शायद आपको पता होगा कि हिंदुस्तान से अलग होने के बाद मुस्लिमों ने अपने देश का नाम पाकिस्तान ही क्यों रखा। दरअसल पाकिस्तान नामक शब्द के जनक सियालकोट के रहने वाले मोहम्मद इकबाल उर्फ अल्लामा इकबाल थे। जो एक कश्मीरी ब्राह्मण की संतान थे।
इकबाल के दादा कन्हैयालाल सप्रू मूलतः शोपियां से कुलगाम जाने वाली सड़क पर स्थित स्प्रेण नामक गाँव के निवासी थे। कन्हैयालाल के पुत्र रतनलाल सप्रू ने एक मुस्लिम महिला इमाम बीबी से विवाह कर इस्लाम अपना लिया था और अपना नाम नूर मोहम्मद रख लिया था। गबन के आरोप के बाद से ये अपनी ससुराल सियालकोट जा बसे थे।
ये वही मुहम्मद इकबाल हैं जिन्होंने "तराना-ए-हिंद" के नाम से एक प्रसिद्ध सेक्युलर गीत "सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा" लिखा था। उस समय वो इस सामूहिक देशभक्ति गीत से अविभाजित हिंदुस्तान के लोगों को एक साथ रहने की नसीहत देते थे। इस गीत के कुछ अंश में सभी धर्मों के लोगों को "हिंदी हैं हम वतन है हिंदोस्तां हमारा" और "मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना" कहकर देशभक्ति और राष्ट्रवाद की प्रेरणा देते थे। पर इस गीत को पूरा पढेंगे तो आपको समझ आ जायेगा कि कीङा कहां कुलबुला रहा था।
देश की विडंबना है कि कुछ सेक्युलर और धर्मांध लोग इन्हें गंगा जमुनी तहजीब का सिरमौर बताते नही थकते, इनकी तारीफों के पुलिंदे बांधते नही थकते।
"है राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज,
अहले नजर उसको समझते हैं इमामे हिंद"
संक्रमित होते ही इकबाल ने अपनी एक किताब "कुल्लियाते इकबाल" में अपने बारे में कुछ इस तरह से लिखा है...
"मिरा बिनिगर कि दर हिन्दोस्तां दीगर नमी बिनी,
बिरहमन जादए रम्ज आशनाए रूम औ तबरेज अस्त"
अथार्त मुझे देखो मेरे जैसा हिंदुस्तान में दूसरा कोई नहीं होगा, क्योंकि मैं एक ब्राह्मण की औलाद हूँ लेकिन मौलाना रूम और मौलाना तबरेज से प्रभावित होकर मुसलमान बन गया।
कालांतर में यही इकबाल मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बने और साथ ही पाकिस्तान के जनक भी। 1920 में ब्रिटिशर्स ने इन्हें नाईटहुड की पदवी से भी अलंकृत किया था। पंजाब, उत्तर पश्चिम फ्रंटियर प्रांत, सिंध और बलूचिस्तान को मिलाकर एक राज्य बनाने की अपील करने वाले वह प्रथम व्यक्ति थे। सन 1930, इलाहाबाद में मुस्लिम लीग द्वारा प्रायोजित लीग के 21वें सत्र में खिलाफत मूवमेंट के समय उन्होंने कहा था...
"हो जाए अगर शाहे खुरासा का इशारा,
सिजदा ना करूं हिंदोस्तां की नापाक जमीन पर"
अथार्त यदि तुर्की का खलीफा (अब्दुल हमीद, जिसको ब्रिटिशर्स ने 1920 में गद्दी से उतार दिया था) इशारा कर दे, तो मैं इस नापाक हिंदुस्तान पर कभी नमाज अदा नहीं करूंगा। बाद में इसी "नापाक" शब्द का विपरीत शब्द "पाक" लेकर पाकिस्तान का निर्माण हुआ, जिसका शाब्दिक अर्थ है मुसलमानों के लिए पवित्र देश।
हिंदुस्तान के विभाजन के बाद इकबाल ने सभी इस्लामिक राष्ट्रों को श्रद्धांजलि देते हुए "तराना-ए-मिल्ली" नामक गीत लिखा और कहा कि इस्लाम में राष्ट्रवाद का समर्थन नहीं किया गया है। उन्होंने दुनिया में कहीं भी रह रहे मुसलमानों को एक ही राष्ट्र के हिस्से के रूप में मान्यता दी, जिसका नेता मोहम्मद है जोकि मुसलमानों का पैगंबर है। इस गीत के बोल थे...
"चीन औ अरब हमारा, हिंदोस्तां हमारा,
मुस्लिम है हम वतन हैं, सारा जहां हमारा"
अब इस सारी कहानी में समझने की बात यह है कि जब एक कश्मीरी ब्राह्मण की, संक्रमित होने के बाद अपने देश और अपनी मातृभूमि के बारे में सोच इतनी जहरीली हो सकती है तो आज हिंदुओं की उदासीनता और अज्ञानता के चलते जो भी धर्मपरिवर्तन हो रहे हैं, उसका परिणाम कितना भयंकर होगा..??
समय की मांग है कि अब इन मनहूस सेक्युलर लोगों के मिथक को पहचाने। ध्यान रहे, अगर धर्म नहीं रहेगा तो देश भी नहीं रहेगा, क्योंकि देश और धर्म का अटूट संबंध है। जिस तरह धर्म के लिए देश की आवश्यकता है ठीक उसी तरह देश की एकता के लिए भी धर्म की आवश्यकता होती है। जाति और क्षेत्रवाद का भेद भूल कर कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और कच्छ से लेकर असम तक सभी को एक ही होना होगा। सनद रहे कि कल तक सिंधु नदी के किनारे व कंबोडिया तक परचम लहराने वाले हम दरकते दरकते आज कहां खड़े है..?? हम जो हर धर्म का हर फिरके का हर मजहब का सम्मान करते है, इसका अर्थ यह नही कि अपने पुरखो का धर्म और संस्कार भूल जाये। हम किसी को न बदलना चाहते, न जीतना चाहते न हमारी ख्वाहिश दुनिया पर हिंदू धर्म कायम करने की है पर खुद को बचाना तो जरूरी है।
धर्मो रक्षति रक्षित:
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अभी हाल ही में मीडिया और सोशल मीडिया में जमकर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के द्वारा लिखी नज्म, "हम देखेंगे लाज़िम है" को लेकर द्वंद छिड़ा हुआ है। कोई उन्हें वामपंथी बता रहा है, तो कोई वतनपरस्त, तो कोई उनकी शान में कसीदे पढ़ रहा है, तो कोई कह रहा है कि पाकिस्तान के कट्टर इस्लामिक राष्ट्रपति और सेना के जनरल ज़ियाउल हक़ जब पाकिस्तान को पूरी तरह से कट्टर इस्लामिक राष्ट्र बनाने की धुन सवार थी तो उस वक़्त शायर फैज़ अहमद फैज़ से लेकर तमाम ऐसे लोग विरोध में उतरे, ये सब लोग जेलों में ठूंसे जा रहे थे, क्योंकि ये अपने यहाँ मुल्लाओं के धार्मिक राज और अल्पसंख्यकों के अधिकार को लेकर मुखर हो रहे थे।
कोई कह रहा है कि उनके द्वारा लिखी गई वह नज्म विशेषतः मज़लूमो के लिए थी। खैर लिखी तो लिखी। पर यह भी स्पष्ट जान ले कि भारत देश पर जियाउल हक की तरह किसी फौजी तानाशाह का शासन नही है। अपितु लोकतांत्रिक तौर पर चुनी हुई सरकार है, जिसे हम समस्त भारतीयों ने मताधिकार से चुना है। लिहाजा जियाउल हक और वर्तमान भारतीय सरकार की तुलना से असहमत हूँ।
फैज एक शायर, एक वामपंथी होने से पहले एक कट्टर मुस्लिम थे।
हम देखेगे लाज़िम है, नामक फ़ैज की नज्म को कुछ लोग एक सेक्युलर नज्म बता कर इति-सिद्धम करने में लगे हैं कि जैसे अल्लामा इक़बाल द्वारा लिखी "हिंदी हैं हम वतन, हिन्दोस्तां हमारा" को बताते है बिना मतलब समझे।
फ़ैज़ द्वारा लिखी एक अन्य नज्म पर प्रकाश डालते हैं जो उन्होंने "ग़ुब्बारे अय्याम" नामक तराना में लिखी थी, जिसका पहला तराना "मुजाहिदीने फिलिस्तीन" के लिए है।
हम जीतेंगे, हक़्क़ा हम इक दिन जीतेंगे
बिल आखिर इक दिन जीतेंगे
है सीना सिपर हर ग़ाज़ी का
क्या खौफ़ युरिशे जैशे क़ज़ा
सफबस्ता हैं अरवाहुल शुहदा
दर काहे का ?
क़द जा अल्हक़्क़ो ज़हक अलबातिल
फरमूदा रब्बे अकबर
है जन्नत अपने पाओं तले
और रहमत अपने सर पर है
फिर क्या डर है ?
अल्लामा इक़बाल द्वारा लिखी गई एक ओर नज्म पर भी प्रकाश डालने की कोशिश करते हैं।
तू ही कह दे कि उखाड़ा दरे-खैबर किसने ?
शहर कैसर का जो था किया सर किसने ?
तोड़े मख़लूके-खुदावंद के पैकर किसने ?
काटकर रख दिए कुफ्फार के लश्कर किसने ?
किसने ठंडा किया आतशकद-ए-ईरां को ?
किसने फिर ज़िंदा किया तज्जिकरे- यज़दां को ?
तुझको छोड़ा कि रसूले-अरबी को छोड़ा ?
बुतगरी पेशा किया ? बुतशिकनी को छोड़ा ?
मुश्किलें उम्मते मरहूम की आसां कर दे ?
हिंद के दैर-नशीनों को मुसलमां कर दे ?
हिंदी तरजुमा
खुदा के अरबी संदेशवाहक (रसूल मुहम्मद) के नाम पर पूरी दुनियां में दूसरे मज़हबों, और उसे मानने वालों को मिटाने के लिए मुसलमानों ने खूनी ताकत का इस्तेमाल किया। यूरोप में सीजर का शहर उजाड़ा, अफ्रीका एशिया में देवी-देवताओं के असंख्य मंदिर-मूर्तियां तोड़ी। ईरान में में पारसियों की पवित्र आग बुझा डाली। मंदिरों की टूटी मूर्तियों के सिर गिरकर, डरकर, अल्लाह की सत्ता स्वीकारते थे। किसकी हैबत से सनम सहमे हुए रहते थे? मुंह के बल गिरके हुवल्ला-हो-अहद कहते थे। इस तरह एक अरबी अल्लाह के मज़हब, इस्लाम को सब जगह स्थापित किया
फैज कम्युनिस्ट और घोषित नास्तिक होते हुए भी और अल्लामा इक़बाल हिंदुस्तानपरस्त (मात्र दिखावा) होते हुए भी मुस्लिम सर्वोच्चता के लिए लिखते रहे और आप सेकुलर बनने के लिए हिंदू होकर भारत माता से, श्रीराम से, राष्ट्रवाद से मुंह छिपाते हो।
ये है असली चरित्र फ़ैज और इकबाल का। ये दोनो गजवा ए जहान का सपना देखते दुनिया से रवाना हुये।
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