Wednesday, January 8, 2020

फेथ, लीप ऑफ फेथ, ब्लाइंड फेथ तथा बुद्धि बनाम भावना



जॉर्ज लूईस बार्गेस, "द इम्मोर्टल" में लिखते है, “मनुष्य के अपवाद के साथ अमरता में कुछ भी विशिष्ट नही है। प्रत्येक जीव अमर है, क्योंकि उन्हें मृत्यु का बोध नही है। दिव्यता, रहस्य और भयावहता अपने अमरता का ज्ञान है।“
मानव का जीवन में इन्हेरेन्ट मूल्य और अर्थ ढूंढने की प्रवृत्ति तथा इस उद्देश्यहीन, अर्थहीन और अराजक ब्रह्माण्ड में उसका ऐसा कर पाने की अक्षमता के द्वंद को अस्तित्वाद में एब्ज़र्ड के  नोशन या भाव से व्यक्त किया गया है।
एब्ज़रडिज्म के अनुसार मानव जीवन में मूल्य तलाशता है। परम्परागत रूप से यह तलाश दो उत्तर प्रस्तुत करती है: जगत में अर्थवत्ता है, सोद्देश्यता है या हम एक उद्देश्यहीन अर्थहीन और अराजक ब्रह्माण्ड में रहते हैं, और चुकि हम एक अराजक, उद्देश्यहीन और अर्थहीन जगत में रहते हैं किंतु मानव की इन्हेरेन्ट प्रवृत्ति जगत और उसके स्वयम के विषय में अर्थ, मूल्य और व्यवस्था तलाशने की है, अतः मानव के जीवन में एक शून्य का निर्माण होता है।

अमरता के ज्ञान और मृत्यु के सत्य के मध्य मानव अवस्थित है। यह ज्ञान और उसकी स्थिति मानवीय चेतना को एक रिक्तता से भर देती है।
रिक्तता पीड़ा है और मनुष्य को इस रिक्तता का अवबोध है। मानव को इस रिक्तता को भरना है। इस खालीपन को या तो पलायन द्वारा भरा जाय या एब्ज़रडीटी का सामना किया जाय। 
लेकिन, एब्सर्डिटी का सामना भी ससीम से असीम, पीड़ा से मुक्ति और अराजकता से व्यवस्था की और छलांग लगाए बिना नही किया जा सकता क्योंकि इस छलांग के बिना निहिलिज़्म की स्थिति उतपन्न होती है, जो एक आत्मव्याघाती विचारधारा है। इस छलांग के लिए "फेथ" एक आवश्यक तत्व है। अस्तित्ववादी दार्शनिक किर्क़ेगार्ड इसे “लीप ऑफ फेथ” कहते हैं।
वैज्ञानिक निहिलिस्म का मानवीय जीवन मे विस्तार करने पर यह दृष्टि सामने आती है कि जगत में जो व्यवस्था दिखाई देती है वह "केयोस" के अनायासिक स्वरूप के कारण उतपन्न, जीवन और चेतना में व्याप्त इसी आकस्मिकता का आवर्धित रूप है, जो केयोस के निःसार, असंगत, उद्देश्यहीन और अराजक स्वरूप को "ब्लाईंड फेथ" की उपस्थिति  में समग्र रूप से ढक लेता है।
फेथ, आस्था या ईमान के साथ "ब्लाइंड" या "अंधी" विशेषण लगाना कितना संगत है इसके विषय मे प्रश्न किया जा सकता है।
आस्था को "अंधी" शब्द द्वारा विशेषीकृत कर "अंधी-आस्था" पद का निर्माण किया जाता है। यहाँ "अंधी" शब्द अपने लक्षणात्मक अर्थ से आस्था को विशेषीकृत करता है। इस लाक्षणिक प्रयोग में "अंधी" को अतार्किकता का पर्यायवाची बनाया जाता है। कहा जा सकता है कि जब विचारक "अंधी-आस्था" शब्द का प्रयोग करते हैं तो उनका अभिप्राय "अतार्किक या अबौद्धिक आस्था" ही होता है।
प्रश्न किया जा सकता है कि बुद्धि और भावना में मौलिक कौन है, क्या भावात्मकता की व्याख्या बौद्धिकता के आधार पर की जा सकती है या बौद्धिकता और भावात्मकता दोनों ही मौलिक हैं और मानव केवल बौद्धिक प्राणी ही नही बल्कि भावात्मक प्राणी भी है।
ध्यातव्य है कि कार्ल सेगन जैसे वैज्ञानिक भी जब “एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल” जीवन की बात करते हैं तो जीवन के उच्चतर रूपों के लिए “इंटेलिजेंट लाईफ” शब्द का ही प्रयोग करते हैं।
क्या यह एक पूर्वाग्रही दृष्टि को प्रदर्शित नही करता जिसमे “बौद्धिकता” ही मनुष्य का पारिभाषिक तत्त्व है?
बुद्धि अकेले मानवीय व्यक्तित्व का सृजन नही करती। मानवीय व्यक्तित्व बुद्धि, भावना और संकल्प की त्रयी होता है। बुद्धि एक करण मात्र है और बुद्धि की विविध स्थापनाओं के लिए भी बुद्धि में आस्था होना आवश्यक है। जिस प्रकार विज्ञान और दर्शन में बुद्धि की प्रधानता होती है,  कला और धर्म भावना प्रधान होते है। कला और धर्म मे यह अंतर है कि, जहाँ कला भावनाओ की अभियक्ति और उनका सम्प्रेषण है वहीं, धर्म में मानवीय व्यक्तित्व के घटक के तीनों आयाम उपस्थित होते हैं।  यहाँ  बौद्धिकता,  सम्वेगात्मकता और क्रियात्मकता तीनो ही एक उच्चतर भावना “आस्था” द्वारा संगठित रूप में मानवीय अस्तित्व में विद्यमान रहते हैं।
डॉ या मसीह, सामान्य धर्मदर्शन और दार्शनिक विश्लेषण, में धर्म के विषय मे  लिखते हैं, “धर्म मे मानव सम्पूर्णतया लग जाता है जिसमे भाव, क्रियातमकता और संज्ञानात्मकता तीनो अवियोजय रूप से पाए जाते हैं।“.
आस्था एक “ईररेशनल” नही बल्कि एक्स्ट्रा-रेशनल तत्व है जिस पर धर्म का अधिवह्न होता है।
प्रो० एच पी सिन्हा अपनी पुस्तक “धर्म दर्शन की रूपरेखा” में आस्था की चार विशेषताओं का उल्लेख करते हैं : एक्स्ट्रारेशनालिटी या निरबौधिक्ता, भावना केन्द्रण, श्रद्धा में आधारिता तथा इसमें मनुष्य की प्रतिबद्धता।
आस्था और धर्म के सम्बंध को आधार बनाकर ही गैलोवे धर्म को परिभाषित करते हैं।
गैलोवे के अनुसार, धर्म वह है जिसमे अपने से परे किसी शक्ति के प्रति मानव आस्था के द्वारा अपनी संवेगात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति करके जीवन मे स्थिरता प्राप्त करता है और इसे वह अपनी उपासना और सेवा में अभिव्यक्त करता है।【जी गैलोवे, द फिलोसोफी ऑफ रिलीजन पृष्ठ 184】
रुडोल्फ ऑटो ने धार्मिक अनुभूति को “सुई जेनेरिस” और “स्पोंटेनियस” कहा है और इसका विश्लेषण भी किया है।
 मनुष्य को सम्पूर्ण रूप से आच्छादित करने,  भावना, ज्ञान और क्रियात्मकता तीनो की उपस्थिति, सुई जेनेरिस एवम स्पॉनटेनियस होने के फलस्वरूप धर्म एक एक्स्ट्रा-रेशनल परिघटना है।

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