Tuesday, January 7, 2020

शंकर और मार्क्स


पहले मैं मार्क्सवादी था और इस तरह की बातें लिखता था:

मुक्ति
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ए बाबा 
ऐगो काम करs
हउ ललका कपड़वा
जवना से पोथीआ बन्हले बाड़
अब कपार प बान्ह ल
अब तक मुड़ी के भरे रलहा
अब गोड़ के भरे हो जा
हई धर हँसुआ
आ चलs खेत मे

फिर जीवन मे दूसरे सवाल आ गए!!
वैसे एक दर्शन के विद्यार्थी होने के नाते आज भी मार्क्स के लिए मेरे मन में उतना ही सम्मान है जितना शंकराचार्य के लिए; मार्क्स की बातें मुझे ज्यादा स्पष्ट हैं वनिस्पत आचार्य शंकर के। मेरी चेतना में यह जगत ब्रह्म और उसकी माया में अविर्भूत मानने के लिए उतने ही अपुष्ट आधार है जितने इसकी अविर्भूति शैतान और उसकी शक्ति सिन में, बल्कि यह जगत विविध तापों, दुखोंऔर अपनी अपूर्णताओं के कारण ब्रह्म-माया  की बजाय शैतान-सिन क्रीड़ा अधिक  प्रतीत होता है।
इस जगत के दुःख इसी जगत में दूर किए जाएँ तो बेहतर क्योकि एक इहलोकेत्तर जगत है इसको पुष्ट किया ही नही जा सकता और मार्क्स इहलोक की पीड़ा का इहलौकिक हल सुझाते हैं।

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