एक और कविता है जो पूरी तरह याद नही:
प्रभात
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आदित्य के प्रभाव से
प्रभात है हो चला
बिखेरती प्रकृति हर्ष
हो चली है सरस्
कोंपले प्रस्फुटित हो
प्रभात संग झूमती
गाते है विहंग भी
प्रभात गान झूम कर।
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