Monday, January 20, 2020

Ish Mishra सर द्वारा. ( पाठ 1 से 10 )


पाठ 1

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद 1

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को मार्क्सवाद का दर्शन कहा जाता है जिसका मार्क्सवाद के विज्ञान, ऐतिहासिक भौतिकवाद के साथ पारस्परिक पूरकता और पुष्टि के संबंध है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का एक नियम है कि प्रकृति की संरचना द्वंद्वात्मक है तथा उसकी गति वस्तु तथा विचार की द्वंद्वात्मक एकता से संचालित होती है। इस द्वंद्वात्मक युग्म में प्राथमिकता वस्तु की होती है। वस्तु से विचार पैदा होता है, विचार से वस्तु नहीं। वस्तु विचार के बिना रह सकती है तथा ऐतिहासिक रूप से विचार की उत्पत्ति वस्तु से होती है। 

इब्ने इंशा ने ‘उर्दू की आखिरी किताब’ में लिखा है कि न्यूटन ने सेब तोड़ने के लिए गुरुत्वाकर्षण नियम का आविष्कार किया। अच्छा, स्वस्थ, व्यंग्य लिखना सबके बस की नहीं है। इब्ने इंशा शायरी भी व्यंग्य में ही करते हैं, “हक अच्छा पर हक के लिए कोई और लड़े तो और अच्छा” पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह, जियाउल को जनता को उनका यह नेक संदेश खतरनाक लगा। हर फासीवादी या तानाशाह विचारों से डरता है, खासकर उनकी व्यंग्य या कार्टून में अभिव्यक्ति से। वह नरपिशाच इतना घबरा गया कि इब्ने इंशा में जेल में ठूंस दिया, करो अब शायरी। शायरी तो वे तब भी करते रहे, लेकिन जेल की तकलीफों ने ज़िंदगी कम कर दी। ‘राष्ट्रवाद’ के रहस्य उजागर करने के राष्ट्र-द्रोह में हबीब जालिब का भी वही हश्र हुआ। वे लोगों से कह रहे थे, “हिंदुस्तान भी मेरा है, पाकिस्तान भी मेरा है/दोनों ही देशों में लेकिन अमरीका का डेरा है” ; “न मेरा घर है खतरे में न तेरा घर है खतरे में/ वतन को कुछ नहीं खतरा, निजाम-ए-जर है खतरे में”; और तो और, “गर फिरंगी का दरवान होता..................... वल्लाह, सदर-ए-पाकिस्तान होता”। टेक्स्ट के बीच में लंबे फुट के लिए मॉफी।

न्यूटन के नाम पर इब्ने इंशा याद आ गए, जिया का डर बेबुनियाद नहीं था। अरे भाई सेब तो अनादि काल से गिरते रहे हैं। सेब के गिरने की भौतिक घटना (वस्तु) को गिरते देख न्यूटन के दिमाग में सवाल आया क्यों? और वे वस्तुओं के ऊर्ध्वाधर पतन के कारणों की खोज में लग गए। तमाम प्रयोगों के जरिए उन्होंने गुरुत्वाकर्षण के नियमों का आविष्कार किया, जिससे हम किसी भी निश्चित मात्रा की किसी ऊंचाई से गिरने के किसी भी विंदु पर उसके वेग, त्वरण, गतिज ऊर्जा तथा तद्जनित बल की बिल्कुल सही सही गणना कर सकते हैं। न्यूटन के नियमों के पहले सेब गिरने की भौतिक घटना (वस्तु) की व्याख्या में महज क्या? सवाल का जवाब दे सकते थे, क्यों?; कैसे?; और कितना? का नहीं। यह अपूर्ण यथार्थ था, न्यूटन के नियमों ने उसे संपूर्णता प्रदान की। दूसरे शब्दों में कहें तो यथार्थ वस्तु और विचार का मिलन है, जिसे मार्क्सवादी शब्दावली में, द्व्वंद्वात्मक एकता कहते हैं। विचार और वस्तु एक दूसरे के पूरक हैं।

थेसेस ऑन फॉयरबाक में मार्क्स लिखते हैं, चेतना भौतिक परिस्थितियों का परिणाम है और बदली हुई चेतना बदली हुई परिस्थितियों की। लेकिन न्यूटन के गति के नियम के अनुसार बिना वाह्य बल के कोई वस्तु हिलती भी नहीं। भौतिक परिस्थितियां आपने आप नहीं बल्कि मनुष्य के चैतन्य प्रयास से बदलती हैं। अतः इतिहास की गति का निर्धारण भौतिक परिस्थितियों और सामाजिक चेतना की द्वंद्वात्मक एकता से होता है, किसी ईश्वर, पैगंबर, अवतार की इच्छा या कृपा-दुष्कृपा से नहीं।

मनुष्य ईश्वर की रचना नहीं है, ईश्वर मनुष्य की रचना है। विकास के हर चरण में मनुष्य अपनी खास ऐतिहासिक परिस्थितियों, खास ऐतिहासिक जरूरतों के हिसाब से अपने शब्द; मुहावरे; कहावतें; किंवदंदियां; उपमा-अलंकार; अतिशयोक्तियां अफवाहें; धर्म और ईश्वर की अवधारणाओं की रचना करता है। चूंकि ईश्वर की अवधारणा मनुष्य-निर्मित, ऐतिहासिक अवधारणा है, इसीलिए देश-काल के परिवर्न के साथ इसका स्वरूप बदल जाता है। पहले ईश्वर गरीब और असहाय की मदद करता था अब उसकी करता है जो खुद अपनी मदद कर सके। (सामाजिक डार्विनवाद)।

....... जारी

26.02.2017

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विद्रोह रचनाशीलता की शर्त है; संघर्ष निर्माण का फर्ज है

पाठ 2

मार्क्सवाद क्या है? 2

स्वतंत्रा और मार्क्सवाद 1

पूर्वकथ्य:

पहली क्लास में प्रतिक्रियाओं, सवालों और बहस से प्रोत्साहित हो मुझे लगा कि क्लास ज्यादा नियमित होनी चाहिए। इस पोस्ट पर कुछ लंबे उत्तर मैं अलग से पोस्ट कर देता हूं, उसे भी क्लास का हिस्सा माना जाए। मैं गदगद हूं। विषय पर आने के पहले बता दूं मैं क्यों गदगद हूं? इसका जवाब मैं एक अनुभव से देता हूं। वैसे टेक्स्ट के पहले फुटनोट नहीं होना चाहिए, फिर भी। 1990 के दशक के अंतिम सालों की बात है। मैं मयूरविहार में रहता था, मोटरसाइकिल से चलता था। 9 बजे से एमए की एक क्लास थी जो हफ्ते में 2 ही दिन होती थी। रास्ते में बारिस शुरू हो गयी, रास्ते में कई जगह रुकने की गुंजाइश थी लेकिन समय नहीं था। वैसे भी चोट लगने वाली धार की बारिस न हो तो बाइक में कोई कष्ट नहीं होता। उम्मीद के प्रतिकूल क्लास खचाखच भरी देख बहुत प्रसन्नता हुई रूसो और उपयोगिता वादियों की प्रसन्नता की तुलनात्मक अवधारणाओं पर क्लास थी। पंखे के नीचे शर्ट सूखती रही, पढ़ाने में मजा आता रहा। कुछ करने में आपको मजा आने लगे तो समझिए काम अच्छा हो रहा है। मैंने क्लास के अंत में उन्हें बताया कि यही फर्क है स्व के न्यायबोध को स्व के स्वार्थबोध पर तरजीह देने की प्रसन्नता की रूसोवादी अवधारणा में और खाओ-पिओ-मस्त रहो की उपयोगितावादी अवधारणा में। एक शिक्षक के स्व का न्यायबोध बोधगम्य भाषा में विद्यार्थियों को समझाना और पढ़ने को प्ररित करना। इलाहाबाद के प्रयागराज प्रोफेसरों को क्लास न लेने में सुख मिलता है, यह सुख उपयोगितावादी है। मैं अगर सोफर ड्रिवेन बीयमडब्लू में आता और क्लास खाली या आधी मिलती तो शायद, सुख की जगह दुख मिलता। द्वंद्वात्म भौतिकवाद पर अगली क्लास की तैयारी जब तक करूं, सोचा 2012 में मार्क्सवाद और आजादी के अंतर्विरोध के सवाल के जवाब के रूप में छ साल पहले का लेक्चर दे दूं। मार्क्सवाद और आजादी एक अहम विषय है, इसलिए इस पर अलग से 4-5 क्लासेज की जरूरत पड़ेगी। तब तक कॉपी-पेस्ट: 

मार्क्सवाद व्यक्तिगत आज़ादी का विरोधी नहीं, सभी की वास्तविक व्यक्तिगत आज़ादी का घोर हिमायती होने के ही चलते उदारवादी आज़ादी के भ्रम को तोड़ता है क्योंकि व्यक्ति के स्वायत्त अस्तित्व की अवधारणा एक भ्रम है, कोई भी व्यक्ति गुलाम या मालिक व्यक्ति के रूप मे नहीं बल्कि समाज में, समाज के द्वारा, समाज के स्थापित संबंधों के तहत, समाज के अभिन्न रूप के रूप में वह गुलाम या आज़ाद होता है. व्यक्ति सदा स्वार्थपरक होकर निजी इच्छाओं की पूर्ति को ही जीवन का उद्देश्य मनाता है, यह भी एक पूंजीवादी विचारधारात्मक दुष्प्रचार है. यह आज़ादी औरों से सहयोग की नहीं अलगाव की, दूसरों की आज़ादी की बेपरवाही की, बेरोक-टोक लूट और संचय की अजादी है. सवाल उठाता है क्या किसी परतंत्र समाज में कोई निजी रूप स स्वंतत्र हो सकता है? निजी स्वंत्रता समाज की स्वतंत्रता से जुड़ी है. आज़ाद होना चाहते हैं तो समाज को आज़ाद करें. मेरे विचार से मार्क्सवाद का मूल मंत्र है कि आज़ाद होना चाहते हो तो आज़ाद समाज का निर्माण करो, व्यक्तिगत आज़ादी सामाजिक आजादी का अंग है। 

“किसी भी समाज में श्रमशक्ति और रचनाशीलता को लूटना और खसोटना कह के” मैंने कभी नहीं संबोधित किया. बल्कि सारी समस्ययायें और एलीनेसन श्रमशक्ति और रचनाशीलता पर स्वाधिकार के क्षरण से होता है. श्रमशक्ति के फल पर और अंततः श्रमशक्ति पर खरीददार –पूंजीपति का अधिकार होता है. कोई भी श्रमिक कितना भी अधिक वेतन पाता हो संचय नहीं कर सकता, संचय के भ्रम में रहता है, संचय तो सिर्फ पूंजीपति ही कर सकता है. श्रम-शक्ति को उपभोक्ता सामग्री के दर्जे से मुक्ति दिलाना और उसे रचनाशीलता के रूप मे सम्मानित करना मार्क्सवाद का मकसद है. जी हाँ स्वायत्त अस्तित्व की धारणा विशुद्ध भ्रम है. ऐतिहासिक विकास के दौरान मनुष्य अन्य मनुष्यों के साथ अपनी इच्छा से स्वतन्त्र सम्बन्ध स्थापित करता है. मार्क्सवाद मनुष्य के behavioral aspect को नकारता नहीं बल्कि चेतना के रूप में उसकी वैज्ञानिक व्याख्या करता है. ऐतिहासिक भौतिकवाद, जिसे मार्क्सवाद का विज्ञान कहा जाता है, निरंतर शोध और अन्वेषण के जरये तथ्यों-तर्कों पर आधारित प्रमाणित और सत्यापित किए जा सकने वाले प्रमेयों का समुच्चय है. सत्य किसी पूर्वाग्रह/पोंगापंथ/ईश्वर की इच्छा या मार्क्स के वक्तव्य पर नहीं आधारित है, सत्य वही जो प्रमाणित किया जा सके. विकास के हर चरण की भौतिक परिस्थियां और तदनुसार समाजीकरण के अनुसार मानव चेतना का निर्माण होता है और बदली चेतना बदली भौतिक परिस्थियों का परिणाम है. लेकिन परिस्थियां स्वयं नहीं बल्कि सचेत मानव प्रयास से बदलती हैं. अतः सत्य भौतिक स्थितियों एवं चेतना का द्वंदात्मक संश्लेषण है.

28.02.2012

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संघर्ष और निर्माण

विषय: मार्क्सवाद क्या है?

पाठ 3

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद 2

 द्वद्वात्मक भौतिकवाद पर पहले पाठ के कुछ सवालों के जवाब अगली क्लास के लिए छोड़  दिया था, यह पाठ उन्ही सवालों से शुरू करता हूं। एक मित्र ने पूछा जड़ वस्तु से विचार कैसे पैदा हो सकता है? 

 पाठ 1 में बताया गया था कि विचार हवा से नहीं आते भौतिक वस्तुओं के इंद्रियबोध पर चिंतन से। इमा (मेरी छोटी बेटी), बहुत छोटी थी (3 साल के कम), जिद कर बैठी की उसे फल खाना है। जो भी फल तो “अमरूद नहीं फल”; अंगूर नहीं फल” ........ बड़ी समस्या? मैं उसे लेकर फल लेने निकल पड़ा। एक ठेले पर रसभरी बेचने वाला दिख गया, उसने शायद रसभरी खाया नहीं होगा। मैंने कहा भाई यह एक “झोंपा फल दे दो”, और फल खाकर वह चुप हो गई। अगर रसभरी के बारे में अंगूर की तरह जानती होती, तो मैं क्या खिलाता? फल नाम की कोई ठोस वस्तु तो होती नहीं। फल वस्तु नहीं बल्कि वस्तु का अमूर्त विचार है। अगर आम, अमरूद जैसी विशिष्ट समानधर्मा वस्तुओं का विचार है। यानि सार्वभौमिक, अमूर्त विचार एक खास तरह की विशिष्ट वस्तुओं का सामान्यीकरण (जनरलाइजेसन) है। विशिष्ट से सामान्य की व्युत्पत्ति को आगमात्मक (इंडक्टिव) और सामान्य से विशिष्ट की व्युत्पत्ति को सिद्धांत की निगमात्मक पद्धति कहते हैं। (यह सामान्य जानकारी जानकारों के लिए नहीं है।) यह उदाहरण मैं प्लेटो के विचारलोक का सिद्धांत पढ़ाते समय देता हूं। इमा उसका अब रॉयल्टी मांगती है, मैं उसकी नाजायज मांग मानता नहीं यह अलग बात है। 

पिछले दोनों पाठों में मार्क्स के ‘थेसेस ऑन फॉयरबाक’ के हवाले से बताया गया है कि यथार्थ वस्तु और विचार की द्वंदवात्मक एकता है। इस द्वंद्व को भी न्यूटन के गति के सिद्धांतों से समझा जा सकता है। गति का न्यूटन का दूसरा (शायद, फीजिक्स की किताब छुए 44 साल हो गए) नियम है कि स्थिर वस्तु को गतिमान बनाने के लिए या गतिमान वस्तु को रोकने के लिए वाह्य बल की जरूरत होती है। वस्तु का विचार अस्तित्व में आने के बाद वाह्य बल बन जाता है और इतिहास और वस्तु तथा विचार के निरंतर द्वंद्व से इतिहास आगे बढ़ता है। लते हैं – प्रगतिशील और प्रतिगामी। इतिहास की गाड़ी में रिवर्स गीयर नहीं होता, लेकिन खतरनाक अस्थाई यू टर्न्स आ सकते हैं। लेकिन इतिहास अंततः आगे ही बढ़ता है, पाषाणयुग से साईबर युग तक मानव विकास की यात्रा इसका चश्मदीद गवाह है। 

 गति के न्यूटन के  तीसरे सिद्धांत के अनुसार, हर क्रिया की विपरीत प्रतिक्रिया होती है। प्रतिक्रिया वस्तु की यथास्थिति में बने रहने की जड़ता की होती है, यानि वस्तु के आंतरिक प्रतिरोध की। यथास्थिति की जड़ता की प्रतिक्रिया से अधिक विचारों के प्रगतिशील वाह्य बल लगते हैं तो इतिहास आगे बढ़ता है, वरना अस्थाई जड़ता में जकड़ जाता है। विचार तो अमूर्त है, उसकी मूर्त अभिव्यक्ति मानव के चैतन्य प्रयास में होती है। लौकिक यथास्थिति वस्तु है जिससे निकले विचार वस्तु को बदलने का प्रयास करते हैं। यथास्थिति (वस्तु) से बरकरार रखने  में विशेषाधिकार प्राप्त तत्वों के निहित स्वार्थ जुड़ जाते हैं क्योंकि उन्हें अपने विशेषाधिकार किसी-न-किसी तर्क से समुचित लगते हैं जो इसे बदलने के चैतन्य मानव प्रयासों का विरोध करेंगे। इसी क्रिया-प्रतिक्रिया में उतार चढ़ाव के साथ इतिहास आगे बढ़ता है। मसलन विश्वविद्यालय व्यवस्था प्रोफेसरों की आजीविका का साधन है, इसमें बदलाव का वे विरोध करेंगे। आइए एक और परिचित उदाहरण लेते हैं। हिंदू शब्द ऊंची-नीची जातियों के एक समुच्चय की अभिव्यक्ति है। जातिवाद (यथास्थिति – वस्तु) से विशेषाधिकार प्राप्त जातियों के निहित स्वार्थ जुड़े हैं, वे इसे बरकरार रखने की कोशिस करेंगे और इसकी विसंगतियों से अवगत जातियां और लोग इसे बदलने की। हमारे छात्र जीवन से अब तक क्रिया-प्रतिक्रिया की यह यात्रा यहां तक पहुंची है कि जहां दलित को अछूत माना जाता था वहां कोई सार्वजनिक मंच से नहीं कह सकता कि वह जात-पांत में विश्वास करता है कितना बड़ा जातिवादी क्यों न हो। वही हाल पित्रिसत्तात्मकता (मर्दवाद) का है। हमारे छात्रजीवन में लोग लड़कों को पढ़ने बार भेजते थे लड़कियों को नहीं। मैंने पहले पाठ के एक सवाल के जवाब में मैंने बताया था कि मुझे अपनी बहन को पढ़ाने के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ी थी। लड़की ज्यादा पढ़कर क्या करेगी? कलेक्टरी थोड़े ही करानी है आदि-आदि। लड़कियों की आजादी को लेकर लोगों के दिमाग में एक अजीब अमूर्त भय था (आज भी है)। लेकिन जेंडर समानता के विचार, लड़कों के समान लड़कियों के शिक्षा के अधिकार के विचार और पितृसत्तामक सामाजिक ढांचे के द्वंद्वात्मक क्रिया-प्रतिक्रिया के फलस्वरूप आज किसी का साहस नहीं है कि कहे वह बेटा-बेटी में फर्क करता है। एक बेटे के लिए 5 बेटियां भले पैदा कर ले। यह स्त्रीवाद की सैद्धांतिक विजय है। 

उपरोक्त परिचित मिशालों से द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के दो नियम निकलते हैं। पहला, परिवर्तन प्रकृति का स्थाईभाव है। निरंतर, क्रमिक मात्रात्मक परिवर्तन एक अवस्था के बाद क्रांतिकारी, गुणात्मक परिवर्तन की तरफ बढ़ते हैं। मार्क्सवादी शब्दावली में व्यवस्था के अंतर्विरोध परिपक्व हो जाते हैं और क्रांतिकारी गुणात्मक परिवर्तन का पथ प्रशस्त करते हैं। वैसे तो कोई भी परिवर्तन विशुद्ध मात्रात्मक नहीं होता।  स्त्री प्रज्ञा और दावेदारी; दलित प्रज्ञा और दावेदारी का उफान क्रमिक, मात्रात्मक परिवर्तन के ज्वलंत उदाहरण हैं। क्रांति कारी गुणात्मक परिवर्तन तो क्रमशः मर्दवाद और जातिवाद से विनाश के बाद ही होगा। 

आज की क्लास बहुत लंबी हो गयी। मॉफी चाहता हूं। ऊपर जिक्र कर ही दिया तो दूसरे नियम का परिचय दे दूं, विस्तृत चर्चा अगली क्लास में। यह वाद-प्रतिवाद-संवाद (थेसिस-एंटीथेसिस-सिंथेसिस) का चर्चित नियम है। दो विपरीतों के निषेध तीसरा तत्व पैदा होता हैं जो दोनों से भिन्न होता है लेकिन दोनों के तत्व इसमें होते हैं। इसे केमिस्ट्री के हाइड्रोक्लोरिक एसिड (एसिटिक) और सोडयम हाइड्राक्साइड की रासायनिक क्रिया के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है।
HCl + NaOH=NaCl+H2O
दो विपरीत रासायनिक गुणों वाले तत्व पारस्परिक निषेध की क्रिया से तीसरे बिल्कुल भिन्न तत्व पैदा करते हैं। शरीर को हानिकरक दो विपरीत तत्वों की द्वंद्वात्क एकता से तीसरा तत्व बना जो जीवन के लिए अनिवार्य है। 

हेगेल और मार्क्स के बारे में एक अच्छा सवाल एक साथी ने पूछा है, उसका जवाब अगली क्लास में, दर-असल तभी क्लास शुरू होगी परिभाषा के साथ, समाज-विज्ञान में परिभाषा अनिवार्य है। वैसे क्लास भूमिका (ओरियंटेसन लेक्चर) से छोटा भी हो सकता है। 

वर्चुअल दुनिया का यह क्लास लंबा हो गया, अब वास्तविक दुनिया के क्लास की तैयारी कर लूं। पहली स्त्री दार्शनिक, मेरी वॉलस्टोनक्रॉफ्ट (1759-1797) के सेक्स और नैतिकता पर विचार पढ़ाना है। मैंने वॉलस्टोनक्रॉफ्ट की जीवनी पर अपना एक लेख (अंग्रेजी में) शेयर किया था, फिर कर दूंगा, यदि कोई साथी हिंदी अनुवाद का समय निकाल सकें तो आभारी रहूंगा।

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संघर्ष और निर्माण
विषय: मार्क्सवाद 
पाठ  7             

पेरिस की सर्वहारा क्रांति (1871) की 
147वीं सालगरह पर

कई दिनों से पाठशाला में औपचारिक क्सास नहीं हुई। ऐतिहासिक और द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की जारी चर्चा को मुल्तवी करते हुए, आज का लंबा लेक्चर, पेरिस कम्यून पर। आज के दिन, 18 मार्च 1871 को पेरिस के मजदूरों ने, विश्व गणतंत्र के नारे के साथ सर्वहारा के स्वशासन की स्थापना की जो सर्वहारा की तानाशाही का पहला प्रयोग था। 

पेरिस कम्यून
सर्वहारा की तानाशाही की पहली मिशाल
ईश मिश्र
 आज के दिन, 18 मार्च, 1871, पेरिस के मजदूरों की सशस्त्र क्रांति के बाद सर्वहारा के जनतांत्रिक स्वशासन, पेरिस कम्यून की स्थापना से दुनिया भर की पूंजीवादी ताकतें सकते में आ गयी तथा सनातनी राष्ट्रीय बैर भूल कम्यून के बर्बर दमन में एक हो गए। कम्यून का भी मकसद विश्व गणतंत्र का था। इतिहास की पहली सफल सर्वहारा क्रांति के बाद, पूंजीवादी राज्य मशीनरी को ध्वस्त कर स्थापित सर्वहारा राज्य की पहले पहली मिशाल, पेरिस कम्यून पर क्रांति के भागीदारों और समकालीनों से लेकर आज तक  बहुत लिखा जा चुका है। मार्क्स ने  इंटरनेसनल की जनरल कौंसिल की तरफ से जारी फ्रांस में गृहयुद्ध (सिविल वार न फ्रांस) में इसकी सटीक और विस्तृत, वैज्ञानिक व्याख्या और समीक्षा है। फिर भी कम्यून की संक्षिप्त चर्चा के बिना, बात अधूरी रह जाएगी। कुछ इतिहासकारों ने इसे रूसो के सामूहिक इच्छा (जनरल विल) के सिद्धांत के औद्योगिक युग में रूपांतरण बताया तो कुछ ने वास्तविक सहभागी जनतंत्र की मिशाल। बकूनिन और अनके अराजक अनुयायियों ने इसे राज्यविहीन अराजक समाज के अभियान के कदम के रूप में देखा और एंगेल्स ने सर्वहारा की तानाशाही की जीवंत मिशाल के। कम्यून के ज्यादातर नेता इंटरनेसनल के सदस्य थे, जिनमें ब्लांकी और प्रूदों के अनुयायियों की संख्या काफी थी। जो भी हो पेरिस कम्यून मजदूरों की की पीढ़ियों के लिए मजदूर क्रांति का संदर्भ-बिंदु और प्रेरणा श्रोत बना हुआ है।

 क्रांति पर मार्क्स के विचारों को समझने के दो प्रमुख श्रोत हैं – कम्यनिस्ट घोषणा पश्र और फ्रांस में गृह युद्ध। घोषणा पत्र 1848 की क्रांति के पहले लिखा गया था और भविष्य के अनुमानित वर्गसंघर्ष की रूपरेखा पेश करता है। घोषणापत्र के आक्रामक तेवर की जगह फ्रांस में गृह युद्ध में दो क्रांतियों के अनुभव की परिपक्ता है। यह तब लिखा गया जब वर्ग-संघर्ष का विकास इस स्तर हो चुका था कि इसने कम्यून की एक नई अवधारणा को जन्म दिया। न तो किसी यूटोपियन समाजवादी ने, न ही भौतिकवादी मार्क्स और एंगेल्स ने ही इसकी कल्पना की थी। र्मार्क्स और एंगेल्स 1872 में कम्युनिस्ट घोषणापत्र के नए संस्करण की भूमिका में इस बात का संज्ञान लेते हुए स्वीकार करते हैं, “1848 के बाद पूंजीवाद के विकास की विराटता और परिणामस्वरूप मजदूर वर्ग के बेहतर और विस्तारित संगठनों के परिदृश्य तथा फरवरी क्रांति और खासकर पेरिस कम्यून के अनुभवों को देखते हुए जिसमें सर्वहारा पूरे दो महीने सत्ता पर अधिकार बरकरार रहा; कुछ मायनों में यह (घोषणापत्र का) पुरातन पड़ गया है। कम्यून ने एक बात खास तौर पर साबित किया कि मजदूर वर्ग पहले से मौजूद राज्यतंत्र पर कब्जा करके उसका उपयोग अपने उद्देश्य नहीं कर सकता”। राज्यतंत्र को विघटित करना ही पड़ेगा। इस बात को 1971 मे जनरल कौंसिल के अपने दो संबोधनों तथा फ्रांस में गृहयुद्ध में मार्क्स ने और भी स्पष्ट किया है। इसीलिए मार्क्सवाद कोई स्थिर विचारधारा नहीं, दुनिया को समझने-बदलने का गतिमान विज्ञान है। 20 साल बाद 1891 में फ्रांस में गृह युद्ध के नए संस्करण की भूमिका में एंगेल्स लिखते हैं, “हाल के दिनों में कई टुटपुजिया सामाजिक जनतंत्रवादी, सर्वहारा की तानाशाही जैसे शब्दों का हौव्वा खड़ा करने में लगे हैं। ठीक है आप जानना चाहते हैं कि सर्वहारा की तानाशाही कैसी होती है? पेरिस कम्यून देखिए, वह सर्वहारा की तानाशाही थी”।

कम्यून के इतिहास, मार्क्स और एंगेल्स तथा अराजकतावादी एवं उदारवादी बुद्धिजीवियों की इसकी व्याख्याओं की व्यापक समीक्षा की यहां गुंजाइश नहीं है, लेकिन कम्यून के उदय की पृष्ठभूमि; मजदूरों की सशस्त्र क्रांति; मार्क्स के कम्यून नेताओं के नाम संदेश; कम्यून की गलतियों और अमानवीय बर्बरता से दमन पर एक सरसरी निगाह डालना लाजमी है। सोवियत संघ के प्रोग्रेस प्रकाशन से प्रकाशित पेरिस कम्यून (1971) में संकलित  1870 में फ्रांस-जर्मनी (प्रैंको-प्रसियन) युद्ध पर इंटरनेसनल में मार्क्स के संबोधन; जनरल कौंसिल द्वारा जारी फ्रांस में गृहयुद्ध; और इसकी तैयारी के प्रारूपों;  मार्क्स एंगेल्स के तत्कालीन लेखों, पत्रों, पूंजीवादी प्रेस तथा संगठनों के दुष्प्रचार के जवाब, कम्यून के उदय-पतन की प्रामाणिक कहानी बयान करते हैं और क्रांतिकारियों की गलतियों की समीक्षा। मार्क्स युद्ध पर अपने पहले संबोधन की शुरुआत इंटरनेसनल में अपने उद्घाटन संबोधन के उद्धरण से करते हैं कि किस तरह शासक वर्ग राजनैतिक सत्ता पर आए संकट से निपटने के लिए युद्धोंमादी राष्ट्रवाद का माहौल बनाकर रक्तपात में समाज की संपदा नष्ट करते हैं। यह आज भी उतनी सही है, जितनी तब थी। “इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि विभिन्न वर्गों के संघर्षों का फायदा उठाकर सत्त्ता हड़पने और समय-समय पर विदेशी युद्धों द्वारा उसे बरकरार रखने वाला नैपोलियन बोर्नापार्ट शुरू से ही इंटरनेसनल को अपना सबसे खतरनाक दुश्मन मानता है। जनमत संग्रह की पूर्वसंध्या पर उसने फ्रांस में अंतर्राष्ट्रीय कामगर संघ (इंटरनेसनल) को उसकी हत्या की साजिश रचने वाला गुप्त संगठन संगठन बताकर, देश भर में इसके पदाधिकारियों की धर-पकड़ का आदेश जारी कर दिया। ........... ........ 

दरअसल वे फ्रांसीसी जनता से खुलेआम जोर-शोर से मतदान के बहिष्कार की जोर-शोर से अपील कर रहे थे क्योंकि मतदान का मतलब है देश में तानाशाही और दूसरे देशों से युद्ध का समर्थन है”।
बोनापार्ट के कुशासन और उसके सैनिकों के अनाचार तथा बैंकरों, कारखानेदारों और व्यापारियों की लूट से जनअसंतोष चरम पर था। इंटरनेसनल के कार्यक्रम और प्रचार मजदूर असंतोष को दिशा दे रहे थे। बोर्नापार्ट युद्ध का माहौल बना रहा था और इंटरनेसनल के नेता और कार्यकर्ता युद्धोंमाद के विरुद्ध जनमत तैयार कर रहे थे। फ्रांस की गरिमा के तथा ‘शत्रु’ जर्मनी से अपनी जमीन वापस लेने के नाम पर जब 15 जुलाई 1870 को बोर्नापार्ट ने युद्ध की घोषणा की तो इसकी चारों तरफ निंदा हुई। इंटरनेसनल की फ्रांसीसी इकाई ने “सभी देशों के कामगरों” के नाम 12 जुलाई को घोषणापत्र जारी किया। “राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए, राष्टीय सम्मान के यूरोपीय संतुलन के नाम पर एक बार फिर दुनिया के अमन-चैन पर खतरे घने बादल मड़राने लगे हैं। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन के कामगर साथियों! आइए हम एकजुट होकर युद्ध के विरुद्ध आवाज बुलंद करें। …….. यह युद्ध वर्चस्व या सल्तनत का युद्ध है। कामगरों की टृष्टि से यह एक आपराधिक बेहूदगी है। ....” कई शहरों में मजदूरों ने शांति मार्च आयोजित किया। इंटरनेसनल की जर्मन इकाई के कार्यकर्ताओं ने भी युद्ध का विरोध किया। नतीजतन जब दोनों ही देशों की सेनाएं आमने-सामने थीं तब वहां के मजदूर एक दूसरे को शांति-संदेश भेज रहे थे। युद्ध और युद्ध विरोधी अभियानों की विस्तृत चर्चा की गुंजाइश नहीं है। इसका बोनापर्ट की पराजय से शर्मनाक अंत हुआ। 2 सितंबर 1870 को देश की पूर्वी सीमा, सेडान में बोनापार्ट की सेना की पराजय के बाद बिस्मार्क की सेना ने ‘सम्राट’ को उनके 100,000 सैनिकों के साथ बंदी बना लिया। पेरिस की सड़कों पर नारे लगाते, नाचते-गाते कामगरों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। यह जनसैलाब राजशाही के अंत और गणतंत्र की स्थापना की मांग कर रहा था।
तथाकथित गणतंत्रवादी विपक्ष कामगरों के इस आंदोलन से सकते में आ गया लेकिन जनमत के दबाव में उसे मजबूरन गणतंत्र और अंतरिम राष्ट्रीय सुरक्षा की की सरकार की घोषणा करनी ही पड़ी। इस सरकार के प्रमुख पदों पर पूंजीवाद समर्थक गणतंत्रवादी थे। मार्क्स फ्रांस का गृहयुद्ध में लिखते हैं, “जब पेरिस के मजदूरों ने गणतंत्र की घोषणा की तो तुरंत ही पूरे फ्रांस में ऐसी निर्विरोध घोषणाएं हुईं। मौके की ताक में बैठे कुछ बैरिस्टर होटल द विल्ले (संसद) पर काबिज हो गए, थियर उनका नेता था और थ्रोचू जनरल। .............. हड़पी हुई अपनी सत्ता की वैधता के लिए पेरिस के प्रतिनिधित्व का अप्रासंगिक हो चुका जनादेश ही काफी समझा”। मार्क्स ने उपरोक्त लेख में सरकार के मंत्रियों के वक्तव्यों के हवाले से बताया है कि सरकार तो समझौता करना चाहती थी लेकिन लोगों और नेसनल गार्ड की देशभक्ति के बुलंद जज्बे को देखते हुए, हिम्मत न कर सकी उल्टे शगूफा छोड़ दिया, “न तो एक इंच जमीन छोड़ेंगे, न ही जर्मनों को किले की एक ईंट ले जाने देंगे”, और जर्मन सेना ने पेरिस पर  घेरा डाल दिया। 

“आश्चर्यजनक हलचलों के बीच, जबकि मजदूरों के असली नेता अब भी बोनापार्ट की जेलों में थे, जर्मन सेना पहले ही पेरिस की तरफ कूच कर चुकी थी, पेरिस ने इस शर्त के साथ बागडोर संभाला कि उसका द्देश्य महज राष्ट्रीय सुरक्षा था। लेकिन पेरिस की सुरक्षा मजदूर वर्ग को हथियारबंद कर प्रभावशाली बल में संगठित किए बगैर नहीं हो सकती, युद्ध अपने आप उन्हें प्रशिक्षण दे देगा। लेकिन हथियारबंद पेरिस का मतलब था क्रांति को हथियारबंद करना”। पूंजीवाद के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली इस सरकार को जर्मनों से ज्यादा खतरा हथियारबंद मजदूरों से था। उनसे निपटने की तैयारी का उसे समय चाहिए था। उसे लगता था कि लंबी घेराबंदी के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव से मजदूरों का क्रांतिकारी जज्बा ठंडा पड़ जाएगा। सरकार एक तरफ राष्ट्रोंमादी लफ्फाजी कर रही थी दूसरी तरफ बिस्मार्क से गुप्त वार्ता। लेकिन नेसनल गार्ड के  रूप में संगठित पेरिस के 200,000 हथियारबंद मजदूरों की जनसेना ने पेरिस की सुरक्षा का दायित्व अपने हाथों मेंले लिया। नगर की सुरक्षा सुनिश्चित कर, हथियार डालने से इंकार कर, अपने ही शासकों पर तान दिया और धरती पर पहले सर्वहारा राज्य को जन्म दिया। तबसे कहीं भी किसी भी शासकवर्ग ने मजदूर वर्ग को हथियारबंद करने की गलती नहीं की। 

युद्ध अक्सर, खासकर, पराजय की स्थिति में, क्रांतिकारी परिस्थितियां पैदा करता है। युद्ध से लोगों की रोजमर्रा की दिनचर्या तहस-नहस हो जाती है। सरकार के कर्त्ता-धर्ताओं; परजीवी राज्य मशीनरी; सेना; मीडिया तथा सत्ता के अन्य स्तंभों के क्रियाकलापों के परीक्षण में लोगों की निगाहों का पैनापन कई गुना बढ़ जाता है। संसद में बहुमत पूंजीवादी गणतंत्रवादियों और बोनापार्टवादियों यानि दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादियों का था। लोगों ने कुछ दिन राष्ट्रीय एकता के नाम पर सरकार का समर्थन किया लेकिन धीरे-धीरे असंतोष फिर फैलने लगा। मजदूर वर्ग जब क्रांति की तैयारी कर रहा था तब यह गिरोह प्रतिक्रांति की।

प्रतिक्रियावादियों की यह सरकार अपनी जनविरोधी नीतियों से पेरिसवासियों, खासकर मजदूरों और नेसनल गार्ड के सदस्यों को लगातार उकसाती रही। कुछ नेसनल गार्डों के का भत्ता  रोक दिया  गया और उन्हें “काम में क्षमता” प्रमाणित करने को कह गया। शहर के घेरे से बहुत लोग बेरोजगार हो गए थे। भुखमरी तो नहीं भुखमरी जैसे हालात पैदा हो गए थे। सभी बकाया किराया और कर्ज 48 घंटे में जमा करने का फरमान जारी हो गया, जिससे छोटे-मोटे व्यापारियों पर दिवाएपन का खतरा मड़राने लगा। फ्रांस की राधानी पेरिस से वर्साय स्थांतरित कर दी गयी। इन और इन सी अन्य जनविरोधी नीतियों ने गरीबों को दरिद्र बना दिया लेकिन इन्ही की प्रतिक्रिया स्वरूप मध्यवर्ग की सामाजिक चेतना का जनवादीकरण हुआ। थियर की प्रतिक्रियावादी सरकार को उखाड़ फेंकना ही पेरिस की मुक्ति का रास्ता था। जुझारू प्रदर्शन शुरू हो गए और मजदूर वर्ग ने विद्रोह का ऐलान कर दिया -- थियर जैसे तथाकथित गणतंत्रवादी और राजशाही समर्थक गद्दारों के खिलाफ आर-पार की लड़ाई। प्रसियन सरकार के समक्ष समर्पण और राजशाही के पुनरुद्धार के खतरों ने आग में घी का काम किया। नेसनल गार्ड क्रांति के अग्रदूत बन गए। 215 बटलियनों के प्रतिनिधियों ने ‘नेसनल गार्डों के महासंघ की केंद्रीय कमेटी’ का चुनाव हुआ। केंद्रीय कमेटी की सत्ता तुरंत सर्वमान्य हो गयी और थियर सरकार द्वारा नियुक्त कमांडर को इस्तीफा देना पड़ा। जर्मन सेना शहर के एक कोने में 2 दिन डेरा डालकर वापस चली गयी।

 थियर सरकार की फौरी चिंता पेरिस के हथियारबंद मजदूर थे। मजदूरों के अधिकार में तोपों का होना पूंजीवाद के लिए “कानून-व्यवस्था” की समस्या थी। दुनिया के सभी प्रतिक्रियावदियों की आंख की किरकिरी बन गया हथियारबंद पेरिस। थियर ने नियमित सेना के 20 हजार सैनिक भेजा तोपों पर कब्जा करने जो उन्होंने आसानी से कर लिया लेकिन उनके पास उन्हें ले जाने का इंतजाम करते, धीरे-धीरे वे मजदूरों की भीड़ से घिरते गये। नेसनल गार्ड्स भी पहुंच गए। भीड़, सैनिक, नेसनल गार्ड सब गड्ड-मड्ड हो रहे थे। सेना के कमांडर ने भीड़ पर गोली चलाने का हुक्म दिया लेकिन सैनिकों ने गोली चलाने से इंकार कर दिया। कई सैनिक नेसनल गार्ड्स को गले लगा रहे थे। क्या अद्भुत दृश्य रहा होगा। कमांडतर लॉकमते और नेसनल गार्ड के पूर्व कमांडर क्लेमांत थॉमस को गिरफ्तार कर लिया गया जिन्हें क्रुद्ध सैनिकों ने मार दिया। थॉमस ने 1848 की क्रांति में मजदूरों पर गोली चलवाई थी। इस परिघटना में केंद्रीय कमेटी की कोई भूमिका नहीं थी लेकिन परिस्थिति ने उसे सरकार की स्थिति में बैठा दिया। थियर और उसके मंत्रियों की हालत खराब हो गयी। सैनिक हुक्म मानने की बजाय सोचने लगे यानि विद्रोह कर दे, यह बात उन्होने सपने भी नहीं सोचा था। भयभीत हो आनन-फानन में पेरिस से वरसाय भाग गया और सेना तथा प्रशासनिक कर्मियों को शहर खाली कर देने का हुक्म दे दिया। थियर का पीछा कर उसकी बची-खुची सेना को भी नष्ट करने के प्रस्ताव को केंद्रीय कमेटी ने नहीं माना। बाद में देखने पर लगता है कि यह एक ऐतिहासिक गलती थी। दरअसल केंद्रीय कमेटी ज्यादातर सदस्यों में सैद्धांतिक परिपक्वता का अभाव था और वे अपनी ऐतिहासिक भूमिका लिए तैयार नहीं थे। 

पेरिस में अब नेसनल गार्ड सरकार की स्थिति में था तथा केंद्रीय कमेटी ने सारे सामरिक स्थानों पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया। मजदूरों के निहत्था करने की सरकार की नाकाम कोशिस के बाद पेरिस के मजदूरों और वारसाय में छिपी सरकार के बीच गृहयुद्ध छिड़ गया। “18 मार्च की भोर कम्यून जिंदाबाद के नारों की गर्जना से हुई”। केंद्रीय कमेटी द्वारा जारी घोषणापत्र में कहा गया, “शासक वर्गों की नाकामियों और गद्दारियों को देखते हुए, पेरिस का सर्वहारा समझ गया है कि वक्त आ गया है कि सार्वजनिक मसलों को संचालन वह अपने हाथ में ले ले। ……….. वह समझ गया है कि यह उसका परम कर्तव्य और असंदिग्ध अधिकार है कि वह सरकारी सत्ता पर काबिज हो अपनी भाग्य का विधाता वह स्वयं बने”। 
केंदीय कमेटी, क्रांति के जज्बे के प्रसार के बजाय अपने लिए पहला काम तय किया कम्यून का चुनाव कराना। क्रांति की निरंतरता की बजाय कीमती समय चुनाव के प्रबंधों में लगा दिया और थियर बिस्मार्क से मिलकर प्रतिक्रांति की तैयारी करता रहा और सैन्यशक्ति और मनोबल बढ़ाता रहा। केंद्रीय कमेटी को लगा कि उनके पास शासन का वैध जनमत नहीं था। 90 सदस्यीय, निर्वाचित कम्यून में अधिकतर क्रांतिकारी आंदोलनों से जुड़े लोग थे और ब्लांकी के अनयायियों मार्क्सवादियों को मिलाकर लगभग एक-चौथाई इंटरनेसनल के सदस्य। जोशो-खरोश  से ओत-प्रोत, कार्रवाई को सदा उद्यत ब्लांकी के अनुयायियों के पास स्पष्ट सैद्धांतिक समझ का अभाव था, कम्यून के पतन के बाद, बचे-खुचे ब्लांकीवादी मार्क्सवाद की तरफ उद्यत हो गये थे। ब्लांकी स्वयं एक प्रांतीय जेल में थे। वरसाय में थियर सरकार से वार्त्ता में कम्यून ने अपनी कैद से तमाम पादरियों की रिहाई के बदले सिर्फ ब्लांकी की रिहाई की मांग की थी, लेकिन पूंजी का दलाल थियर तो वार्त्ता में विषयांतर के लिए उलझा रहा था जिससे कम्यून के खिलाफ सारे प्रतिक्रियावादियों को लामबंद कर सके। निर्वाचित चंद दक्षिणपंथियों किसी-न-किसी बहाने इस्तीफा दे दिया और कुछ को गिरफ्तार कर लिया गया जब पता चला कि वे पुलिस के मुखबिर या जासूस थे। मार्क्स ने एटींथ ब्रुमेयर में लिखा था कि पूर्ववर्ती क्रांतियों ने राज्य-मशीनरी को नष्ट करने की बजाय उन्हें मजबूत किया और फ्रांस में गृहयुद्ध में लिखते हैं, “मजदूर वर्ग पहले से ही मौजूद राज्य मशीनरी पर मात्र कब्जा करके उसे अपने वर्गीय हितों के निये प्रयोग नहीं कर सकता। चूँकि उसकी राजनैतिक गुलामी का हथियार कभी उसकी मूक्ति का यंत्र नहीं बन सकता"। 

सत्ता संभालते ही कम्यून ने राज्य मशीनरी के सारे विशेषाधिकार खत्म कर दिए; किराया और कर्ज की अदायगी पर अप्रैल तक के लिए रोक लगा दी; बंद कारखाने कामगरों के नियंत्रण में शुरू किए गये; रात्रिकालीन काम को न्यूनतम करने तथा गरीब और बीमार के भरण-पोषण सुनिश्चित करने के प्रावधान बनाए। कम्यून ने घोषित किया कि उसका उद्देश्य समाजवादी आदर्श का प्रसार और “पूंजीपतियों के फायदे के लिए मजदूरों का आपसी अराजक प्रतिस्पर्धा का अंत करना है”। 

 नेसनल गार्ड में भर्ती शारीरिक रूप से सक्षम हर व्यक्ति के लिए खुली थी और जैसा ऊपर बताया गया है, उसकी संरचना पारदर्शी तौर पर जनतांत्रिक थी। खुद को लोगों से अलग-थलग और ऊपर समझने वाली सेना तथा पुलिस को अवैधानिक करार कर, भंग कर दिया गया। चर्च को राज्य से अलग कर धर्म को निजी मामला घोषित किया गया और चर्चों की बेशुमार संपत्ति जब्त कर ली गयी। प्रशासनिक अधिकारी, आम मजदूर के समान वेतन पर काम करने वाले कम्यून द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि थे, जिन्हें वापस बुलाया जा सकता था। बेघरों के लिए सार्वजनिक भवनों और भगोड़ों के अधिगृहित घर अधिगृहित किए गए। शिक्षा, प्रेक्षागृह और ज्ञान तथा संस्कृति के सारे केंद्र सार्वजनिक रूप से सभी को सुलभ करा दिए गये। विदेशी कामगरों को तुरंत ‘अंतरराष्ट्रीय मजदूरों के सार्वभौमिक गणतंत्र’ के सदस्य के रूप में मान्यता दी गयी। गौरतलब है कि कम्यून के निर्वाचित सदस्यों में भी कई प्रवासी थे। सामाजिक जीवन के तमाम पहलुओं को ‘साझे हित’ में व्यवस्थित करने के लिए दिन-रात हजारों लोगों की सभाएं लिए होने लगीं। कम्यून और नेसनल गार्ड की छत्र-छाया में विकसित हो रही व्यवस्था का चरित्र निस्संदेह समाजवादी था। कम्यून की भयानकतम गलतियों में वार्साय की जवाबी हमलों को नजर अंदाज करना और केंद्रीय बैंक पर कब्जा करने की मार्क्स की सलाह को न मानना था जो थियर को कम्यून को कुचलने की तैयारी के लिए लाखों फ्रैंक मुहैया कराता रहा। लेनिन के नेतृत्व में 1917 में यह गलती बॉल्सेविकों ने नहीं दुहराया, सबसे पहले उन्होने ने बैंकों और प्रसारण संस्थानों को कब्जे में लिया था। 

1848 में मार्क्स और एंगेल्स ने लिखा था कि यूरोप के सिर पर कम्युनिज्म का भूत मड़राता रहता है और 1871 में पेरिस कम्यून के रूप में वह भूत उन्हें साक्षात दिख गया। यूरोप के प्रतिक्रियावादी खेमें में बौखलाहट मच गयी। मार्क्स ने कम्यून को अपने संदेश में स्पष्ट किया था कि पेरिस के बाहर अड्डा जमाए प्रशियन सैनिक या तो थियर की मदद करेंगे या खुद कम्यून पर हमला कर देंगे। मार्क्स यह स्पष्ट समझ रहे थे कि सर्वहारा की इस क्रांति को पुख़्ता करने के लिए ज़रूरी है कि पेरिस की कामगारों की सेना पेरिस में प्रतिक्रान्ति की हर कोशिश को कुचलकर, बिना रुके वर्साय की ओर कूच कर जाना चाहिए था। वर्साय में ही थियेर सरकार के साथ ही पेरिस के सभी धनपशुओं ने शरण ले रखी थी। उस समय थियर की कमान में मात्र 27 हजार हतोत्साहित सानिक थे और सर्वहारा की फौज में एक लाख नेशनल गार्डस। पेरिस की नकल पर कई और कम्यून बने थे। वार्साय पर झंडा गाड़ने के बाद क्रांति को देशव्यापी बनाया जा सकता था। लेकिन किसी ऐतिहासिक मिशाल; सैद्धांतिक परिपक्वता; ठोस, संगठित नेतृत्व; ठोस स्पष्ट कार्यक्रम के अभाव और घेराबंदी की अफरा-तफरी में, पेरिस का मजदूर जमीनी हकीकतों के संदर्भ में, सर्वहारा के हित में नये समाज के गठन की प्रक्रिया में फूंक-फूंक कर कदम रख रहा था। इसीलिए, लगता है, कम्यून क्रांति को पुख्ता किए बिना क्रांति के बाद के समाज के ताने-बाने में फंस गया। छोटी मोटी झड़पों में वारसाय सेना द्वारा कुछ कम्युनार्डों को पकड़कर कत्ल कर देने की घटना के बाद, नेसनल गार्ड के दबाव में कम्यून ने वरसाय पर 3 मोर्चों से हमला करने का फैसला लिया। 

अपनी सामरिक कमजोरी को जानते हुए, थियर कम्यून से वर्तालाप का नाटक कर रहा था, और जैसा कि मार्क्स को पूर्वाभास था, कम्यून को कुचलने के लिए बिश्मार्क से गुप-चुप सौदे बाजी। और अंततः जब पुनर्गठित सेना के साथ पेरिस पर भारी तोपों के साथ हमला बोला तो राजनैतिक और सामरिक अनुभव और अंतर्दृष्टि की कमी के चलते, सर्वहारा की फौज को लड़ते हुए पीछे हटना पड़ा और एक सप्ताह तक पेरिस पर बमबारी होती रही, इसे इतिहास में काला सप्ताह नाम से याद किया जाता है। सेना का चरित्र वैतनिक हत्यारों सा होता है, थियर की सेना किसी विदेशी सेना का नहीं, अपनी विद्रोही जनता का। इसके बाद प्रतिक्रियावादियों ने सड़कों पर दमन का जो तांडव किया वह बेमिशाल है। पेरिस लाशों से पट गया। लगभग 30 हजार क्रांतिकारियों ने शहादत दी, जिसमें बच्चे-बूढ़े-महिलाएं सब थे। कम्युनार्ड लड़े तो भूतपूर्व बहादुरी से लेकिन सामरिक योजना में अपरिपक्वता के चलते 28 मई को 2 महीने का कम्यून पराजित हो गया। सशस्त्र दस्ते जून में पेरिस की सड़कों पर गस्त करते रहे और किसी को भी कम्यून के सहयोगी के संदेह में गोली मार देते थे। कम्यून के पतन के बाद सभी देशों में इंटरनेसनल के सदस्यों और शाखाओं पर दमन बढ़ता रहा और संगठन में टकराव, जिसके नतीजतन संगठन दो फाड़ हो गया और अंततः विघटित।

कम्यून की विसंगतियों और कार्यक्रमों की सैद्धांतिक अस्पष्टता, प्राथमिकताओं के गलत चुनाव के कारण समय और ऊर्जा की बर्बादी आदि कमियों पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, उपरोक्त पेरिस कम्यून इसकी समीक्षा का तत्कालीन, प्रामाणिक और वैज्ञानिक समीक्षा है। मजदूरों के पहले अल्पजीवी राज्य के उत्थान-पतन और पतन की एक संक्षिप्त समीक्षा के साथ इस चर्चा को समाप्त करते हैं। मार्क्स ने 18 मार्च के पहले ही कहा था कि तत्कालीन, प्रतिकूल परिस्थियों में सत्ता पर कब्जा करना एक “दुस्साहसिक भूल होगी”। लेकिन इतिहास में स्वफूर्तता की अपनी भूमिका होती है। पेरिस के मजदूर महज अपनी लड़ाई नहीं लड़ रहे थे बल्कि शोषण, वर्गविभाजन, सैन्यवाद और राष्ट्रोंमाद से मुक्त “एक सार्वभौमिक गणतंत्र” की। 1871 की तुलना में आज गहराते पूंजीवादी संकट के संदर्भ में विकसित और विकासशील औद्योगिक देशों में क्रांति की परिस्थियां ज्यादा अनुकूल हैं, लेकिन पहले इंटरनेसनल जैसे क्रांतिकारी संगठन की नामौजूदगी से शासकवर्ग संकट से विषयांतर के लिए नस्लोंमाद; धर्मोंमाद; राष्ट्रोंमाद का सहारा ले रहा है। आज जरूरत ऐसे समाज की ठोस बुनियाद तैयार करने की है जिसके लिए पेरिस के सर्हारा स्त्री-पुरुषों ने कुर्बानियां दीं। कम्यून, अल्पजीविता के बावजूद एक समाजवादी समाज बनाने का ईमानदार प्रयास था और क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास में मील का पत्थर बन गया तथा भविष्य की क्रांतियों का संदर्भविंदु। 
18.03.2018

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संघर्ष और निर्माण
विषय: मार्क्सवाद
 पाठ  8     
टॉपिक:  द्वंद्वात्मक भौतिकवाद 
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इसके पहले द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को दृष्टांतों से समझाने की कोशिस की गयी है, अब परिभाषा पर बात करके फिर एराध दृष्टांत से यह अध्याय खत्म किया जाये। 

किसी भी नई चिंतन धारा का उदय और विकास उस समय के ऐतिहासिक संदर्भ में प्रचलित चिंतन धाराओं के सापेक्ष होता है। उस समय यूरोपीय दार्शनिक गगन में दो प्रमुख चिंचनधाराएं प्रचलित थीं, हेगेल का द्वंद्ववाद और फॉयरवाक का भौतिकवाद। मार्क्स उन्हें चुनौती देते हैं; खारिज करते हैं; उनका कायाकल्प कर,  उनकी द्वंद्वात्मक एकता स्थापित कर, जोड़कर एक नया सिद्धांत देते हैं, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद। हेगेल का मानना था कि यथार्थ पूर्णतः या काफी हद तक विचारों से निर्मित है और दृष्टिगोचर जगत विचारों के अदृश्य जगत की छाया मात्र है। मार्क्स द्वंद्वात्मक उपादान के लिए हेगेल का आभार व्यक्त कर इसे आदर्शवाद कह कर खारिज किया। उन्होंने कहा कि हेगल ने वास्तविकता को सर के बल खड़ा किया है उसे पैर पर खड़ा करना है। विचार से वस्तु की उत्पत्ति नहीं, वस्तु से विचार की उत्पत्ति होती है। ऐतिहासिक रूप से वस्तु विचार से पहले से विद्यमान होती है तथा ऐतिहासिक रूप से विचार वस्तुओं से ही निकले हैं, निर्वात से नहीं। न्यूटन के गुरुतवाकर्षण के सिद्धांत से सेबों का गिरना शुरू नहीं हुआ बल्कि सेबों का गिरना देख कर उनके दिमाग में उसका कारण जानने का विचार आया। सेबों के गिरते देखकर ‘क्या’ सवाल का उत्तर दिया जा सकता है, ‘क्यों’ का नहीं। क्यों, कैसे, कब और कितना का जवाब न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत से मिलता है। यथार्थ की संपूर्णता का निर्माण सेब गिरने की घटना (वस्तु) और न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम (विचार) की गतिशील द्वंद्वात्मक सम्मिलन से होता है।  

फॉयरबॉक का वैज्ञानिक युग का भौतिकवाद विचारों को सिरे से खारिज करके कहता है भौतिकता ही सब कुछ है, जिसे मार्क्स मशीनी भौतिकवाद या प्रतीकात्मक (मेटाफरिकल) भौतिकवाद कह कर खारिज करते हैं। मार्क्स थेसेस ऑन फॉयरबाक में फॉयरबॉक से सहमति जताते हुए लिखते हैं कि मनष्य की चेतना उसकी भौतिक परिस्थितियों का परिणाम है और बदली हुई चेतना बदली हुई परिस्थितियों की। लेकिन न्यूटन के गति के नियम के अनुसार बिना वाह्य बल के कोई वस्तु हिलती भी नहीं। भौतिक परिस्थितियां आपने आप नहीं बल्कि मनुष्य के चैतन्य प्रयास से बदलती हैं । अतः इतिहास की गति का निर्धारण भौतिक परिस्थितियों और सामाजिक चेतना की द्वंद्वात्मक एकता से होता है, किसी ईश्वर, पैगंबर, अवतार की इच्छा या कृपा-दुष्कृपा से नहीं। 

इस तरह हम देखते हैं मार्क्स ने सत्य की व्याख्या की अपने समय की प्रचलित दो प्रमुख परस्पर-विरोधी चिंतनधाराओं: हेगेले का द्वंद्वाद तथा फॉयरबाक के भौतिकवाद संदर्भविंदु बनाया; ललकारा तथा खारिज किया; उनकी द्वंद्वात्मक एकता से सत्य की एक नई व्याख्या की चिंतनधारा, नए दर्शन का उद्घाटन किया – द्वंद्वात्मक भौतिकवाद। हेगेल के द्वंद्वाद को उन्होंने आदर्शवादी करार दिया क्योंकि वस्तु पर विचार की प्राथमिकता के साथ यथार्थ को सिर के बल खड़ा किया था। विचार से वस्तु नहीं बनती बल्कि वस्तु से विचार निकलते हैं। ईश्वर ने मनुष्य को नहीं बनाया बल्कि मनुष्य ने ईश्वर की अवधारणा गढ़ी। उन्होंने वस्तु को ही संपूर्ण सत्य मानने वाले फॉयरबाक के भौतिकवाद को प्रतीकात्मक कह कर खारिज किया कि विचारों के बिना वस्तु प्रकृति की गतिशीलता के प्रकृति के विरुद्ध जड़ता में जकड़ी रहेगी। वस्तु अर्ध सत्य है, उसके विचारों से द्वंद्वात्मक मिलन से सत्य बनता है। 
एंगेल्स ने लुडविग फॉयरवाक और जर्मन दर्शन का अंत में लिखा है, “किसी भी अन्य दार्शनिक कथन की संकीर्ण सरकारों ने इतनी प्रशंसा नहीं की और न उतने ही संकीर्ण उदारवादियों ने इतनी निंदा जितनी की हेगेल के निम्न कथन की:
‘जो भी वास्तविक है, वह विवेकसम्मत है; और जो भी विवेकसम्मत है वह वास्तविक है’।
प्रकारांतर से यह निरंकुश शासन, पुलिसिया सरकार, ... और सेंसरशिप को समर्पित दार्शनिक मंगलकामना है। … लेकिन वे हर वजूददार चीज को वास्तवुक नहीं मानते थे। हेगेल के लिए वास्तविकता उसी का गुण है जो वास्तविक है।

‘अपने विकास क्रम में वास्तविकता आवश्यकता बन जाती है’
एंगेल्स ‘मियां की जूती मियां के सिर’ कहावत चरितार्थ करते हुए हेगेल के ही द्वंद्ववाद विपरीत, क्रांतिकारी निष्कर्ष निकालते हैं। “रोम गणतंत्र वास्तविक था और उसकी जगह आया रोम साम्राज्य भी वास्तविक था। 1789 में फ्रांस की राजशाही इतनी अवास्तविक यानि अनावश्यक हो गयी कि महान क्रांति को उसे ध्वस्त करना पड़ा। राजशाही अवास्तविक हो गई थी और क्रांति वास्तविक, अतः विवेकसम्मत” । कहने का मतलब जिसका भी अस्तित्व है उसका अंत निश्चित है।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर संक्षिप्त चर्चा लंबा विषयांतर हो गया। उपरोक्त चर्चा के निष्कर्ष स्वरूप हम पाते हैं कि द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के निम्न नियम हैं:
 1. यथार्थ (सत्य) वस्तु और विचार का द्वंद्वात्मक युग्म है, जिसमें प्राथमिकता विचारों की है। इस नियम को ऊपर, वस्तुओं के ऊर्ध्वाधर पतन (वस्तु) और न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम की द्वंद्वात्मक एकता के द्वांद्वात्मक एकता से सत्य की संपूर्णता के निर्माण के उदाहरण से दर्शाने की कोशिस की गई है। वस्तु और विचार की द्वंद्वात्मक एकता की प्रक्रिया, या दूसरे शब्दों में दोनों की एक-दूसरे पर क्रिया-प्रतिक्रिया की निरंतरता ही पाषाणयुग से साइबरयुग तक मानव इतिहास की यात्रा की संचालक शक्ति रही है। मार्क्स पूंजीवाद के राजनैतिक अर्थशास्त्र, वर्गीय अंतर्विरोध तथा वर्ग संघर्ष के विश्लेषण में इसी द्वंद्ववाद का इस्तेमाल करते हैं। “अभी तक के समाजों का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है” 
 2. प्रकृति की द्वंद्वात्मकता की प्रकृति परिवर्तन की निरंतरता है, जिसके गतिविज्ञान के अपने नियम हैं । सतत क्रमिक मात्रात्मक परिवर्तन समयांतर में परिपक्व हो, गुणात्मक क्रांतिकारी परिवर्तन बन जाता। पिछले 40 सालों में भारत में क्रमिक मात्रात्मक परिवर्तनों के साफ-साफ दिखने वाले उदाहरण हैं: दलित- सशक्तीकरण तथा स्त्री-सशक्तीकरण। स्त्री प्रज्ञा तथा दावेदारी और दलित प्रज्ञा तथा दावेदारी के रथ, मंद गति से शुरू हो त्वरित गति से आगे बढ़ रहे हैं। आज किसी का नैतिक साहस नहीं है कि कहे कि वह बेटा-बेटी में फर्क करता है, एक बेटे के लिए 4-5 बेटियां भले पैदा कर ले। उसी तरह बड़े-से-बड़ा जातिवादी भी सार्वजनिक रूप से नहीं कह सकता कि वह जाति-पांत में विश्वास करता है, बल्कि तमाम मनुवादी किसी दलित के घर टीवी पर प्रचार के साथ भोजन करना प्रायोजित करते हैं। वैसे तो कोई परिवर्तन विशुद्ध मात्रात्मक नहीं होता। यह क्रमशः स्त्रीवाद तथा जातिवाद-विरोध की सैद्धांतिक विजय है, इसीलिए अभी तक यह मात्रात्मक परिवर्तन है। क्रांतिकारी, गुणात्मक परिवर्तन विचारधारा के रूप में क्रमशः मर्दवाद तथा जातिवाद (ब्राह्मणवाद) के विनाश के खंडहरों पर उगेंगे। 
 3. द्वंद्वात्मक समग्रता के दोनों परस्पर-विपरीत के पारस्परिक निषेध से तीसरे उच्चतर की तत्व की उत्पत्ति होती है जो दोनों से गुणात्मक तौर पर भिन्न होता है लेकिन दोनों के तत्वों को समाहित किए हुए। इस नियम को वाद-प्रतिवाद-संवाद (Thesis, anti-thesis, synthesis) का नियम भी कहते हैं। इसे दो परस्पर विपरीत रासायनिक गुणों वाले, हाइड्रोक्लोरिक एसिड तथा सोडियम हाइड्रॉक्साइड की रासायनिक क्रिया (द्वंद्वात्मक योग) के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है।
HCl + NaOH=NaCl+H2O
दो विपरीत रासायनिक गुणों वाले तत्व पारस्परिक निषेध की क्रिया से तीसरे बिल्कुल भिन्न तत्व पैदा करते हैं। शरीर को हानिकरक दो विपरीत तत्वों की द्वंद्वात्क एकता से तीसरा तत्व बना जो जीवन के लिए अनिवार्य है। 1917 की क्रांतिकाकी परिस्थियों ने क्रांतिकारी चेतना पैदा किया क्रांतिकारी परिस्थितियों और क्रांतिकारी चेतना से लैस मनुष्य की द्वंद्वात्मक एकता के परिणामस्वरूप नवंबर क्रांति हुई। 
4.जिसका भी अस्तित्व है उसका अंत निश्चित है, पूंजीवाद अपवाद नहीं हो सकता इसे नियम की बजाय प्रकृति की ऐतिहासिक प्रवृत्ति कहना ज्यादा उचित है।  
22.03.2018
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संघर्ष और निर्माण
विषय: मार्क्सवाद
पाठ 9
टॉपिक:
मार्क्सवाद: एक विज्ञान

मार्क्सवाद क्या है?  

जैसा कि इस श्रृंखला की शुरुआत में बताया गया है कि मार्क्सवाद वैज्ञानिक सिद्धांतो के आधार दुनिया को सनमझने और बदलने की एक चिंतनधारा है, जिसका नाम इस धारा के प्रवर्तक, कार्ल मार्क्स (1818-183) के नाम पर पड़ा। वे एक क्रांतिकारी बुद्धिजीवी थे जो पूंजीवादी विकास के शोषण-दमनकारी व्यवस्था को समझना ही नहीं, बदलना भी चाहते थे। उन्होंने बौद्धिक जीवन की शुरुआत में अपने विचारों की क्रांतिकारिता की घोषणा कर दिया था।  “दार्शनिकों ने अन्यान्य तरीकों दुनिया की व्याख्या की है, लेकिन जरूरत इसे बदलने की है”[9]। उनके जीवन काल में ही उनके सिद्धांतों पर आधारित, मार्क्सवाद एक चिंतनधारा बन चुकी था। कई छोटे-छोटे मार्क्सवादी समूह बन चुके थे। मार्क्स की शवयात्रा में कम उपस्थिति के संदर्भ में, अपने अंत्येष्टि भाषण में एंगेल्स ने कहा था कि वह दिन दूर नहीं जब पूरी दुनिया मार्क्स के पक्ष-विपक्ष में खड़ी होगी। तीन दशक से कम समय में ही बॉलसेविक क्रांति ने इस भविष्यवाणी को सच कर दिया। सारी दुनिया दो खेमों में बंट गई मार्क्स के पक्ष और विपक्ष में -- राजनैतिक और बौद्धिक दोनों अर्थों में। मार्क्स के निधन के बाद 1889 में गठित दूसरे इंटरनेसनल के लगभग सभी घटक मार्क्सवाद को ही अपना वैचारिक श्रोत मानते थे, जैसे भारत की दर्जन से अधिक कम्युनिस्ट पार्टियां मानती हैं। एंगेल्स ने अपने उसी अंत्येष्टि भाषण में यह भी कहा था कि जिस तरह डार्विन ने जीवन के विकास के नियमों की व्याख्या किया उसी तरह मार्क्स ने इतिहास के नियमों की[10]। मार्क्सवाद विज्ञान है तथा मार्क्स विज्ञान को गतिशील मानते थे, इसीलिए यह कोई स्थिर आस्था नहीं गतिशील विचार है, जिसके बौद्धिक संसाधन मार्क्स तथा एंगेल्स की ही रचनाओं के भंडार तक सीमित नहीं है। ज्ञान की ही तरह विज्ञान भी एक निरंतर प्रक्रिया है, मार्क्सवादी परिप्रक्ष्य से अपनी परिस्थिति को समझने और बदलने के प्रयास करने वाले, लेनिन, माओ, भगत सिंह, ग्राम्सी, चे ग्वेयरा आदि की रचनाओं से यह भंडार लगातार संवृद्ध होता रहा है। 

मार्क्स के जीवन के बारे में बहुत लिखा जा चुका है, उस पर चर्चा की यहां न तो गुंजाइश है न जरूरत। एकाध बातों का जिक्र यह रेखांकित करने के लिए जरूरी है कि शासक वर्ग और उनके भोंपू, सदा से ही वैज्ञानिक विचारों से आक्रांत होते रहे हैं और विचारों से भयभीत हो विचारक को कत्ल; दर-ब-दर और कैद करते रहे हैं। सुकरात से शुरू होकर बरास्ते ब्रूनो; गैलीलियो; दिदरो, रूसो; ब्लांकी; मार्क्स; भगत सिंह; ग्राम्सी; चे; ... की मिशालों की ऐतिहासिक निरंतरता है। मार्क्स 1841 में प्राचीन यूनानी प्रकृतिवादी दर्शन पर पीयचडी जमा करने करने के पहले ही सर्वहारा के रूप में इतिहास के नए नायक का अन्वेषण कर चुके थे[11] तथा छात्र जीवन में यंग हेगेलियन के सदस्य के रूप में छात्र-राजनीति में भी सक्रिय थे।एक कहावत है, ‘होवहार विरवान के होत चीकनो पात’। विश्वविद्याय में नौकरी मिलने से रही। कोलोन में एक पत्रिका में नौकरी कर लिया और संपाक बन गए। ‘सत्य वही जो प्रमाणित हो व्यवहार में’[12] लिखने के पहले ही पत्रकार के रूप में प्रमाणित कर सत्य लिखने लगे थे। एक कहावत है, ‘जंह-जंह पांव पड़ैं, संतन कै, तंह तंह बंटाधार’। तो शासकवर्गों के कानों में ‘राष्ट्र की सुरक्षा’ और ‘शांति’ के लिए खतरे की घंटी बजने लगी और अखबार बंद कर दिया गया तथा मार्क्स ने भाग कर फ्रांस में शरण ली। कहने का मतलब, हेगेल के अधिकार के दर्शन की समीक्षा में एक योगदान [1843-44] तथा आर्थिक और दार्शनिक मैनुस्क्रिप्ट (पेरिस मैनुस्क्रिप्ट) [1844] के प्रकाशन के साथ यूरोप के बौद्धिक जगत में क्रांतिकारी लहजे में प्रवेश के पहले ही, 24 साल के एक युवक के कलम का इतना आतंक कि उसका अपनी धरती पर मौजूदगी ही राष्ट्र के लिए खतरा बन गया। वह ताजिंगी इंकिलाब की अलख जलाते दर-बदर भटकता रहा।

1848 तक उनका फ्रांस में भी रहना खतरनाक हो गया और भागकर बेल्जियम गए, जहां उन्होने एंगेल्स के साथ मिलकर कम्युनिस्ट मैन्फैस्टो की रचना की। राष्ट्र की सुरक्षा के खतरे का भूत वहां भी नहीं साथ छोड़ा, उन्हें बेल्जियम भी छोड़ना पड़ा। राज्यविहीन विचारक के रूप में लंदन में बीती। वैसे भी उनका सपना राज्य-विहीन दुनिया का था, व्यक्ति की राज्य विहीनता का नहीं। भूमंडलीय लूट के प्रमुख औजार हैं, राष्ट्र-राज्य की सरकारें, क्रांति भी राष्ट्र-राज्य की भौगोलिक सीमा में ही होगी। युगचेतना की धारा के विपरीत विचार जल्दी पचते नहीं। समकालीन शासक वर्गों तथा उदारवादी और अराजकतावादी बुद्धिजीवियों के कोप-पात्र बन गए। तरह-तरह के कुप्रचार तथा विचारों पर सवाल होने लगे। जिसका वाजिब समझते थे जवाब देते थे, बाकी नजर-अंदाज कर देते थे। अराजकतावादी दार्शनिक, जोसेफ पियरे प्रूधों ने सर्वहारा के नायकत्व की मारक्स की अवधारणा का मजाक उड़ाते हुए, एक किताब लिख मारा, गरीबी का दर्शन[13] जो नवीनता के अभाव में, कोई खास प्रभाव छोड़ने में नाकाम रही। मार्क्स ने जवाब में दर्शन की गरीबी[14] लिखा जो एक कालजयी कृति बन गयी। सब रचनाएं अपनी परिस्थितियों को ही संबोधित करती हैं, अतः समकालिक होती हैं, महान रचनाएं, सर्वकालिक, कालजयी बन जाती हैं। इसमें ऐतिहासिक भौतिकवादी उपादान की पहली स्पष्ट झलक मिलती है।

“आर्थिक परिस्थितियों ने आम ग्रामीण जनता को मजदूर बना दिया। पूंजी के प्रभुत्व ने सबकी परिस्थितियां और हित एकसमान कर दिया है। अतः पूंजी की विरुद्ध अधीनता की समान स्थिति को अर्थ में अपने आप में वर्ग है, लेकिन अपने लिए नहीं। संघर्षों के दौरान यह जनसमूह एकता बद्ध रूप से संगठित होता है तथा अपने लिए वर्ग बन जाता है। जिन हितों की यह रक्षा करता है, वर्ग हित बन जाता है”[15]।

‘अपने आप में वर्ग’ से ‘अपने लिए वर्ग’ की यात्रा का वाहन है, वर्गचेतना। वर्ग और वर्ग चेतना पर विस्तृत चर्चा की गुंजाइश तो नहीं है, लेकिन एक अतिसंक्षिप्त विवरण आवश्यक लगता जिसकी कोशिस आगे की जाएगी। इतिहास के विरले चरित्रों के जीवन बहुत रोचक होते हैं। लालच समेटते हुए मार्क्स की जीवनी उनके लेखन काल के शैशवकाल में ही छोड़, मार्क्सवाद की इस लेख के लिए प्रासंगिक, कुछ प्रमुख अवधारणाओं की संक्षिप्त चर्चा के साथ, रूसी क्रांति के मूल विषय पर आते हैं। मार्क्स बुद्धिजीवी-क्रांतिकारी नहीं थे, क्रांतिकारी-बुद्धिजीवी थे। पूंजी लिखना पूरा करने के लिए फर्स्ट इंटरनेसनल की गतिविधियों से समय चुराते थे[16]।       

व्यवस्था बदलने के लिए उसके के गतिविज्ञान के नियमों की वैज्ञानिक समझ जरूरी थी। इसकेलिए उन्होंने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के दार्शनिक आधार पर ऐतिहासिक भौतिकवादी उपादान का अन्वेषण किया। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद मार्क्सवाद का दर्शन है तथा ऐतिहासिक भौतिकवाद इसका विज्ञान। इन पर विस्तृत चर्चा की गुंजाइश नहीं है। लेकिन कुछ प्रमुख अवधारणाओं की संक्षिप्त चर्चा अप्रासंगिक न होगी।

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संघर्ष और निर्माण
विषय: मार्क्सवाद 
पाठ 10
टॉपिक : ऐतिहासिक भौतिकवाद
2
 मार्क्सवाद के दर्शन ,द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर कई पाठों के बाद मार्क्सवाद के विज्ञान, ऐतिहासिक भौतिकवाद की एक संक्षिप्त चर्चा वांछनीय है। वैसे इस पर एक पद्यात्मक पाठ (3) हो चुका है।  ऐतिहासिक भौतिकवाद का मूलमंत्र है. अर्थ ही मूल है। यह एक ऐतिहासिक  दृष्टिकोण है जो समाज के आर्थिक विकास को इतिहास के गतिविज्ञान की कुंजी मानता है। इतिहास के सभी कारण-कारक की उत्पत्ति, “उत्पादन पद्धति में परिवर्तनों और विनिमय तथा परिणामस्वरूप विभिन्न वर्गों में समाज का विभाजन और वर्ग संघर्ष में निरूपित करता है” । सत्य वही जो तथ्य-तर्कों के आधार पर प्रमाणित किया जा सके। मार्क्स, राजनैतिक अर्थशास्त्र की समीक्षा में एक योगदान  की प्रस्तावना के निम्न लंबे उद्धरण में ऐतिहासिक भौतिकवाद का सार है। 
“अपने सामाजिक उत्पादन के दौरान, भौतिक उत्पादन के विकास के विशिष्ट चरण के अनुरूप मनुष्य विशिष्ट संबंधो में बंध जाते हैं, उत्पादन के सामाजिक संबंध, जो अपरिहार्य और अपनी इच्छा से स्वतंत्र होते हैं। इन्ही संबंधों के योग से समाज का आर्थिक ढांचा तैयार होता है, जो वास्तविक बुनियाद है बुनियाद है जो पर कानूनी और राजनैतिक ढांचों का निर्धारण करता है, और जिसके अनरूप सामाजिक चेतना का विशिष्ट स्वरूप होता है। भौतिक जीवन की उत्पादन प्रणाली, सामाजिक, राजनैतिक और बौद्धिक गतिविधियों के सामान्य स्वरूप का निर्धारण करती है। मनुष्य की चेतना उसके अस्तित्व का निर्धारण नहीं करती बल्कि उसका सामाजिक अस्तित्व उसकी चेतना का निर्धारण करता है। विकास के एक खास चरण में समाज की भौतिक उत्पादन की शक्तियों और मौजूद उत्पादन संबंधों, कानूनी भाषा में संपत्ति के संबंधों में टकराव की स्थिति पैदा होती है। मौजूदा उत्पादन संबंध उत्पादक शक्तियों के आगे विकास में बाधक बन जाते हैं। तब शुरू होता है सामाजिक क्रांति का युग। आर्थिक बुनियाद में परिवर्तन से देर-सबेर सभी अधिरचनाओं में तदनुरूप आमूल परिवर्तन हो जाता है। इन परिवर्तनों के अध्ययन में प्राकृतिक विज्ञान की तरह सही सही ज्ञात किए जा सकने वाली भौतिक उत्पादन आर्थिक परिस्थियों और वैझानिक, राजनैतिक, धार्मिक, कला संबंधी, य दार्शनिक – कुल मिलाकर विचारधारात्मक स्वरूप में परिवर्न में, फर्क करना जरूरी है। विचारधारात्मक स्वरूप में परिवर्तन से मनुष्य इन अंतरविरोधों के प्रति जागरूक हो संघर्ष करता है।”

ऐतिहासिक भौतितवाद एक व्यवहारिक विज्ञान है। उत्पादन प्रणाली में परिवर्तन के आधार पर यह मानव इतिहास का युग निरूपण करता है: आदिम उत्पादन प्रणाली पर आधारित आदिम साम्यवाद का युग; दास उत्पादन प्रणाली का दास युग तथा सामंती प्रमाणी का सामंतवादी युग तथा अंतिम वर्ग समाज, पूंजीवादी उतपादन प्रणाली पर आधारित पूंजीवादी युग जिसके अंत के बाद वर्ग विहील, राज्य विहीन साम्यवादी युग, जो निरंतर सर्वहारा क्रांतियों से आएगा मगर जिसकी समय-सीमा नहीं तय की जा सकती । 

मार्क्स-एंगेल्स कम्यनिस्ट घोषणा पत्र के शुरू में ही लिखते हैं कि समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है और कम्युनिस्ट पार्टियों का इतिहास 200 साल से कम। कहने का मतलब यह कि वर्ग समाज में शोषण-उत्पीड़न और अन्याय के विरुद्ध सभी आंदोलन वर्ग संघर्ष के ही हिस्से हैं. जैसाकि ऊपर कहा जा चुका है कि मार्क्स का आकलन था कि क्रांति विकसित पूंजीवादी देश में होगा जहां प्रचुरता का बंटवारा मुद्दा होगा। लेकिन मार्क्स ज्योतिषी नहीं थे। मार्क्स के विकास के चरण के सिद्धांत से इतर मार्क्सवाद की विचारधारा की पहली क्रांति रूस में हुई जहां पूंजीवाद लगभग अविकसित था और सामंती उत्पादन संबंध सजीव थे। क्रांति की दो शर्तें हैं, क्रांतिकारी परिस्थितियां और सजग-संगठित क्रांतिकारी पार्टी रूस में दोनों का समागम हुआ, और जैसा ऊपर कहा गया है 1917 में ताबड़-तोड़ दो क्रांतियां हुईं, मार्च की बुर्जुआ जनतांत्रिक क्रांति और नवंबर में सर्वहारा क्रांति।  आबादी में किसानों और कारीगरों की संख्या अधिक थी। किसानों की लामबंदी के लिए ‘जो जमीन को जोते बोए वह जमीन का मालिक होए’ का नारा दिया गया था।

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