Tuesday, February 4, 2020

गाँव और बचपन की यादेँ

आज आप  बरसात में रघुनाथपुर स्टेशन उतरेंगे तो उससे दक्खिन कैथी जाने के लिए गाड़ी की कमी नही है । पाँच से दस मिनट में आप कैथी लेकिन आज से मात्र दस साल पहले यदि आपको रघुनाथपुर से कैथी जाना हो आपको यही एहसास होता कि आप सही में दक्खिन जा रहे हैं: तिरछे खेते-खेत आप जा नही सकते थे और रोड होके बहुत लम्बा पड़ता। सवारी के नाम पर बस कैथी गाँव के "बड़क बारी का एक्का" । कैथी से रघुनाथपुर के बीच की कनेक्टिविटी का एकमात्र साधन। बड़क चाचा के एक्का की सेवा हमने भी कई बार ली थी। बड़क चाचा के इक्का में घोड़ी जुती थी। हमारे बैठने के बाद हई च्च च्च करके एक्का स्टार्ट करते और फिर कहते चलs! और गाड़ी चल पड़ती। बड़क चाचा घोड़ी को "ना मनबु?", "तहार खोराक कम करे के परी का" वगैरह कहते एक्का हाँकते, हाँ सवारी के लिए उनका केवल एक इंस्ट्रक्शन रहता: कस के धइले रहब जा क्योकि कभी दाहिना चक्का नीचे रहता तो कभी बायाँ। कही-कही तो बड़क चाचा खुद उतर कर घोड़ी को आगे खींचते और तब एक्का आगे बढ़ता और अंततः हम अपने गंतव्य को पहुँच जाते। एक्का जब कभी चार-पाँच मिनट के लिए स्मूथ चलता तो बड़क चाचा दुहराने लगते: नईया खेव रे मलहवा नईया डूबल चाहेले-नईया खेव रे मल---हाँ---ना मनबु?

बहुत दिनों तक गौर नही किया था लेकिन एक दिन दिख ही गया कि बड़क चाचा ने अपनी घोड़ी की आंखों पर  जो चमड़े की पट्टी लगाते है ताकि वो सीधा देखें, वह नही लगाया था। मैंने सोचा कि यूं ही नही लगाया होगा लेकिन दो-तीन बार यही देखा तो मुझसे रहा नही गया और जब एक्का थोड़ा आगे बढ़ा तो उनसे पूछ लिया कि चाचा घोड़िया के अँखिया पर हउ जवन लगावल जाला उ काहे ना लगावेलs?

बड़क चाचा ने जवाब दिया: बाचा उ त ओकरा के लगावल जाला नु जेकरा लउकेला, ई त जन्मे से आन्हर ह!!

मैंने कहा चाचा एक्का जल्दी रोकs!!!!

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बचपन मे बहुत दिन तक परेशान रहा कि मुझसे क्राइम नही होगा। यह परेशानी तब तक बनी रही जब तक बड़के भैया द्वारा मुझे मारा गया यह ताना याद रहा। इस हिन भावना से निकलने के लिए उनको कह भी दिया कि तू एक गो मर्डर करबs त हम दु गो करब!
चाचा के लड़के हमारे बड़के भैया हमारे संयुक्त परिवार में मेरी पीढ़ी के सबसे बड़े भाई थे, मुझसे लगभग दो साल बड़े और इस तरह कई चीजो में मेरे गुरु भी। खोखा को भर कर भरेठ गोली बनाना उन्होंने ही मुझे सिखाया था। यह एक बड़ी उपलब्धि थी और बोकारो आकर मैं इस कला का अपने सहरी दोस्तो के बीच प्रदर्शन करता लेकिन जब बाबूजी को पता चला कि मैं यह कला दिखा रहा हूँ तो वो मुझपर बहुत गुस्सा हुए। उनका गुस्सा इस बात से नही था कि मैं खोखा से भरेठ गोली बना रहा हूँ बल्कि वह इस बात से क्रोधित हुए की मैं उनकी बन्दूक का नाल खराब कर रहा हूँ। सजा में बाबूजी नाल पकड़ते और चिन्दी में कपड़ा बांध के चिन्दी मुझे तबतक खींचना पड़ा जब तक नाल अंदर से चमचमा नही गया।

हाँ तो बड़के भैया हालांकि मुझसे दो साल ही बड़े थे लेकिन बचपन मे ही प्रौढ़ हो गए थे। चाचा जी उनको बच्चों के साथ खेलने की जगह, बच्चों के समाज मे जाने देने की जगह, अपने समाज मे बैठाते और इस तरह धीरे-धीरे बड़का भैया ने चाचा और उनके समाज की भाषा और हाव भाव आत्मसात कर लिया।

बचपन मे मैं सुकुवार था, बारिश में भीगता और बीमार पड़ जाता, ज्यादा खेलता और बीमार पड़ जाता। एक दिन मुझे और बड़के भैया को बाजार भेजा गया। हमारे गांव से बाज़ार 2 कोस दूर है। गर्मी का दिन था और भैया जितनी तेज भी नही चल पा रहा था। भैया ने मेरी हालत देख कर मुझे ताना मारा:
तें कतना सिमसीमाह बाड़े रे, तोरा 4 कोस चल के क्राइम करे के होई त तोरा से त होइबे ना करी!

ताना मेरे दिल को लग गया और मैंने भैया से कहा कि यदि आप एक मर्डर करेंगे तो मैं दो करूँगा।

भैया दिल्ली पहाड़गंज में होटल खरीदकर अपने उसी व्यवसाय में लगे हैं और मैं बोकारो में लेकिन जब हम मिलते है और यह चर्चा होती है तो खूब आनंद आता है और अब मैं उनको ताना मरता हूँ : 
भैया क्राइम करे ना चलबs!!

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ॐ कुम्भनी स्वाहा:

पहला क्रश कोई नही भूलता। मैं भी नही भुला लेकिन अब जब वह सब सोचता हूँ तो हँसी आती है। पहला क्रश तब हुवा था जब फ़िल्म देखकर आता था और फिर रात में सोते समय हीरो को मिटाकर उसकी जगह खुद को प्लॉट करके पूरी फिल्म कपार में चलती लेकिन इतना तो ज्ञान था ही कि वो हीरोइने असल मे बहुत दूर हैं। तब तीसरे-चौथे में था। किताबे पढ़ने की आदत तब से ही लग गई थी। एक दिन मेरे हाथ नाना की लाइब्रेरी में "तन्त्र मंत्र और टोटके" नामक की किताब लग गई। अपने काम की चीज "वशीकरण" खण्ड में मिली जिसमे लिखा था कि ॐ कुम्भनी स्वाहा मंत्र 10000 बार पढ कर फिर गुलाब के फूल पर 108 बार पढ़ कर जिस स्त्री को सूंघा दिया जाय वह वश में हो जाती है। 
अपनी तो निकल पड़ी ●●●●●
पड़ोस में एक भाभी रहती थी, मेरी पहली क्रश। बंगालन थी, बहुत खूबसूरत। मुझे मानती भी बहुत थीं लेकिन अपने शैतानी दिमाग मे कुछ और प्लान चल रहा था। 
मैंने घरवालों से छुपकर, अपने तब के दोस्तो से छुप कर 10000 बार ॐ कुम्भनी स्वाहा का जाप किया फिर एक दिन एक गुलाब का फूल लेकर उसपर भी 108 बार मंत्र पढा। 
सब तैयार था, अब बस उन भाभी को गुलाब के उस फूल को सुंघाने की ज़रूरत थी फिर●●●●●●●●

भाभी को लेकिन कैसे यह फूल सुंघाउँ यह भी एक समस्या थी। उधेड़बुन में था कि एक दिन उन्होंने कुछ बनाया था और मुझे खिलाने के लिए बुलाया। 
खाना खाने के बाद जब भाभी कमरे में आई तो लगा की बस यही मौका है: मैने अपनी हाफपेंट की जेब मे हाथ डाला और वो सूखा गुलाब का फूल हाथ मे लेकर खेलने लगा। यही नही उसको उनके यह दिखाते हुए सूंघा जैसे कोई नॉर्मल बात हो और देखना चाहता हूं कि उस गुलाब में अब भी खुशबू है कि नही। भाभी मुझे यह करते देख ही रही थीं कि मैंने बहुत ही सहज भाव से उनसे कहा कि भाभी देखिए न यह सूखने के बाद भी खुशबू दे रहा है।
भाभी मेरे जाल में फंस चुकी थीं। उन्होंने उसको लिया और सूंघ लिया। मेरा कलेजा खुशी से झूम उठा कि ये हुवा काम लेकिन भाभी ने कहा कि इसमें तो कोई खुशबू नही है और उसको उन्होंने मसलते हुए खिड़की से बाहर फेंक दिया। मैं वहाँ थोड़ी देर रुका की भाभी पर अब असर हो लेकिन कुछ कहाँ होने वाला था। मैंने सोचा हो सकता है यह मंत्र एक-दो दिन बाद असर करेगा लेकिन हफ़्तों बाद भी यह बेअसर रहा।
 अब मन टूट गया था और तन्त्र से विश्वास उठ चुका था।।

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बबुआन  मिसिर अपने चापाकल को, जी यह चापाकल उनका अपना था, एकदम पर्सनल (पारिवारिक नही), सरकारी जोगाड़ लगवा कर अपने दुआर पर गड़वाए थे और एकदम अपने निजी पैसे से उसके चारों और सीमेंटेड प्लेटफार्म बनवाए थे। बबुवान हलाकि अपना निजी सोटा-साबुन अपनी कठही अलमारी में ताला मार कर चाभी अपने जनेऊ में बांध कर रखते लेकिन, उस  सीमेंटेड प्लेटफार्म के बगल में उनका अपना एकदम निजी मिटटी का "इतना बड़ा" ढेला खुले में पड़ा रहता जिससे वह अपना हाथ मांजते थे। उस सीमेंटेड प्लेटफार्म के एक कोने पर दो तीन प्रकार के पत्थर भी पड़े रहते जिससे वह अपनी  एंड़ी रगड़ते और अपने बिवाइयों को हटाने की कोशिश करते क्योंकि उनका मानना था:

सूखे सिहुला, दुखे दिनाय
करम फूटे तो फाटे बेवाय।

खैर, बबुवान नहाते बहुत थे, पीतल की बाल्टी में फुलहा लोटा और उनके नाती चापाकल चापते-चापते परेशान हो कर उनसे गाली सुनकर फिर से तेजी से चापाकल चापने लगते और बबुवान: हरहर बमबम -हरहर-बमबम।

उस दिन बबुवान नहाने के बाद जब अपने अंगूठे और तर्जनी को आगे पीछे करके अपना जनेऊ गार रहे थे तभी सामने से माहटर पंड़ित आते दिखाई दिए।
 
माहटर पंड़ित: गोड़ लागीं
बबुआन: जै, जै!

(यहाँ यह बताना भूल गया था कि बबुवान की एक नतिनी भी थी जिसको दसवी बोर्ड परीक्षा देनी थी, प्राइवेट से।

नतिनी को दसवी इसलिए पास करवानी थी की उसका अच्छे घर में नौकरिहा लइका से बियाह करना था और प्राइवेट इसलिए की नतिनी जैसे छठी में पहुंची थी ठीक उसी समय भैस के खेत में पड़ने के विवाद में मर्डर हो गया था।

अब मर्डर इसलिए हुवा था क्योंकि बबुवान खानदान को अपनी इज़्ज़त बनानी थी और चुकी इज़्ज़त बन गई अतः एक इज़्ज़तदार घर की नतिनी बाजार में स्थित स्कूल में कैसे पढेगी!)

माहटर पंड़ित: अउर चाचा का हाल बा जी,
सुननी हा की नतिनिया बोर्ड देतीया?

बबुवान: हूं जी, खदेरनपुर इस्कूल में सेंटर पड़ल बा आ ओकरे फिकिर बा कि लईकी जात आन गाँवे कइसे जाई।

माहटर पंड़ित: महाराज कहीं के, हमार साढू न हेडमास्टर है उस स्कूल का आ इज़्ज़त का बात आ गया है त ऊ कवन दिन काम आएगा।

लईकी काहे उँहा जाएगी, कांपी घरे आएगा जी।

बबुवान का नाती  रोज की तरह चापाकल चापने के बाद घर नही भागा था बल्कि यह बातचीत सुनने के लिए चापाकल का हैंडिल पकड़ के खड़ा हो गया था।
बबुवान ने उसको गाली देते हुए कहा: ते का सुन तारे रे ससुरा, जो भीतर से कुरुसी ले आव।

--आईं-आईं माहटर साहेब तनी आईं  त!
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बोर्ड परीक्षा शुरू हो गई और माहटर पण्डित ने सढ़ुआने में पैरवी करके प्रश्नपत्र और कॉपी घर मंगा लिया। अब समस्या थी कि कॉपी लिखेगा कौन!
माहटर पण्डित ने यह कहकर हाथ जोड़ लिया कि उनके जमाने और इस जमाने की पढ़ाई बदल चुकी है अतः तय हुआ कि नतिनी के मामा गाँव से फलाने पांड़े का लड़का कॉपी लिखेगा। बेचारा तेज़ था लेकिन करम खराब होने के कारण ट्यूशन पढा रहा था।

फलाने पाँडे का लड़का प्रश्न पत्र और कॉपी लेकर बैठा था और छोटे छोटे लड़के उसको उत्सुकतावश घेरे खड़े थे। बबुवान मिसिर वहाँ पहुँचे और लड़कों को गाली देते हुए कहा: भाग स रे इहाँ कवनो खेल होता, पढ़ाई का काम हो रहा है।

फलाने पांड़े के लड़के ने प्रश्नपत्र देखा और बबुवान से कहा: अब बताइए कि इतना हार्ड कोस्चन आतना छोट बच्ची से पूछना चाहिए, हमलोग को नही बुझा रहा है त उ लड़की क्या लिखेगी!
जानते हैं बाबा, ई मय लालुवा का चाल है। उ हार्ड -हार्ड कोस्चन देके फारवड को फेल करना चाहता है।

बबुवान मिसिर भी उतने कच्चे खिलाड़ी न थे, उन्होंने पूछा कि पास कर जइब नु की तहरो नइखे बुझात?

पांडे जी के लड़के ने कहा: देखीं बाबा हम तो लिख देंगे बाकी पास करना और नही करना मास्टर के हाथ मे है। बैकवड मास्टर के पास कांपी गया तो गड़बड़ा भी सकता है।
पांड़े जी के लड़के ने सोचा कि यदि बच्ची फेल हो गई तो इसको बैकवड-फ़ारवड मास्टर में उलझा के अपनी इज़्ज़त बचा लेंगे लेकिन रिजल्ट आया और बबुवान कि नतिनी थर्ड डिवीजन से पास हो गई।

त बोलs 
सियाबर रामचन्द्र शंकर जी उमा!!!

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नाच का बहुत ज्यादा अनुभव तो नही है, एकाध बार ही देखा है बचपन मे और एक बार बड़का बाबूजी के लड़के की शादी में एकदम टाईट दूल्हा का भाई बनकर लेकिन मेरा दुर्भाग्य की मैं तब भले ही यह सोचता होऊं की मैं भी जवान हो गया हूँ लेकिन बाई जी को शायद यह नही लगता होगा तभी वह स्टेज से उतरकर बड़े बड़े मुछवालो के पास नाचते नाचते चली जाती थीं लेकिन मेरे पास एक बार भी नही आईं!

खैर, जब नाच आता था तो सारे गाँव जवार में हल्ला हो जाता था कि फलाने के यहाँ नाच आया है। 
नाच दो प्रकार के होते थे: लवंडे का नाच और लेडी नाच। लौंडा नाच में लड़के स्त्री वेश धरकर नाचते थे।

आज नृत्य को लेकर घर के लोग भले ही उदार हो चले हो  लेकिन तब कोई भाई यदि डांस करता तो बुढ़वे इससे चिढ़ते थे  और कहते:
जनम के गं**आ कर्म के हीना
तेक़ा राम नचनिया कीन्हा

नाच आने पर नाच संभालने की जिम्मेदारी भी जरूरी थी, तो थोड़े उस टाईप के बाबा या चाचा को नाच मैनेजर बना दिया जाता। ये नाच मैनेजर उस तम्बू के पास जहाँ लौंडा या लेडी तैयार होते वहाँ कुर्सी डाल के बैठ जाते। इनका पहला काम था छोटे-छोटे बच्चों को उस तम्बू के पास फटकने से रोकना--घर के लड़के बिगड़ गए तो! 
ये बाबा , चाचा लेकिन खुद बिगड़ैल थे और बीच बीच मे तम्बू के अंदर झांकते हुए झूठ मुठ कहते: अभी और कितनी देर है,जल्दी करो, आलम जुट गया है। यही नही एक बार तो एक बुढ़ऊ को एक लौंडा को गोद मे बैठा कर बीड़ी पिलाते हुए भी पकड़ा था।

तब गांव में से ही एक्स्ट्रा तखत मांग कर नाच का स्टेज बनता था और सामने मिसिर जी, उपाधिया जी, सिंह जी अपनी अपनी एकनाली, दुनाली, थ्री-फिफ्टीन लेकर बैठते और नाच शुरू होता।
सबसे पहले गणेश और सरस्वती वंदना फिर एक देशभक्ति गीत और तब असली नाच जो नाच से ज्यादा तखत तोड़ कॉम्पटीशन होता।
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