Wednesday, February 12, 2020

बोतल का मुँह और मुँह का बोतल

मैं: कोई अंतिम सत्य नही होता
वो: यह कहकर तुम एक अंतिम सत्य ही तो बता रहे हो।
मैं: तभी तो कोई अंतिम सत्य नही होता। सत्य प्याज के छिलके के मानिंद होता है। आप परत उघाड़ते जाइए, उघाड़ते जाइए, उघाड़ते जाइए और बहुत सी दार्शनिक समस्याएं तो मात्र भाषा-जन्य भ्रम होती हैं; ये मात्र इसलिए उपस्थित होती हैं कि हम अपने भाषा की सीमा को नही समझते और बुद्धि प्रपंच द्वारा तर्क पर तर्क किए जाते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि उस मूल प्रश्न का उत्तर तो मिलता नही असंख्य और प्रश्न खड़े होते चले जाते हैं और फिर उनके असंख्य उत्तर। और फिर एक दार्शनिक सम्प्रदाय का ही जन्म हो जाता है और फिर उस संप्रदाय के अंदर  सम्प्रदाय......और अंततः होता यह है कि दर्शन का जीवन से विच्छेद हो जाता है और यह एक दुरूह शास्त्र बनकर आसमान में टँग जाती है।
एक उदाहरण लीजिए:
गाय के चार पैर होते हैं
गधे के चार पैर होते है
अतः गाय गधा है। 
अब वास्तविक दुनिया मे गाय तो गधा है नही लेकिन चूंकि मनुष्य एक बौद्धिक प्राणी है और यह बुद्धि ही उसको अन्य पशुओ से अलग करती है तो बुद्धि द्वारा स्थापित यह तथ्य गलत कैसे हो सकता है?
सम्भवतः इस दुनिया के गाय और गधे वास्तविक गाय और गधे नही हैं। अब चूंकि इस दुनिया के गाय और गधे वास्तविक गाय और गधे नही है अतः यह दुनिया भ्रम है और चुकी यह दुनिया भ्रम है अतः कोई वास्तविक दुनिया अवश्य है। और चूंकि वास्तविक दुनिया अवश्य है अतः हमरा लक्ष्य उस वास्तविक दुनिया के लिए होना चाहिए। और चूंकि--------।
और हाँ चूंकि इस तरह "गाय-गधे वाली" चिंतन हमारे पूर्वजो ने की है; तर्क की एक विधि स्थापित की है अतः मुझे उस तर्क के अनुरूप मात्र उदाहरण ढूंढना है और उसी चिंतन पद्धति को पुष्ट करना है तो ये लीजिए:
दरवाजा आधा बन्द है अतः दरवाजा आधा खुला है
अतः दरवाजा पूरा बन्द है क्योंकि दरवाजा पूरा खुला है; दरअसल बात उस दरवाजे की हो रही है बन्द होते हुए भी खुला है और चूंकि----------------।

वैसे बोतल का मुँह होता है तो मुँह का बोतल क्यो नही होता भी एक बहुत बड़ा दार्शनिक प्रश्न है।

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विज्ञान  विजित क्षेत्र है; इसकी हद में वह सुरक्षित क्षेत्र हैं जिसमे ज्ञान और कला हमारे अद्भुत जगत का निर्माण करते हैं। लेकिन यात्रा यहीं खत्म नही हो जाती। इस विजित क्षेत्र के आगे और अनिश्चित तथा और भी अधिक रहस्य से भरा क्षेत्र जीते जाने के लिए उपलब्ध होता है। दर्शन यहाँ परिकल्पनाओं और विमर्शात्मक चिंतन द्वारा पथ-प्रदर्शक बनने का प्रयास करता है।
ध्यातव्य है कि इस विंदु पर कल्पना की कोई एक दिशा नही होती, कल्पना यहाँ हर दिशा में उड़ान लेती है। चिंतन की पद्धति में एक नया पैराडाइम भी उपस्थित हो सकता है और विज्ञान आगे बढ़ता है।
इन सबो के बीच एक समस्या उतपन्न होती है: विज्ञान द्वारा पुष्ट उन एक या अनेक दार्शनिक परिकल्पनाओं के अलावा शेष परिकल्पनाओं को भी मोह/रूढ़ि/वश मानव नकार नही पाता और उन्हें जीवित रखने के लिए जाने-अनजाने छद्म विज्ञान की रचना करता है। यहाँ दुर्भाग्य से  ज्ञान-से दिखनेवाले ऐसे तन्त्रो का एक समूह भी विकसित किया जाता है जिनका वास्तव में कोई मोल नही, ये मात्र अपव्यय हैं।

दर्शन का काम छद्मविज्ञानो को नष्ट करने के  साथ साथ  इन बन्ध्या परिकल्पनाओं और विचार पद्धतियों को भी नष्ट करना  होना चाहिए।
 
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