और चमेली के इत्र के, दुर्गन्ध से भरे होते।
इनका कर्ज तो चुकाना है!!''
ऐसा नहीं है कि अकबर महान ही वह पहले सुल्तान थे जिन्होंने उनका कर्ज चुकाने को सोंचा था। इसके पूर्व भी किसी नवाब ने उनका कर्ज चुकाया था।
हालांकि उस नवाब का नाम तो नही याद है लेकिन उनकी जाति- नाम के जगह मेहतर लिखा होता था।
जी हाँ मेहतर एक फ़ारसी अल्फ़ाज़ है जिसका अर्थ "मुखिया" या "बुजुर्ग" होता है।
मेहतर शब्द को नवाबों की एक पीढ़ी ने भी कभी अपनाया था।
वर्तमान पाकिस्तान के चितराल के नवाब अपने को मेहतर कहते थे और मेहतर उस वक़्त सम्मान सूचक शब्द था। चितराल के मेहतरों के नवाब की पीढ़ी के किसी नवाब को पाखाना ढोने वालों का कर्ज उतारने का ख्याल आया तो उन्होंने उनको अपना यह उपनाम ही दे दिया।
वर्तमान में भी कुछ सवर्ण संघटनों द्वारा अछूतों का उपनयन संस्कार करवाया जा रहा है। उन्हें जनेऊ पहनाया जा रहा है। चुकी उन संगठनों को मैंने काफी नजदीक से देखा है और उनमें काम भी किया है अतः मैं कह सकता हूँ कि उनकी इस जनेऊ-आंदोलन में कोई लाग-लपेट नही है, कोई छल-प्रपंच नहीं है लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि यह वास्तव में जाति तोड़ने का उपाय नहीं है। आपने "जातिवाद" की ताकत को सही से नही आँका है और आपका हल उतना ही कच्चा है जितना उस "नवाब मेहतर" का था।
नाम बदल देने से मेहतर नवाब नही हो गए बल्कि अकबर महान के समय तक आते आते, जबकि बहुत दिन नही बीते होंगे, मेहतर शब्द गाली बन गई थी।
तभी तो अकबर महान को आज एक मुनादी करनी थी और मेहतरों को "हलालखोर" अर्थात हलाल की खाने वाला कहना था।
जी हां हलालखोर, हमारा हलखोर।
क्या बदला?
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मेहतर_महात्मा
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आइए एक ऐतिहासिक यात्रा पर चलते है, लेकिन यह किसी शब्द की ऐतिहासिक यात्रा होगी। किसी शब्द के दो अर्थ होते हैं: वाच्यार्थ और भावार्थ। वाच्यार्थ निरपेक्ष होता है लेकिन भावार्थ क्रमशः बदलता रहता है। भावार्थ सापेक्ष होता है।
शब्द केवल वर्णनात्मक ही नहीं होते वरन भावात्मक भी होते हैं। वह तदनुरूप किसी वस्तु की और इशारा ही नहीं करते बल्कि भावना भी जागृत करते हैं।
शब्दों की इस विशेषता को यदि हम ध्यान में न रखें तो अर्थ को हम पकड़ ही नहीं सकते।
शब्द के भावार्थ और वाच्यार्थ में संगति हो ऐसा ज़रूरी नहीं है। कभी भावार्थ वाच्यार्थ पर भारी होता है तो कभी वाच्यार्थ भावार्थ पर।
मेहतर,
यह शब्द आपके अंदर क्या भाव उतपन्न करता है। एक मिनट को सोचिए। आपके मन जो भाव उतपन्न हुवा यह है उसका भावार्थ।
फ़िलहाल हम "मेहतर" शब्द के भावार्थ की ऐतिहासिक यात्रा को किनारे करते हैं।
आइए हम "मेहतर" शब्द की ऐतिहासिक यात्रा करते हुए उसके वाच्यार्थ को स्थापित करते हैं:
मेहतर एक हिंदुस्तानी (हिंदी-उर्दू) शब्द है जिसका अर्थ होता है : सफाई करने वाला। पुनः हिन्द-कुश के चितराल(चितराल को 1974 में पाकिस्तान में मिला दिया गया था) इलाके के नवाबों का यह टाइटल भी रहा है।
मेहतर, नवाबों का टाइटल??
जी हाँ, मेहतर कभी नवाबों का टाइटल रहा है और इसको एक्सप्लेन करेगा मेहतर शब्द की ऐतिहासिक यात्रा, उसकी व्युत्तप्ति!
फ़ारसी में "मिहतर" का अर्थ होता था "अगुवा", "मुखिया" जो कालांतर में अस्तबल के मुखिया अर्थात मुख्य सईस का सूचक हो गया।
थोड़ा पीछे चलते हैं।
फ़ारसी "इंडो-इरानियन" समूह की भाषा है।
संस्कृत भी इसी समूह की भाषा है अतः लाज़मी है कि संस्कृत में इस शब्द का कॉग्नेट, सजातीय पाया जाय। संस्कृत में इसका सजातीय है "महा" और "महत"। वही महानुभाव वाला "महा" और "महत्वकांक्षा" वाला महत।
और थोड़ा पीछे चलते है।
अब हम "प्राक् भारोपीय" या "प्रोटो इंडो-यूरोपीय" भाषा के काल मैं हैं जहां संस्कृत के "महा" और "फ़ारसी" के "मिहतर" दोनों को ही जन्म देने वाला शब्द मौजूद है। और वह शब्द है
*méǵh₂s
माफ़ करिएगा क्योंकि मुझे इसका उच्चारण नहीं पता है अतः इसका देवनागरी में ट्रांसलिट्रेशन नही कर पाउँगा।
यहाँ प्राक् भारोपीय भाषा में इस शब्द *méǵh₂s का अर्थ है "बड़ा"
अब अगर हम *méǵh₂s से "मेहतर" तक की नीचे की और यात्रा करें तो मेहतर का तो वही अर्थ है जो महात्मा का है।
और सच में मेहतर क्या महात्मा नहीं होते?
महात्मा हमारे अंदर की गंदगी को साफ करते है और मेहतर हमारे बाहर की।
क्या हम मेहतर के वाच्यार्थ को इसके भावार्थ पर तरजीह नहीं दे सकते?
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