यदि अब्राहमीय मजहबों में एकेश्वरवाद को लेकर मतिग्रस्ति है तथा ईश्वर और मनुष्य के मध्य मध्यस्थता एक आवश्यक तत्व है जिसके आधार पर जगत की विविधता को नष्ट करते हुए इन तत्वों के नाम पर कई सभ्यताओ के संहार को न्यायोचित ठहराया जाता है तो हिन्दू धर्म भी अपने सामाजिक सन्दर्भ में इन नकारात्मकताओं से अछूता नही रहा है। जहाँ रिलीजन में एकेश्वरवाद को लेकर मतिग्रस्ति है वहीं धर्म, वर्णाश्रम धर्म तथा कर्म सिद्धान्त को लेकर व्यामोहित रहा है। कर्म सिद्धान्त और वर्णाश्रम धर्म मे यह संभावना उपस्थित है कि व्यक्ति अतिशय भाग्यवादी बन जाता है तथा वर्ण जन्मना बन कर व्यक्ति और व्यक्ति के मध्य विभेद स्थापित करता है।
सामाजिक सन्दर्भ में धर्म या रिलीजन प्रायः अपनी श्रेष्ठता के दावा का करण बन कर भी उभरे हैं। रिलीजन में विस्तारवादी प्रवृति होने के कारण जहाँ इसके नाम पर अपनी श्रेष्ठता का दावा अन्य धर्मो, संस्कृतियों एवम सभ्यताओ के दमन के रूप में उपस्थित है वही धर्म मे विस्तारवादी प्रवृति की अनुपस्थिति के कारण अपनी श्रेष्ठता के दावा को अभिव्यक्त करने के लिए एक आंतरिक विभेद और अंत:मुखी विस्तारवाद उपस्थित है जिसका परिणाम समाज के एक वृहत हिस्से का अमानवीयकरण रहा है। अमानवीयकरण को कर्म सिद्धान्त द्वारा न्यायोचित ठहराना एक ऐतिहासिक यथार्थ के रूप में उपस्थित है।
Wednesday, January 22, 2020
मजहब और धर्म की मतिग्रस्तियाँ
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