परिवर्तन या शाश्वतता का प्रश्न दर्शनशास्त्र का बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है। पाश्चात्य और भारतीय दोनों ही परम्पराओ में परिवर्तन और शाश्वतता का द्वंद उपस्थित है। हेराक्लाइट्स कहते हैं "एवरीथिंग इज़ फ्लक्स" जबकि परमेंआईडीज़ इसके उलट "ओनली बीइंग इज़ रियल" की उद्घोषणा कर परिवर्तन को अयथार्थ और उस सता को जो अपरिवर्तनीय है, यथार्थ स्वीकार करते हैं। भारतीय परम्परा में उपनिषदें यथार्थ के रूप में एक अपरिवर्तनशील नित्य सत्ता को स्थापित करती हैं जबकि बुद्ध परिवर्तन को ही सत्य मानते हैं। बुद्ध हेराक्लाइट्स के साथ सहमत हैं कि "आप एक ही नदी में दो बार डुबकी नही लगा सकते"।
आधुनिक काल मे यह दो विचार नैतिक सामाजिक क्षेत्र में दो अलग दृष्टियों की सृष्टि करते हैं जिसमे जो सत्ता को अपरिवर्तनीय मानते हैं वह नैतिक जगत में मूल्यों की निरपेक्षता में विश्वास करते हैं जबकि दूसरी मूल्यों की सापेक्षता में विश्वास करती है। साम्यवाद परिवर्तन (द्वंदात्मक भौतिकवाद) में विश्वास करनेवाली वह दार्शनिक दृष्टि है जिसने अपनी पद्धति से तत्वमीमांसिय अलौकिकता को निकाल दिया और भौतिकवाद को अपने दर्शन में केंद्रीय स्थान दिया। अर्थात परिवर्तन में विश्वास करने के बावजुद इसे बुद्ध के निर्वाण, जन्ममरण चक्र आदि पर विमर्श नही करना बल्कि इसे इहलोक के दुःख और उसके निवारण पर ध्यान केंद्रित करना है; त्रिविध दुखो की सत्ता को अस्वीकार कर यह भौतिक दुखो के अंत को ही अपना ध्येय समझता है।
मार्क्स का द्वंदात्मक भौतिकवाद मानवीय विचारों के इतिहास में इस अर्थ में बिल्कुल एक नवीन बात थी कि इसके पूर्व इस चिंतन पद्धति का एक इतना सुव्यवस्थित और विस्तृत तंत्र मौजूद नही था; यह पूर्व की यूटोपियन पद्धतियों की तुलना में वैज्ञानिक था।
■■■■■
भौतिकवाद और द्वंदात्मक भौतिकवाद
भौतिकवाद एक तत्त्वमीमांसिय निष्कर्ष है जिसके अनुसार सत्यता अंततः भौतिक है, जगत का कोई प्रयोजन नही है तथा यह भौतिक नियमो से संचालित है।
द्वंदात्मक भौतिकवाद सत्यता को देखने का तत्त्वमीमांसिय फ्रेमवर्क के विरुद्ध सत्यता को द्वंदात्मकता में देखने की पद्धत्ति है।
द्वंदात्मक भौतिकवाद तत्त्वमीमांसा तथा प्रत्ययवाद दोनों के विरुद्ध प्रतिक्रिया है।
यह प्रत्ययवाद को अस्वीकार करता है क्योंकि इसकी मान्यता है कि सत्यता अपने मौलिक रूप में चेतन या विचार नही बल्कि भूतद्रव्य है। अपनी इस मान्यता के चलते यह भौतिकवाद की अन्य विशेषताओं को स्वीकार कर लेता है यथा: जगत की प्रयोजनहीनता तथा उसकी यांत्रिकता।
द्वंदात्मक भौतिकवाद तत्त्वमीमांसा या मेटाफिजिक्स के विरुद्ध भी एक प्रतिक्रिया है क्योकि मेटाफिजिकल फ्रेमवर्क में जगत एक इंटीग्रल होल नही बल्कि रैंडम घटनाओ का एक असम्बद्ध जमावड़ा है। द्वंदात्मकता या डायलेक्टिक्स में प्रकृति इसके सभी घटकों की एक गत्यात्मक इकाई है।
No comments:
Post a Comment