Wednesday, January 15, 2020

शंकरो, शंकर: साक्षात




(असंपादित)

शंकर ने "अद्वैत" का भेद पा लिया था।

शंकर अपने अद्वैत के प्रचार को चले। सामने एक चांडाल था। चांडाल तो अछूत होता है, उसकी छाया भी अशुद्ध कर देती है अतः शंकर ने उसे अपने रास्ते से हट जाने को कहा।
चांडाल ने उत्तर दिया, "हे सभी वेदों, उपनिषदों के ज्ञाता, तुम किसे हटने को कह रहे हो? इस शरीर को या इस आत्मा को जो इस शरीर में निवास करती है? आपका और मेरा शरीर समान तत्व से बना है अतः क्या एक शरीर दूसरे शरीर से यह कह सकता है कि दूर हटो?

एक चांडाल शंकर को अद्वैत जीना सीखा रहा है।
दरअसल वह  चांडाल साक्षात् भगवान शंकर थे जो शंकर को अद्वैत जीना सीखा रहे थे।
शंकर का शंकर का सामना हो रहा था।
पवित्रता और अछूत की कोटियों का तिरोधान हो रहा था। अदैत कि व्यवहारिक स्थापना हो हो रही थी।
शंकर और शंकर का भेद मिट रहा था।

शंकरो शंकरः साक्षात्!

जी हां एक ऐसे कथा का सृजन हो रहा था जहाँ चांडाल भी शंकर और शंकर भी शंकर, ब्राह्मणत्व की दृष्टि की सृष्टि! 

और ब्राह्मण?
ब्राह्मण एक पद है ठीक वैसे ही जैसे बुद्ध, ठीक वैसे ही जैसे अर्हत। ब्राह्मण होना पड़ता है। ब्राह्मणत्व अर्जित करना पड़ता है। कई जन्म लेने पड़ते है तब यह पद प्राप्त होता है ।
 यह ब्राह्मणों के ह्रदय की विशालता नहीं की उन्होंने उस चांडाल को शिव पद दे दिया।
 मैं नहीं मानता की
 "ब्राह्मण का ह्रदय विशाल होता है ।"
मुझे तो लगता है कि
"जिसका ह्रदय विशाल हुवा, वह ब्राह्मण।"
तभी तो बुद्ध भी ब्राह्मण, महावीर भी ब्राह्मण, नानक भी ब्राह्मण, कबीर भी ब्राह्मण।

आप कहते है "ब्राह्मण के हृदय की विशालता"।
मित्र मुझे तो लगता है कि जिस भी ब्राह्मण ने चांडाल को शिव पद दिया  दरअसल वह पहले ब्राह्मण था ही नहीं। 
वह ब्राह्मण तो उस समय बना जिस वक्त उसने चांडाल को शिव पद दिया।

क्या ऐसा नहीं हो सकता ही "चांडाल-शंकर" का प्रसंग वास्तव में कभी घटा ही न हो?
वह बालक शंकर जो आठ वर्ष की अवस्था में अपने गुरु द्वारा यह पूछे जाने पर की तुम कौन हो, निर्वाण षट्कम में जवाब देता है और कहता है "शिवोहम शिवोहम", क्या उसको युवा होकर फिर से इस बात का ज्ञान चाहिए की शंकर ही शंकर है, चंडाल शंकर ही है?
नहीं मित्र "शंकर-चांडाल" का प्रसंग  तो एक बहाना है। रज्जु में सर्प का भ्रम है। माया है। 
तत्व तो पकड़ना होगा। माया तो भेदना होगा।
माया में उलझ जाओगे तो कभी यह ब्राह्मण हृदय की विशालता दिखेगी  कि उन्होंने चांडाल को शिव पद दे दिया, तो कभी ब्राह्मणों का अहंकार जिसके कारण वह चांडाल को चांडाल रूप में स्वीकार न कर पाए।

अब उस दिन कशी में  शंकर- चांडाल प्रसंग में ऊपरी रूप में जो घटा हो लेकिन वास्तव में एक "ब्राह्मणत्व" की घटना तो  घटी ही थी, ठीक वैसे ही जैसे बोधि वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ के साथ संबोधि की घटना घटी थी: सिद्धार्थ बुद्ध हो गए थे।
किसी ब्राह्मण का ह्रदय बूँद से सागर बना और तब वह सही मायनों में ब्राह्मण बना था। ब्राह्मणत्व की दृष्टि का जन्म हुवा था।
 विशालता की इस दृष्टि में अब कौन चांडाल और कौन शंकर? इस दृष्टि में तो शंकर भी चांडाल हैं और चांडाल भी शंकर।

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