Sunday, February 2, 2020

संघी मुसंघी राष्ट्र पथलगढ़ी और वामपंथ

सर ये मुसंघी क्या होता है? साफ साफ 'मुस्लिम जेहादी' क्यों नही लिख रहे। संघी को आप हिजेहादी या हिमुल्ला भी लिख सकते थे लेकिन आप नही लिखेंगे क्योकि एक नकारत्मकता के भाव की पुष्टि करने वाले विमर्श में संघी शब्द की आपको दो बार आवृत्ति करनी है ताकि संघी शब्द के साथ नकारात्मकता के भाव को अधिकाधिक रिनफोर्स किया जा सके। इस शब्द के प्रयोग से "मुस्लिम" शब्द भी विमर्श से बड़ी महीनता से बाहर निकल जाएगा। यह भी छद्मधर्मनिर्पेक्षता है। 
आपसे  मुसंघी की जगह मुलसमान जेहादी शब्द करने का आग्रह करता हूँ ताकि विमर्श में वस्तुनिष्ठता बनी रहे।

सर मैं झारखण्ड में रहता हूँ जो एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है। आदिवासियों में किनशिप या कबीले की भावना के प्रति अत्यंत लगाव होता है। 

राष्ट्र दरअसल एक कबीला ही है। किसी काल विशेष में जन्मा काल विशेष की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक बड़ा, काफी बड़ा कबीला।

अब मानव को मेरा कबीला, तेरा कबीला, मेरा राष्ट्र, तेरा राष्ट्र आदि में विभाजित किया जा सकता है। साम्यवाद इस विभाजन को स्वीकार नही करता। वह अक्रॉस कबीला, ट्राइब और राष्ट्र लोगो को शोषक और शोषित में वर्गीकृत करता है। 

राष्ट्र अथवा कबीला की भावना को हवा देनेवाली अन्य साहयक सनकल्पनाए उसके लिए व्यर्थ है यथा :धर्म या मज़हब। यहाँ तक तो साम्यवाद मानवता की सरवोत्तम विचारधारा है लेकिन व्यवहार में यह राष्ट्रवाद का विरोध करता है लेकिन आदिवासियों के मध्य कबीले की भावना का विरोध करते इसे कहीं नही पाया। 
राम का विरोध तो देखा है लेकिन आदिवासियों के बोंगा का विरोध यह नही करता।
साम्यवाद यहाँ कुछ ऐसी गलतियां कर बैठता है, बल्कि जानबूझ कर ऐसी आग बोता है कि आदिवासियों में कबीले की भावना प्रबल होती जाती है और उनके अंदर राष्ट्र बनाम कबीला का भाव जन्म लेता है। उन्हें राम तो पाखण्ड लगते हैं लेकिन बोंगा पाखण्ड नही लगते।

यह विरोधाभास क्यों?
क्या यह साम्यवाद का विरोधाभास है अथवा एक रणनीति की सबसे पहले सबसे प्रबल शत्रु को ध्वस्त किया जाय?

भारतीय राष्ट्र के खिलाफ आदिसियो के कबीले के भाव को भी वामपंथीयो ने राष्ट्र बनाम कबीला के द्वंद को उभारने के लिए खूब इस्तेमाल किया है और पत्थलगढ़ी के नाम पर नरसंहार उसकी एक मूर्त अभिव्यक्ति है।

यह आंदोलन गुजरात-महारष्ट्र सीमा, झारखण्ड, छतीसगढ़ और ओडिशा तक पहुंच चुका है। छतीसगढ़ के दुर्ग और बालोद जिले में कंगलामांझी सरकार आज भी चल रही है। इनके पास अपनी सेना है, वे परेड करते हैं, साल में एक बार राजसभा का आयोजन होता है। देशभर के कई आदिवासी नेता इसमें शामिल होते हैं। ये भी भारत सरकार को नहीं मानते। ओडिशा में इसका नेतृत्व बीरमित्रापुर के एमएलए जॉर्ज तिर्की कर रहे हैं। उनका नारा है न हिन्दुस्तान न पाकिस्तान, हमें चाहिए आदिवासिस्तान। वह एक ट्राइबल कॉरिडोर बनाने की मंशा भी रखते हैं।

पत्थलगढ़ी भारतीयता के खिलाफ आदिवासियत को खड़ा कर उसके माध्ययम से आदिवासियों द्वारा राज्य के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह के लिए भड़काने की वामपंथी-मिशनरी साजिश है। जिस प्रकार मुसलमानों को इस्तेमाल अमेरिका ने किया है ठीक वही इस्तेमाल नक्सली-मिशनरी आदिवासियों का कर रहे हैं।  इस्लाम खतरे में हैं और आदिवासियत खतरे में है, इन दोनों बातों में कोई फर्क नही है।  जहाँ कट्टरपंथी इस्लामी यह कहते हैं कि चूंकि यह धरती, चांद, सूरज, हवा सब अल्लाह ने बनाए और काफ़िर इसका इस्तेमाल करते हुए भी अल्लाह को नही मानते ठीक उसी प्रकार की भावना भरके कट्टरपंथ आदिवासियत को बढ़ावा दिया जा रहा है और उनके मन मे यह बात बार बार भरी जा रही है कि भारतवर्ष दरअसल उनका था, वो ही यहाँ के मूलवासी है, सारे प्राकृतिक संसाधन भी उनके थे और गैर आदिवासी या दिकू उनपर आदिवासियों का हक़ मारते हुए भारतीयता के नाम पर उन पर कब्जा करते चले जा रहे हैं।
आदिवासी समाज को कट्टरपंथ इस्लाम और उससे हुए इस्लामी मुल्कों में नुकसान से सबक लेनी चाहिए क्योकि पत्थलगढ़ी का समर्थन हो या विरोध, मारे वो ही जाएंगे।


वास्तव में वामपंथ न तो इस्लाम का ही मित्र है और न ही आदिवासियों का। भारत मे राष्ट्रवाद के खिलाफ आदिवासियत और इस्लामियत को हवा देना उनकी रणनीतिक मज़बूरी मात्र है।


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