क्लास आठ में लिखी एक और कविता
ओस
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करती क्रंदन प्रकृति निः सहाय सी
याद कर अपने संचालक सूर्य को
कहीं तृण, कहीं प्रसून या पल्लवों पर
गढ़ती प्रकृति रात्रि में ओस है।
विखरे नेत्रों से प्रकृति के शोक में
आदित्य के अभाव में विलापते
कुछ नही यह अश्रु हैं प्रकृति के
यह चमकती मोतियाँ जो ओस की
पर यह क्षणिक क्लेश था प्रकृति का
दूर हुवा प्रभात संग उल्लास से
सोख रहीं अब अर्चियाँ थी सूर्य की
विखरे हुए अश्रुओं के बूंद को।
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