दुनिया का कोई भी धर्म लीजिए और उसके सापेक्ष मार्क्सवाद को रखिए।
ईश्वर से सन्निकटता या आदिम साम्यवाद के रूप में एक महान अतीत दोनों में है। उस महान अतीत से हटकर एक ट्रब्यूलेंट वर्तमान दोनों में है: धर्मो में भी मार्क्सवाद में भी। इस ट्रब्यूलेंट वर्तमान से मुक्ति के रूप में एक महान भविष्य भी दोनों में है: धर्मो में ईश्वरीय साम्राज्य के रूप में और मार्क्सवाद में साम्यवाद की स्थापना के रूप में।
धर्मो की अपनी किताबें है साम्यवाद की अपनी बाईबल: दास कैपिटल।
धर्मो के अपने पैगम्बर है साम्यवाद के अपने।
धर्मो ने अपने तरीके से खून खराबे किए हैं मार्क्सवाद ने अपने।
पारलौकिकता को हटा दिया जाय तो मार्क्सवाद भी तो मुझे धर्म ही लगता है। एक ऐसा धर्म जिसमे परम्परागत धर्म की एक विशेषता पारलौकिकता को छोड़कर उसकी सारी विशेषताएं मौजूद हैं।
भविष्य में साम्यवाद की स्थापना होगी क्या यह कथन अफीम के नशे के बाहर का है?
आप साइंटिफिक डेटर्मीनिज़्म का हवाला देते हुए कहेंगे कि हां यह अफीम का नशा नही है बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक डेटर्मीनिज़्म है लेकिन तब से यही तो कह रहा हूँ कि आज वैज्ञानिक डेटर्मीनिज़्म की अवधारणा ही ध्वस्त हो चुकी है। अब तो हम विज्ञान के उस रूप को जान चुके हैं जहाँ समान प्रयोग समान निष्कर्ष नही देते। 17 वी शताब्दी का वैज्ञानिक डेटर्मीनिज़्म। स्वयम विज्ञान के हाथों ध्वस्त हो चुका है और मार्क्सवाद अभी तक उस वैगयानिक डितरमिनिज़्म की ही बात करता है।
बुद्ध का दुःख और मार्क्स का दुःख एक नही था। बुद्ध का दुःख तत्वमीमांसिय दुःख था। जरा-मरण का दुख उनके लिए प्रमुख था और उसके लिए उन्होंने प्रमाता के निषेध के रूप में दर्शन का लक्ष्य रखा। मार्क्स के लिए आधिदैविक या आध्यात्मिक दुःख कोई दुख ही नही क्योकि वह मानव को एक भौतिक सत्ता तक सीमित कर देते हैं, उसमे भी वह समग्र भौतिक दुःखो की बात न करके अर्थ विषयक दुख तक ही उनकी दृष्टि सीमित रही।
वस्तुतः कालांतर में दोनों दर्शन एक दिवा स्वप्न बनकर रह गए और इसीलिए बौद्ध धर्म की तरह ही मार्क्सवाद का भी पतन प्रारम्भ हो गया।
बुद्ध ने कभी भौतिक तत्व को चेतना के ऊपर प्रधानता नही दी और न ही हीनयान या महायान के किसी सम्प्रदाय ने ही। योगाचार तो जगत को चेतनसृष्ट मानता है। सम्पूर्ण भारतीय दार्शनिक वाङ्गमय में चार्वाक को छोड़ दें तो अन्यान्य सभी सम्प्रदाय भौतिकीवाद को द्वितीयक ही मानते हैं।
बुद्ध और मार्क्स की तुलना भी बेमानी है क्योंकि मार्क्स अपनी परिस्थितियों की उपज थे और बुद्ध अपने।
परलोक की कल्पना निश्चित रूप से किसी काल की कल्पना थी व्यवहार में विरला ही कोई होगा जो आज भी परलोक में विश्वाश करता होगा। आध्यत्मवादी भी प्रायः अब इहलोक की समस्याओं का हल परलोक में नही ढूंढते।
विरोध मार्क्सवाद को विज्ञान और मार्क्सवाद में इम्प्लाइड नियतिवाद को लेकर है क्योंकि आज विज्ञान का ही नियतिवाद में विश्वास ध्वस्त हो चुका है, हम प्रॉबबलिटी और केओस डायनेमिक्स की आज बात करते हैं दूसरा यह भी महत्वपूर्ण है कि इन दर्शनों के व्यवहारिक परिणाम क्या रहे। साम्यवाद क्यो पूरी दुनिया मे असफल रहा? साम्यवादी व्ययवस्था जहाँ लागू हुई वहाँ तो कम से कम साम्यवाद के प्रेडिक्शन के अनुरूप समाज स्थापित हो जाने चाहिए थे लेकिन परिणाम उसके उलट रहे। साम्यवादी सरकारें स्वयम तानाशाही बनकर उभरीं और इन सरकारों ने जमकर कत्ले आम भी किए। ब्लैक बुक ऑफ कम्युनिज्म के अनुसार साम्यवादियो ने अकेले दोनों विश्वयुद्ध में हुई हत्याओ से अधिक कत्लेआम किया।
आप लाख कोशिश करें इतिहास का उपयोग करके ऐतिहासिक गति का एक सामान्य नियम बना ही नही सकते। इतिहास अतीत की घटनाओं के अध्ययन तक तो ठीक है लेकिन इसमें प्राकृतिक विज्ञानों की प्रेडिक्टिव पावर नही होती अतः इतिहास भविष्य में ऐसा या वैसा करवट लेगा कहना मात्र दुराग्रह है।
मार्क्सवाद भी इस दुराग्रह से पीड़ित है और जब वह इतिहास के भविष्य को प्रेडिक्ट करता है तो भविष्य पुराण ही बनता है।
जी इतिहास में दो प्रोफेट मिले हैं जिन्होंने "डूम" की प्रोफेसी की है: एक का नाम यहाँ अप्रासंगिक है क्योंकि उनका उद्देश्य पारलौकिक हो जाता है। दूसरे मार्क्स हैं जो पूंजीवादी व्यवस्था के डुम की प्रोफेसी करते हैं।
पहले को भी हिंसा से कोई गुरेज नही, मार्क्स भी टेरर की बात करते हैं।
पहले वाले की तरह मार्क्स भी एक दिवास्वप्निल आदर्श: सर्वहारा का अधिनायकत्व की बात करते हैं।
बर्ट्रेंड रसेल लिखते है कि
मार्क्स को मनोवैज्ञानिक रूप से समझने के लिए निम्न शब्दकोश प्रयोग किया जाना चाहिए:
याहवा: द्वंदात्मक भौतिकवाद
मसीहा: मार्क्स
इलेक्ट: सर्वहारा
चर्च: कम्युनिस्ट पार्टी
ईसा के द्वितीय आगमन: क्रांति
नर्क: पूंजीवादियों की सज़ा
इसमें जन्नत को सर्वहारा का अधिनायकत्व के रूप में जोड़ लीजिए।
मार्क्स ज्योतिष थोड़े थे, प्रोफेसी करनेवाले प्रोफेट थे।
नजूमी सितारे पढ़ कर भविष्य बताते हैं, मार्क्स ने इतिहास पढ़ कर भविष्य बताने की कोशिश की।
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