Tuesday, January 7, 2020

धर्म: पदत्त अस्तित्व का निषेध और अस्तित्व विस्तारण।






●पीड़ा, समस्या या रहस्य?
पीड़ा प्राणी मात्र में सार्वभौमिक घटना है। जहाँ "सत्ता" विशुद्ध सत, विशुद्धचित, विशुद्धआनंद है वहीं प्राणिमात्र में सत और चित की विशुद्धता के विषय में भले ही विवाद हो पर निरपेक्ष वेदना की उपस्थिति निर्विवाद है। वेदना न तो निर्जीव में पाई जाती है और न ही सच्चिदानंद में। समस्त प्राणियों में मनुष्य ही एक मात्र प्राणी है जिसे वेदना का विशिष्ट भान है। यह अवबोध वेदना को महसूस करने का ही नही बल्कि, "जीवन में वेदना है", इस तथ्य का भी ज्ञान है। जीवन स्वभावतः वेदना से दूर जाना चाहता है। हर प्राणी पीड़ा से बचना चाहता है किंतु इसके विशिष्ट बोध के कारण मनुष्य में एक  छटपटाहट पायी जाती है जिसे अगर समस्त प्राणी जगत के संदर्भ में देखें तो मानव में यह सबसे और तीव्र है। मानव में छटपटाहट की यह तीव्रता "मानवीय पीड़ा" को अन्य प्राणियों की पीड़ा से अलग एक सर्वथा नवीन सत्तामीमांसिय कोटि में डाल देता है: मनुष्य विशिष्ट है, इसकी चेतना विशिष्ट है, इसकी पीड़ा भी विशिष्ट है।
यदि चेतना समस्या और रहस्य में भेद करती है तो "पीड़ा" क्या है: समस्या या रहस्य? 
गैब्रियल मार्शल के अनुसार समस्याओं में हमे अपनी आत्मलीनता दिखाई नही देती। यहाँ विषय और विषयी का द्वैत होता है। लेकिन, रहस्य कुछ ऐसे प्रश्न होते हैं जिनके बारे में विचार करते ही हमे तत्क्षण यह अनुभव होता है कि ये हमारे अस्तित्व के साथ प्रारम्भ से ही सम्बद्ध हैं। इनसे हम दूरी नही रख सकते, क्योंकि यह अंतरंग रूप से हमसे जुडी रहती हैं।
"मैं पीड़ित हूँ ,मैं पीड़ा के बारे में प्रश्न कर रहा हूँ" यह विचार आपस में ठीक वैसे ही सम्बद्ध हैं जैसे "मैं कौन हूँ जो सत्ता के विषय में प्रश्न कर रहा है"।
इन दोनों चिन्तनों में पीड़ा विषयक चिंतन पूर्ववर्ती है; आर्य सत्यों का ज्ञान जीवन में दुखो की अनुभूति के बाद ही होता है तथा निर्वाण की अवधारणा भी "सर्वम दुःखम" तथा अन्य दो आर्य सत्यों के बाद चौथे आर्य सत्य मे ही अभिव्यक्त होती है।
"सत्ता क्या है" का विचार पीड़ात्मक अनुभूति के पश्चात इसके शमन के रूप में स्थापित प्रक्रियाओं को उभारने के क्रम में आता है।

●पीड़ा: उत्पत्ति, शमन और प्रदत्त अस्तित्व 
पीड़ा एक रहस्य प्रश्न है। इसकी अव्यवहित अनुभूति होती है। पीड़ा पर थोड़ा विचार ही अस्तित्व को इसके कारण-रूप में स्थापित कर देता है: जब तक अस्तित्व की बेड़िया हैं, पीड़ा है।
अस्तित्व के निषेध द्वारा पीड़ा का अंत किया जा सकता है। अस्तित्व का सकारात्मक निषेध कैसे किया जाय यह धर्म प्रस्तावित करता है। 
सकारात्मक निषेध में वैचारिक एवम प्रतीकात्मक स्तर पर प्रदत्त अस्तित्व का निषेध किया जाता है। वैचारिक स्तर पर इस निषेध की प्रकृति मिथकीय, पौराणिक अथवा तत्त्वमीमांसिय होती तथा उपवास, बलि आदि क्रियाओ के द्वारा निषेध की प्रतीकात्मक क्रिया सम्पन्न की जाती है। 
■ तत्त्वमीमांसिय निषेध:-
(क) अद्वैत वेदांत का उदाहरण:
मृत्यु की उपस्थिति के कारण  प्रदत्त अस्तित्व असत है। इस असत का निषेध अमरता के सत द्वारा किया जाता है तथा सत और शाश्वतता को सम्बद्ध कर दिया जाता है। असत अचित पर आधारित है अतः अचित का निषेध उस चित द्वारा किया जाता है, जो निरपेक्ष और असीम है। वेदना का निषेध आनंद द्वारा, परम् आनंद द्वारा किया जाता है। इस प्रकार प्रदत अस्तित्व के निषेध में "सच्चिदानन्द" की सत्ता स्थापित की जाती है। 
(ख) बौद्ध धर्म का अनात्मवाद: जीवन और जगत के विषय मे बौद्ध तत्वमीमांसा उपनिषदों के आत्मा और ब्रह्मवाद के विपरीत अनात्मवाद को प्रतिपादित करती है। जहाँ उपनिषदों में आनुभविक अहम या प्रमाता, जीवात्मा तथा साक्षी में भेद स्थापित कर, प्रमाता तथा जीवात्मा का निषेध कर साक्षी को ब्रह्म के साथ संयुक्त कर दिया जाता है, वहीं बौद्ध तत्त्वमीमांसा में स्व का यह अमूर्त विश्लेषण अनावश्यक और पीड़ा के मूल प्रश्न से दूर करने वाला माना जाता है। 
अपनी इस व्यवहारिक दृष्टि के कारण बौद्ध तत्त्वमीमांसा प्रमाता अथवा आनुभविक अहम को ही केंद्र में रखती है, तथा प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धान्त के आधार पर प्रमाता के तात्त्विक निषेध का प्रयास करती है। बौद्ध धर्म मे जीवन का लक्ष्य निर्वाण की प्राप्ति है।
निर्वाण चाहे मौलिक रूप में भावात्मक या अभावात्मक अवस्था हो, लेकिन यह जन्म-मरण के चक्र के निषेध के रूप में प्रमाता का निषेध ही है।
(ग) जॉन हिक की "आत्मा-निर्माण" की प्रक्रिया: समकालीन धर्म दार्शनिक "जॉन हिक" अपने थियोडायसी में "आत्मा निर्माण की प्रक्रिया" स्थापित करते हैं। उनके अनुसार बाईबल की यह उक्ति की "ईश्वर ने मनुष्य को अपने प्रतिरूप में बनाया" का, अर्थ यह है कि मनुष्य निरन्तर ईश्वर के स्वरूप की प्रतिकृति को पाने की ओर बढ़ता रहता है। इस प्रतिकृति को प्राप्त करने का मूल्य पीड़ा है।
पीड़ा को  ईश्वरीय प्रतिकृति प्राप्त करने के अनिवार्य घटक के रूप "हिक" की आत्मा-निर्माण की प्रक्रिया भी प्रदत अस्तित्व का निषेध ही है।
■ पैराणिक-मिथकीय निषेध: ईसाई धर्म मे व्याप्त "आद्य पाप" की अवधारणा को पौराणिक-मिथकीय निषेध कहा जा सकता है। तत्त्वमीमांसा और पैराणिक व्याख्या में मूल अंतर विचार प्रकिया में प्रयुक्त सम्प्रत्ययो की सापेक्षिक सूक्ष्मता या रिलेटिव एब्स्ट्रेक्शननेस है। पौराणिक चिंतन प्रक्रिया में अपेक्षाकृत स्थूल सम्प्रत्ययो द्वारा चितन किया जाता है। 
आदम और ईव द्वारा ईश्वरीय आदेश की अवहेलना को "आद्य पाप" कहा जाता है। इस आद्य पाप के कारण मनुष्य जन्म से ही पापी है। वह जन्मना पापी है, इसका अभिप्राय उसके अस्तित्व का निषेध ही है।  वह इसलिए पापी है कि उसके आद्य पूर्वज आदम और ईव ने "ईश्वरीय आज्ञा" का उल्लंघन किया था, अतः यहाँ भी मानवीय अस्तित्व के निषेध में एक सत्ता उपस्थित है, जो मनुष्य की सीमित शक्ति की तुलना में सर्वशक्तिमान, मुनष्य की अल्पज्ञता की तुलना में सर्वज्ञ,  मनुष्य की देश-काल मे सीमित पहुँच की तुलना में सर्वव्यापी तथा दयालु, ईश्वर है।
■ प्रतीकात्मक निषेध: मानवीय अस्तित्व का प्रतीकात्मक निषेध उपवासों तथा बलि आदि क्रियाओ में अभिव्यक्त होता है। बलि का आशय अपनी प्रिय वस्तु का समर्पण है। मानव का सबसे प्रिय वस्तु उसके प्राण ही हैं। अपने प्राणों का उत्सर्ग, प्रतीकात्मक रूप से किसी अन्य जीव की बलि द्वारा संपादित की जाती है और इस प्रकार किसी अन्य जीव की मृत्यु द्वारा अपने अस्तित्व का प्रतीकात्मक निषेध किया जाता है। यहाँ भी निषेध में, “स्थापित सत्ता” अवश्य उपस्थित रहती है, क्योंकि बलि किसी "को" दी जाती है और इस प्रकिया द्वारा उस ज्ञात या अज्ञात के साथ सम्बन्ध स्थापित किया जाता है।
प्रदत्त अस्तित्व के निषेध द्वारा एक सत्ता, एक सत्यता रची जाती है। इस निषेध द्वारा रची गई सत्ता बस यूँ ही किसी निर्वात में रखने के लिए नही होती बल्कि इस सत्ता की रचना ही इसलिए होती है कि इसको स्व के साथ सम्बद्ध किया जाए। प्रदत्त अस्तित्व के निषेध द्वारा रची गई सत्ता के रूप में स्व को सारगर्भित कर अथवा उसके साथ स्व को  विविध रूपो में सम्बद्ध कर अस्तित्व का विस्तारण किया जाता है।

भारतीय धर्मो के लक्ष्य, जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति, कैवल्य, अपवर्ग, मोक्ष, वैकुंठ आदि  वस्तुतः प्रदत्त अस्तित्व का सकारात्मक निषेध ही है। भारतीय धर्मो में निषेध के पश्चात व्यक्तित्व शेष नही रहता  बल्कि एक एक ऐसा तत्व आविर्भूत होता है जो या तो सभी कोटियों से विमुक्त अवर्णनीय, अथवा शून्यता है।
अब्राहमीय धर्मो की विशेषता यह है कि इनमें निषेध कुछ इस प्रकार किया जाता है कि व्यक्तित्व शेष रहता है, अतः उसकी आकांक्षाएं बची रहती हैं। इन धर्मो में उक्त निषेध द्वारा स्थापित सत्ता या सत्यता में आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अनन्त वस्तुएं और अनन्त विकल्प उपलब्ध होते हैं अतः इन धर्मो में जन्नत या ईश्वरीय साम्राज्य की अवधारणा मिलती है। 
●अस्तित्व का निषेध, सत्व निर्माण एवम सत्व द्वारा अस्तित्व का पुर्नअस्तित्वीकरण:
अस्तित्व का निषेध एक सर्जनात्मक प्रकिया है जहाँ मानव एक सार का निर्माण करता है साथ ही यह प्रकिया अस्तित्व के निषेध पर ही समाप्त नही कर दी जाती, बल्कि प्रदत्त अस्तित्व के निषेध में स्थापित सत्ता को स्व से सम्बद्ध करने के लिए इस सार का मूर्तकरण या अस्तित्वीकरण भी किया जाता है क्योंकि सार के मूर्तकरण के अभाव में व्यक्ति अपनी सीमा से बाहर नही निकल सकता। अतः इस प्रकार स्थापित सत्व को अस्तित्व देकर मनुष्य अपने स्व का पुनः अस्तित्विकरण करता है। पुर्नअस्तित्वीकरण के फलस्वरूप तथा इस प्रक्रिया के द्वारा भी मानव अपने प्रदत्त अस्तित्व का विस्तार करता है और अपनी ससीमता से बाहर निकलकर असीमित सत्ता से जुड़ने का प्रयास करता है; धर्म में अपनी ससीमता से निकलकर असीमित सत्ता से जुड़ने की प्रवृति निश्चित रूप से पाई जाती है।
जॉन हिक इसे धर्मो में व्याप्त, धर्मो में सामान्य, "मुक्तिशास्त्रीय संरचना" कहते हैं।
अस्तित्वीकरण अथवा मूर्तकरण के दो आयाम होते हैं: कहाँ और कैसे। कैसे का उत्तर उपासना पद्धति, कर्मकांड, प्रतीकों, नैतिक नियमो आदि से दिया जा सकता है और जहाँ तक अस्तित्वीकरण या मूर्तकरण के कहाँ का प्रश्र है, इसके दो लोकस होते हैं: व्यक्ति और समाज।
मूर्तकरण की यह प्रकिया मानव का अपने स्व के साथ सम्बन्ध तथा उसका और समाज के अंतर्सम्बन्ध  दोनों ही रूपो में प्रकट होती है इसीलिए, धर्म की व्यक्तिकेंद्रित तथा  समाजकेंद्रित दोनों ही अवधारणाएं सम्भव हैं तथापि धर्म की उतपत्ति मौलिक रूप से मानवीय पीड़ा में होने के कारण यह पीड़ा के रहस्य प्रश्नों की पृष्ठभूमि में प्रदत्त अस्तित्व के निषेध द्वारा सार निर्माण, और पुनः इस सार के  अस्तित्विकरण द्वारा प्रदत्त अस्तित्व के विस्तारण का प्रयास है। 

1 comment:

  1. आनंद आ गया पढ़कर। बेहतरीन। सभी को पढ़ना चाहिए।

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