और उस कॉन्क्लेव में टकीला की शिप और सिगरेट का कश लेते हुए उस महिला कॉमरेड ने
वहां---- सुदूर उस आदिवासी इलाके में क्रांति के सब्ज बाग की मार्केटिंग के लिए अपनी इस कविता के टैग लाइन का प्रोपोजल किया जिसे बाकी कामरेडों ने अपनी अपनी पसंद के शराब की घूंट पीते हुए स्वीकार कर लिया:
'तुम सभ्य सुसंस्कृत
टकीला पिया है
माँ की छाती से तुमने
हमने माँ की छाती से आंसू
जो जम गया है हर तह में बारूद बनकर
हाँ हम आदिवासी हैं!'
बाकियों ने कहा: हाँ कॉमरेड इस कविता में बारूद है, आदिवासियों की मांए तो अभाव में आंसू पीकर ही बड़ी होती हैं, अब अपने बच्चों को तो अपनी छाती से वह आंसू ही पिलाएंगी न और बुर्जुवा लडकिया चुकि टकीला पीकर बड़ी होती हैं इसलिए उनके स्तनों से तो टकीला ही निकलेगा।
नेपथ्य से आवाज आई कामरेडायन, "तुम क्या पी रही हो" जिसे बाकी कामरेडों ने अनसुना करते हुए कहा:
---वाह कॉमरेड, वाह कॉमरेड, वाह कॉमरेड!!
"लेकिन कॉमरेड यदि उन आदिवासी इलाकों में सरकार विकास की योजनाएं लेकर पँहुचे तो?"
एक दूसरे कॉमरेड ने सवाल किया।
-इसके लिए एक अलग नैरेटिव है, साथी।
मूलता के खतरा का नैरेटिव।
और उसकी मार्केटिंग का टैग-लाइन होगा,
'राम, तेज पियोगे हमारा?
हमारी नाभी में अमृत नही है,
बारूद है, आपादमस्तक:
फट जाएगा तुम्हारे
नीलकण्ठ का कण्ठ भी',
और फिर कहीं कुछ केन बम लगवा देना है!
सारे कामरेडों ने एक साथ शराब होठो से लगाते हुए कहा: लाल सलाम कॉमरेड, क्रांति अमर रहे!!
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