Thursday, February 13, 2020

चावल (दका)

एक
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अगर एक सिद्धान्त को माने तो भारत में सबसे पहले नेग्रीटो प्रजाति ने प्रवेश किया। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में यह आज भी अपने पाषाण कालीन सभ्यता में जी रहे हैं।
उक्त सिद्धान्त के अनुसार भारतवर्ष में निग्रिटो के बाद आग्नेय या  ऑस्ट्रेलॉयड/ प्रोटो-ऑस्ट्रेलायड प्रजाति ने प्रवेश किया।
आग्नेय प्रजाति के पश्चात द्रविड़ों ने भारत में प्रवेश किया और फिर आर्य भारत वर्ष आए।
माना जाता है इनमे आग्नेय प्रजाति उस रास्ते से भारत नही आई जिस रास्ते से होकर आर्य और द्रविड़ आए थे बल्कि ऑस्ट्रो एशियाटिक भाषा समूह का वितरण इस बात की गवाही देता है कि वह उत्तर-पूर्व के रास्ते भारत में घुसे।
बर्मा, इंडोनेशिया, वियतनाम में उसी भाषा समूह की भाषाएं ही जिस भाषा समूह की भाषा संथाली और मुंडारी है।

यही नही ऑस्ट्रेलिया के अबोरिजीनल्स और मुंडा-सन्थाल एक ही प्रजाति समूह के हैं।
अब भारत से मुंडा-सन्थाल प्रजाति के लोग या तो  ऑस्ट्रेलिया गए या तो जावा सुमात्रा से इनकी एक लहर उत्तर पश्चिम होते हुए भारत पहुंची और दूसरी लहर दक्षिण पूर्व ऑस्ट्रेलिया।
लेकिन यह तभी सम्भव है जब हम जावा मानव की परिकल्पना को सत्य मान ले।
यदि मानव अफ्रीका में विकसित हुवा तो हमे यह यह मानना होगा की ये अफ्रीका से पहले भारत आए फिर भारत से ऑस्ट्रेलिया गए और बीच रास्ते से कहीं इनकी एक लहर काल क्रम में पुनः किसी कारण से वापस लौट आई।

यदि हम इस परिकल्पना को सत्य माने तो अचानक से अज्ञात  हिहरी पिपड़ी, हरात पर्वत, सिंग दुवार, सासांग बेडा स्पष्ट होते दिख जाते हैं।
और इसी क्रम में मारांग बुरु सबसे बड़ा पहाड़ की कल्पना/परिकल्पना के जन्म के पृष्ठभूमि भी स्पष्ट होती दिखती है।
इनकी स्मृति-श्रुतियों में इनके राह को एक बहुत बड़े पर्वत ने अवरुद्ध कर दिया तब इन्होंने मारांग बुरु (सबसे बड़े पहाड़) की आराधना की और इन्हें रास्ता मिल गया और इनकी यात्रा जारी हुई।
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दो
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झारखण्ड के आदिवासियों का कोई धार्मिक अनुष्ठान हँड़िया के बिना सम्पन्न नही होता। यह चावल से बनी शराब है जो लगभग हर आदिवासी परिवार बनाता है।
सन्थाल लोककथाओं के अनुसार लिटा गोसाईं या मरांग बुरु (सबसे बड़े देवता) ने प्रथम पुरुष और प्रथम स्त्री, पिलछु हड़ाम तथा पिलछु बूढ़ी की रचना के पश्चात उनके सम्मुख आकर उन्हें हँड़िया बनाने की विधि बताई। इसे पीकर इन आद्य पूर्वजो ने आपस मे सम्बन्ध बनाए तथा मानवता की शुरुवात हुई।
आशय यह है कि, चावल की खेती सीखने के पश्चात ही उनकी सभ्यता फली फूली और वह फिर विभिन्न गोत्रो, क्लैनो में विभाजित हुए।
इस बात की पूरी संभावना है कि भारत मे चावल की खेती का इंट्रोडक्शन इन्ही प्रोटो ऑस्ट्रेलॉयड लोगो ने किया।
संथाली लोककथाओं और गीतों में कुछ नाम मिलते हैं: हिहरी-पीपीरी, सासांग बेड़ा, मरांग बुरु।
ये स्थान कहाँ हैं यह अभी एक रहस्य हैं किंतु कुछ शोधों के आधार पर एक परिकल्पना का निर्माण किया जा सकता है।
भारत के बाहर ऑस्ट्रोएशिएटिक भाषा वियतनाम, कम्बोडिया, वर्मा आदि देशों में बोली जाती है।
अभी हाल ही में ज्ञानेश्वर चौबे ने अपने शोध से यह प्रमाणित कर दिया है कि भारत मे सन्थाल, मुंडा आदि दक्षिण पूर्व से आए थे। यह शोधपत्र नेचर पत्रिका में मौजूद है।
चावल का जन्मस्थान चीन और हिमालय की तराई है।
सन्थाल लोककथाओं में सासांगबेड़ा आता है । सासांग का अर्थ पिला और बेड़ा का अर्थ घाटी होता है। क्या यह संयोग मात्र है कि ह्वांगहो या पीली नदी चीन में है और सन्थाल, मुंडा आदि ज्ञानेश्वर चौबे के शोध के अनुसार उधर से आए?


इन लोगो को इनकी कथा के अनुसार एक बहुत बड़ा पहाड़ (मरांग बुरु) मरांग का अर्थ बड़ा और बुरु का अर्थ पहाड़ होता है, मिला था। क्या वह हिमालय नही था?
यहाँ इन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की और फिर उन्हें रास्ता मिल गया।
इन सबके बीच क्या एक सम्भावना नही बनती की यह चावल की खेती करते करते भारत तक फैल गए और भारत के अंदरूनी हिस्सो में इन्होंने चावल को इंट्रोड्यूस किया?

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तीन
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एक दिन बॉडिंग की द सन्थाल एंड देयर ट्रेडिशन दिखी तो उत्सुकतावश उसके पन्ने पलटने लगा क्योंकि जहाँ मैं काम करता हूँ वहाँ सन्थाल जनजाति के लोग रहते है। पुस्तक के पन्ने पलट रहा था कि निगाह एक शब्द पर आकर अटक गई-खरवार!
बीस पच्चीस साल पहले की स्मृति ताज़ा हो गई: मेरे पैतृक गाँव, जो की बिहार के बक्सर जिले में है, में एक छोटी से पहाड़ी नुमा सरचना है। इसे लोग गढ़ कहते हैं। गढ़ के ऊपर आज गढ़पति परमार राजपूतों के वंशजो की बैठक है। उस वक़्त मैंने किसी से पूछा की ये गढ़ किसने बनाया तो उसने बताया कि हमने अपने बाप-दादाओं से सुना है कि इसमें पहले कन्दरा नुमा संरचनाये थी जिसमे शायद चिरो-खरवार रहते थे।
उस वक़्त मैंने सोचा की शायद इस व्यक्ति को कुछ भी पता नही इसलिए यह एक झूठ-मुठ के नकली शब्द से मुझे बहला रहा है लेकिन, खरवार शब्द मेरे मन में अंकित हो गया।
खैर पन्द्रह-बीस सालों तक वह शब्द मन के किसी कोने में दबा रहा लेकिन यहाँ तो बॉडिंग भी इस शब्द को लिख रहे हैं!
हो-सन्थाल-बिरहोर और कुडुम्बी (कुड़मी) जनजातियों को सामूहिक रूप से एक कोलिया, जिसकी कथा बॉडिंग रिकार्ड कर रहे है,आज से 137 साल पूर्व खरवार कह कह रहा है।

मेरा पैतृक गाँव गङ्गा के मैदानी इलाके में अवस्थित है। प्रश्न यह है कि क्या मेरे पुरखों ने झारखण्ड के आज के आदिवासी के पुरखों से कुछ छिना है?

इस प्रश्न का उत्तर मैं समय और परिस्थिति के अनुसार देता हूँ। झारखण्ड में मेरा उत्तर #नही होता है लेकिन सत्य यह है कि #हाँ।

हमारे पुरखो ने इस उपजाऊ जमीन को उनसे छीना है और उन्हें पठार की ओर खदेड़ा है।
मेरे पास अपनी बात को सिद्ध करने के लिए आदिवासियों के उनके विस्मृत गीत हैं, उनकी लोककथाएं हैं, गङ्गा के मैदान के प्रति उनके गीतों में उनका क्रंदन है।

हमारे यहाँ जब किसी को जंगली या असभ्य कहना होता है तो लोग कहते है कि चिरो खरवार हो क्या?
नटुआ का नाच मत करो आदि

जिन शब्दों से हम धिक्कार अभिव्यक्त करते है वह उन शब्दों के नीचे यहाँ के आदिवासी आज भी जीते हैं और ये शब्द उनके लिए गर्व की बात है।

ये स्वयम को खरवार कहते हैं। खरवार खेड़वाड़ का विकृत रूप है जिसका अर्थ है चिड़िया का वंश

समग्र खरवार स्वयम को कॉस्मिक हंस और हंसिनी के कॉस्मिक अंडे से उतपन्न मानते हैं।

इनकी इस सृष्टि विषयक कथा को मिशनरियों ने कैसे एक्सप्लॉयट किया है यह भी कभी बताऊंगा लेकिन यहां यह भी बताना चाहता हूं कि उनका यह विस्थापन और विस्थापन के पूर्व का दो अलग संस्कृतियों के एनकाउंटर आज भी उनके शब्द हमारी भाषा मे और हमारे शब्द उनकी भाषा  मे क्रियात्मक होकर उस एनकाउंटर की गवाही देता है।

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