स्याद्वाद और मेरा सन्निपात
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(एक)
क्या सापेक्षता का होना निरपेक्षता को स्वयमेव प्रमाणित करता है?
प्रो● हिरियन्ना जैन दर्शन को लेकर लिखते हैं: यदि सापेक्षवाद को उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुचाया जाय, तो निरपेक्षवाद प्राप्त होता है, जिसे जैन दर्शन मानने से इनकार करता है।
ध्यातव्य है कि जैन दर्शन एक सापेक्षतावादी ज्ञानमीमांसा का प्रतिपादन करता है जिसे स्वादवाद कहते हैं। इसकी मान्यता है कि "सत का स्वरूप अत्यधिक अनियत है"। अर्थात वस्तु को अनेक दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है और प्रत्येक दृष्टिकोण से एक भिन्न निष्कर्ष प्राप्त होता है (अनेकांत)।
सत के विषय मे प्रत्येक कथन असल मे सोपाधिक मात्र होता है। एकांत विधान (उपनिषद) और एकांत निषेध (बौद्ध) दोनों गलत है।
प्रो● हिरियन्ना स्याद्वाद के विषय मे यह भी लिखते हैं कि "वैदिक एकेश्वरवाद के प्रसंग में हमने दार्शनिक दुराराध्यता की जो बात कही थी वह यहाँ पराकाष्ठा पर पहुंच जाती है"।
प्रो● चन्द्रधर शर्मा जैन दर्शन की इस विशेषता को "बौद्ध और उपनिषदों का तत्वमीमांसिय-ज्ञानमीमांसिय माध्य" कहते हैं।
प्रश्न यह है कि सापेक्षता की तार्किक परिणति निरपेक्षता है या निरपेक्षता एक अनावश्यक तत्वमीमांसिय कोटि है जो मनस द्वारा सापेक्षता के मानसिक निषेध की प्रक्रिया पर आधारित है और विचार के बाहर वाह्य जगत में कुछ निरपेक्ष होता ही नही?
भाषाई अज्ञेयों द्वारा बौद्धिक क्रीड़ा करके एक मानसिक सत्ता बनाकर उसको वाह्य जगत पर आरोपित करना अलग बात है और वाह्य जगत में जो सत्ताएं पाई जाती है उनका विश्लेषण अलग।
हालांकि यह समझा जाता रहा है कि उपरोक्त प्रथम कार्य एक दार्शनिक होने की अनिवार्य शर्त है लेकिन वास्तव में यह दर्शन नही है। पश्चिम में तो हीगल के बाद ही यह प्रतिक्रिया हो गई और तत्वमीमांसा की कृत्रिमता, अतिशय बौद्धिकता, परिकल्पनात्मक चिंतन का बाहुल्य, प्रत्ययवादी प्रवृति और दर्शन तथा तत्वमीमांसीय चिंतन के एकीकरण के विरुद्ध उयोगोगितावाद, वास्तववाद, अस्तित्ववाद, द्वंदात्मक भौतिकवाद आदि दृष्टियों का जन्म हुआ लेकिन भारत मे आज तक ऐसी कोई प्रतिक्रिया हुई ही नही है और यह अभाव दर्शन के लिए घातक है।
देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय लिखते हैं
"भारतवर्ष में कुछेक दार्शनिक मतवादों का जन्म बहुत पुराने समय मे ही हो गया था, और आगे के समय का दार्शनिक क्रियाकलाप-कम से कम इरादे में-इन मूलभूत दृष्टिभंगियो का पल्लवन-भर था।"
(भारतीय दर्शन)
【यह शोध का विषय हो सकता है कि भारत में दार्शनिक क्रियाकलाप एक सर्वथा नवीन वैचारिक ढांचे में नवीन चिंतन, जगत और मनुष्य तथा जगत और मनुष्य के नए नए सम्बन्धो की तलाश की बजाय पूर्व में प्रतिपादित कुछ मूलभूत दृष्टि और स्थापित वैचारिक ढाँचे का ही बार बार नवीन हामी ही क्यों रहा।
दर्शन मनुष्य से बड़ा नही है किंतु भारत मे इस दृष्टि का जन्म क्यो नही हो पाया जिसमे मनुष्य के अस्तिव को दर्शन के ऊपर स्थापित किया जाय।
विचारों में परिवर्तन, वैचारिक ढाँचों में परिवर्तन बदलती परिस्थितियों के सूचक होते हैं। भारत मे एक ही वैचारिक ढाँचे और फिर मात्र बौद्ध धारा में एक नवीन वैचारिक फ्रेमवर्क का आना क्या इस बात की ओर ईशारा नही करता कि भारतीय समाज पश्चिमी समाज की तुलना में गत्यात्मक नही था?
राजनैतिक उठापठक, साम्राज्यों का आना और जाना अलग बात है और सामाजिक गत्यात्मकता और बात।】
बहरहाल बात स्यादवाद की हो रही थी और देखिए मुझे फिर सन्निपात हो गया। अगली बार स्याद्वाद पर एकाग्र करने की चेष्टा करूँगा हालांकि मुझे पता है कि मेरा और सन्निपात का विक्रम और वेताल का रिश्ता है।
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स्याद्वाद और मेरा सन्निपात
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(दो)
अव्वल तो मुझे आंतरिक जगत का अर्थ बहुत ज्यादा स्प्ष्ट नही है। मैं आंतरिक जगत से मन और उसके विभिन्न संकाय के समुच्चय का अवबोध पाता हूँ। स्मृति, कल्पना, भावना, ईष्या, परार्थकल्याण आदि सम्भवतः आंतरिक जगत के अवयय हैं।आतंरिक विकास वाह्य विकास के लिए निश्चित रूप से आवश्यक है इसमें तो कोई दो मत है ही नही हालांकि चेतना का ग्रेडेशन पता नही एक वैज्ञानिक शब्दावली है या नही फिर भी व्यवहार के लिए इस शब्द को तबतक स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नही है जब तक चेतना का वैज्ञानिक ग्रेडेशन न हो जाय अथवा चेतना का ग्रेडेशन होता है इस बात को ही लैब में अप्रमाणित न कर दिया जाय।
चेतना के ग्रेडेशन के विषय मे न्यूरोसाइंटिस्ट, मनस-दार्शनिकों और समकालिन मनोवैज्ञानिकों की राय जानने का प्रयास करूंगा।
भारतीय दर्शन के विभिन्न सम्प्रदाय भिन्न-भिन्न टेम्परामेंट वालो के लिए है यह बात सही होते हुए भी गलत है क्योंकि यदि इस लाईन ऑफ थॉट को एक्स्टरपोलेट किया जाय तो फिर हिंदुत्व-इस्लाम-क्रिश्चियनिटी भी अलग अलग टेम्परामेंट के लोगो के लिए है और इस प्रकार इनमे कोई भेद है ही नही।
दूसरी, यह बात इस लिए भी सही नही है कि यह विभिन्न दर्शनों के मध्य हुए वाद-विवाद, उनके पक्ष-प्रतिपक्ष, उनकी पुष्टि और विरोधी मतों के खण्डनार्थ विकसित सिद्धांतो और शास्त्रों को ऑबलीवियन में धकेल देता है जो दर्शन के इतिहास के साथ न्याय नही है; आत्मा के स्वरूप पर ही नास्तिक सम्प्रदायो को छोड़िए, सारे आस्तिक सम्प्रदाय एकमत नही है।
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विशुद्ध चेतना क्या हो सकती है? चेतना के साथ विशुद्ध का विशेषण क्यों? चेतना के साथ क्या मिल कर उसे अशुद्ध करती है?
क्या चेतना अपने आप मे कोई चीज है या चेतना किसी की होती है? फेनोमेनोलॉजीकल विचारक यह दावा करते हैं कि चेतना में डियरेक्टेडनेस होती है अतः चेतना किसी की होती है और निरपेक्ष चेतना की बात करना बेमानी है।
चेतना क्या वास्तव में कोई अभौतिक सत्ता है? शायद नही क्योकि चेतना न्यूरॉन्स में हो रहे बायो इलेक्ट्रिकल और बायो केमिकल क्रियाओं का परिणाम है।
अब यदि चेतना के लिए भूतद्रव्य के इस खास प्रकार से संगठन की आवश्यकता होती है तो उस अर्थ में ब्रह्मांडीय चेतना शब्द का कोई अर्थ नही है हाँ यह शब्द कोई काव्यत्मक उदगार अवश्य हो सकता है।
पशुओ में शायद बिचार नही होते क्योकि उनमें मष्तिष्क का यह हिस्सा नही होता जो विचार बनाने के लिए उत्तरदायी है। मैं एक प्रयोग करता हूँ--अपने मष्तिष्क को विचार शून्य करने का प्रयास करता हूँ। हालांकि यह कठिन है लेकिन जब जब मष्तिष्क विचार शून्य मस्तिष्क होता है तो वास्तव में जो बोध मुझे हो रहा होता है, जो संवेदना मुझे हो रही होती है वही उन पशुओ की संवेदना है जिनके मष्तिष्क के पास विचार करने की जटिलता नही है। मैं और भीतर जाने का प्रयास करता हूँ और मैं विकास क्रम में और पीछे के जीवो की संवेदना को महसूस करने का प्रयास करता हूँ।
दरअसल मैं विशुद्ध चेतना की ओर नही जाता बल्कि निम्न स्पीसीज अपने दिमाग मे कैसा महसूस करते है इसकी कसरत मात्र करता हूँ।
विशुद्ध चेतना, ब्रह्मांडीय चेतना वास्तव में कुछ होती भी है!
स्वादवाद और मेरा सन्निपात
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(तीन)
मित्र, चेतना उत्तरोत्तर विकसित होती रहती है। हम स्थूल से सूक्ष्म की और बढ़ते हैं। कभी सोचा है कि किसी आदिम सभ्यता को अविकसित और आधुनिक सभ्यता को विकसित क्यों कहते हैं? मेरा मानना है कि विकसित सभ्यता सत्ता और अस्तित्व , जिसमे प्रकृति भी शामिल है, के सूक्ष्म तक पहुंच चुकी होती है। इस अर्थ में संहिताओं के काल से विकसित औपनिषदिक काल होंगे, औपनिषदिक काल से विकसित दर्शन का काल रहा होगा और दर्शन कालों में सर्वाधिक विकसित शून्यवाद और अद्वैतकाल रहे होंगे।
मित्र, जब आप भारतवर्ष के दार्शनिक इतिहास पर दृष्टिपात करेंगे तो आप पाएंगे कि आदर्शवादी विचारकों ने जिनके अनुसार ईस्वर, चेतना, प्राथमिक है और भूत गौण अपनी व्याख्या में एक सरल वैज्ञानिक सत्य की,' उत्तरोत्तर विकास होता है ,"के साथ संगति स्थापित नहीं कर पाए है।
आइए ऋग्वेद के प्रथम संहिता को लेते हैं
अग्निमिदे पुरोहितम। यज्ञस्य देवम ऋत्विजम। होतारम। रत्नोधात्मम!
अब इस मंत्र की व्याख्या कई तरीकों से की जा सकती है ।
आचार्य सायण आधारित ग्रिफ्फिथ के अनुसार,
"I laud Agni, the chosen priest, God, Minister of sacrifice, the Hotar, the lavishest of wealth."
अब देखिए स्वामी दयानंद सरस्वती इसमें कैसे अर्थ विस्तार करते हैं:
"He is like Energy. He leads. He has been present from before. I adore him. He sheds light on this interconnected spectacle. He creates at the appointed time. He gives and reclaims. He sustains jewels in an incomparable manner"
मित्र, दयानद की चेतना किसी देश काल की उपज थी। वह काल था भारतियों को जगाने का काल अतः ऐसी व्याख्या आत्म स्वाभिमान को बनाए रखने के लिए आवश्यक थी। उस वक्त की मांग थी की स्थूल से जुड़े भारतीय मनस को पुनः सूक्ष्म से संबद्ध किया जाय लेकिन हम आज क्या कर रहे हैं-आज परमाणु बम और सपेक्षिता के सिद्धांत को वेदों में ढूंढ रहे है, क्वांटम भौतिकी के सिद्धांतों और वेड की अद्वैत वादी धाराओं में ज़बरदस्ती सामाजस्य बिठाने का प्रयास कर रहे हैं जबकि वेद मात्र और मात्र मानवीय चेतना के स्थूल से सूक्ष्म की ऒर प्रयाण की गवाही हैं।
कुछ दिनों पहले संघ विचारक श्री राकेश सिन्हा जी का "डेकोलोनैज़ेश ऑफ़ इंडियन माइंड' पर व्याख्यान सुन रहा था। बड़ी अच्छी बात कही उन्होंने : हम भारत महान के माइक्रो नैरेटिव में फंस कर रह गए है हमने आइडिया ऑफ़ इंडिया के मेटा नैरेटिव को क्रिएट ही नहीं किया है। यदि भारत की सृजनात्मकता को बहार लाना है तो कम से कम 50 सालो के लिए मेरा भारत महान, वेद उपनिषद और लछछेदार संस्कृत के श्लोको पर मोराटोरियम लगाना होगा।
स्याद्वाद और मेरा सन्निपात
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(चार)
विडम्बना यह है कि फंडामेंटल लेवल पर पार्टीकल की उपस्थिति न होने को लोग अपने अनुसार मोड़ लेते है और उन्हें लगता है कि यहाँ भौतिकवाद हार गया और इस पार्टीकल की समाप्ति के पश्चात पृष्ठभूमि में चेतनवाद है लेकिन यह फील्ड्स जो मैटर को जन्म देती है, स्वयम भी कोई चेतन तत्व नही हैं बल्कि इनका स्वरूप भी भौतिक ही है।
अब यदि मासलेस फ़िल्डस से मास वाले मेटेरियल इमर्ज हो सकते हैं तो पुनः मैटर के विशिष्ट संयोजन से मासलेस और एक नवीन घटना "चेतना" क्यो नही इमर्ज होगी?
सारा चेतनावाद चेतना को भौतिक न मानने की शर्त पर टिका है।
जगत की अंतिम सत्ता के विषय मे दो सिद्धान्त बड़े चर्चित हैं: आइडियलिज़्म या प्रत्ययवाद (चेतनवाद) और भौतिकवाद। भौतिकवाद जगत को भूत द्रव्यो से उतपन्न मानता है अतः इस विचारधारा के अनुसार चेतना भूतद्रव्यो का उत्पाद है। चेतनावाद इसके उलट जगत को चेतना की उतपत्ति स्वीकार करता है और या तो जड़ तत्व का ही खंडन करने का प्रयास करता है; जड़ को अविद्याजन्य या भ्रम स्वीकार करता है।
उपरोक्त एकत्त्ववादी विचारधाराओं के अलावा जगत की अंतिम सत्ता विषयक बहुतत्ववादी और द्वैतवादी विचार भी मौजूद है। भारतीय दार्शनिक पद्धतियो में न्याय-वैशेषिक एवम जैन को बहुतत्ववादी व सांख्य को द्वैतवादी माना जा सकता है।
बात सन्निपात, स्यादवाद और चेतना की हो ही रही है तो थोड़ा डायवर्जन लेते हुए मनोव्याधियो की भी बात आवश्यक है। मनोविकारों की चर्चा के आलोक में भी चेतना के विषय मे स्थापित शास्त्रीय भारतीय मान्यताओं का विश्लेषण अनिवार्य है ताकि चेतना को उस अलौकिक लोक से नीचे लाकर इहलोक का विषय बनाया जा सके। प्रसङ्गातीत यह डाइग्रेशन इसलिए भी आवश्यक है कि "ब्रह्मांडीय चेतना, विशुद्ध चेतना, अनश्वर चेतना आदि जैसे शब्दों के दावों की इस नई रोशनी में भी जाँच की जा सके।
आप यहाँ कहेंगे कि नही नही तुम भारतीय शास्त्रों में वर्णित चेतना को समझने में भूल कर रहे हो तो मैं आपको आमंत्रित करता हूँ कि मुझे भारतीय शास्त्रों में वर्णित चेतना का अर्थ समझाने की कृपा की जाय क्योकि प्रो●हरिमोहन झा की तरह ही मैं उस चेतना को नही जानता जो न तो शस्त्रों से कट सकती है और न ही जिसे अग्नि जला सकती है बल्कि मैं उस चेतना को जानता हूँ जो क्लोरोफॉर्म से तिरोहित हो जाती है (सन्दर्भ: दार्शनिक विमर्श, बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी)
पेट्रीसिया कैसी और ब्रेंडन कैली "फिशज़ क्लिनिकल सैकोपैथोलॉजी" में मनोव्याधियो को निम्न शीर्षो में विभाजित करते हैं:
● प्रत्यक्षीकरण की व्याधियाँ
(Disorders of Perception)
● विचार और वाक की व्याधियाँ
(Disorders of thought and speech)
●स्मृति की व्याधियाँ
(Disorders of memory)
● भावनाओ की व्याधियाँ
(Disorders of Emotion)
●आत्मानुभव की व्याधियाँ
(Disorders of self experience)
●व्यक्तित्व सम्बन्धी व्याधियाँ
(Disorders of Personality)
●गति सम्बन्धी व्याधियाँ
(Motor disorders)
●चेतना की व्याधियाँ
(Disorders of consciousness)
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